आदम ख़ोर

यह कहानी राबिया नाम की एक बीमार लेकिन आत्मिक रूप से बेहद मजबूत महिला की है, जो अपने जीवन के संघर्षों, रिश्तों की सच्चाई, समाज की संवेदनहीनता और प्रेम की शक्ति को जीते हुए आगे बढ़ती है। कहानी में “आदमखोर कबीला” एक प्रतीक है—उन लोगों का जो स्वार्थ, लालच और निर्दयता के कारण इंसानियत खो चुके हैं। राबिया बीमारी, रिश्तेदारों की बेरुख़ी और मानसिक यातना से गुजरती है, लेकिन उसका पति और बेटियाँ उसके लिए ढाल बनकर खड़े रहते हैं। कहानी आधुनिक समाज में टूटते रिश्तों, बदलती संस्कृति, संवेदनहीनता और मानवता के संकट को उजागर करती है। साथ ही यह भी दिखाती है कि सच्चा प्रेम, त्याग, सेवा और करुणा आज भी इंसानियत को जीवित रखे हुए हैं। यह कहानी प्रेम, पीड़ा, परिवार, आस्था और मानवीय मूल्यों का अत्यंत भावुक और गहन चित्रण है।

May 23, 2026 - 13:25
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आदम ख़ोर
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कहानी तो हम सब के अन्दर समुन्दर की लहरों की तरह उभरती डूबती रहती हैं .
समुन्दर में मैं हूँ 
मुझ में समुन्दर 
बारिश की बूँदें समुन्दर में 
और समुन्दर बारिश की बूंदों में .
मुझे करीब से देखो 
पहचानो !
उभरती डूबती लहरें तुम से क्या कह रही हैं ?
आदमी !
साँप से भी ज़हरीला आदमी !!
आदमी हरे भरे दरख्तों की जड़ों को कुरेदता आदमी , दरख्तों को काटने के मुआमले में शर्मनाक किरदार निभाता आदमी -
आदमी - सुख में साथ देता , दुख में साथ छोड़ता आदमी-
आदमी बीमार  परीशाँ को देख कर मुस्कुराता आदमी ----
आदमी अब आदमी कहाँ रह गया है - वह तो भागा जा रहा है , तेज़ धूप में बारिश में , आंधी और तूफ़ान में , मंजिल का पता नहीं , वह तो है किसी और राह का मुसाफिर , मगर भागा  जा रहा है , टेढ़ी मेढ़ी पगडण्डीयों पर ..........
अज़मत ए आदम की गुम  होती तहरीक क्या तुम्हें बेचैन नहीं करती मेरे ननकू !
कहानी अब शुरू होती है , मेरे प्यारे ननकू !!
आज कल रातों में नींद नहीं आती-जाग जाती है राबिया अक्सर  रातों में खांसते खांसते - देखती है  वह दायें बाएं, एक तरफ सोयी अपनी बेटियों को, दूसरी तरफ अपने शौहर को, जिस के चेहरे पर एक इत्मीनान है की वह अपनी गिरफ्त से जाने नहीं देगा, शायद दोनों की रूहें मुहब्बत की डोर से बंधी हैं -
रूह का रिश्ता एक बीमार बीवी और शौहर का -
शौहर के चेहरे में कभी वह कभी अपनी माँ को देखती है , तो कभी अपने वालिद को कि आज कि माएँ तो कुत्ते के बच्चों को गोद में ले कर प्यार करती हैं, मगर खुद उनकी बेटियां नौकरानी कि गोद में पलती हैं बढती हैं-
माँ एक गुमशुदा पंछी कि तरह और हमारा आज का कल्चर, कुत्ता कल्चर !
आदमी कुत्ता - कुत्ता आदमी .
`सावधान यहाँ कुत्ते रहते हैं '
आदमी कहाँ रहते हैं कहाँ बसते हैं -?
घरों में आदमी के चेहरों की जगह कुत्तों ने ले ली -
हम तरक्की कर रहे हैं मेरे दुलारे  ननकू !

