बाबूजी
यह संस्मरण एक ऐसे पिता (बाबूजी) के जीवन का जीवंत चित्रण है, जो अपने समय के प्रभावशाली व्यक्तित्व, कुशल पहलवान, समाजसेवी और निडर इंसान थे। उनके व्यक्तित्व में साहस, स्वाभिमान और नेतृत्व की अद्भुत झलक मिलती है। ग्रामीण जीवन, पारिवारिक संघर्ष, सामाजिक प्रतिष्ठा और अंततः बीमारी से संघर्ष तक की उनकी यात्रा भावनात्मक और प्रेरणादायक है। यह कहानी न केवल एक व्यक्ति की गाथा है, बल्कि उस दौर के ग्रामीण समाज और मूल्यों का भी प्रतिबिंब है।
बाबूजी का नाम लेते ही आँखों के सामने एक दिव्य तुल्य छायाकृति खड़ी हो जाती है। छः फिट से ऊंचा कद, उन्नत ललाट, बड़ी-बड़ी आँखें, मोटी बड़ी मूँछे, ऊँची नासिका, रक्ताभ होठ, चमकीलीबत्तीसी, लम्बी-लम्बी भुजाएँ, चौड़ा सीना, साँवला होने के बादभी चमकता चेहरा, अद्भुत शरीर सौष्ठव था, जो अब देखने में कम मिलता है। नौजवानी में क्षेत्र के नामी गिरामी पहलवान थे, अधेड़ होते-होते क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्ति हो गए। बाबूजी ग्रामीण अंचल के कुशल राजनीतिज्ञ थे। भले ही गाँव के प्रधान अथवा न्याय पंचायत के सरपंच नहीं बनते थे लेकिन अपने ही लोगों को बनाते थे। किंग भलेन बनें किंगमेकर तो रहते थे। मेरे बचपन में आर्थिक तंगी होने के बाद भी दरवाजे पर बाबूजी का दरबार दिन-रात चला करता था। गोहरी की आग उपलब्ध होने पर तम्बाकू होक्का का दौर चला करताथा अन्यथा सुर्ती-चूना, बीड़ी-माचिस सिरहाने रखा रहता था। लोगों की आवभगत के लिए कई कड़ाहे का पिटिउरा (गन्ने में मसाला डालकर बनाया गुड़) सजा रहता था। वैसा गाँव में आनंद कहाँ रहा। गाँव में लेखपाल, अमीन, पुलिस-दरोगा, नायब तहसीलदार जो भी आते थे, कुछ देर जरूर विश्राम करते थे। बाबूजी का झंझरीदार बैठका डाक बँगले का काम करता था। गरमी के दिनों की दोपहरी में कई जोड़े ताश के पत्ते खेले जाते थे। गाँव के बच्चे दर्शक की भूमिका में रहते थे क्योंकि उन दिनों मोबाइल नहीं था। तपती धूप में बाहर खेल भी नहीं सकते थे। घर के बच्चों को बीच-बीच में कुँए से पानी निकाल कर पिलाना पड़ता था। दोपहर बारह बजे से सायं पाँच बजे तक शकुनी के पासे की तरह ताश के खेल का चटखारे लेकर आनंद लिया जाता था। युवावस्था में बाबूजी गाँव के ही नहीं क्षेत्र के नामी गिरामी पहलवानों में से एक थे। बाबूजी बताते थे गाँव से पाँच किलोमीटर दूर भटहर के दंगल में पचास रुपए चाँदी के सिक्को की कुश्ती लड़ी थी। आधे घंटे कुश्ती के बाद बराबरी पर दोनों पहलवानों को छुड़ा दिया गया। चांदी के पचीस सिक्के तथा एक लाल गमछा पुरस्कार में मिला था।
बाबूजी का पालन-पोषण बहुत ही संपन्नता में हुआ था। सूरज निकलते ही उन्हें देशी घी तथा खिचड़ी का नाश्ता कराया जाता था क्योंकि वह परिवार में सबसे बड़ी संतान थे। किंचित कारणों से नाश्ते में जरा भी विलंब हो जाता तो दादी पर शामत आ जाती। दूध-दही से परिपूर्ण भोजन होता था क्योंकि उस समय कई भैंसें, गाएँ, चार बैल हुआ करते थे। दो हल की खेती हुआ करती थी। तीन गाँव में जमीन थी। गाँव के बड़े काश्तकारों में गिनती की जाती थी। गाँव में स्कूल न होने के कारण बाबू जी