तो हंसिए ना...
हमारा रुख शिमला की तरफ था लेकिन बीच रास्ते में बिखरा प्रकृति का अनुपम सौंदर्य मन को बार-बार पकड़े जा रहा था। राह में इतना सब कुछ था कि हम तो शिमला को भूल ही गए थे। मंजिल पर तो पहुंचना ही था लेकिन फिर भी, मुफ्त में बंट रही इस सुंदरता को मैं कैसे खोने देता इसलिए मैंने सभी नजारों को कैमरे में कैद करने की क़वायद शुरू कर दी। जो चीज आपके दिल को बेहद पसंद आती है, क्या आप उसे हमेशा के लिए संजोकर नहीं रखना चाहेंगे? निसंदेह, हर कोई चाहेगा। इसलिए मैंने भी उन पहाड़ों, वादियों, लंबे-लंबे सुंदर हरे पेड़ों, नीले आकाश, चमकीले सूरज, सफेद बादलों, और घुमावदार सड़कों को फोटो के रूप में बांधने का प्रयास किया। हालांकि, प्रयास निष्फल गया क्योंकि जिस उत्सुकता के कारणवश मैंने सैकड़ो फोटो खींच लीं थीं उसे समाहित करने का सामर्थ्य मेरे फोन के पास नहीं था। मजबूरन अधिकांश फोटोज़ को डिलीट करना पड़ा। खैर! मम्मी भी ठीक ही कहती हैं कि फोटो खींचना निहायत ही बेतुका काम है; "लोग सारा टाइम फोटो लेने में ही बर्बाद कर देते हैं जो चीज देखने आए हैं उसे तो देखते ही नहीं।"
चंडीगढ़ से कालका, कालका से सोलन और सोलन से शिमला में हम प्रवेश कर रहे हैं। 'शिमला राजधानी' में नहीं, शिमला जिले में। जिलों का बंटवारा तो सिर्फ नक्शा ही कर रहा था लेकिन प्रकृति तो अभिन्न थी। पहाड़ों के बीच सड़कों पर चलते-चलते हम कब शिमला के नजदीक आ पहुंचे हमें मालूम नहीं हुआ।
"एक कप चाय पी ली जाए! " चाय के शौकीन पिताश्री ने अपने दोनों ओर दुकानों की लाइनों को देखकर राहत भरे अंदाज में कुछ इस तरह कहा कि मानो हम पहुंच ही गए हों।
"यहीं पर देख लेते हैं, चाय की दुकान हो तो कोई।" मम्मी आंखों की मदद से दुकानों की छानबीन करने लगीं।
'नहीं, थोड़ा आगे पी लेंगे।" पापा ने कहा।
" ठीक है।"
और मैं जानता था कि आगे क्या होने वाला है क्योंकि हमारे साथ अक्सर ऐसा ही होता है। होता कुछ नहीं! बस, पापा किसी चीज की डिमांड करते हैं और खुद ही कहे चले जाते हैं “आगे, थोड़ा और आगे और थोड़ा और आगे।" मंजिल पर पहुंचने के बाद ही हमें वह चीज नसीब होती हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। जहां पर हमें दुकानें दिखतीं, हम पहले उन्हें देखते, फिर थोड़ा विचार-विमर्श करते तथा अंत में मुख मोड़ कर आगे की ओर रुख कर लेते। अगर किसी दुकान पर ठहरकर चाय पीने के लिए सहमति बनती भी तो पापा फिर कह देते "थोड़ा और आगे देख लेते हैं।" ऐसा करते-करते हम पहुंच गए शिमला में। जल्दी ही थोड़ी-थोड़ी दूरी पर होटल भी दिखने लगे। अभी भी हम शिमला के बाहरी भाग में ही है।
"शिमला तो पहुंच गए लेकिन होटल वगैरह का क्या करेंगे?" मम्मी ने कहा और गाड़ी में सवार सभी जनों की चाय-तृष्णा होटल-तृष्णा में तब्दील हो गई। पापा ने यह काम मामा को सौंपा और मामा ने "गूगल मैप्स" को। गूगल ने अनेकों होटलों के नाम मामा को बताए और मामा ने पापा को। जब चार-सितारा व पांच-सितारा होटलों एवं उनके किरायों की चर्चा चल ही रही थी तभी एक व्यक्ति अपने हाथ में कुछ कागज लिए सर! सर! कहते हुए गाड़ी को रोकने के लिए हमें संकेत करता है। हमारे रुकने के बाद, उसने बड़ी उत्सुकता से हाथ में लिए उन पर्चों को एक के बाद एक पलटना शुरू कर दिया। पापा समझ गए कि उसके पास हमारी समस्या का समाधान था।
"यह देखिए सर ! 5000 में आपको डीलक्स मिल जाएगा।"
"फाइव स्टार है?"
