पर्यावरणीय शिक्षा और सतत विकास : हिन्दी साहित्य के विशेष संदर्भ में एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
यह शोध-लेख हिंदी साहित्य में पर्यावरणीय चेतना और सतत विकास की अवधारणा के अंतर्संबंधों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें आदिकाल, सिद्ध-नाथ साहित्य, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समानता, संसाधनों के संतुलित उपयोग तथा सतत जीवन के विचारों को रेखांकित किया गया है। लेख हिंदी साहित्य को पर्यावरणीय शिक्षा और सतत विकास लक्ष्यों के प्रति जन-जागरूकता का प्रभावी माध्यम मानता है।
सारांश
औद्योगिक क्रांति के उत्तरार्ध में जिस वैश्विक आर्थिक ढाँचे का निर्माण हुआ, उसने मानव और प्रकृति के आदिम संबंधों में एक गहरी दरार उत्पन्न कर दी है। संसाधनों के बेलगाम उपभोग और अनियंत्रित शहरीकरण ने पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को उस सीमा तक पहुँचा दिया है, जहाँ से पुनर्प्राप्ति अत्यंत चुनौतीपूर्ण प्रतीत होती है। फलतः, वर्तमान युग में 'सतत विकास' और 'पर्यावरण संरक्षण' केवल अकादमिक शब्द न रहकर, एक अस्तित्वपरक विमर्श के रूप में उभरे हैं।
प्रस्तुत शोध-लेख का उद्देश्य हिंदी साहित्य के विस्तृत स्तर पर व्याप्त पर्यावरणीय चेतना और 'सतत विकास' के अंतर्संबंधों का विश्लेषण करना है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक असंतुलन एक गंभीर चुनौती बनकर उभरे हैं, वहाँ साहित्य मात्र मनोरंजन का साधन न रहकर एक 'वैचारिक समाधान' के रूप में सामने आता है।
अतः इस शोध-पत्र के माध्यम से यह प्रतिपादित होता है कि हिंदी साहित्य 'पर्यावरणीय शिक्षा' का एक सशक्त माध्यम है। साहित्य में निहित 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'प्रकृति-सह-अस्तित्व' के भाव ही वास्तव में 'सतत विकास' के मूल आधार हैं। 'पर्यावरणीय शिक्षा' और 'सतत विकास' में साहित्यिक अभिव्यंजना अहम भूमिका निभाती है।
प्रस्तावना
पर्यावरणीय बोध का आरंभ साहित्य में आदिकालीन साहित्य से ही विद्यमान रहा है। आदिकालीन और भक्तिकालीन साहित्य मात्र श्रृंगारिक रचनाओं और वीरतापरक रूप में जाना जाता रहा है, परंतु पर्यावरणीय चेतना तत्कालीन कवियों की रचनाओं में भी अभिव्यक्त हुई है। यह चेतना कवियों की श्रृंगारिक रचनाओं में विभिन्न रूपों, जैसे षट्-ऋतुओं का वर्णन, बारहमासा इत्यादि में लक्षित है। जैसे-जैसे विकास की दौड़ बढ़ने लगी, औद्योगीकरण और शहरीकरण ने प्रकृति को विनाश की ओर धकेल दिया। साहित्यकारों ने साहित्य-रचना के माध्यम से समाज को जागरूक करते हुए यह संदेश दिया कि प्रकृति के साथ हो रहे इस अत्याचार को यदि समय रहते रोका नहीं गया, तो भविष्य में इसका परिणाम भयावह हो सकता है।
आदिकालीन साहित्य में पर्यावरणीय चेतना
आदिकालीन साहित्य मुख्य रूप से वीरतापरक और श्रृंगारिक रचनाओं के लिए महत्वपूर्ण है। गहराई से यदि अवलोकन किया जाए, तो इसमें पर्यावरणीय शिक्षा के सूत्र भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। आदिकालीन जीवन में भौतिक सुख-सुविधाएँ बहुत अधिक नहीं थीं, जिसके परिणामस्वरूप उस काल का जीवन प्रकृति पर आश्रित था और प्रकृति के बहुत करीब था।
हिंदी साहित्य में षट्-ऋतु वर्णन, बारहमासा इत्यादि कवियों की काव्य-कृतियों में प्राकृतिक चित्रण मिलता है।
उदाहरण:
बसंत ऋतु का वर्णन और वनस्पति का खिलना।
ङ्खमहमास-समीरे कंपिय-तीरे
कुसमय-पल्लव-सोहिय-नीरे।ङ्ग ¹
