हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल

यह लेख आचार्य रामचंद्र शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें उन्हें हिंदी के प्रथम अंतःअनुशासनिक और विश्वस्तरीय आलोचक के रूप में स्थापित किया गया है। उनके आलोचनात्मक दृष्टिकोण, लोकमंगल की अवधारणा, काव्य सिद्धांत, तथा भारतीय और पाश्चात्य विचारों के समन्वय को विस्तार से समझाया गया है।

Apr 8, 2026 - 18:47
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हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी के पहले असाधारण अंत: अनुशासनिक आलोचक हैं जिनकी ज्ञान की सभी शाखाओं में अबाध गति थी।आपकी आलोचनात्मक स्थापनाएँ अपनी मौलिकता,नवीनता,गहनता एवं संतुलित साहित्य- विवेक से अनुप्राणित होने के कारण क्लासिकी गरिमा से युक्त हैं। शुक्लजी एक महान आलोचक होने के साथ-साथ सभी विषयों के ज्ञाता, श्रेष्ठ प्राध्यापक और शिक्षाविद भी थे। एक बड़े आलोचक के लिए यह जरूरी है कि साहित्य और शास्त्र के अलावा ज्ञान-विज्ञान के तमाम क्षेत्रों में उसकी गति हो, वह बहुश्रुत एवं बहुपठित हो; तभी वह जीवन और जगत के समस्त आयामों पर लिखे गए साहित्य का सही निर्वचन कर सकता है। आ.महावीर प्रसाद द्विवेदी और आ.रामचंद्र शुक्ल ऐसे ही आलोचक थे।
इन्होंने काव्यसृजन द्वारा लेखकीय जीवन का शुभारंभ किया था किन्तु इनका परम बौद्धिक व्यक्तित्व स्वत: निबंध और आलोचना जैसी गंभीर विधाओं की ओर मुड़ गया। आप हिंदी और भारतीय भाषाओं के ही सर्वश्रेष्ठ आलोचक नहीं हैं अपितु विश्व के तीन सार्वकालिक श्रेष्ठतम आलोचकों में से एक हैं। मेरा मानना है कि अरस्तू, मैथ्यू आर्नल्ड और आचार्य रामचंद्र शुक्ल विश्व के तीन सबसे बड़े आलोचक हैं जिन्होंने काव्यालोचन के क्षेत्र में युगांतरकारी प्रस्थान उपस्थित किया है। एक ऐसा प्रस्थान प्रवर्तक व्यक्तित्व जो अतीत से लेकर वर्तमान तक को नूतन बना दे और भविष्य के लिए विवेकपूर्ण संकेत कर जाए वही आचार्य कहलाने का अधिकारी है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ऐसे ही आचार्य हैं। ये विश्वस्तरीय निबंधकार, अन्तर्दृष्टि एवं विश्वसंदृष्टि सम्पन्न आलोचक, उत्कृष्टसिद्धांतशास्त्री, विश्वस्तरीय इतिहासकार, संस्कृति चेता, दार्शनिक और वैज्ञानिक चिंतक रहे हैं। इनके आलोचनात्मक व्यक्तित्व में भारतीय इतिहास, परंपरा, मूल्य-मान, धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ-साथ पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान और साहित्यिक दृष्टिकोण का संश्लेषण है।ये भारतवर्ष की गतिशील लोकोन्मुख परंपरा की गहन पहचान, काव्यशास्त्रीय, अंत: अनुशासनिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक चिंतन के अनुप्रयोग तथा पाश्चात्य काव्यचिंतन से सार्थक मुठभेड़ करते हुए हिंदी आलोचना में आत्मविश्वास का दर्शन विकसित करते हैं। शुक्लजी अपने  आलोचनात्मक चिंतन में लोकमंगल और विरुद्धों के सामंजस्य की प्रतिष्ठा द्वारा काव्यालोचन के सार्वभौम-शाश्वत प्रतिमान निर्मित करते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल: हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष

