हाइजीन
यह कहानी एक ऐसी महिला के मनोविज्ञान को सामने लाती है जो बीमारी और बढ़ती उम्र के कारण कमला की दादी को घर के काम के लिए रखती है, लेकिन उसके प्रति मन में लगातार स्वच्छता, दूरी और वर्गभेद से जुड़े पूर्वाग्रह बनाए रखती है। एक दिन घंटी की आवाज से वह दादी की झुंझलाहट को महसूस करती है और धीरे-धीरे समझती है कि उसके पीछे भी अपने घर, परिवार और पोती से जुड़ी परेशानियाँ हैं। अंत में बची हुई खीर को ‘हाइजीन’ के डर से फेंक देना उसके भीतर मौजूद सामाजिक दूरी और पूर्वाग्रह को उजागर करता है। कहानी पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि स्वच्छता की चिंता और मनुष्य के प्रति संवेदना के बीच हमारी सोच कहाँ खड़ी है।
कॉल बेल की कर्र्.... कर्र् की आवाज आई। अभी कमला की दादी के आने का समय था, उसने ही घंटी बजाई होगी। कॉल बेल की आवाज तो एक जैसी ही होती है, लेकिन उसकी आवृत्ति और बजने के अंतराल से बजाने वाले की मनः स्थिति का अंदाज हो जाता है। कॉल बेल की तेज आवाज में आज झुंझलाहट साफ सुनाई दे रही थी।
घंटी की इस तेज आवाज से मेरे मन में खीझ हुई और मैंने अंदर से ही आवाज़ दी - ‘दरवाज़ा खुला है आंटी, अंदर आ जाओ।’ मेरी आवाज भी थोड़ी तल्ख़ हो गई थी। मैं फिर अपने आप से ही कह रही थी-‘कितने जाहिल होते हैं ये लोग भी...’
पिछले कुछ महीनों से जब तबियत बिगड़ी थी और अकेले घर का काम कर पाना मुश्किल जान पड़ा तब काफी सोच-समझकर और अपने मन को समझा-बुझा कर हमने घर के काम के लिए कमला की दादी को रख लिया था। लेकिन मैं अक्सर अपने मन को समझाती-‘केवल उसके ही आ जाने से घर का सारा काम हो जाता है, ऐसा तो है नहीं। बस थोड़ी सहायता मिल जाती है इसके आ जाने से...।’
कामवाली को रखने की बात पर घर में प्रायः चर्चा होती रही थी। लेकिन पति-पत्नी में से कोई भी पूरे मन से किसी को घर पर काम के लिए बुलाना स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। मैं हमेशा सोचती-‘कैसे कोई किसी अनजान को घर में बुलाए। पता नहीं कहाँ–कहाँ से काम करने की बाद अपने घर आएगी और फिर न जाने कैसे हाथों से बिना सफ़ाई के घर के सभी सामानों को छूती फिरेगी। मुझे तो घिन आती है यह सोचकर भी कि कोई कैसे घर में और रसोई में किसी को बुला ले और सारा काम करवाए।’
पति कहते - ‘घर में आकर कोई काम करे तो ऐसा लगेगा कि आदमी अपने ही घर में जैसे कैद हो गया हो। न अपने मन का काम कर पाओ, न अपने मन से रह सको, न अपने तरीके से बातें कर सको। कितना संभल कर बोलना पड़ेगा, जब तक कोई दूसरा घर में रहेगा। कुछ भी ऊँच-नीच बोलो तो न जाने कहाँ-कहाँ बातें पहुँच जाएगी। ऐसे लोगों से ही पूरे मुहल्ले में घर के हर एक बात की जानकारी हो जाती है और लोग बातों का न जाने क्या-क्या मतलब निकालेंगे।’
ऐसी ही सोच के साथ हमने कभी किसी कामवाली को घर के काम के लिए नहीं रखा। बल्कि घर को किसी भी बाहर वाले के लिए निषेध ही रखा।
