भारतीय जनमानस के प्राण : मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम

यह लेख भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र, उनकी मर्यादाओं और रामराज्य की अवधारणा पर आधारित है। इसमें वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस के माध्यम से श्रीराम के जीवन मूल्यों—पितृभक्ति, सत्यनिष्ठा, धर्मपालन, सामाजिक समरसता और आदर्श शासन व्यवस्था—का विश्लेषण किया गया है। साथ ही आधुनिक समाज में इन मूल्यों की प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है।

Apr 15, 2026 - 12:28
Apr 17, 2026 - 15:34
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भारतीय जनमानस के प्राण : मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम
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श्रीराम भारतीय संस्कृति के आकाश में चमकने वाले सूर्य है। भगवान श्री राम का चरित्र चित्रण वाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामचरितमानस में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण संस्कृत में लिखी गई है जबकि तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस हिन्दी अवधि भाषा में लिखा गया है। किसी समय में संस्कृत राष्ट्र की जन् भाषा थी, तब वह जनसाधारण के लिए सुलभ और लोकप्रिय भी रही अब संस्कृत देव भाषा रह गई है। जन भाषा राजभाषा हिंदी है। रामचरितमानस हिंदी में होने से उसे अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई है। भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं नीति धर्म सदाचार के लिए उनका अवतार हुआ था। धर्म की ग्लानिऔर अधर्म के अभ्युत्थान का शमन  करने साधुता का परित्राण एवं दुष्कृतों के विनाश के लिए अवतार धारण किया और सनातन की प्रतिज्ञा का उन्होंने सदैव पालन किया। भगवान राम ने सामयिक समस्याओं का समाधान किया और परिस्थितियों के अनुरूप कार्यक्रम बनाएं। भगवान श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे उनकी कथनी और करनी में पूर्ण समानता थी। राम की गौरव गरिमा के सुविचार की आधारशिला उनकी पितृ भक्ति थी। बचपन से ही श्री राम माता पिता के वचनों के अनुरागी थे, उनकी दिनचर्या में माता-पिता के चरण छूना और उनसे अनुमति प्राप्त कर सब कार्य करना आवश्यक था। प्राचीन काल से ही माता-पिता और गुरु के चरण स्पर्श की मर्यादा भारतीय संस्कृति की पारिवारिक जीवन का प्रमुख अंग बनी रही है।

परिवार में एकता आत्मीयता और एक दूसरे के प्रति प्रेम और त्याग की भावना के विकास में चरण स्पर्श की छोटी सी प्रक्रिया से आश्चर्यजनक सहयोग मिलता था। दुख की बात है कि आज पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध में हमने अपनी श्रेष्ठ परंपराओं की हत्या कर दी और उसी का फल भुगतने के लिए विवश होना पड़ा। चरण स्पर्श जैसी छोटी परंपराओं की उपेक्षा करके हमने पारिवारिक एकता को समाप्त करने का घोर अपराध किया है, यही कारण है कि आज परिवार सीमित होते जा रहे हैं । परिवार में चाचा, ताऊ बुआ के रिश्तों का अभाव सा होता  जा रहा है। भगवान राम को मानने वाले उनकी मर्यादाओं को अपने जीवन में स्वीकार करें और अपने परिवार की परंपराओं को बनाए रखें। श्रीराम को उनके पिता प्राणों के समान प्रिय थे। वास्तव में भगवान श्री राम पिता की आज्ञा का पालन करने नहीं वरन पिता को लोकगीत कलंक से बचने के लिए वन गमन गए थे ।रघुकुल की परंपरागत रीति को यदि महाराज दशरथ  पुत्र राम अभिषेक के मोह में फंसकर परित्याग करते  तो उन्हें अपकीर्ति का भागी बनना पड़ता। राज्याभिषेक को छोड़कर श्री राम वन में गए संसार के इतिहास में ऐसी अद्वितीय घटना की मिसाल नहीं मिलती । इसी भारत में राज्य लोभ के लिए पिता और भाई की हत्या के अनेक उदाहरण मिलते हैं। राम राज्य में राम और उनके तीनों भाइयों के बीच निश्चल और प्रगाढ़ भ्रातृ प्रेम था। राम सत्यवादी थे उनकी प्रतिज्ञाएं केवल साहित्यिक शब्दाडंबर मात्र से युक्त नहीं होती थी। भगवान राम यद्यपि धर्म के समस्त रहस्य को जानते थे परंतु लोक मर्यादा की दृष्टि से उन्होंने कभी उसकी  उपेक्षा नहीं की ।प्रतिदिन सरयू स्नान, दरबार में व्यक्तियों एवं भाइयों ,राज्य के उच्च अधिकारियों के साथ बैठकर वेद पुराणों के कथा प्रसंग को सुनना दैनिक जीवन कार्यक्रम का आवश्यक अंग था। उनके कुछ विशिष्ट नियमों के कारण ही उनके भाइयों और राज कर्मचारियों में स्वार्थ अथवा पदलोलुपता भाव जागृत नहीं हो पाए थे। उस काल की प्रजा के सदाचारी होने का यही रहस्य रहा।