आचार्य रामचंद्र शुक्ल स्वाधीन संग्राम के कठिन संघर्ष के दिनों में हिंदी आलोचना के क्षेत्र में आते हैं और जो कार्य उस समय महाकवि जयशंकर प्रसाद,निराला, माखनलाल चतुर्वेदी,सुभद्रा कुमारी चौहान, गणेश शंकर विद्यार्थी अपने सर्जनात्मक लेखन द्वारा कर रहे थे वही कार्य आचार्य शुक्ल अपने आलोचनात्मक लेखन में भी कर रहे थे। इनके आलोचक व्यक्तित्व के निर्माण में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास, जायसी एवं तत्कालीन आंदोलनों की विशेष भूमिका रही है।वे अपने समय और समाज के प्रति अत्यंत सजग और दायित्वबोध से परिपूर्ण आलोचक रहे हैं। फलस्वरूप इनके अध्ययन की भाँति इनका आलोचनात्मक लेखन भी साहित्य के अलावा जीवन और जगत के अनेक संदर्भों का विश्लेषण करता है। ऐसा अंत: अनुशासनिक आलोचक हिंदी में दूसरा नहीं है।आचार्य शुक्ल भारतीय साहित्य की उस उदार मानवतावादी दृष्टिकोण को हिंदी आलोचना में प्रतिष्ठित करते हैं जो अपने प्रशस्त रूप में लोकमंगल और लोकहित की सिद्धि का कारण बनती है। इस दृष्टिकोण के निर्माण में भक्तिकाल के कवियों और विशेष रूप से गोस्वामी तुलसीदास की भूमिका रही है जो चराचर जगत के मंगल हेतु रचनारत थे।वे अपनी असाधारण मेधा,वैज्ञानिक दृष्टि, लोकमंगल की विराट चेष्टा, भारत बोध के कारण अपने समय के सभी भारतीय भाषाओं के आलोचकों से बहुत आगे थे।
आप अपनी प्रखर मेधा,निरपेक्ष तथा जनतांत्रिक सोच एवं प्रखर  विश्वदृष्टि द्वारा हिंदी आलोचना को ठोस आधार और आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं।आप ऐसे वृहद स्तरीय ( Macro) तथा गहन स्तरीय (Micro)  आलोचक हैं जो अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं जानते हैं। इनके जैसा सुसंस्कृत, दूरदर्शी, वाग्मी एवं अलौकिक बौद्धिकता सम्पन्न आलोचक संपूर्ण भारतीय साहित्य में एकांत दुर्लभ है। आपने `ग्रहण' और `त्याग' के विवेक का परिचय देते हुए पश्चिम से वांछनीय तत्वों का वरण किया। इन्होंने अपने स्वाधीन व्यक्तित्व तथा लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करते हुए पाश्चात्य सिद्धांतों तथा विचारकों से आक्रांत न होने का साहस दिखलाया। उन्हें उनके एकांगी चिंतन से अवगत कराया। आप भारतवर्ष की जीवंत व गतिशील लोकोन्मुख परंपरा को लोक से सम्बद्ध करके उसे पुरस्कृत करते हैं। राजनीतिशास्त्र में जो महत्व लोकतंत्र का है, लगभग उसी वजन तथा महत्व का शब्द लोकधर्म को आपने  हिंदी आलोचना के चरम प्रतिमान के रूप में प्रतिष्ठित किया।आचार्य शुक्ल की लोकचिंता, अंतर्दृष्टि और विश्वसंदृष्टि उन्हें विराट और व्यापक दृष्टिकोण से समन्वित आलोचक के तौर पर हमारे सामने लाती है। आप भारतीय अस्मिता-बोध और भारत बोध के नायक के रूप में हिंदी आलोचना का व्यक्तित्व निर्मित करते हुए यह स्थापित करते हैं कि,`हमें अपनी दृष्टि से दूसरे देशों के साहित्य को देखना होग्ाा,दूसरे देशों की दृष्टि से अपने साहित्य को नहीं।' यह भी प्रत्येय है कि शुक्ल जी अपनी स्वतंत्र एवं भारतीय आलोचना दृष्टि के आधार पर ही रिचर्डस और क्रोचे जैसे पाश्चात्य विद्वानों का भी मूल्यांकन किया है। यह हिंदी आलोचना का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा  कि परवर्ती आलोचकों ने मार्क्सवाद से आक्रांत होकर इस निजत्व बोध को तिलांजलि दे दी जिससे उसका देशीपन क्षरित हो गया।