लेकिन उम्र के साथ जब शरीर थकने लगा और घर का काम छूटता-सा लगने लगा, तो घर के काम के लिए सहायता की ज़रूरत महसूस होने लगी थी। ऐसे में ही कमला की दादी को बर्तन और घर की सफाई के लिए हम दोनों ने मन को बहुत मुश्किल से समझाते हुए रख लिया था। उसकी उम्र को देखकर हम उसे आंटी कहने लगे थे।
शुरूआती दिनों में आंटी अधिक बातें नहीं करती और न ही मैं जरूरत से अधिक उससे कुछ बोलती। आंटी आती, सीधे रसोई में जाती, बर्तन की सफाई करती, घर की सफाई करती और चली जाती। लेकिन समय के साथ आंटी थोड़ी बहुत बातें अपने घर, परिवार और मुहल्ले की करने लगी थी। वह अक्सर अपने बेटा, बहू के साथ-साथ अपनी तीन साल की पोती की बातें सुनाती।
‘आज तो पोती छोड़ ही नहीं रही थी बीवी जी। कह रही थी, अम्मा, काम पर मत जाओ। मेरे साथ खेलो। अब खेलने से पेट भरेगा क्या, बोलो बीवी जी।’
वह मुझे बीवी जी कहने लगी थी। यह जरूरी नहीं होता कि उसकी सभी बातें मैं सुन ही रही हूँ। उसकी बातें सुनकर मैं बस ‘हाँ’ में अपना सिर हिला देती। मुझे लगता हर बात का जवाब देना जरुरी थोड़े ही है।
बार-बार मन कहता, बस तबियत में थोड़ा सुधार हो जाए, फिर खुद ही सारा काम कर लुंगी। घर का काम भी आखिर कितना होता है। लेकिन एक बार आंटी काम पर आने लगी तो फिर वह आने ही लगी। पहले से मन में बैठे सारे नेम-टेम धरे रह गए। लेकिन आंटी जब भी काम करने आती, मन में हमेशा एक बात आती रहती - ‘एक बार काम करने आ गई है तो जल्दी अपना काम निपटाकर वापस चली जाए। देर तक नहीं रुके। देर तक रुकेगी तो पता नहीं क्या-क्या छूती रहेगी। बिछावन, चादर, धुले कपड़े। कितनी मेहनत से कपड़ों को धोना पड़ता है। सारा साफ़-सुथरा सामान पता नहीं कैसे हाथों से छुएगी।’
उस दिन जब घंटी बजी और मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा कि आंटी अपनी पोती कमला को भी साथ लाई थी। दरवाज़े पर उन दोनों को देखकर मैं मन ही मन झुंझला गई थी। लेकिन तीन साल की उस मासूम बच्ची को देखकर मैं कुछ कह नहीं सकी। मैंने कोशिश की कि मेरे चेहरे पर आया भाव आंटी देख न सके।
आंटी अपनी पोती को ड्राइंग रूम में बैठा कर रसोई में सफाई के लिए जाना चाह रही थी, लेकिन वह अपनी दादी के पीछे-पीछे रसोई तक चली गई और उसके पीछे ही खड़ी रही। वह अपनी दादी के पीछे-पीछे, जहाँ-जहाँ वह काम करने जाती, घूमती रही। मैंने कई बार नरम लहजे में उसे एक जगह बैठने को कहा और प्लास्टिक की एक कुर्सी दीवार से लगाकर रख दी। लेकिन शायद उसे मेरी बातों में कोई अपनापन और प्यार महसूस नहीं हो रहा था और वह अपनी दादी के साथ ही चिपकी घूमती रही।
उस दिन मैं चाह रही थी कि आंटी का काम जल्दी से खत्म हो और वह चली जाए। पूरे घर में उस बच्ची का घूमना मुझे असहज कर रहा था। शायद आंटी भी यह जान गइ& होंगी। उस दिन के बाद वह अपनी पोती को अपने साथ कभी भी नहीं लाई।