घरों में आदमी के चेहरों कि जगह कुत्तों ने ले ली - पुरानी सुनहरी क़दरों की जगह नई क़दरों ने ले ली  फ़िरोज़पुर डिविज़न  के काला बकरा स्टेशन पर बैठे राबिया और ननकू दुरंतो एक्सप्रेस का इंतज़ार कर रहे हैं और राबिया कहानी सुना रही है - ननकू सोच रहा है की यह कहानी राबिया अपनी सुना रही है या फिर कोई और राबिया मालकिन के अन्दर रच बस गयी है -
वैसे मालकिन ने जिंदगी में बहुत उतार चढ़ाव देखे हैं -

`काला बकरा' स्टेशन पर कहानी आगे बढती है-प्लेटफार्म नंबर २ पर, चंद क़व्वाल कहीं जा रहे थे, उनके इर्द गिर्द भीड़ जमा थी, किसी ने भीड़ में से फरमाईश की और फिर फ़िल्मी गानों पर लिखी गयी नातों पर,हाथों में झंडे लिए लोग झूमने लगे- पान खा कर क़व्वाली की महफ़िल जम गयी-
हर किस्म की हवाएं बह रही हैं. हवाएं ठंडी भी, गर्म भी... इंसानी जिंदगी के मुताबिक भी . इन हवाओं पर किस की हुकूमत है? मगर क़व्वाली में किसी और को मुरादें पूरी करने वाला कहा जा रहा था ...
`ननकू! कहाँ गुम हो गया रे...क्या सोच रहा है? क्या देख रहा है?'
`कहीं नहीं मालकिन, सफ़र में एक तरह के खय़ालात नहीं आते,मैं शऊर की रौ में बह रहा था,सामने भीड़ को देख कर, भीड़ की मंजिल का हमें पता नहीं होता ...'
`चल, कहानी सुन! आने वाले दिनों में तुझे कहानी सुनाने वाला चेहरा नहीं दिखाई देगा '.
राबिया का बीमार जिस्म काँप रहा है , कमजोरी से डर रहा है, डर रहा है मौत की आहट से, मगर वह मरना नहीं चाहती, निजात पाना नहीं चाहती इस तकलीफ से, जो इस के लिए रहमत हैं, उसकी जन्नत हैं. रब की कुर्बत है ...
राबिया रो रो कर सारी रात जागती है, जिस्म की तकलीफ की शिद्दत आजकल कुछ ज्यादह बढ़ गयी है. रूह ज़ख़्मी है, मगर वह उसे रब की रहमत मानती है. रात के एक बजे से सुबह के छः बजे के सरे लम्हे कभी लेटे लेटे तो कभी बैठे बैठे गुज़र जाते हैं-सोचती चलो उठ कर `तहज्जुद' पढ़ लें - लेकिन जिस्म में न तो `फ़जिर' पढने की ताक़त है, न ही तहज्जुद की ..न ही खड़े होने की ताक़त है न ही बैठने की ...लब हिल रहे हैं, इशारों में रुकू और सजदे हो रहे हैं .
 `काला बकरा' स्टेशन पर कहानी आगे बढती है- प्लेटफार्म नंबर २ पर , चंद क़व्वाल कहीं जा रहे थे , उनके इर्द गिर्द भीड़ जमा थी, किसी ने भीड़ में से फरमाईश की और फिर फ़िल्मी गानों पर लिखी गयी नातों पर ,हाथों में झंडे लिए लोग झूमने लगे-पान खा कर क़व्वाली की महफ़िल जम गयी -
हर किस्म की हवाएं बह रही हैं .हवाएं ठंडी भी, गर्म भी ... इंसानी जिंदगी के मुताबिक भी. इन हवाओं पर किस की हुकूमत है? मगर क़व्वाली में किसी और को मुरादें पूरी करने वाला कहा जा रहा था ...
`ननकू ! कहाँ गुम हो गया रे... क्या सोच रहा है? क्या देख रहा है?'
`कहीं नहीं मालकिन, सफ़र में एक तरह के खय़ालात नहीं आते , मैं शऊर की रौ में बह रहा था,सामने भीड़ को देख कर, भीड़ की मंजिल का हमें पता नहीं होता ...'
`चल , कहानी सुन! आने वाले दिनों में तुझे कहानी सुनाने वाला चेहरा नहीं दिखाई देगा '.