हिंदी आलोचना का मेरुदंड: आचार्य रामचंद्र शुक्ल का विराट व्यक्तित्व

रामचंद्र शुक्ल हिन्दी के पहले आलोचक हैं जिन्होंने जीवन एवं जगत के पुन: सृजन के रूप  में गुंफित काव्य के गहरे और व्यापक लक्ष्यों के मर्म के उद्घाटन का गंभीर और वैज्ञानिक प्रयत्न किया। उन्होंने 'भाव अथवा  रस' को काव्य की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित किया। इन्होंने  काव्य के चरम लक्ष्य के रूप में आनन्द के बजाय विभिन्न भावों के परिष्करण, प्रसार एवं सामंजस्य द्वारा लोकमंगल की प्रतिष्ठा की है। ये मैथ्यू आर्नल्ड की भाँति महान काव्य की प्रशंसा करते हैं और द्वितीय श्रेणी के काव्य के प्रति  अपेक्षित उदासीनता दिखाते हैं। इन्होंने जीवन और जगत की गतिशीलता और क्रियाशीलता को अभिव्यक्त करने वाले काव्य को ही महान काव्य का दर्जा दिया। इनके अनुसार जीवन और जगत का सर्वांगपूर्ण चित्रण एवं युगजीवन को प्रेरित- प्रभावित करने वाला काव्य ही श्रेष्ठता का अधिकारी है। एक महान आलोचक के रूप में शुक्लजी ने अपनी मान्यताओं को सैद्धांतिक बनाते हुए  उसे  लोकमंगल की साधनावस्था कहा। ये अपनी  मौलिक अवधारणाओं, गहन चिंतनो और तलस्पर्शी विश्लेषण के लिए ख्यात रहे हैं। इनके काव्यादर्श लोकजीवन के मूर्त आदर्शों से परिचालित हैं। इनकी स्पष्ट मान्यता है कि `हमारे हृदय का सीधा लगाव प्रकृति के गोचर रूपों से है' इसलिए कवि का सबसे पहला और आवश्यक काम `बिंबग्रहण' या `चित्रानुभव' कराना है। पूर्ण विंबग्रहण के लिए वर्ण्य वस्तु की `परिस्थिति' का चित्रण भी अपेक्षित होता है। `इस प्रकार शुक्ल जी काव्य द्वारा जीवन के समग्र बोध पर बल देते हैं। जीवन में और काव्य में किसी तरह की एकांगिता उन्हें अभीष्ट नहीं।यह समग्र बोध तत्कालीन संदर्भ में भारत बोध और अस्मिता-बोध का प्रतीक है।
शुक्ल की स्थापनाएँ अपनी शास्त्रबद्धता और मौलिकता के कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई हैं। इन्होंने अपने विराट अध्ययन लोकभावना और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हिंदी कविता एवं काव्यशास्त्र का अपेक्षित संस्कार किया। आप प्रस्थान प्रवर्तक होने के कारण आचार्य कोटि में आते हैं।आचार्य शुक्ल ऐसे आलोचक हैं जो भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र के गहन अध्ययन द्वारा विश्वसंदृष्टि सम्पन्न मौलिक आलोचना दृष्टि का विकास करते हैं। ये किसी विदेशी चिंतन अथवा विचारधारा से नियंत्रित नहीं होते। फलस्वरूप ऐसा व्यापक दृष्टिकोण अन्यत्र दुर्लभ है।काव्य में लोकमंगल की भावना शुक्ल जी की समीक्षा की शक्ति  है। वे जिस तरह लोकधर्म के निर्वहन एवं काव्यनिबद्ध जीवन के व्यावहारिक और व्यापक अर्थों के मार्मिक अनुसंधान पर जोर देते हैं वह उनकी स्थापना की मौलिकता है। इनकी आलोचना का पूर्वनिश्चित नैतिक केंद्र इनकी साहित्यिक मूल्यचेतना का उन्नयन करके मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विविध  कवियों की मनोगति की पहचान में अद्वितीय है।ये ऐसे काव्यमर्मज्ञ आलोचक हैं जो काव्य की समस्त पर्तों का सम्यक निर्वचन करता है। आचार्य शुक्ल कृत `रस- मीमांसा' हिंदी आलोचना का श्रेष्ठतम सैद्धांतिक ग्रंथ है जिसमे शुक्ल जी रस की नितांत मौलिक, वैज्ञानिक एवं लोकसापेक्ष व्याख्या करते हैं।

