भगत सिंह - निडर निर्भीक देश प्रेमी क्रांतिकारी...!
यह लेख शहीद भगत सिंह के जीवन, उनके क्रांतिकारी विचारों, स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान और देशभक्ति की अद्भुत भावना को दर्शाता है। इसमें जलियांवाला बाग कांड से लेकर असेंबली बम कांड और उनकी शहादत तक की प्रेरणादायक कहानी प्रस्तुत की गई है।
भगत सिंह.......!!
मनुष्य के जन्म के पीछे कोई न कोई एक विशेष प्रयोजन होता है, उद्देश्य होता है; जो शायद हो सकता है कि पूर्व के जन्मों में अधूरा रह गया हो और उसको प्राप्त करने या संपूर्ण करने हेतु पुनर्जन्म हुआ हो! एक बात तो यह जरूर है कि आत्माओं का पुनर्जन्म अवश्य होता है, जो शाश्वत सत्य है; क्योंकि पंचभौतिक देह नश्वर है और आत्मा अजर अमर...!!
यह भी सत्य है कि जब मनुष्य की मृत्यु होने को होती है तब उस समय जो भाव, विचार जिस किसी वस्तु पर चलता है; उसी को प्राप्त करने हेतु संसार में पुन: आना पड़ता है......!!
ऐसे ही इस तरह एक मनुष्य संसार में आया और अपने लक्ष्य को साध कर संसार से पुन: गमन कर गया; उनका नाम था सरदार भगत सिंह...!!
भगत सिंह का जन्म सिख परिवार में २८ सितंबर १९०७ को गांव बंगा जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था और यह एक साधारण सा किसान परिवार था...!! उस समय भारत पर अंग्रेजों का आधिपत्य था और उनकी हुकूमत पूरे भारतवर्ष भर में जुल्म ज्यादती ढा रही थी! पूरा भारतवर्ष दासता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और हर भारतवासी की दशा एवम मनोदशा बंद पिजड़े में तोते की जैसी थी! गुलामी से हर एक भारतीय व्यथित था दुखी था! देश भर में अग्रेजों के विरुद्ध जगह जगह आंदोलन चल रहे थे और अनेक प्रकार के अभियान उनके विरुद्ध चलाया जा रहा था! आजादी के दीवाने स्वतंत्रता प्राप्ति के अनेक क्रांतिकारी अग्रेंजों को मानसिक, आर्थिक क्षति पहुंचा रहे थे...!!
आजादी का जुनून भगत सिंह को भी चढ़ गया था और वो भी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और क्रांतिकारी बन गए! उसी दरम्यान अमृतसर में १३ अप्रैल १९१९ को जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड की घटना घट गई थी जिससे भगत सिंह को काफी हद तक मानसिक रूप से तोड़ दिया था और तत्पश्चात उनके विचारों में काफी गहरा बदलाव आ गया था! लाहौर के नेशनल कॉलेज़ से उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़कर भारत को आजाद कराने के लिए नौजवान भारत सभा की नींव रख डाली थी...!!
१९२२ में जब चौरी-चौरा हत्याकांड हुआ तब गाँधी ने किसानों का साथ नहीं दिया था, तब भगत सिंह बहुत निराश हो गए थे और उनका गांधी के अहिंसा से विश्वास उठ चुका था; तब उन्होंने हथियारों के बल पर आजादी प्राप्त करने का मार्ग चुन लिया और क्रांतिकारी दलों से जा मिले! चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में गठित पार्टी गदर दल से जुड़ गए थे! इधर जब काकोरी काण्ड में राम प्रसाद `बिस्मिल' सहित चार अन्य क्रान्तिकारियों को फाँसी तथा अन्य सोलह क्रांतिकारियों को कारावास की सजा से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न एवम विचलित हो चुके थे की वो चन्द्रशेखर आजाद के साथ मिलकर उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गए और उस पार्टी को फिर एक नया नाम दिया गया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन! जिसका मुख्य उद्देश्य था ऐसे नवयुवकों को मानसिक रूप से तैयार करने का था जो देश के प्रति अपने प्राणों की आहुति दे सके, मर मिटने का जज्बा रखते हुए सेवा, त्याग और कष्ट पीड़ा झेलने को तत्पर रहे...!!