राबिया का बीमार जिस्म काँप रहा है , कमजोरी से डर रहा है, डर रहा है मौत की आहट से, मगर वह मरना नहीं चाहती, निजात पाना नहीं चाहती इस तकलीफ से, जो इस के लिए रहमत हैं, उसकी जन्नत हैं. रब की कुर्बत है ...
राबिया रो रो कर सारी रात जागती है, जिस्म की तकलीफ की शिद्दत आजकल कुछ ज्यादह बढ़ गयी है. रूह ज़ख़्मी है, मगर वह उसे रब की रहमत मानती है. रात के एक बजे से सुबह के छः बजे के सरे लम्हे कभी लेटे लेटे तो कभी बैठे बैठे गुज़र जाते हैं- सोचती चलो उठ कर `तहज्जुद' पढ़ लें-लेकिन जिस्म में न तो `फ़जिर ' पढने की ताक़त है, न ही तहज्जुद की ..न ही खड़े होने की ताक़त है न ही बैठने की ...लब हिल रहे हैं, इशारों में रुकू और सजदे हो रहे हैं.
एक तरफ बीमार जिस्म दूसरी तरफ ठण्ड का मौसम शुरू हुआ ही है कि खांसी परीशां करने लगी .सारा जिस्म तकलीफ से जुंबिश कर रहा है, दिमाग को छोड़ कर, दिमाग ही तो इन्सान का सब से बड़ा दुश्मन है, अगर यह अपने पीछे की तरफ छूटती जिंदगी को याद दिलाने का काम छोड़ देता तो शायद राबिया थोडा सुकून पा जाती.
राबिया सोचती है कि कोई इन्सान कौमा में चला जाता है या उसका ब्रेन डेड हो जाता है तो उसके रिश्तेदार, मिलने जुलने वाले कहने लगते हैं कि बस वह ख़त्म ही हुआ समझो. तख्लीक्कार इस जहाँ में मरने से पहले शायद अपनी तखलीक को थोड़े वक़्त के लिए सुकून दे देता है. जिस में कुछ याद नहीं रहता सिर्फ साँसें चलती रहती हैं -
राबिया कई मर्तबा कौमा में जा चुकी है. उसके रिश्तेदार उस के मरने का इलान भी कर चुके थे. मगर आज भी वह जिंदा है .
राबिया को अच्छी तरह से याद है, आठ साल कि उम्र में अपनी अम्मी से सुनी हुई वह कहानी जो अल्लाह जाने सच थी या झूठ .
आज भी याद है वह आदम खोर इंसानों की कहानी .
कभी पुराने ज़माने में आदम खोर कबीले हुआ करते थे. अगर कोई मुसाफिर वहां फँस जाता था तो सेहतमंद हुआ तब तो ठीक है. मगर उसकी तबियत ज़रा भी ख़राब रही तो कबीले वाले रात ही में उसे मार कर , भून कर खा जाते थे.
बचपन में राबिया ने जब यह कहानी सुनी थी तो उसे दस दिन तक नींद नहीं आई थी. एक खौफ़, एक डर उसके अन्दर जाग गया था. एक खौफ़ज़दा बच्चे की तरह वह सोचती रहती थी कि कैसे एक बीमार आदमी को मार देते होंगे, कैसे खा जाते होंगे. शायद राबिया कि जिंदगी में पहली मर्तबा आज की तरह नींद आँखों से कोसों दूर चली गयी होगी. अब तो राबिया को ऐसा लगता है कि पहले तो कुछ कबीले ही आदम खोर हुआ करते थे, लेकिन आज आदमखोरों में से इन्सान को ढूँढना पड़ता है .
आदम खोर घर के आँगन में भी, और आँगन के बहार भी!
आँगन !
आदम खोर !!
फिजा ज़हरीली होती जा रही है और मौत कि तिजारत में लगे हैं, ताजिरान ए वक़्त.
राक्षस संस्कृति ....
आदमखोर मार डालता है एक बीमार को ज़ख़््मी कर देता है उसकी रूह को, लहूलहान कर देता है शरीर के हर अंग को. हाथ मुंह धोता है, डायनिंग टेबल पर खाना खाता है .शराब पीता है, सूद का चखना लेता है, रहता है मुस्लमान की तरह !
 
`मालकिन आप बिल्ली को कितना प्यार करती थीं'
ये जुमले अदा करते हुए ननकू ने कहानी में ब्रेक लगा दिया, मगर यह कोई कमर्शियल ब्रेक नहीं था.