कुछ ही दिन स्कूल गए। मास्टरजी के कहने पर मानीटर ने हल्के से बाबूजी को थप्पड़ मारा। बाबू जी ने कई तमाचे जड़कर चल दिए। स्कूल जाना छोड़ दिए। बड़े दादा पुलिस थे तथा बहुत बलशाली थे। उन्होंने बाबूजी को पहलवान बनाने को सोचा किंतु नियति को मंजूर नहीं था। किशोरावस्था आते-आते दादा दलजीत सिंह और उनके दोनो भाई काल कवलित हो गए। उस समय इलाज की ऐसी उचित व्यवस्था नहीं थी। प्लेग, हैजा तथा तावन से गाँव के गाँव काल के गाल में समा जाते थे। बाबूजी के सिरसे साया उठ चुका था किंतु दादाजी की इच्छा देखते हुए पहलवानी के लिए अभ्यास जारी रखा। गाँव के अखाड़े में उस्ताद के रूप में सम्मान प्राप्त था। प्रधान एवं गाँव के सहयोग से कई वर्ष तक दंगल लगवाते रहे। चाचा को भी पहलवान बनाने का प्रयास किया किंतु असफल रहे।
एक बार गाँव के दंगल में दूसरे गाँव का कोई पहलवान आकर चुनौती दे दिया। गाँव का कोई पहलवान हाथ न मिला सका। पहलवान ने अखाड़े में कई बार फेरी मारी और ताल ठोंका। सभी की स्थिति द्रौपदी के चीर हरण के समय पांडवो जैसी थी।सभी मुँह नीचे कर लिए। बाबूजी अधेड़ हो चुके थे। अखाड़े में रेफरी का काम कर रहे थे। पहलवान ने फिर ललकारा `जिसने माँ का दूध पिया हो कोई भी लड़ सकता है।’ बाबूजी का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। बोल पड़े `बस पहलवान बस । मेरे गाँव की प्रतिष्ठा का सवाल है। कुश्ती तो तुमसे नहीं लड़ सकता। हाँ मेरा पंजा मोड दो तो तुम्हें पहलवान मान लूँ।’ उसने भी पंजा लड़ाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया। पंजे में पंजा आजाने के बाद दोनों पहलवानों ने पूरी ताकत लगाई। पाँच मिनट जाते-जाते दोनों पहलवानों को पसीना छूट गया। बाबूजी की लम्बाई ज्यादा थी। बाबूजी लम्बाई का फायदा उठाते हुए उसका पंजा मोड़ दिए। बाबूजी जय बजरंगबली बोलकर उछल पड़े। गाँव के लोग बाबूजी को उठा लिए । बाबूजी ने उसी दिन से लंगोट रख दी। दंगल लगना बंद हो गया। लेकिन बाबूजी नियमित वृद्धावस्था तक लाठी के सहारे सैकड़ों दंड बैठक करते रहे। हमारे बाबूजी बड़े बहादुर थे। उनके बहादुरी की चर्चा आन गाँव-जवार में भी होती थी। पहले साधनों का अभाव था। लोग गाँव से पैदल पचासों किलोमीटर दूर विंध्याचल की यात्रा पैदल ही करते थे। एक बार बाबूजी गाँव के लोगों के साथ विंध्याचल जा रहे थे। रास्ते में एक जमींदार के दखाजे पर पानी पीने के लिए रुके।
उस समय यात्री अपने साथ लोटा-डोरी रखते थे। दरवाजे पर लोहे की पाँच मन (अर्थात एक क्विंटल) की नाल रखी थी। कई पहलवान उसे उठाने का प्रयास कर रहे थे पर नहीं उठा पारहे थे। बाबूजी ने जमींदार, से कहा `मैंनाल उठाऊँ ? जमींदार ने कहा `उठाओ।' बाबूजी नाल कंधे तक उठाकर रुके फिर पूरी ताकत से ऊपर उठाकर फिर नीचे रख दिया। जमींदारने खाट से उठकर गले लगा लिया और पीठ थपथपाई।