आंटी के आने का समय हो गया था। मैं सोच रही थी कि जूठे बत&नों को जल्दी से समेटकर नल के पास रख दूँ। ऐसा नहीं किया तो आधे बत&न तो यूँ ही छूट जाते हैं। ऐसा तो है नहीं कि गंदे बत&न दिखें तो वह खुद ही समेट ले और साफ कर दे। लेकिन वह भी बेचारी क्या करे। उसे तो पहले दिन से ही हिदायत दे दी गई थी कि बेवजह इधर-उधर न घूमे और रसोई और खाने-पीने के सामानों को बेवजह न छुए। फिर तो आंटी उन्हीं बत&नों की सफाई करती जो नल के पास रखे होते। वह भी आखिर बेवजह दो बातें सुनने का मौका क्यों दे।
आंटी अपने समय पर आ गई थी। घंटी बजी, दरवाज़ा खुला और वह सीधा रसोई की ओर चली गई। वह आते ही पहले राम-राम कह कर अभिवादन करती और अपने कामों में लग जाती। लेकिन आज उसने कोई राम-राम नहीं किया।
नल पर जूठे और गंदे बत&न रखे थे। उसने एक-एक बत&न से पहले जूठन अलग किया और वहीं रखे डस्टबिन में डालती रही। एक बार पानी से सभी बत&नों को साफ़ किया और फिर उन्हें माँजने लगी। बत&नों के माँजने की आवाज़ के साथ-साथ वह अपने आप में कुछ बुदबुदा भी रही थी। रसोई से अस्पष्ट-सी आवाज आ रही थी। शायद आज उसका मन थोड़ा चिढ़ा हुआ था। आखिर क्यों न हो। मन ही तो है। और यह भी कोई उम्र है घर-घर जाकर जूठे बत&न साफ करने की। यदि मजबूरी न होती तो कोई भला क्यों दूसरे का जूठा बत&न साफ करता फिरे।
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आज आंटी का मन झुंझलाया हुआ था। यह मुझे घंटी की आवाज से ही मालूम चल गया था। उसकी तीन साल की पोती कल रात से ही ज़िद कर रही थी कि उसे खीर खाना है। कल रात वह रोते-रोते सो गई थी। उसने पूरा घर जैसे सिर पर उठा लिया था। बेटा और बहू भी कितना चिल्ला रहे थे उस बच्ची पर। बेटे ने तो हाथ ही उठा दिया था। उस छोटी बच्ची पर क्या गुजरती, यदि वह बीच में नहीं आ गई होती।
यही सोचते-सोचते आंटी एक-एक बत&न माँज रही थी। उसके हाथ में दूध का पतीला आया। उसमें दूध की मलाई जल गई थी। आंटी के हाथ उस पर सफ़ाई के लिए चल रहे थे। पतीले में रात खीर बनाई गई थी। उसे माँजते हुए रात की सारी घटना आंटी के सामने एक बार फिर घूम गई।
आंटी काम निपटा कर जा चुकी थी। आंटी के जाने के बाद मैं रसोई में गई। आज मैंने जल्दीबाज़ी में बत&न खाली किया गया था और कल रात की बची हुई खीर रसोई के स्लैब पर छूट गई थी। मैंने सोचा था, प्रिâज में रख दूँगी, लेकिन मालूम नहीं कैसे जल्दीबाज़ी में कटोरी बाहर ही छूट गई थी।
रसोई में आकर मैंने देखा, वह कटोरी बाहर ही रखी थी। मेरे मन में अचानक आया – ‘आंटी काम करते-करते हाथों से कितना पानी झटकती रहती है। मालूम नहीं पानी के छींटे कहाँ-कहाँ जाते होंगे। एक बार बातों-बातों में इसके लिए उसे टोका भी था, लेकिन इन लोगों की आदत में कोई सुधर नहीं हो सकता...। ’
मैं कुछ देर खड़ी सोचती रही - ‘अब इसे कौन खाएगा। हाइजीन भी तो ज़रूरी है न। अब इतनी खीर के लिए आदमी अपनी तबियत तो खराब नहीं कर सकता।’
मैंने खीर की कटोरी उठाई और डस्टबिन में डाल दी।
पद्मराग मणि
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