`हाँ रे ननकू! अगर तुम्हारा दिल एक बिल्ली भी नहीं ले सकती तो समझ लो वह मुर्दा हो चूका है , उसे काले पत्थर के साथ रख दो'
`दुरंतो एक्सप्रेस एक घंटे देरी से प्लेटफार्म नंबर एक पर आएगी यात्रियों को हुई असुविधा के लिए हमें खेद है.' अनौन्स्मेंट हो रहा था और कहानी फिर शुरू हो गयी...
माँ के सामने दम तोड़ गया एक मासूम बच्चा.
आदम खोर कुत्तों ने नोच नोच कर मार डाला. गाँव में काफी आक्रोश था. बच्चा को बचाने के लिए गाँव वालों ने काफी कोशिश की, मगर आदम खोर कुत्तों के आगे किसी की न चली. गाँव वालों का कहना था कि एक साल पहले एक बीमार मास्टर जी को भी आदम खोर कुत्तों ने नोच कर मार डाला था. गाँव वाले बताते हैं कि हड्डा गाँव में बागमती नदी के किनारे सैकड़ों आदम खोर कुत्ते रहते हैं,जो बीमार जानवरों, मरे हुए जानवरों के मॉस को नोंच नोंच कर खाते खाते आदम खोर हो गए और सरयू नदी के किनारे  नामालूम लोगों की जो लाशें मिली थीं . उसके बाद आस पास के इलाके में भी आदम खोर कबीला की अफवाह अफवाही थी .
आदम खोर चेहरा बिगाड़ देता है जिंदगी का .
बनाता है अपना शिकार 
सुनहरी तहजीब को 
`रौशन ' को,
और फिर पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को सौंप दी जाती है.
अगर राबिया को शौहर की शकल में इन्सान न मिला होता तो आज उसकी हड्डियाँ भी बाक़ी नहीं होतीं, काबर उसे कब का निगल गयी होती .
राबिया बीमार है, सख्त बीमार, इतनी बीमार की किसी पल का ठिकाना नहीं , जिस्म बेहद कमज़ोर,लेकिन रूह बेहद मज़बूत.
राबिया को अपना बचपन याद आता है . जब उसकी दादी माँ सख्त बीमार पड़ी थीं तो मोहल्ले की पुरानी सहेलियां जो उन्हीं की तरह बूढी थीं . नाश्ते के बाद से ही आ जाया करती थीं , कोई सर में तेल लगा रही होतीं , तो कोई बालों में कंघी , कोई कमज़ोर पाँव  में तेल की मालिश , फिर कोई उनकी साडी बदल रही होतीं. तो कोई राबिया के ब्याह के गीत गाने लगतीं.. 

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खोलो न किवड़िया जल्दी आवें मेरी लाडो 
तुमरा टीका लिए हम खड़े हैं जी लाडो  
अरे जल्दी आवें मेरी लाडो ........
तुमरा बेसर लिए हम खड़े हैं जी लाडो 
तुमरा कंगन लिए हम खड़े हैं जी लाडो 
अरे आवें मेरी लाडो ..

यह गीत सरहद के उस पार से आई दादी माँ की बड़ी बहन ने सुनाया था , और इस गीत को `आपा नानी' ने ढोलक की थ्ााप, सुर और ताल के साथ आर्यवर्त की ज़मीन से उपजे काले काले चावल के दानों जैसे ल़फ्ज़ों को एक नई  ज़बान अत कर दी थी .
`बन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी / बन्नो तेरा बनना लाख का रे /बन्नो तेरी जोड़ी है हजारी ....'

राबिया को शादी के वक़्त के हर चेहरे याद आने लगे . शौहर की बेलौस मुहब्बतें, उसके स्पर्श से न जाने कितने रंग बिरंगे ख्वाब , खुशियों से भरे सपने उसकी आँखों में तैरने लगे. ज्यों ज्यों दोनों बेटियां बड़ी होने लगीं . राबिया की आँचल की छाँव में निखरने  लगीं , संवरने लगीं , दोनों जहाँ में अपनी शिनाख्त कायम रखने की खातिर तो उसका शौहर जिसे प्यार से वह खुसरू पुकारा करती थी कहने लगा था ---
बेटियां शबनम की बूंदों सी होती हैं. बेटियां काँटों की राह पर चल कर भी, दूसरों की राहों में फूल बिछाती हैं, बेटियों की आवाजें, उनकी हंसी, नर्म नर्म हथेलियाँ, और उन हथेलियों पर लिखी एक इबारत `अच्छी तरबियत' एक प्यारा सा एहसास दिल में जगाती हैं .