लोकमंगल की दृष्टि से हिंदी साहित्य: आचार्य शुक्ल का आलोचनात्मक अवदान

शुक्ल जी काव्य के उद्देश्य पर विचार करते समय अपने विश्वप्रसिद्ध कालजयी निबंध `कविता क्या है? ' में लिखते हैं कि,`कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-सम्बंधों के संकुचित मण्डल से ऊपर उठकर लोक- सामान्य भाव भूमि पर ले जाती है जहां जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है, इस भूमि पर पहुँचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता। वह अपनी सत्ता को लोक-सत्ता में लीन किए रहता है। उसकी अनुभूति सबकी अनुभूति होती है या हो सकती है। इस अनुभूति योग के अभ्यास से हमारे मनोविकार का परिष्कार तथा शेष सृष्टि के साथ हमारे रागात्मक संबंध की रक्षा और निर्वाह होता है। जिस प्रकार जगत अनेक रूपात्मक है उसी प्रकार हमारा हृदय भी अनेक भावात्मक है। इस अनेक भावों का व्यायाम और परिष्कार तभी समझा जा सकता है जबकि इन सबका प्रकृत सामंजस्य जगत के भिन्न-भिन्न रूपों, व्यापारों या तथ्यों के साथ हो जाए। इन्हीं भावों के सूत्र से मनुष्य जाति जगत के साथ तादत्म्य का अनुभव चिरकाल से करती चली आई है। जिन रूपों और व्यापारों से मनुष्य आदिम युगों से परिचित है,जिन रूपों और व्यापारों को सामने पाकर वह नर जीवन के आरंभ से ही लुब्ध और क्षुब्ध होता आ रहा है,उनका हमारे भावों के साथ मूल या सीधा संबंध है। अत: काव्य के प्रयोजन के लिए हम उन्हें मूल रूप और मूल व्यापार कह सकते हैं। इस विशाल विश्व के प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष और गूढ़ से गूढ़, तथ्यों को भावों के विषय या आलंबन बनाने के लिए इन्हीं मूल रूपों में नहीं लाए जाते तब तक उनपर काव्य दृष्टि नहीं पड़ती।'१ शुक्लजी इस निबंध में इतिहास, समाज, प्रकृति-पर्यावरण और सभ्यतापरक प्रश्नों के माध्यम से जीवन और जगत की जटिलताओं का निर्वचन करते हुए कवि-कर्म की चुनौतियों पर प्रकाश डालते हैं। फलस्वरूप यह निबंध उनके सैद्धांतिक चिंतन का मुखपृष्ठ बन जाता है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का स्पष्ट अभिमत है कि मनुष्य नैसर्गिक परिवेश में ही अपने मूल स्वभाव के निकट होता है और सभ्यता के आवरण के साथ ही उसका मूल रूप आच्छन्न होता गया है।मनुष्य को उसके मूल रूप तक लाने में कवि और कविता की ही विशेष भूमिका होती है। इस संदर्भ में शुक्लजी लिखते हैं कि,`कवि-वाणी के प्रसार से हम संसार के सुख-दुख, आनंद-क्लेश आदि का शुद्ध स्वार्थमुक्त रूप में अनुभव करते हैं। इस प्रकार के अनुभव के अभ्यास से हृदय का बंधन खुलता है और मनुष्यता की उच्च भूमि प्राप्त होती है।'२ यह बात छायावादी कवियों के व्यापक सौंदर्य बोध के निर्माण में सहायक रही है। यदि छायावादी कवि प्रकृति प्रेम और उसके साथ संतुलन की अवस्था में रहने पर जोर देते हैं तो कहीं न कहीं उसपर शुक्लजी की इस स्थापना का भी प्रभाव है।शुक्ल जी के काव्यचिंतन का सार इस निबंध में आ गया है।
 यहाँ सूत्र रूप में कतिपय चिंतनीय बातें प्रस्तुत कर रहा हूँ:-
१- कविता इसलिए लिखी जाती है कि एक ही भावना सैकड़ों- हजारों क्या, लाखों दूसरे आदमी ग्रहण करें।
२- लोक हृदय में लीन होने की दशा का नाम रस दशा है।