'बिल्कुल सर" "
'सस्ते में नहीं हो सकता?"
"4000 तक हो सकता है, सर। "
पापा और मामा ने सलाह-मशविरा किया और निर्णय लिया गया "थोड़ा और आगे देखते हैं!" जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते रहे वैसे-वैसे हमारी समस्या का समाधान हाथ में लिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर हमें दो-एक-दो व्यक्ति मिलते रहे। "थोड़ा और आगे देखते हैं" इस मंत्र को लेकर हम चले जा रहे थे। कुछ समय बाद अपने होटलों में ठहरने का निमंत्रण देने वाले ये लोग भी गायब- से हो गए।
अब हम एक तिराहे पर आ गए जहां किसी हाथ ने हमें रोका। काले कुर्ते में दुबला-पतला और थोड़ा-सा कुबड़ा एक व्यक्ति प्रकट हुआ जिसके पास कागज तो नहीं था लेकिन हमारी परेशानी को वह दूर कर सकता था। हमारी गाड़ी रुकी। उसका मुख उसकी उपलब्धि को स्पष्टतः प्रदर्शित कर रहा था और हमारी आंखें तृप्ति से परिपूर्ण थी।
"सर, होटल चाहिए, आपको?"
"बताइए।"
"यह देखिए आपके सामने "आशीर्वाद होटल "
इतने लंबे सफर के बाद और अधिक पूछताछ करने की हिम्मत पापा में नहीं थी। निर्णय लिया गया "यहीं रूम देख लेते हैं।"
मामा, मामी और पापा रूम देखने के लिए होटल के भीतर जाते हैं। मैं और मम्मी बाहर ही रहते हैं। बाहर आसमान बादलों की कलाकृतियों से भरा था और सुनहली धूप पल-पल में आ-जा रही थी। सामने ही सड़क के किनारे सिर पर स्कार्फ बांधे हुए एक हिमाचलीन भुट्टा भुन रही थी। बाईं ओर थोड़ा आगे चलकर एक भीड़ी-सी सड़क थी जहां एक-दो गाड़ियां कभी-कभार आती-जाती दिख जाती थी। पार्किंग के बगल में ही एक पेड़ आकाश की तरफ उन्मुख था । "आकाश की तरफ उन्मुख" लिखने का एक कारण है - वह बिल्कुल सीधा था, कहीं कोई घुमाव या मुड़ाव नहीं; उसे देखने पर लगा जैसे कि उसे आकाश के अलावा कहीं और जाने की इच्छा ही ना हो; उसकी बस एक ही मंजिल और एक ही रास्ता हो। निस्संदेह यह देवदारू का वृक्ष था। नाम ही कितना मधुर है !
जब अगल-बगल की चीजों को निहारने की मेरी प्रक्रिया चल ही रही थी कि उसी के बीच में मामा, मामी और पापा वापस आ जाते हैं। उनके चेहरों पर सफर की थकान अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही थी। और इसी थकान के परिणामस्वरूप आशीर्वाद होटल में ही ठहरने का निर्णय ले लिया जाता है। हमारे छोटे-बड़े सभी बैग हमारे कंधों व हाथों पर आ लदे और हमारे साथ जा पहुंचे कमरा नंबर 8 और 10 में। कमरा नंबर 10 से नजारा बेहद मजेदार था। दीवार के बीच में एक बहुत बड़ा शीशा था जिससे हरी घाटी, वहां पर मौजूद इक्के-दुक्के मकान, सड़क (यह वही सड़क थी जहां से हम आए थे) और सड़क के पीछे चार-पांच मंजिला हरी और लाल रंग की इमारतें और इन इमारतों के पीछे नील गगन में लहराता तिरंगा स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। मैंने घोषणा की कि मैं कमरा नंबर 10 में ही रहूंगा इसलिए मामा-मामी के लिए कमरा नंबर 8 स्वतः ही निर्धारित हो गया।
अपने कंधों से बैग उतार कर हम सभी ने सांस ली ही थी कि यकायक मैं चिल्ला दिया -"पापा! यहां पर तो पंखा ही नहीं।" सभी की आंखें दीवारों पर घूम गई लेकिन वहां सचमुच कोई पंखा नहीं था। सब हड़बड़ा-से गए।
मामी तो बिल्कुल गुस्सा हो गईं, "मुझसे नहीं रहा जाएगा, यहां पर आपने क्या देखा था? इतनी गर्मी है, मेरा तो दम घुट रहा है। मैं नहीं.."