१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए जब भयानक प्रदर्शन आरंभ हुए, तब इन प्रदर्शनों में भाग लेने वालों पर अंग्रेजों ने लाठी चार्ज किया और इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई! भगत सिंह इस घटना से आहत हो चुके थे और उन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना रच डाली! सशक्त रणनीति के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लग गए और जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गए जैसे कि उनकी साइकिल खराब हो गई हो! चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० वी० स्कूल की चारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे......!
१७ दिसंबर १९२८ को सायंकाल सवा चार बजे के आसपास सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सॉन्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में दे मारी और तुरन्त बाद भगत सिंह ने भी ३/४ गोली दाग कर उसको मौत के घाट उतार दिया! ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया तब चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसको चेतावनी देते हुए कहा कि रुक जाओ वरना गोली मार दूंगा; जब वो नहीं रुका तो आज़ाद ने उसे गोली मार दी और वो वहीं पर ढेर हो गया! इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया........!!
भगत सिंह को अंग्रेज पूंजीपतियों की भारतीय मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं थी; क्योंकि उस समय अंग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पा रहे थे! अतः अंग्रेजों के द्वारा मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका घोर विरोध करना स्वाभाविक रूप से सही था! मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था! सभी चाहते थे कि अंग्रेजों को इस का बात का खौफ हो जाना चाहिए कि हिन्दुस्तान के लोग अब जाग चुके है और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है! अंग्रेजों को उनकी नीतियों के विरुद्ध उनको सबक सिखाने के लिए ऐसा ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनाई थी...!!
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा इनको भी चोट लग सकती थी! पूरा हाल धुएँ से भर गया था, अगर भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया! उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे, बम फटने के बाद उन्होंने 'इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद' के नारों से सारा संसद गुंजायमान हो गया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिए! वो एक जज्बा था देश प्रेम के प्रति...!! भगत सिंह करीब २ साल तक कारावास में बंद रहे! इस दरम्यान वे अपना समय साहित्य पढ़ने तथा लिखने में व्यतीत करते हुए अपने क्रांतिकारी विचारों को लेख के रूप में लिखकर कलम के जरिए व्यक्त किया करते थे! उनके द्वारा लिखे हुए लेख और अपने परिवार एवम सगे संबंधियों को लिखे गए पत्र उनके विचारों के रूप में समाज के भीतर आज भी दर्पण का काम कर रहा है! उन्होंने पूंजीपतियों को अपना शत्रु बताया और कहा की को मजदूरों का शोषण करने वाला होगा फिर चाहें वो एक भारतीय ही क्यों न हो, वह मेरा शत्रु है...!!
एक लंबे समय तक चली कानूनी कार्रवाई के पश्चात आखिरकार २३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी पर लटका दिया गया! फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी अंतिम ख्वाहिश पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे है अत: उनको पूरी जीवनी पढ़ने तक का समय दिया जाए! कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- `ठहरिए! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।' फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - `ठीक है अब चलो।'
फाँसी पर जाते समय भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव तीनों मस्ती से देश प्रेमी गीत मेरा रंग दे बसंती चोला गाते हुए जा रहे थे...!
अंग्रेजों को इस कदर डर लग रहा था कि इनकी फांसी के पश्चात कहीं जनता नहीं भड़क उठे, इसके लिए अंग्रेजों ने इनके पार्थिव शरीर के टुकड़े कर के बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ केरोसिन तेल डालकर इनके पार्थिव शरीर कोजलाया जाने लगा! समीप के गांव वालों ने जब आज जलती देखी तब वो समीप आए; जिससे अंग्रेज भय खा कर इनकी अधजली लाश के टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंक कर भाग खड़े हुए...!
गांव वालों द्वारा उनके पार्थिव शरीर के अधजले टुकड़े एकत्रित का फिर सनातनी विधिवत् अंतिम संस्कार किया गया...!!
भगत सिंह जैसे निडर निर्भीक इंसान बहुत कम विरले पैदा होते है, महान आत्माएं संसार में आ कर अपना लक्ष्य पूरा कर के नाम अमर कर लौट जाती है...!!
जननी जने तो ऐसा जने के दाता के सूर!
नी तो रिजे बांझडी, मत ना गवाज्ये नूर!!
पवन सुरोलिया "उपासक "
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