ऋतुओं में मैं वसन्‍त हूँ -भगवान श्रीकृष्‍ण

यह लेख ऋतुराज वसंत की सुंदरता, महिमा और प्रकृति पर उसके प्रभाव का भावपूर्ण वर्णन करता है। इसमें वसंत को भारतीय परंपरा, नव-सृजन, उल्लास, प्रेम, समरसता और सकारात्मक ऊर्जा की ऋतु के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा वसंत को अपनी विभूति बताए जाने से लेकर होली के उत्सव और प्रकृति के नव-रूप तक, लेख वसंत के विविध सांस्कृतिक, प्राकृतिक और आध्यात्मिक पक्षों को उजागर करता है।

Sep 3, 2026 - 18:05
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ऋतुओं में मैं वसन्‍त हूँ -भगवान श्रीकृष्‍ण
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ऋतुराज वसंत की महिमा ही कुछ ऐसी है कि देवताओं में श्रेष्ठ भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण ने गीतोपदेश में स्वयं को ऋतुओं में वसंत कहा है- ‘‘ऋतूनां कुसुमाकर:’’ (अध्याय १०, श्लोक ३५)। कुसुमाकर इसलिए कहा है, क्योंकि यह ऋतु पुष्पमय है। इस समय प्रकृति में सर्वाधिक सुंदर फूल सृजित होते हैं। स्वयं की विभूतियों में भगवान ने वसंत ऋतु को इसलिए सम्मिलित किया है, क्योंकि संसार में जो भी सबसे अधिक शुभ, सबसे अधिक सुंदर और श्रेष्ठ है, वही प्रभु श्रीकृष्ण की एक विभूति है। इस प्रकार वसंत भी अपवाद नहीं है, क्योंकि वह ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ है।

वैदिक काल में वसंत को ही प्रथम ऋतु माना जाता था, क्योंकि वसंत से ही प्रकृति अपनी तरुणाई में होती है। उसकी चपलता, कोमलता, उष्णता सम्पूर्ण जीव-जगत में नव-तरुणाई, नव-सृजन का संचार करती है। इस दौरान ही हमारा नववर्ष (चैत्र प्रतिपदा) भी प्रारंभ होता है, जो हर लिहाज से उपयुक्त है।

शीत ऋतु की विदाई के पश्चात् जब सौरमण्डल के सबसे प्रभावी ग्रह, सौर-नरेश भगवान सूर्य जब मीन और मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तब धरती पर एक नवीन, गुनगुनी एवं मादक ऋतु वसंत का आगमन होता है। चारों ओर धरती पर फैली ठिठुरता से अलसाया संसार अचानक ही अपनी चपलता में लौटने लगता है। जो पवन किटकिटाती शीतलता अपने में समोई होती है, इस समय तत्क्षण ही अपना स्वभाव बदलकर उष्णता बाँटने लगती है। सर्दियों में विहंग-जन समुदाय जहाँ अलसाये-उकताये-ठिठुराये अपने नीड़ों में एक प्रकार का निर्वसन जीते रहते हैं और वसंत की बाट जोहते रहते हैं। वसंत के आते ही विहंगों में पुनः जिजीविषा का संचार होता है।

इस ऋतु में धरती एक गुलाबी चादर ओढ़ लेती है। उसकी उर्वरा शक्ति में बढ़ोत्तरी हो जाती है और पेड़-पौधों में नये पत्ते पल्लवित होने लगते हैं। वसंत ऋतु, प्रकृति की सृजनात्मक शक्ति की द्योतक है। समस्त जगत में वसंत एक प्रकार की सकारात्मकता का संचार करता है। इस दौरान जब प्रकृति स्वयं ही गीत गाने लगती है, तो उनके अनुचरों में स्वतः ही प्राणों का संचार होने लगता है। किसान फसलों के पकने से प्रसन्न होते हैं और इसीलिए यह त्योहार या उत्सव मनाने के लिए भी उपयुक्त समय होता है।

वसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। वसंत ऋतु के समय में वातावरण में न तो अधिक शीतलता होती है और न ही अधिक ताप। समतापी इस मौसम में न तो नीरवता होती है और न ही उदासी। जैसे-जैसे गुनगुनी उष्णता, शीतलता का अतिक्रमण करते जाती है, वैसे-वैसे प्रकृति वसंत की लाली ओढ़ने लगती है। वासंती कोयल कुहू-कुहू से जनवृंद में मादकता का संचार होने लगता है। आम के पेड़ों पर अमराई फूटने लगती है। नीम, महुआ, पलाशादि समवेत स्वरों में वासंती गीत गाने लगते हैं। शामों में अचानक से एक सुरमईपन व्याप्त हो जाता है, जिसमें वासंती मन प्रेम हिलोरों में झूमने लगता है।

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अध्यात्मिक प्रेमियों के लिए यह समय विशेष अनुकूल होता है। जब समस्त प्रकृति, चराचर जगत वसंत के आगमन में उल्लसित हो, तो फिर प्रेमी क्योंकर पीछे रहें। इसी समय होली का त्योहार भी मनाया जाता है, जो कि हमारी एकात्मता, समरसता और एकांशी होने का उद्घोष करता है। रंग-बिरंगों फूलों का रस एकत्र कर उनसे होली के रंग बनाए जाते हैं और होलिका दहन के अगले दिन ‘धुलेण्डी’ को समस्त समाज एकरस और एकरंगी होकर इस आयोजन को मनाता है।

समस्त जन-समुदाय आपस में एक दूसरे को रंग लगाकर विगत में हुई भूलों को भुलाने की अपेक्षा करता है और मतभेदों को भुलाकर गले मिलता है। बच्चों की टोलियाँ गलियों में हुड़दंग मचाती हैं और उनकी बाल-सुलभ क्रियाएँ अनायास ही गोकुल-वृंदावन की याद दिला देती हैं। अब पानी की शीतलता बदन में फाँस की मानिंद चुभती नहीं, बल्कि अजीब-सी झुरझुरी उत्पन्न करती है। सभी का आने वाला वर्ष शुभ हो। शुभम् भवतु।

दुर्गेश कुमार ‘शाद

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