३- कविता पढ़ते समय मनोरंजन अवश्य होता है पर इसके सिवा कुछ और भी होता है। जो लोग स्वार्थवश किसी की प्रशंसा और खुशामद करके वाणी का दुरुपयोग करते हैं,वे सरस्वती का गला घोंटते हैं।
४- कविता सृष्टि- सौंदर्य का अनुभव कराती है और मनुष्य को सुंदर वस्तुओं में अनुरक्त करती है।
५- कविता में मनुष्य भाव की रक्षा होती है । कविता मनुष्य के हृदय को उन्नत बनाती है और उसका उत्कृष्ट और अलौकिक पदार्थों से परिचय कराती है।
६- कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य और असभ्य सभी जातियों में पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो ,विज्ञान न हो ,दर्शन न हो पर कविता अवश्य होगी।
७- कविता कुछ वस्तुओं और व्यापारों को मन के भीतर मूर्त रूप में लाने और प्रभाव उत्पन्न करने के लिए कुछ देर रखना चाहती है। अत: उक्त प्रकार के अर्थ- संकेतों से ही उसका काम नहीं चल सकता। इससे जहां उसे किसी स्थिति का वर्णन करना रहता है,वहाँ वह उसके अंतर्गत सबसे अधिक मर्म- स्पर्शिनी कुछ विशेष वस्तुओं या व्यापारों को लेकर उनका चित्र खड़ा करने का आयोजन करती है।'३ इस तरह शुक्ल जी काव्य स्वरूप और उसके सभी पक्षों का अत्यंत वैज्ञानिक एवं गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।शुक्ल जी अपने साहित्य विवेक द्वारा लोकमंगल अथवा लोकधर्म को अपनी आलोचना का केंद्रीय प्रतिमान बनाते हैं। वे विरुद्धों के सामंजस्य द्वारा परस्पर विरोधी वृत्तियों के संघटन एवं सामंजस्य से परिपूर्ण काव्य को ही श्रेष्ठ काव्य का दर्जा देते हैं। इस संदर्भ में वे लिखते हैं कि,`लोक में फैली दुख की छाया को हटाने में ब्रह्म की आनंदकला जो शक्तिमय रूप धारण करती है,उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचंडता में भी गहरी आर्द्रता साथ लगी रहती है। विरुद्धों का यही सामंजस्य कर्मक्षेत्र का सौंदर्य है जिसकी ओर आकर्षित हुए बिना मनुष्य का हृदय नहीं रह सकता। इस सामंजस्य का कई और रूपों में भी दर्शन होता है। किसी कोट- पतलून- हैट वाले को धारा- प्रवाह संस्कृत बोलते अथवा किसी पंडित वेशधारी सज्जन को अंग्रेजी की प्रगल्भ वक्तृता का यही सौंदर्य समझना चाहिए। भीषणता और सरसता, कोमलता और कठोरता, कटुता और मधुरता, प्रचंडता और मृदुता का सामंजस्य ही लोकधर्म का सौंदर्य है।'४ ऊपर से देखने पर भले ही लगता हो कि शुक्ल जी के इस चिंतन के निर्माण में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव परिलक्षित होता है परन्तु शुक्ल जी ने उसे अपने वैज्ञानिक एवं गहन चिंतन से मौलिक बना लिया है।
आचार्य शुक्ल काव्यसंदृष्टि सम्पन्न ऐसे भावक आलोचक हैं जो अपने द्वारा निर्मित प्रतिमानों के आलोक में किसी भी कृति की तलान्वेषी और तलस्पर्शिनी व्याख्या करते हैं। शुक्ल जी भाव और कलापक्ष के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए जायसी, सूर और तुलसी के काव्य सौष्ठव की जिस तरह समीक्षा करते हैं वह आज भी उतनी ही प्रभावी और प्रासंगिक है। शुक्लजी अपनी व्यावहारिक आलोचना का श्रेष्ठतम जायसी को देते हुए पद्मावत के लोकोन्मुख सांस्कृतिक संदर्भों को पूरी मर्मस्पर्शिता के साथ विश्लेषित करते हैं। उनके द्वारा लिखित जायसी, सूर,तुलसीदास हिंदी साहित्य के इतिहास में आदिकाल से लेकर उनके समय तक के सभी कवियों पर लिखित समीक्षा और कवियों का सर्वांगपूर्ण विवेचन व्यावहारिक