अब तो माँ के सर से `आँचल' सरकता जा रहा है , 
`आँचल' जिस में हमारी सुनहरी संस्कृति के ज़री बूटे जड़े होते थे , 
`आँचल' जिंदगी की तपती दोपहर में ठंडी छाँव दिया करते थे 
वह धानी रंग चुनरिया अब कहाँ लहराती है ....
नेक बख्त लोगों का चेहरा भी धीरे धीरे घर के `आँगन' से गुम होता जा रहा है, अब तो घरों में सिर्फ दरवाज़े हैं,आँगन तो हमारे घरों से कब का गायब हो चूका है .
अन्नार
मज़ख 
ऐ मेरे क़दीम ज़माने के दरख़्त !
तुम अपनी हरी भरी टहनियों को एक दुसरे पर मार कर आग बरसाओ ना.
लज्ज़त और सरूर बख्शने वाली शराब को छोड़, दुनियावी शराब के नशे में भीड़ आगे ही आगे बढ़ी चली जा रही है, अंजाम से बे खबर. लोगों के दिलों में यह गुमान हो गया है कि इनका मालिक जब्बार ओ क़ह्हार नहीं सिर्फ रहीम ओ करीम है -
गरीबों को नवाजने वाला कौन ?
मुश्किल कुशा कौन ?
दस्तगीर कौन ?
मगर हम किसे पुकार रहे हैं ??
किस से मदद मांग रहे हैं ???
घर के आँगन में उगे हरे भरे पौधे आँखों को सुकून देते हैं,ठंडक पहुंचाते हैं. गर्मी के मौसम में राबिया अपने घर के आँगन में पौधों का खास ख्याल रखती थी.ख्याल भी सिर्फ इस लिए रखती थी कि इनकी हरी हरी पत्तियां रब की तस्बीह में मसरूफ हैं .
राबिया बोलती थी कि हर आदमी की जिंदगी में हमेशा एक सा मौसम नहीं रहता है. कभी हथेलियाँ गर्म हवाओं से सख्त हो जाती हैं तो कभी बारिश कि बूंदों से नम !
जिंदगी में हर तरह के मौसम को वह अपनी खुशकिस्मती मानती थी, वह शाकिरा और साबीरा (धर्यवान) जो ठहरी .
राबिया कि जिंदगी में भी ऐसा मौसम आया जो उसे जिंदगी की, रिश्तेदारों की हकीकत समझा गया. जब धुप में मुरझाते पौधों को पानी से   सींचने और धुप से बचाने की बजाये, सारे लोग उसके आँगन के सारे पौधों को जड़ से काटने में जुट गए और उसे अपने हिस्से की सब से बड़ी `नेकी' समझने लगे. किसी को यह एहसास तक नहीं हुआ, कहीं ये बाग़ की हरियाली गुम न हो जाये इंसानी रिश्तों की तरह...!
ज्यादा सुर्ख मिटटी से पौधे सूखने लगते हैं और नमी वाली मिटटी से पौधों को चिलचिलाती गर्मी में नई जिंदगी मिलती है.मगर राबिया की जिंदगी की बगिया में सारे खुनी रिश्ते सुर्ख मिटटी डालने में जुट गए .
 
पौधे और इंसान में फर्क.
पौधे को स्प्रे से पानी दिया जाता है, और बीमार को ...
बासी कढ़ी में मक्खी गिरी आगे मेरी अम्माँ ! 

राबिया को फिर बचपन की कहानियों में बसा वह कबीला डराने लगा, जैसे ही उसे याद आने लगी खुनी रिश्तेदारों की वह बातें, वह मुकालमे...
`मेरी बेगम कोई नर्स नहीं जो बीमार बेटी का ख्याल रखें .’
