अधूरी प्रेम कथा
यह कहानी चंपा और सुनील की मासूम, सच्ची और अधूरी मोहब्बत की है। चंपा फूल बेचने वाली एक किशोरी थी और सुनील टेंपो चलाने वाला युवक। रोज माला खरीदते-खरीदते दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए। उनकी मोहब्बत में दिखावा या जिस्मानी लालसा नहीं, बल्कि सच्चे दिल का अपनापन था। लेकिन परिस्थितियों ने दोनों को अलग कर दिया। सुनील अपने बीमार पिता के कारण गांव चला गया और जब लौटा, तब तक चंपा की शादी हो चुकी थी। वर्षों बाद मुलाकात में दोनों ने महसूस किया कि उनका प्रेम आज भी कहीं न कहीं जिंदा है, लेकिन किस्मत उन्हें एक नहीं कर सकी। यह कहानी अधूरे प्रेम, यादों और जीवन की मजबूरियों का बेहद भावुक चित्रण है।
शहर के बीचो-बीच टेंपो स्टैंड के पास फूल वाली बैठती थी जो दिन भर फूल और फूल मालाएं बे चती थी।
उनमें से एक मालन का नाम था चंपा वह लगभग १५ साल की थी, सुबह-सुबह वहां एक टेंपो वाला जिसका नाम सुनील था, टेंपो लेकर स्टैंड पर आता और कनखियों से देखते हुए फिर शरमाता हुआ चंपा के पास जाता और एक माला खरीदता। सुनील करीब १९ २० साल का लड़का था उसे चंपा पसंद थी वह और कहीं से माला नहीं खरीदता था
धीरे-धीरे चंपा भी उसकी और आकर्षित होने लगी शायद दोनों की उम्र का यही तकाजा था। एक दिन माला खरीदते समय सुनील ने चंपा का हाथ हल्के से दबा दिया चंपा का रोम रोम सीहर उठा
उसने भी जवाब में सुनील का हाथ दबा दिया।
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कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा, फिर एक दिन सुनील ने हिम्मत करके चंपा को कहा'घूमने चलोगी क्या मेरे साथ'
चंपा ने हां में गर्दन हिला दी। एक दिन चंपा अपनी छोटी बहन को वहां बिठाकर चुपके से सुनील के साथ घूमने निकल गई, वह लोग बीच पर गए मंदिर गए खूब बातें की। कुछ घंटे बाद सुनील चंपा को वापस वहीं स्टैंड पर उतार दी।
अब चंपा सुबह-सुबह सुनील का इंतजार करने लगी कि कब आए। इस बीच दोनों कई बार टेंपो में घूम कर आ गए उनकी मोहब्बत बिल्कुल पाक थी जो दिल से थी उनमें जिस्म की भूख किसी में भी न थी। फिर कुछ दिनों बाद पता नहीं क्या हुआ कि सुनील का टेंपो स्टैंड पर आना बंद हो गया, चंपा रोज उसका इंतजार करती दिनभर उसका उदासी मैं निकलता।
जब बहुत दिन निकल गए तो चंपा भी सहज हो गई कुछ दिनों बाद उसकी शादी भी हो गई और एक फूल सा बच्चा भी हो गया। पति मजदूरी करता था। एक दिन वह अपने बच्चे के साथ बैठी थी और फूल मालाएं बन। रही थी। तभी उसकी नजर एक टेंपो पर पड़ी मानो पुराने जख्म हरे हो गए। वह टेंपो सुनील का था पहले से बहुत कमजोर नजर आ रहा था। वह चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए चंपा के पास पहुंचा और एक माला मांगी। चंपा में माल। पकड़ा दी उसे खुशी भी हुई थी और दुख भी हुआ खुशी तो इस बात की वापस आ गया और दुख इस बात की वह उसे पा ना सकी
पकड़ते हुए बोली `इतने दिन का रह गए थे' सुनील थोड़ा उदास होकर बोल।' पिताजी को कैंसर था तो आती थी, इसलिए वापस शहर लौट आया।'
उनमें से एक मालन का नाम था चंपा वह लगभग १५ साल की थी, सुबह-सुबह वहां एक टेंपो वाला जिसका नाम सुनील था, टेंपो लेकर स्टैंड पर आता और कनखियों से देखते हुए फिर शरमाता हुआ चंपा के पास जाता और एक माला खरीदता। सुनील करीब १९ २० साल का लड़का था उसे चंपा पसंद थी वह और कहीं से माला नहीं खरीदता था
धीरे-धीरे चंपा भी उसकी और आकर्षित होने लगी शायद दोनों की उम्र का यही तकाजा था। एक दिन माला खरीदते समय सुनील ने चंपा का हाथ हल्के से दबा दिया चंपा का रोम रोम सीहर उठा
उसने भी जवाब में सुनील का हाथ दबा दिया।
कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा, फिर एक दिन सुनील ने हिम्मत करके चंपा को कहा'घूमने चलोगी क्या मेरे साथ'
चंपा ने हां में गर्दन हिला दी। एक दिन चंपा अपनी छोटी बहन को वहां बिठाकर चुपके से सुनील के साथ घूमने निकल गई, वह लोग बीच पर गए मंदिर गए खूब बातें की। कुछ घंटे बाद सुनील चंपा को वापस वहीं स्टैंड पर उतार दी।
अब चंपा सुबह-सुबह सुनील का इंतजार करने लगी कि कब आए। इस बीच दोनों कई बार टेंपो में घूम कर आ गए उनकी मोहब्बत बिल्कुल पाक थी जो दिल से थी उनमें जिस्म की भूख किसी में भी न थी। फिर कुछ दिनों बाद पता नहीं क्या हुआ कि सुनील का टेंपो स्टैंड पर आना बंद हो गया, चंपा रोज उसका इंतजार करती दिनभर उसका उदासी मैं निकलता।
जब बहुत दिन निकल गए तो चंपा भी सहज हो गई कुछ दिनों बाद उसकी शादी भी हो गई और एक फूल सा बच्चा भी हो गया। पति मजदूरी करता था। एक दिन वह अपने बच्चे के साथ बैठी थी और फूल मालाएं बन। रही थी। तभी उसकी नजर एक टेंपो पर पड़ी मानो पुराने जख्म हरे हो गए। वह टेंपो सुनील का था पहले से बहुत कमजोर नजर आ रहा था। वह चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए चंपा के पास पहुंचा और एक माला मांगी। चंपा में माल। पकड़ा दी उसे खुशी भी हुई थी और दुख भी हुआ खुशी तो इस बात की वापस आ गया और दुख इस बात की वह उसे पा
ना सकी माला पकड़।ते हुए बोली 'इतने दिन का रह गए थे' सुनील थोड़ा उदास होकर बोल।' वह पिताजी कोकैंसर था तो गांव चला गया कुछ समय बाद में उनकी मृत्यु भी हो गई खेती-बाड़ी का काम मैं संभाल। पर उससे घर खर्च मुश्किल से चलता था दिक्कत भी बहुत आती थी, इसलिए वापस शहर लौट आया।'
वह शरमाते हुए बोली `क्या तुम्हारी शादी हो गई' वह बोला नहीं' चंपा बोली क्यों नहीं की वह उदास स्वर में बोला' दिल तो मैं तुम्हें दे गया था शादी करके क्या करता' इस बात से दोनों उदास हो गए वह माल। लेकर चला गया। उस दिन के बाद सुनील और चंपा कभी नहीं मिले।
मांगीलाल शर्मा
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