आलोचना का ऐसा  प्रतिमान है जिसमें हिंदी आलोचना का प्राण आ गया है। इनके द्वारा प्रतिष्ठित व्यावहारिक आलोचना का उच्च प्रतिमान आज भी सहृदय पाठक के लिए  यथावत उपयोगी बने हुए हैं। इनमें शुक्ल की काव्यमर्मज्ञता, जीवनविवेक, विद्वत्ता और विश्लेषण क्षमता का जो असाधारण प्रमाण मिलता है वह अपना प्रतिद्वंदी नहीं जानता। इनके द्वारा काव्यगत संवेदनाओं की गहरी पहचान, स्पष्ट एवं पारदर्शी विश्लेषण और विषयानुरूप भाषिक अनुप्रयोग आज भी  पाठक को भली-भाँति संप्रेषित कर देने काr अपूर्व सामर्थ्य से युक्त हैं। इनके हिंदी साहित्य के इतिहास की समीक्षाओं में भी ये विशेषताएँ स्पष्ट हैं। आचार्य शुक्ल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के व्यक्तित्व की व्याप्ति के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास के महत्व का निर्वचन करते हुए लिखते हैं कि,`राम के बिना हिंदू जीवन नीरस है,फीका है। यही रामरस उसका स्वाद बनाए रहा। राम ही का मुंह देखकर हिंदू जनता का इतना बड़ा भाग अपने धर्म और जाति के घेरे में पड़ा रहा। न उसे तलवार हटा सकी, न धनमान का लोभ,  न उपदेशों की तड़क-भड़क। जिन राम को जनता प्रत्येक स्थिति से देखती आई, उन्हें छोड़ना अपने प्रिय-से-प्रिय परिजन को छोड़ने से कम कष्टकर न था। ....
इसी एक नाम के अवलंब से हिंदू जाति के लिए अपने प्राचीन स्वरूप, अपने प्राचीन गौरव के स्मरण की संभावना बनी रही। रामनामामृत पान करके हिंदू जाति अमर हो गई। इस अमृत को घर-घर पहुँचाने वाला भी अमर है। आज जो हम बहुत से `भारतीय हृदयों' को चीरकर देखते हैं,तो वे अभारतीय निकलते हैं, पर इसी एक कविकेसरी को भारतीय सभ्यता, भारतीय रीति-नीति की रक्षा के लिए सबके हृदय द्वार पर अड़ा देख हम निराश होने से बच जाते हैं।'५ कहने का आशय यह है कि शुक्ल जी अपनी इन्हीं तलस्पर्शी व्याख्याओं के कारण अतुल्य हैं,उनका कोई सानी नहीं है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: परंपरा, आधुनिकता और विश्वदृष्टि के सेतु
फलतः शुक्लजी के प्रिय कवि भले ही महाकवि गोस्वामी तुलसीदास रहे हों परंतु उन्होंने अपनी व्यावहारिक आलोचना का सर्वोत्तम जायसी को दिया है। इसी तरह उन्होंने हिंदी साहित्य के सभी कालखंडों, रचनाकारोंतथा साहित्य की प्रायः सभी विधाओं पर साधिकार लिखा है वह उनकी व्यावहारिक आलोचना को बहुआयामी एवं आश्चर्यजनक अर्थव्याप्ति प्रदान करता है। इनके द्वारा रचित `रस-मीमांसा' हिंदी की सैद्धांतिक आलोचना का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। शुक्लजी ने जिस सूझ-बूझ,मेधा, तार्किकता और विवेचन-क्षमता द्वारा क्रोचे के अभिव्यंजनावाद की मर्यादाएं बतायीं, उसके दुर्बल और अनुपयोगी पक्षों को उद्घाटित किया और पाश्चात्य सिद्धांतों तथा विचारधाराओं की गहन जानकारी होने के बावजूद हिंदी आलोचना को उसके दुष्प्रभावों से बचाया वह उनकी आलोचना को विश्वस्तरीय विमर्श प्रदान कलता है। साथ ही, उन्होंने जिस तैयारी, साहस तथा विश्लेषण क्षमता द्वारा सामंतवाद का विरोध किया, जिन शब्दों में दरबारी संस्कृति का मुखौटा उतारा, जिस नैतिक एवं सामाजिक सरोकार से रहस्यवाद एवं गुह्य-साधना का विरोध किया तथा जिस विनोदवृत्ति द्वारा पूंजीवाद का मुखौटा उतारा वह उनके आलोचक को बहुत बड़ा बनाता है। इनका आलोचक तुलना और विश्लेषण के प्रतिमान द्वारा रचना की चतुर्दिक व्याख्या करते हैं। इनके सारे निष्कर्ष तर्कपूर्ण समास- शैली में अभिव्यक्त होते हैं जिससे उनके सूत्र आज भी विमर्श की गुंजाइश रखते हैं। यही कारण है कि ये अपनी परवर्ती आलोचकों के लिए न केवल एक बड़े प्रेरक स्तंभ बने रहे अपितु हिंदी आलोचना में परस्पर विरोधी विचारधारात्मक स्थितियों के लिए अनुकूल परिवेश तैयार करने वाले भी रहे।