 `बीमार की अयादत तभी मुमकिन है, जब वह अच्छे से बात करे'
 `मेरी बेटी मर गयी’
`बीमार बीवी  से सच्ची मुहब्बत, जोरू की गुलामी '
...इस तरह की कई आवाजें उस का पीछा कर रही थीं,और हर आवाज़ की अपनी एक शकल थी ..
 
मगर वह जिस का र्म्rीूग्हग्हा बढा हुआ हो , जिसका र्ल्rी बढा हुआ हो, जिस का प्ं  सिर्फ ४ हो, जो बिलकुल सेहतमंद रहा हो और अचानक ये सब रोग साथ हो गए हों ... वह जो कौमे की हालत में हो.... वह जो ..... वह जो ..... 
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`राबिया उसके शौहर और दोनों बेटियों को यहाँ से निकल फेंको, बीमार बेटी को घर में पनाह न दो, एक दिन सारी जायदाद हड़प लेंगें, राबिया की खिदमत में आप तबाह हो जायेंगें, आपके बेटे और बहु के लिए कुछ नहीं बचेगा.' एहसान मामू चीखे .
राबिया की अम्मी को अपनी नवासियों का ख्याल आया . इस लिए वह बोलने लगीं, बेटियां अभी बहुत छोटी हैं, बीमार माँ को कैसे संभालेंगी, अभी तो खुद उनको ऊँगली पकड़ कर चलने की उम्र है.
दूसरी तरफ किसी से कोई मदद मिलती न देख राबिया का शौहर लम्बी छुट्टी ले कर, राबिया की खिदमत में लग गया कि इसके लिए राबिया की जिंदगी ज़रूरी थी, राबिया एक बीमार उसके लिए रहमत थी ज़हमत नहीं, एक बीमार से इश्क में रब की कुर्बत थी, जन्नत थी...
वह राबिया जो,नौ माह तक खाना कैसे खाया जाता है, अपने पाँव पर कैसे चला जाता है...भूल गयी थी...अपने दुबले पतले शौहर की गोद में,एक मासूम बच्चे की तरह पलने लगी, बाथ टब में नहा नहा कर निखरती रही ,अपने शौहर और बेटियों की उँगलियाँ पकड़ कर, कभी कंधों का सहारा ले कर चलना सीखती रही,मासूम सी, छोटी सी बेटियां अपने हाथों से खाना बना कर `बंद कमरे' में खिलाने की कोशिश करती रहीं कि वह चेहरे अब सामने न आयें जिन्हों ने एक ब्बीमर को बिस्तर पर तड़पने के लिए छोड़ दिया था ..
मगर इंसानियत को शर्मसार करने वाले चेहरे बीमार और तीमारदार के सामने आते रहे.
डायलाग ही डायलाग .... अदाकारी ही अदाकारी ..... मुखौटे .... अलग अलग रंगों के मुखौटे !
राबिया के मामूं जान चीखे `उस के शौहर ने निकाह पढ़ा है,शादी के बाद बेटी का माँ बाप पर कोई हक नहीं रहता, और वह भी बीमार बेटी, राबिया को संभालेगा इसका शौहर,बीमार की तीमारदारी भी करेगा, और अपनी बेटियों को संभालेगा भी ...'
`बीमार बीवी पर सीर्फ उसके शौहर का फ़र्ज़ होता है बाजी !बाजी बात को समझो ! आरज़ू चिल्ला चिल्ला  कर अपनी बहन को समझा रहे थे .
`राबिया को भूलने की कोशिश करो, आखिर वह कितने दिनों की मेहमान है, क़बर में पाँव लपके जाये हैं, अपनी जवान और तंदरुस्त बहू में अपनी बेटी को तलाश लो..'
