धर्म
यह कहानी एक गर्भवती स्त्री के रहस्यमयी स्वप्न और उसकी मानसिक उथल-पुथल को प्रस्तुत करती है, जिसमें उसका अजन्मा पुत्र स्वयं को एक नए धर्म का प्रवर्तक बताता है। धर्म, कट्टरता, हिंसा और मानवता के बीच झूलती यह कथा मातृत्व, करुणा और शांति के भावों को गहराई से उजागर करती है। अंततः माँ अपने भय से ऊपर उठकर ममता और मानवता को स्वीकार करती है, और एक नए विचारधर्म के जन्म का संकेत देती है।
एक स्त्री गर्भवती हुई। नौ माह पूरे होने पर जन्म से पहले बेटा सपने में आया, ‘माँ तुम लेखिका हो। इसीलिए तुम्हारे गर्भ में आया। अभी तुम्हारी उमर बाइस साल है। अगले २५ साल से मेरे द्वारा चलाया गया धर्म विश्व के सभी धर्मों से बड़ा होगा। इसकी प्रसिद्धि २५ साल बाद से तुम्हारे बूढ़े होने तक यानी नब्बे साल के होने तक होगी और बाद में भी बनी रहेगी। तुम चूँकि लेखिका हो, तुम्हें बुद्धि और भावों में संतुलन बनाकर कर्म कर चलते जाना, लेखन भी करते जाना विवादों के बीच आता है। तुम स्वस्थ् और शांत जीवन जी सकोगी अपनी अंतिम साँस तक। पिछले जन्म में तुमने एक धार्मिक संघर्ष में शांति बनाने के प्रयास करते हुए अपने प्राण दिए थे और अंतिम साँस के निकलने से पहले आजीवन की साधना के कारण मूक हो मेरे चित्र को देखते हुए प्राण त्यागे थे। इसीलिए तुम्हें मेरी माता के रूप में जीवन मिला है। तुम घबराओ नहीं। जन्म के बाद भी मैं तुम्हारी मानसिकता में बसकर दिशा निर्देश का काम करता रहूँगा।‘
विचित्र से आए इस स्वप्न से व्यथित हो स्त्री की आँख खुल गई। उसकी बेचैनी बढ़ गई। धार्मिक विप्लव घर घर और बाहर मचा हुआ था। नित्य ही नई-नई खबरें मिल रही थीं। मार-काट, साजिश, तोड़-फोड़ कुछ भी शेष न था। ‘हे भगवान! क्या बिगाड़ा है मैंने किसी का। कितनी लालायित हो संतान का मुँह देखने की बाट जोह रही थी। सभी धर्मों की प्रमुख पुस्तकों को पढ़कर अपनी संतान के ज्ञान की वृद्धि की। सुख-शान्ति से जीने का रास्ता दिखाया और आज यही उसका फल है। क्या विश्वास कर ले स्वप्न पर। पर उसे तो स्वप्न आते ही नहीं। दिन भर की व्यस्तता के बाद आँख लगती है और ऐसे खुल जाती है जैसे सोई ही नहीं।‘ चिंतित हो सोचा उसने।
‘एक बार फिर कोशिश करती हूँ सोने की’।’
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ओह! पर नींद कोसों दूर थी। प्रसव पीड़ा मंद- मंद आरंभ हो गई। अपनी सास के साथ वह अस्पताल जा पहुँची। शरीर पीड़ा के कारण क्लांत हो रहा था। कुछ देर की राहत मिली तो उसकी झपकी लग गई। स्वप्न फिर आ गया। एक नन्हा सुन्दर बालक गोल-गोल पानीदार आँखों में मातृस्नेह लिए मधुर वाणी में कुछ कह रहा था। वह सुन पा रही थी, ‘माँ! माँ! मैं आ रहा हूँ। घबराओ नहीं।’
वह भी अवचेतन अवस्था में सपने में जा पहुँची थी। घबराकर बोली, ‘धर्मों की धरती पर कमी नहीं। संत, ज्ञानी आये और बस पीछे एक-एक पंथ छोड़ गए। पंथों को लोगों ने धर्म बनाया और फिर कट्टरता का जामा पहना लड़ने लगे। छाया भी पड़ जाए तो खून की नदियाँ बह जायें। नहीं देख रहे तुम तालिबानियों को....! सीरिया, ईरान, यूरोप, अफगानिस्तान ; कहाँ-कहाँ तांडव नहीं किया धर्म ने....। न ! न! ना बाबा ! मुझे नहीं चाहिए कोई भी धर्म धुरंधर । तौबा हो गयी है धर्म की दुनिया से । तुम.... तुम.... चले जाओ..... !’
‘क्या कहती हो माँ...! चला जाऊँ....?’ माँ को परेशान देख बालक रो पड़ा।
माँ विव्हल हो उठी। ‘बेटा। छाती से लगाने के लिए ही तो तुझे जन्म दे रही हूँ। पर तेरे...तेरे कारण माँओं से एक बार फिर बच्चे छिन जाएँ ये कैसे बर्दाश्त करूँगी मैं ।‘ वह फफक पड़ी।
‘माँ शांत हो जाओ। शांत हो जाओ। तुम तो बुद्धिजीवी हो और बुद्धिजीवी नहीं रोते। वादा करो मुझसे मेरा साथ दोगी। दोगी ना माँ ...?’
‘हाँ बेटा। जरूर। जरूर दूँगी। मैं तेरी माँ हूँ ना। धरती ने कभी पेड़-पौधों में भेद किया है! अपनी छाती से लगा सब को जीवनदान दिया है। नीम हो या आम, बबूल हो या पारिजात उसकी दृष्टि सदा सम ही रही। मेरी छाती का उफनता दूध तेरे होंठों के और नन्हें हाथों के स्पर्श के लिए बेताब हो रहा है। आ जा मेरे लाल। जब तक साँस है, तेरी माँ तेरे साथ है। तेरा धर्म तुझे मुबारक। मेरी ममता मुझे मुबारक।’
बच्चा हँसा। माँ के पसीने से भीगे माथे पर उसने अपनी नन्ही-सी एक ऊँगली रख दी। आँख खुल गई और बच्चे के मीठे रुदन से लेबर रूम चहक उठा। दूर-दूर तक फैली मधुर ध्वनि ने सबके हृदय में खुशी का संचार कर दिया। सास ने वहीं बैठे बहू की बलैया ली। संसार में एक बार फिर एक नए धर्म का जन्म हो चुका था।
किरन भण्डारी
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