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भगवान राम के काल में समाज ,सामूहिक व्यक्तिगत और राजनीतिक रूप से प्राकृतिक शक्तियों को अनुकूल करने की पूरी चेष्टा करता था। परिणामस्वरूप  प्राकृतिक शक्तियों पूरी तरह समाज के अनुकूल थी। यह शक्तियां श्री राम के शासनकाल में क्यों अनुकूल करती थी और आज प्रतिकूल क्यों है, उत्तर बिल्कुल स्पष्ट है कि भगवान राम के समय में नागरिकों ने उन्हें अपने अनुकूल करने का उपाय किया था । स्वयं भगवान राम सचेष्ठ रहते थे और उनकी प्रजा भी उन्हीं के आचरण तथा चेष्टा का अनुसरण करती थी। जब राजा अथवा राजतंत्र सत्यवती न्याय पारायण एवं धार्मिक हो जाएगा तब दैवीय शक्तियां भी समय समय पर अपना दान सहयोग देकर देश में सुख समृद्धि का साम्राज्य विस्तृत करेगी, खेती उत्तम होगी तथा अकाल की आशंका दूर होगी और तभी आर्थिक कठिनाइयों से मुक्ति मिलेगी। मनुष्य के पास जब क्षुधा शांत करने के साधन हो गए तभी सब उद्योग धंधों की उन्नति होगी और पुन: राम राज्य के स्थापित हो सकने की आशा की जा सकेगी,स्वयं राम अवतार लेकर आदर्श समाज की स्थापना नहीं करेंगे वरन् जब हम सब लोग सही ढंग से जीवन जीने की प्रक्रिया अपना लेंगे तो समाज स्वत आदर्श बन जाएगा, हर कार्य के लिए दूसरों पर भरोसा करना और हर बुराई के लिए अन्य पर दोषारोपण करने की प्रवृत्ति हमें ऊंचा नहीं उठा सकती। समाज को आदर्श बनाने के लिए बड़े-बड़े सिद्धांतों और योजनाओं को कार्यान्वित करने के पूर्व हमें जनसाधारण को सभ्य  रहने का अभ्यस्त करना होगा, सभ्य समाज की यही पहचान हो कि उसमें सर्वत्र स्वच्छता के दर्शन हो, केवल एक व्यक्ति के सभ्य से ,समाज का हित नहीं हो सकता समाज तो सबका समूह है और सब की जिम्मेदारी समाज को सक्षम बनाने में समान रूप से है। हमारा सबसे बड़ा दोष यही है कि हर प्रयास के लिए हम दूसरों का मुंह देखते हैं रामायण कालीन समाज में यह बात नहीं थी छोटे बड़े सभी अपने दायित्व को निभाते थे इसीलिए सभी सुखी रहते थे।
रामायण एवं भगवान श्री राम से हमें प्रेरणा मिलती है कि समाज के उत्थान के लिए हमें सदैव प्रयत्नशील होना चाहिए वास्तव में नागरिक के जागरण से ही राष्ट्र का जागरण होता है। समाज निर्माण में नारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है स्वामी विवेकानंद जी लिखा है कि भारत के पतन का इतिहास उसी दिन प्रारंभ होता है जब से स्त्रियों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया। उन्नतशील देश में स्त्रियों के सामाजिक स्थिति बड़ी संतोषजनक मिलती है। राम राज्य के काल में नागरिक व्यक्तिगत गुणों से विभूषित थे समाज को सुखी बनाने वाले सारे तत्व उनके भीतर विद्यमान रहते थे। 