...और वह जो राबिया की बीमारी में उस के शौहर ने एक बीमार बीवी की ख्वाहिश के एहतेराम में,ख़ूबसूरत सा घर बनाया. अपना ट्रांसफर कराया,सब से जूनियर हो कर एक बीमार की जबान से निकले हुए जुमले को पूरा करने की खातिर , उस शहर में आ गया जहाँ बीमार राबिया के माँ बाप रहा करते थे, सिर्फ इस लिए कि राबिया कि यह ख्वाहिश थी कि माँ बाप के पास थोड़ी तकवियत मिलेगी...वर्ना उसका शौहर जिस पद पर कार्यरत था  वहां इलाज की सारी सुविधा उपलब्ध थी, हर माह उसके इलाज में २५ हज़ार का खर्च आता था ... जो उसे अपनी जेब से नहीं देना पड़ता था ...उसे किसी चीज़ की कमी नहीं थी....कमी थी तो सिर्फ परदेस में अकेलेपन की....एक हँसता मुस्कुराता परिवार, मुहब्बतें ऐसी कि एक पल भी कोई एक दुसरे से जुदा नहीं होते...पति पत्नी और दो बेटियां हंसी की गोद में खेलता था ये परिवार ...फटे चिटे कपड़ों में लिपटे,. फकीरों को अपने बिस्तर पे बिठा कर खाना खिलाता था ये परिवार, जाड़े की ठिठुरती रात में कांपते हुए `सूरदास' को अपना नया कोट ख़ामोशी से दे दिया करता था ये परिवार... बहुत कुछ अच्छाई तो इनकी पोशीदा रहती थीं.... ज़ाहिर नहीं करते थे ये.
 
तस्बीह के दानों पर उँगलियाँ थिरकती रहीं 
सजदे होते रहे 
मुसल्ले आबाद होते रहे ... हर आदमी एक दुसरे की आजमाईश का जरिया बनता रहा. गरीब दौलतमंद से और बीमार सेहतमंद से आजमाया जाता रहा. अज़ीम किताब सिर्फ आँखों से चूमने, सीने से लगाने, ताक पर रखने और क़सम खाने के लिए इस्तेमाल होती रही.
सातों ज़मीनों में धंस जाने वाले चेहरे, सख्त अज़ाब से बेखबर दुनिया हासिल करने में जुटे रहे. 
 राबिया ने जब बगावत करने की कोशिश की कि वह नहीं जाएगी , आखिर इसके शौहर ने उसकी खातिर ट्रांसफर ले लिया है , कवार्टर छोड़ दिया है . सारा सामान यहाँ आ गया है .... आखिर ये सब उसके शौहर ने किसके लिए किया .... वह अब यहाँ से नहीं जाएगी , आखिर वह इस घर की बेटी है , उसका भी घर के लोगों पर हक है , इस घर के आँगन में वह पली बढ़ी है , थोड़े दिनों की तो बात है , सेहत वापस लौट आएगी तो वह चली जाएगी , परदेस में बीमार बीवी और  दो नन्ही मासूम बेटियों को शौहर कैसे संभालेंगें .
सारे रिश्तेदारों ने एकजुट हो कर राबिया और उसके परिवार को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया... अपने पराये हो गए और गैर अपने बन गए ....उसने जो घर बनाया था, बीमारी की हालत में भी एक अरमान को दीवारों पे सजाया था वह सब एक फकीर की तरह छोड़ सफ़र पर निकल पड़ी .....
 बीमार चेहरा जब घर से निकल गया तो बाबा कह रहे थे `आई एम रिलेक्स टू डे '
उस रात जब वह व्हील चेयर से उतर कर ट्रेन में बैठी तो फिर उसे सारी रात नींद नहीं आई कि `आदमखोर' कबीला आज भी जिंदा है, और उसके घर में आ गया है, सारे सेहतमंद लोग मिल कर बीमार का काम तमाम कर देंगें या उसे मौत दे कर तकलीफ से छुटकारा दिला देंगें .
लेकिन उसके शौहर ने उसे समझाया कि  नहीं राबिया ऐसा कोई कबीला नहीं है, मेरा यकीन करो, मेरे साथ नए आशियाने चलो , तुम्हें इस बात का यकीन हो जायेगा, आखिर अपने `घर' पहुँच कर उसे यकीन हो चला कि यहाँ ऐसा कोई कबीला नहीं है और उसे फिर से मीठी नींद आने लगी .
 आज एक ज़माने के बाद उसके बाबा का फोन आया. अपने किये पर शर्मिंदा थे, वह कह रहे थे, बहुत बड़ा गुनाह हो गया.... मैं अब तुम्हारे लिए दुआएं किया करता हूँ ...मैं और तुम्हारी अम्मी तुम्हारे पास आना चाहते हैं... तुम्हारा भाई बीमार पद गया है, बहू की भी सेहत ख़राब हो चुकी है, घर में हर वक़्त मियाँ बीवी में झगडा होता रहता है.. तुम्हारे पास हमलोग सुकून के लिए आना चाहते हैं .