बाबूजी अपनी बहादुरी से नाम तो कमाया किंतु दुश्मनों की फौज भी खड़ी कर दी। गरीब और कमजोर लोगों का पक्ष लेने के कारण गाँव के कुछ लोगों से दुश्मनी भी हो गई। बाबूजी के अधेड़ होते-होते चकबंदी, भी आ गई। पट्टीदार, पड़ोसी तथा गाँव वालों ने कई मुकदमा कर दिया। मुकदमे के कारण चिंता में बाबूजी ने मेरा नाम टी. डी.कालेज जौनपुर में लिखाया। मुकदमें,पढ़ाई, बड़े परिवार का खर्च, शादी विवाह के कारण लगभग दस बीघे जमीन बेंचनी पड़ी। तीन गाँव में जमीन थी सिमटकर दोगोंव में रह गई। किंतु खर्च और शानो-शौकत में किसी प्रकार की कभी कमी नहीं हुई। दीवानी मुकदमे के साथ कई फौजदारी के मुकदमेभी लड़ने पड़े।
हमारे गाँव में सभी जाति के लोग पाए जाते हैं। किंतु हमारा पुरवा ब्राह्मण अधिसंख्य है जिसके कारण कुछ लोग बभनौटी (ब्राह्मणों की बस्ती) भी कहते हैं। मेरे बचपन की घटना है-पहले पुरवट, घर्रा, दुबला' रहट से खेतों की सिंचाई होती थी। खेती करने में महीनों लग जाते थे। १९७० में बाबूजी एक पड़ोसी पांडेय के साथ मिलकर पंपिंग सेट लगवाए। तब जाकर सिंचाई करने में राहत हुई। किंतु एक समस्या खड़ी हो गई, बिजली कम समय के लिए आती थी।
हमारे कुएं से जिन खेतों की सिंचाई होती थी, सबके लिए पानी की व्यवस्था कैसे हो? हमारे और पांडेय के पास खेत ज्यादा थे। इसके लिए विवाद बढ़ने लगा। उस समय हमारे यहाँ भगेलू हरिजन हलवाही करते थे। वैसे तो बाबूजी रामायण, महाभारत, पहलवानी, क्षेत्रीय राजनीति की बात करते थे, किंतु कभी-कभी हास-परिहास की बात भी करते थे। सिंचाई को लेकर विवाद चरम पर था। बाबूजी बोले, `भगेलू, कल मार-पीट होने वाली है। पंडित लोग संख्या में ज्यादा हैं। तुम्हे भी लाठी-डंडा लेकर तैयार रहना होगा। `भगेलू ने तपाक से कहा, `बाबू साहब मारपीट में हम सब जीति नाई सकित। तिहावा हमार हिस्सा हऊ। दुई लाठीखाई लिह त बगल होइ जाय, एकलाठी हमहूँ खाईलेब!' बैठका में बैठे हम सब लोग हँसकर लोटपोट हो गए।
दूसरे दिन बाबूजी घर पर थे। बड़े भाई साहब पंपिंगसेट के पास थे। पंपिग सेट घर से थोड़ी दूर पर था। ब्राहमण घराने के पन्द्रह-बीस लोग लाठी-डंडों के साथ पंपिंग सेट के पास गए। भाई साहब परिस्थिति भाँप कर मशीन घर में ताला लगाकर वहाँ से घर की तरफ भागे। कुछ ब्राहमणों ने पीछा किया। पीछा करते-करते घर की तरफ आ गए। मैं घर के अहाते में भैंस चरा रहाथा। बाबूजी घर पर बैठे थे। लोगों की मारो-मारो की ललकार पर उन्हें क्रोध आ गया। तेजी से घर में घुसे एक हाथ में बल्लम दूसरे हाथ में गड़ासा लेकर बाहर निकलना चाहा। माँ ने रोकने की कोशिश की,पैर पकड़ लिया किंतु बाबूजी ने तेजी से झटक दिया। माँ-चाची से बोली, `दुलहिन-दरवाजे के बीच में खड़ी होकर रोकले नहीं तो अनर्थ हो जायेगा।’
चाची जाकर दरखाजे की बीच में खड़ी हो गईं। संस्कारतः हिंदू धर्म में अनुज-वधू का स्पर्श केवल एक ही अवसर विवाह में `ताग-पाट डालते समय ही करते थे। फिर आजीवन कभी भी स्पर्श नहीं करते हैं। बाबूजी पर क्रोध सवार था, उन्होंने चाची को एक हाथ से खींचकर दरवाजे से हटा दिया। बाहर निकलकर द्वार पर खड़े होकर ललकारा-‘ रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहूँ से लड़हीं।’ अर्थात बलवान शत्रु को देखकर हम नहीं डरते। एक बार काल से भी लड़ सकते हैं।
