भारतीय ज्ञान परम्परा
भारतीय ज्ञान परंपरा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक व्यापक और जीवंत पद्धति है। वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, योग, आयुर्वेद, दर्शन, विज्ञान और अध्यात्म के माध्यम से भारत ने सदियों से मानवता को दिशा दी है। यह लेख भारतीय संस्कृति, ऋषि परंपरा, वैज्ञानिक चिंतन, नैतिक मूल्यों और आधुनिक भारत की उपलब्धियों को जोड़ते हुए ज्ञान की उस निरंतर बहती धारा को प्रस्तुत करता है, जिसने विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “तमसो मा ज्योतिर्गमय” जैसे महान संदेश दिए।
भारतीय ज्ञान परंपरा पर लिखते हुए सबसे पहले मन करता है कि अपनी भूमि को प्रणाम कर लूँ। लिखना बाद में, झुकना पहले। यही भारत भूमि है, जहाँ मिट्टी भी कुछ कहती है और हवा में भी कोई पुरानी बात तैरती रहती है। यहाँ ज्ञान किसी एक किताब में बंद नहीं रहा, वह तो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आया -कभी कथा बनकर, कभी मंत्र बनकर, कभी जीवन जीने की रीति बनकर।
हमारे यहाँ समय को भी सीधी घड़ी से नहीं नापा गया। विद्वानों ने काल को युगों में बाँटा-सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलयुग। हर युग का अपना स्वभाव रहा, और उसी के अनुसार ज्ञान भी ढलता रहा। कहीं सत्य प्रधान रहा, कहीं कर्म, कहीं भक्ति और कहीं संघर्ष। पर एक बात समान रही - ज्ञान ने मनुष्य को संभाला। जब परिस्थितियाँ कठिन रहीं, तब भी चिंतन और विवेक का साथ नहीं छोड़ा गया।
यहाँ ज्ञान का मतलब केवल जान लेना नहीं था। यहाँ ज्ञान जीवन को आसान बनाने का साधन रहा। खेती से लेकर परिवार तक, जन्म से लेकर मृत्यु तक, हर पड़ाव पर कुछ न कुछ सोचा गया, समझा गया। शायद इसीलिए भारतीय ज्ञान परंपरा बहुत भारी-भरकम नहीं लगती, वह साथ चलती है।
मनुष्य की उत्पत्ति, सृष्टि की रचना, आदि आदि विषयों पर हमारे ऋषियों ने मनन किया। पर उन्होंने कहीं यह नहीं कहा कि अब सब जान लिया। यहाँ ज्ञान को अनंत माना गया। जितना जाना, उतना कम लगा। यही विनम्रता इस परंपरा की पहचान रही है।
भारत भूमि की एक और विशेषता रही कि यहाँ लौकिक और आध्यात्मिक अलग नहीं रहे। घर-गृहस्थी चलाते हुए भी आत्मा की बात होती रही। पूजा-पाठ केवल मंदिर तक सीमित नहीं रहा, वह व्यवहार में उतरा। काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष चारों को जीवन के अलग-अलग रंग माना गया।
वेद हमारी ज्ञान परंपरा का मूल हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इनमें जीवन के अलग-अलग सुर मिलते हैं। कहीं प्रकृति से संवाद है कहीं आत्म से, कहीं यज्ञ, कहीं संगीत, कहीं लौकिक विषयों की चर्चा। आज भी इन ऋचाओं में विद्वानों को आधुनिक विज्ञान से तारतम्य दिखता है। शायद इसीलिए भारत सदियों से ज्ञान का केन्द्र रहा। लोग यहाँ सीखने आए, कुछ चकित हुए, कुछ लोभ में भी पड़ आक्रामक भी हुए, पर ज्ञान की धारा रुकी नहीं, अभी तक नहीं।
वेदों के बाद उपनिषद आए। इन्हें वेदांत कहा गया। यहाँ बातें और भी भीतर की हो गईं। आत्मा क्या है? मैं कौन हूँ?... सरीखे प्रश्न सामने आए। बड़े-बड़े शब्दों से अधिक अनुभव पर जोर दिया गया। ‘तू वही है’ कहकर बहुत कुछ कह दिया गया। दर्शन और गणित की ओर देखें तो कपिल मुनि का सांख्य दर्शन याद आता है, जहाँ प्रकृति और पुरुष के सिद्धांत के माध्यम से सृष्टि की वैज्ञानिक व्याख्या की गई। त्रेतायुग में राम का जीवन केवल एक कथा नहीं रहा, वह आचरण बना। ऋषि वाल्मीकि के राम को संत तुलसीदास ने जन जन का बना दिया। नीति, मर्यादा और सामाजिक संतुलन का गूढ़ ज्ञान भी भक्तिरस में लिपटकर सरल व सरस हो गया। लगता है जैसे कोई बड़ा अपने घर की बात समझा रहा हो।