भगवान श्री राम तो धर्म की धुरी को धारण करने वाले थे। धर्म पालन के निमित्त राज वैभव और समस्त सुख भोगो को तृणवत त्याग कर १४ वर्षों तक वन की अपरिमित  असुविधाओं को सहन करने में उन्होंने संकोच न किया। यही कारण था कि श्री राम जैसे धर्म परायण व्यक्ति के हैं सिंहासनारूढ़ होते ही विद्युतधारा के समान चारों दिशाओं में सुख शांति की लहर फैल गई । राजकुमार के रूप में भी श्री राम आदर्श रहे और वनवासी के रूप में भी श्री राम आदर्श बन रहे। यद्यपि राजा सर्वशक्तिशाली होता है लेकिन श्रेष्ठ मर्यादाओं और परंपराओं का उसे पालन करना चाहिए ताकि प्रजा उनका अनुसरण करें राजा बनकर राम ने समानता के सिद्धांत तक का त्याग नहीं किया खानपान और रहन-सहन में अपने तथा भाइयों के बीच भेदभाव नहीं किया। वह नित्य भाइयों के साथ ही भोजन करते थे, इसी प्रकार प्रजा की सुख सुविधाओं के लिए हर संभव उपाय श्री राम किया करते थे। खाद्य पदार्थ और भोग विलास की सामग्री का अभाव नहीं था।

सब प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी ।राम के शासनकाल में कसिी चीज का अभाव नहीं था। प्रशासनिक सुव्यवस्था के परिणाम स्वरुप राज्य में विधि व्यवस्था बनी रहती है और सामान्य नागरिकों का जीवन सुखी एवं सदाचारी बनता है। राजा का आचरण धर्म अनुकूल होने पर प्रजा उसका अनुकरण करती है। फलस्वरूप प्राकृतिक शक्तियां जनसाधारण के अनुकूल प्रतीत होती है. सदाचार की प्रेरणा देना राजा का आवश्यक कर्तव्य होता था। राम समय समय पर राज्य के प्रतिनिधियों को बुलाकर उन्हें नीति और धर्म के अनुकूल आचरण करने की प्रेरणा देते रहते थे। भगवान श्री राम का जन्म सर्वांगीण रूप से पूर्ण और आदर्श था।

राजनीति में प्रशासन व्यवस्था दंड न्याय तथा निष्पक्ष नीति का जितना सुंदर और व्यावहारिक उदाहरण भगवान श्री राम ने प्रस्तुत किया वह संसार के समस्त राजनीतिज्ञों द्वारा अनुकरणीय होना चाहिए। भगवान श्री राम तो देवी संपत्तियों के पुंज थे। राम तथा रामायण के अन्य पात्रों के साहसपूर्ण कार्य ही रामायण के प्रमुख विषय है। सच तो यह है कि बालपन से राम ने अपने शौर्य का परिचय देकर महानता की स्थिति प्राप्त की। यदि वे पुरुषार्थी न होते तो हम सब उनका गुणनुवाद कदापि न करते। भगवान राम ने केवल सत्य का प्रतिपादन ही नहीं किया वरन् अपनी वंश परम्परा के अनुकूल आचरण कर के उन्होंने अमर कीर्ति प्राप्त की है। वे सूर्य कुल के भूषण थे, रघुवंशी थे। उनका आचरण उस कुल की मर्यादा के अनुसार था जिसमें सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र उत्पन्न हुए थे जिन्होंने सत्य के पालन के लिए राज पाट खोने में भी संकोच न किया। भगवान राम के प्रति जन आस्था अक्षुण्ण बनी रहे उनके चरित्र श्रवण का जन मानस की आदर्शवादी परंपराएं सुदृढ़ बनाने के लिए प्रयोग होता रहे, यही हमे अभीष्ट है।
(साभार: पं श्रीराम शर्मा आचार्य का साहित्य दर्शन )

 

डॉ. विजय पाटिल

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