बाबू जी का विकराल क्रोधित रूप देखकर वे लोग हतप्रभ हो महज दरवाजे से थोड़ी दूर पर रुक गए। बाबूजी सिंह की तरह दहाड़ते हुए बोले- ‘मेरी मृत्यु आज निश्चित है लेकिन इतने आसानी से नहीं,सँग कई लोगों को मारकर मरूँगा।' इतना कहकर कुएँ की तरफ बढ़े। अपना जनेऊ निकालकर कुएं में फेंक दिया और बोले,' आज से पुरोहित और यजमान का रिश्ता खत्म करता हूँ।' बाबूजी का रौद्र रूप देखकर वे लोग आपस में धरि-धीरे बात करते हुए हमारी आबादी के क्षेत्र से बाहर जाकर कुछ दूर खड़े रहे। बाबूजी बहुत बड़े मुकदमे बाज थे। उनकी इच्छा थी कि मारपीट हमारी आबादी में हो जिससे कानूनी रूप से मजबूत रहूँ। धीरे-धीरे आपस में बात करते हुए सब अपने घर की ओर चले गए। बाबूजी के जीवन में कई घटनाएँ ऐसी हुईं लेकिन उन्होंने कहीं हार नहीं मानी। बड़ी बहादुरी से अपना जीवन जिए।
मुंबई में अध्यापक की नौकरी लगने के बाद ग्रीष्मावकाश, दीपावली अवकाश में गाँव जाता था। कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर बीच में एकाध बार गाँव जाता था। यहाँ तक कि पत्नी के बीमारी के कारण एक बार मैं तीन महीने गाँव में रह गया था। पत्नी की बीमारी,बच्चों की पढ़ाई के कारण धीरे-धीरे गाँव जानाकम हो गया, किन्तु ग्रीष्मावकाश में गाँव निश्चित रूपसे जाता था।
मई २००४ में मैं सपरिवार गाँव गया था। पत्नी गंगा- स्नान एवं विश्वनाथ भोले बाबा के दर्शन की मन्नतमान रखी थी। उसे पूर्ण करने में बच्चों के साथ एक दिन वाराणसी जाने के लिएसुबह की बस पकड़ने निकला,पिताजी भी साथ-साथसड़क तक आगए ।
शाम को घर पहुँचने पर दरवाजे का दृश्य देखकर मैं दंग रह गया। मड़हे में काफी लोग जमा थे। डॉ.नूरेग्लूकोज़ चढ़ा रहे थे। मुझे देखकर भाभी सिसकते हुए बोलीं-‘ बबुआ, बाबूजी को फालिश मार दिया है उनका एक हाँथ और एक पैर काम नहीं कर रहे हैं। आवाज भी बराबर नहीं निकल रही है। मैं बाबूजी को देखकर रो पड़ा। बाबूजी की भी आँखे भर आयीं। डॉ. ने कहा,‘जितना प्राथमिक उपचार था, मैंने कर दिया है। सुबह इन्हें जौनपुर,इलाहाबाद, (सम्प्रति प्रयाग) बनारस में किसी स्पेशलिस्ट बड़े डाक्टर को दिखाओ।’
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दूसरे दिन कई लोगों के साथ जीप में लादकर जौनपुर गया। भारी भरकम शरीर को जीप से उतारकर डाक्टर के केबिन ले जाना कठिन था। दो-तीन लोगों के सहयोग से किसी तरह लाया गया। डॉ. अरुण मिश्र ने दवा, इंजेक्शन देकर, वाराणसी से पूरे बाडी का चेकअप करवाकर लाने के लिए कहा। शाम को घर आया। बाबूजी का दाहिना हाथ-पैर काम नहीं कर रहा था। किसी तरह से खाना खिलाया गया। दूसरे दिन भतीजे के दोस्त की गाड़ी से वाराणसी जाकर पूरे शरीर का चेकअप कराया गया। तीसरे दिन पूरी रिपोर्ट एवं बाबूजी को जीप से लेकर जौनपुर गया। सारी रिपोर्ट देखने के बाद डाक्टर ने कहा, `इन्हें फालिश मार दिया है दवा एवं व्यायाम करने से अपनी दिनचर्या कर लें यही बहुत है।' बाबूजी समाज एवं पंचायत में जाकर बहुत कटु सत्य बोलते थे। उस समय बाबूजी को काफी दिनों से हाई ब्लड प्रेशर था। इसलिए गुस्सा कर बोलते थे।