मानव सभ्यता के इतिहास का महानतम उपदेश, भगवद्गीता। इसमें न कोई भारी निर्देश हैं, न डराने वाली बात। बस इतना ही समझाया गया कि कर्म करते रहो, फल की चिंता छोड़ दो। जीवन के हर मोड़ पर यह बात सटीक बैठती है। गीता केवल युद्ध की पुस्तक नहीं रही, वह जीवन जीने की किताब बन गई।
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फिर आर्यभट्ट आते हैं अपने शून्य के साथ। शून्य छोटा सा दिखता है, पर उसने संख्याओं को ताकत दी। पाई का मान बताकर गणना को दिशा दी। वराहमिहिर ने गणित, ज्योतिष और खगोल विज्ञान को एक सूत्र में पिरोकर ब्रह्मांडीय गणनाओं को सरल किया।
स्वास्थ्य की बात आते ही लगता है कि भारत ने शरीर को भी उतना ही महत्व दिया जितना मन को। ‘पहला सुख निरोगी काया’ केवल कहावत नहीं रही। आचार्य सुश्रुत ने शरीर, रोग और उपचार की शल्य प्रणाली पर कार्य किया। वहीं आचार्य चरक ने आयुर्वेद को जीवनशैली से जोड़ा। जब आधुनिक पद्धति निराश करती है लोग आयुर्वेद की ओर देखते हैं। योग की बात न हो तो यह यात्रा अधूरी लगेगी। पतंजलि ने योग को केवल आसन नहीं जीवन का अनुशासन बनाया। ध्यान, संयम और अभ्यास से जीवन को संतुलित करने की बात कही। आज जब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है, तो लगता है कि भारत की एक पुरानी बात दुनिया तक पहुँच गई।
संस्कृत साहित्य में भर्तृहरि की नीति छोटी-छोटी पंक्तियों में बड़ी सीख है। चाणक्य ने ‘अर्थशास्त्र’ लिखकर राजनीति और शासन को समझाया। ये सब अलग-अलग होते हुए भी भीतर से जुड़े हुए हैं। कहीं एक सूत्र में पिरोये हुए हैं। यही सूत्र हमारी गौरवशाली ज्ञान परंपरा है। विज्ञान हो, तकनीक हो या दर्शन - जो आज पश्चिम का अर्वाचीन है वो निःसंदेह पूर्व के प्राचीन का तारतम्य मात्र है। भारत की सोच ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की रही, पूरा विश्व एक परिवार। यहाँ ‘मैं’ से ज़्यादा ‘हम’ की बात हुई। अहिंसा को महत्व दिया गया। यही सोच आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम में दिखाई दी। गांधीजी ने सत्य और अहिंसा को जीवन में उतारकर दुनिया को प्रभावित किया। उनका जीवन प्रश्न भी पूछता है और मार्ग भी प्रशस्त करता है। आधुनिक भारत में भी यह ज्ञान परंपरा थमी नहीं है। विज्ञान के क्ष्ोत्र में नए प्रयोग हुए। अंतरिक्ष तक भारत पहुँचा। मंगलयान की सफलता ने यह दिखाया कि साधन कम हों, पर संकल्प मजबूत हो तो रास्ता निकल आता है। कंप्यूटर और सूचना तकनीक में भी भारत ने अपनी जगह बनाई। यूएसबी और यूपीआई जैसे उन्नयन जन के कल्याण की चिंता के उदाहरण हैं। इतना सब लिखते लिखते लगता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा कोई बंद किताब नहीं है। यह तो चलती हुई नदी है। जहाँ से जो समझ आया, हमने लिया। अंत में यही प्रार्थना मन में आती है- ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ - हम अंधकार से प्रकाश की ओर चलें। मैंने जो समझा, वही शब्दों में रखा। कहीं कमी रह गई हो तो क्षमा चाहती हूँ। और जो पढ़ रहे हैं, उनका आभार कि उन्होंने भारत के ज्ञान को याद करने में मेरा साथ दिया।वंदेमातरम।
प्रतिभा जोशी
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