मामा ने थोड़ी मासूमियत के साथ जवाब दिया, "आप भी तो साथ ही थे। आप देख लेते पंखा है या नहीं।"
लंबी सांस भरकर मुस्कुराते हुए मैंने कहा, "अब तो यह सारा सामान दोबारा नीचे लेकर जाना पड़ेगा।"
हमने सोचा शायद कमरा नंबर 10 में ही पंखा ना हो इसलिए 8 नंबर भी देख आते हैं लेकिन वह भी पंखे से विहीन ही था।
फिर हमेशा की तरह मम्मी ने एक सुझाव दिया, "इनसे कहकर एक छोटा-सा टेबल-फैन रखवा लेते हैं। दूसरा होटल ढूंढना तो अब मुश्किल है।"
मामी ने अपना पक्ष दोहराया, "नहीं दीदी! उससे काम नहीं चलेगा। देखो ! कितनी गर्मी है।"
सभी के चेहरे एक-दूसरे से इस परेशानी का हल ढूंढने का आग्रह कर रहे थे। चिंता, थकान, हताशा, गुस्सा और ठगे-से रह जाने जैसी भावनाएं मपी- तुली मात्रा में हमारे चेहरों पर साफ दिखाई दे रही थी; सब परेशान ही इतने ज्यादा हो गए थे। लेकिन सच बताऊं, मेरा मन तो जोर से हंसने का था। मुझे काफी मजा आ रहा था इसलिए नहीं कि सब परेशान थे। बल्कि इसलिए कि मैं इस परेशानी को देख रहा था। हमारे सामने एक चुनौती थी- "पंखा न होने" की चुनौती। इस चुनौती ने सभी को घबराहट में डाल दिया। मैं घबराहट को देख रहा था; देख रहा था कि खेल कैसे हो रहा है। और देखने का अपना अलग मजा है!
कुछ देर बाद एक अंकल यह संदेश देने आते हैं कि कुछ देर में कमरे की सफाई करवा दी जाएगी। हमने उनकी बात सुनी, सुनकर उसे अनसुना किया और फटाक से अपनी परेशानी कह सुनाई।
वे बड़ी सादगी से बोले, "तो सर.. शिमला में कोई पंखा और ए. सी लगवाता ही नहीं।"
"क्यों?"
"जरूरत ही नहीं पड़ती। ठंड जो रहती है, यहां हर वक्त ।
"नहीं देखिए! कितनी गर्मी अभी.."
" सर.. आप इतना सारा सामान ऊपर लेकर आए हैं इसलिए आपको गर्मी लग रही है। कुछ देर बाद सब नॉर्मल हो जाएगा।"
हम सब एक दूसरे का मुंह ताकते रह गए। यह मौका था अपनी बेवकूफी पर हंसने का। शिमला आए थे इसलिए कि ठंडे और मनभावन मौसम का मजा ले सकेंगे और आकर भूल ही गए कि शिमला ठंडी है। यहां पंखे की क्या जरूरत?
हमारी आदत बेमतलब खुद-ब-खुद तंग होने की है। रोज ऐसी ही समस्याएं पैदा करते हैं; समाधान को समस्या बनाए फिरते हैं। क्या आपने भी अपने हाथों से समस्याएं पैदा करने का निरर्थक कार्य किया है? किया है तो हंसिएं ना! और अगर नहीं तो हमारी बेवकूफी पर हंस लीजिए।
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