आज राबिया बहुत खुश है, अब उसे लग रहा है, ऐसा कोई कबीला दुनिया में नहीं बचा है , अब वह सकून की नींद सोएगी. अब कोई दर नहीं. बहुत दिनों के बाद आज उसका दिल चाय के बाद अख़बार पढने के लिए चाह,अख़बार उठाया तो सामने के सफहा पर खबर थी कि अम्रीका में नेवी के चार अफसरों को जज साहिब ने माफ़ कर दिया,जो जहाज़ डूबने के बाद एक बोट पर जान बचाने के लिए समुन्दर में निकले थे.
खाना पीना ख़त्म होने के बाद भुखमरी की हालत में, जब अपनी अपनी जान बचाने की नौबत आई तो इन चारों ने साज़िश रच कर, पांचवें बीमार साथी को मार डाला और खा गए . इत्तेफाक से वह चरों बच गए . बोट किनारे लगी तो उन्हों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया, उन पर मुक़दमा चला और आखिर में जज साहिब ने उन्हें माफ़ कर दिया, ताकि एक और आदम खोर क़बीला तैयार हो जाये.क्योंकि उन चरों को एक बीमार आदमी के खून का ज़ायक़ा मिल गया था.
 राबिया फिर छटपटाने लगी .कि आज भी आदम खोर क़बीला वजूद में है, हर मुल्क में है, हर घर में है, हर आँगन में है, अब इस बीमार की जान शायद ही बचेगी.और राबिया ज़ोर ज़ोर से रोने लगी, उस के शौहर और दोनों बेटियां दौड़ कर उस के क़रीब आये,
शौहर ने कहा, हाँ ये सच है कि आदम खोर चरों तरफ हैं,लेकिन तख्लीककार/रचनाकार ने तुझे एक सेनापति और दो सिपहसालार दिए हैं,जो तेरी हिफाज़त का ज़रिया बने हुए हैं , तुझे मेरा ये `घर' क़िला के तौर पर दिया गया है . उस रब ने तुझे वह सब कुछ वापस लौटा दिया है जो ज़िंदा रहने कि शर्त हुआ करती है. वह कितना अज़ीम है जिसके इशारे पर यह कायनात हरकत में है, हम लोग हर तरह से तेरी हिफाज़त का सबब बनेंगें .
चुप हो जाओ , खौफ को दिल से निकाल फेंको ---
और राबिया अपनी जिंदगी लोरी आंसुओं के साथ गुनगुनाने लगी :
जिंदगी के ३६ वें पड़ाव पर 
 जब मैं चलना भूल गयी थी 
और तुम ने ऊँगली पकड़ कर चलना सीखाया था 
तब मैं ने तुम्हें `पापा' पुकारा था.
जब मैं खाना भूल गयी थी, और तुम्हारी नर्म हथेली की उँगलियों ने 
खाना सिखाया था 
तब मैं ने तुम्हें `माँ' पुकारा था.
ये भी एक इत्तेफाक है कि...
तुम मुझे नौ माह तक अपनी गोद में लिए 
ज़माने की तेज़ धुप और बारिश से बचाते फिरते रहे 
मुहब्बतें , रहमतें साथ चलती रहीं ...
तब मैं ने तुम्हें अपना प्यारा दोस्त कहा था !
`तुम' मेरे लिए क्या हो ,`मैं'तुम्हारे लिए क्या?
ये तो मैं जानू, तुम जानो हो और रब जाने है...
मैं जब तुम से दूर चली जाऊं 
जब `मैं ' मैं न रहूँ 
अपने रब की हो जाऊं !
और तुम्हारे पास रह जाएँ सिर्फ यादें 
कभी आंसू न बहाना !
जिंदगी लिख जाएगी तुम्हारी हथेली पे एक नई इबारत .... एक नया एतबार !!
और राबिया बहते हुए आंसुओं को पोछते हुए , शौहर और बेटियों की ' गोद ' में आराम की नींद सो गयी .
कहानी तो समुन्दर की लहरों की तरह उभरती डूबती रहती है मेरे दुलारे ननकू , कि आदम खोर क़बीला आज भी जिंदा है ।

खुर्शीद हयात

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