तीन सगी बहनें, दो चचेरी बहनें, बुआ, गाँव तथा पड़ोस केलोग देखने आए। बाबूजी दिनरभर, द्वार-पर, बाजार में, सबसे बतियाते रहते थे। बहुत पराक्रमी- क्षेत्र के नामी पहलवान थे किंतु रोग के आगे सारा पुरुषार्थ थक गया। दिनचर्या करना भारी हो गया। लम्बा तथा भारी शरीर होने के कारण कई लोग मिलकर उठाते, लघु- शंका, दीर्घशंका कराते। कभी-कभी पड़ोसियों का भी सहारा लेना पड़ता था। हर हफ्ते गाड़ी से, डाक्टर को दिखाने के लिए जौनपुर जाना पड़ताथा। चाचा, दो भाई सब मुंबई में रहते थे। उस समय मोबाइल नहीं था। बहुत संभ्रांत घरों में फोन हुआ करते थे। दूसरों से उनलोगों को बाबूजी की बीमारी का पता लगा। सबने पूछा, `बाबूजी की बीमारी को क्यों नहीं बताए? मैंने कहा `डाक्टर के हिसाब से बाबूजी को ठीक होने में दो-तीन महीने लगेंगे। मेरा स्कूल बयालीस दिनों के लिएबंद है, तब तक मैं देखूँगा। आप सब भी बारी-बारी से आकर उनकी देखभाल करियेगा।' सुबह एक हाथ मे लाठी तथा एक हाथ,हाँथ से पकड़कर घुमाया जाता था। बाबूजी काफी प्रयास के बाद घर के बाहर शौचालय तक जाने लगे। शौचालय में एक कुर्सी बीच में काटी गई थी जिस पर बैठकर शौच किया जा सके। मुंबई में १३ जून को विद्यालय खुलते हैं। मेरा ११जून को मुंबई जाने का रिजर्वरेशन था। १० जून को बड़े भाई गाँव आ गये। पूरा परिवार सेवा कार्य कर रहा था । भाभीजी की सेवा सराहनीय थी क्योंकि माताजी आठ वर्ष पहले मर चुकी थीं।
चार वर्ष तक बाबूजी दवा तथा सेवा पर जीवित रहे। परिवार के सभी लोगों ने बहुत सेवा किया। जनवरी २००८ में बाबूजी की तबियत खराब हो गई। डाक्टरों ने घोषित किया कि अब वह ज्यादा दिन जीवित नहीं रहेंगे। पूरे परिवार के सोलह लोग मुंबई से आगे-पीछे सभी गाँव पहुंच गए। लगभग १५पन्द्रह दिनों तक बाबूजी के साथ रहा। सेवा के साथ-साथ प्रतिदिन बाबूजी के पास बैठकर गीता-रामायण का पाठ करता था। वह ध्यान से सुनते थे। मेरी छुट्टी समाप्त हो गई। मेरी बेटी की दसवीं की परीक्षा थी। फरवरी महीनें में प्रैक्टिकल की परीक्षाएँ थीं। बड़े भतीजे संजीव को जिम्मेदारी देकर मुंबई आ गया। मुंबई आने के पाँच दिनों बाद बाबूजी का दस फरवरी २००८ को देहावसान हो गया। रविवार का दिन दोपहर का समय था। हवाई जहाज से भी टिकटन उपलब्ध होने के कारण पिताजीका अंतिम दर्शन न कर सका। बाबूजी का शव बस द्वारा वाराणसी लाया गया। गाँव के लोग,रिश्तेदार सभी उपस्थित थे। बड़े भतीजे संजीव ने मुखाग्नि दी। पुनः हम सब गाँव आ गए। पुत्री की परीक्षा के कारण पत्नी गाँव न जा सकी। बाबूजी की इच्छानुसार उनकी अन्त्येष्टि का कार्यक्रम प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर किया। तेरहीं में लगभग तीन हजार लोगों को खिलाने की व्यवस्था की गई। माता-पिता के मरने के बाद छत्रछाया समाप्त हो गई। उनकी यादगार के लिए चाहकर भी कुछ न कर सका। हाँ मैने प्रथम काव्य संग्रह' सपने बिखर गए बाबू जी को समर्पित किया वह छंद दृष्टव्य है-
`राणा-सा थास्वाभिमान, शिवा सा शौर्य जिसमें,
काल का भी लेशमात्र भय नहीं करता।
उनत ललाट भाल, देव तुल्य देह थी,
जिंदगी भरजो अन्याय से था लड़ता।
प्रखर स्पष्ट बोलते,भलाया बुरा लगे,
लाख परेशानियों से कभी न सिहरता।
नाम चन्द्रेशसिंह सूर्य-सा प्रताप जिसका
ऐसे पिताश्री को शतबार नमन करता ।’
रामसिंह
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