हिंदी आलोचना में वैज्ञानिक दृष्टि और लोकधर्म के प्रवर्तक: शुक्लजी
सारांश यह है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ऐसे महान प्रतिभासंपन्न आलोचक हैं जिन्होंने हिंदी आलोचना को सर्वाधिक पारिभाषिक शब्द दिए। इनके द्वारा प्रयुक्त लोकमंगल, लोकधर्म, लोकसंग्रह, लोकसंस्कृति, साधनावस्था, सिद्धावस्था जैसे शब्दबंध न केवल आलोचना के पारिभाषिक दायरे का विस्तार करते हैं अपितु उसे अर्थगर्भित एवं विचारपूर्ण भी बनाते हैं। इनकी लेखनी ने हिंदी आलोचना को विश्वस्तरीय बनाने का आधार निर्मित किया।यदि रस-मीमांसा इनके सैद्धांतिक चिंतन का प्रकर्ष है तो तुलसीदास, जायसी ग्रंथावली और भ्रमर गीत सार की भूमिका इनकी व्यावहारिक आलोचना का चरम निदर्शन है। यही कारण है कि इनके बाद कई हिंदी आलोचना इनसे संवाद करते हुए अथवा टकराते हुए ही आगे बढ़ी है। इन्होंने जिस बौद्धिक तैयारी,सर्वांगपूर्ण और भेदक दृष्टि द्वारा हिंदी साहित्य के सभी कालखंडों, सभी रचनाकारों एवं सभी विधाओं पर लिखा है वह हर आलोचक के समक्ष चुनौती है। इसी तरह साहित्य, संस्कृति, मनोविज्ञान, धर्म, कला,राजनीति, अर्थतंत्र, भारत बोध और लोकचिंता जैसे विषयों पर लिखित इनके विषय प्रधान, विचारपूर्ण निबंधों का भी कोई सानी नहीं है।
यदि हिमालय पृथ्वी का मानदंड है तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत  हिंदी साहित्य का इतिहास साहित्येतिहासों का मानदंड है। साथ ही,रस-मीमांसा सैद्धांतिक आलोचना का गौरव ग्रंथ है। जब-जब हिंदी आलोचना अपर्याप्तता, संकीर्णता और एकांगिकता की शिकार होगी तब-तब आचार्य रामचंद्र शुक्ल एक अभिभावक और मार्गदर्शक की भाँति उसका मार्ग प्रशस्त करेंगे। ये हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष और मेरुदंड हैं। इनके बिना उसकी परिकल्पना ही संभव नहीं है।एक आलोचक कितना तटस्थ और नीर-क्षीर विवेकी हो सकता है,यह हम आचार्य रामचंद्र शुक्ल से ही सीख सकते हैं। संक्षेप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी आलोचना की अस्मिता के प्रतीक हैं। इनके द्वारा लिखित आलोचना में कृति के सत्य को जिस निष्पक्षता, व्यापक दृष्टिकोण, वस्तुनिष्ठता और बौद्धिक विवक्षा के साथ उद्घाटित किया गया है उससे हिंदी आलोचना का स्वतंत्र, शक्तिमान, वैज्ञानिक और आधुनिक व्यक्तित्व निर्मित हुआ है। अत: जब तक यह धरती है तब तक आचार्य शुक्ल का नाम एवं अवदान सुरक्षित है।
संदर्भ सूची
१-- आचार्य रामचंद्र शुक्ल के श्रेष्ठ निबंध-- संपा.  डॉ.सत्यप्रकाश मिश्र, पृष्ठ ९१-९२
२- वही, पृष्ठ- १०६
३-- वही, पृष्ठ- २२६
४-- वही, पृष्ठ- २१६
५- आचार्य रामचंद्र शुक्ल संचयन-- रामजी यादव, पृष्ठ-२३०।
डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय 

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