संदेशरासक ग्रंथ में इन पंक्तियों के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि प्रकृति जड़ नहीं है। हवा का चलना, फूलों का खिलना, जल का प्रवाह एक जीवंत प्रक्रिया है। पर्यावरणीय शिक्षा का पहला उपदेश यही है कि प्रकृति को मात्र एक ‘वस्तु’ न समझकर उसे एक जीवंत इकाई समझा जाए।
सिद्धों और नाथों के साहित्य में पर्यावरणीय शिक्षा और सतत विकास
सिद्धों और नाथों के साहित्य में प्रकृति मात्र पृष्ठभूमि नहीं है, अपितु साधना का अनिवार्य हिस्सा थी। सिद्धों और नाथों के उपदेशों में प्रकृति, काया (शरीर) और ब्रह्मांड के अंतर्संबंधों के रूप में मिलती है। सिद्धों ने सहज अवस्था पर जोर दिया। इसका अर्थ था कृत्रिमता का त्याग और प्राकृतिक रूप से जीवन जीना, जो सतत जीवन का मूल आधार समझा जाता है।
मध्यकालीन साहित्य में पर्यावरणीय चेतना और सतत विकास की अवधारणा
मध्यकालीन हिंदी साहित्य को उसकी प्रवृत्तियों के आधार पर दो भागों में विभाजित किया जाता है-भक्तिकाल एवं रीतिकाल। भक्तिकाल में भक्ति और रीतिकाल में श्रृंगारिक रचनाओं की प्रचुरता रही, परंतु दोनों ही कालों में प्रकृति के सौंदर्य का अत्यंत मार्मिक चित्रण भी देखने को मिलता है।
उदाहरण के रूप में रहीम का दोहा देखिए, जिसमें सदियों पहले जल की महत्ता को एक जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
ङ्खरहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष चून॥ङ्ग ³
यहाँ पानी के तीन अर्थ हैं, जिनमें से एक प्राकृतिक जल है, जिसके बिना न तो प्रकृति का और न ही मनुष्य का कोई अस्तित्व है। यह संसाधनों के अतिशय उपयोग का विरोध भी दर्शाता है।
सतत विकास की अवधारणा:
१. लैंगिक समानता (पंचम सतत विकास लक्ष्य)
सतत विकास लक्ष्यों में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है लैंगिक समानता, जिसका तात्पर्य है स्त्री-पुरुष की समानता। भक्तिकालीन संत कवि कबीर के दोहे में स्त्री-पुरुष समानता और सामाजिक न्याय पर बल दिया गया है।
ङ्खनारी की झाईं परत, अंधा होत भुजंग।ङ्ग
२. असमानता में कमी (दशम सतत विकास लक्ष्य)
कबीर ने जाति-पाँति और ऊँच-नीच के विरुद्ध भक्तिकाल में क्रांति की थी। यहाँ सामाजिक असमानता पर सीधा प्रहार किया गया है, जो आज के वैश्विक लक्ष्यों का केंद्र-बिंदु है।
ङ्खजाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार को, पड़ा रहन दो म्यान॥ङ्
३. शून्य भुखमरी और गरीबी (प्रथम एवं द्वितीय सतत विकास लक्ष्य)
संसाधनों के समान वितरण और न्यूनतम उपभोग की चर्चा इस सतत लक्ष्य में की गई है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को भोजन मिले और गरीबी से कोई भी ग्रस्त न रहे।
ङ्खसाईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥ङ्ग
ठीक इसी प्रकार रीतिकालीन कवियों की रचनाओं में प्रकृति को विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति मिली है। तत्कालीन कवियों, जैसे सेनापति, बिहारी, देव आदि की रचनाओं के माध्यम से पर्यावरणीय चिंतन को उभारा है।
आधुनिक हिंदी साहित्य में पर्यावरणीय शिक्षा और सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के प्रति सजगता:
औद्योगीकरण की समस्या का उदय मुख्य रूप से १९वीं सदी से मुखर हुआ, जो आधुनिक काल के नाम से जाना जाता है और जिसने प्रकृति को विनाश की ओर धकेल दिया। इन्हीं समस्याओं की बढ़ती गति को देखते हुए हिंदी के साहित्यकारों ने इनका वर्णन अपने साहित्य के माध्यम से किया।
उदाहरणार्थ, पंत की पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं
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ङ्खजग जीवन में जो चिर महान,
सौंदर्य पूर्ण और सत्य प्राण।ङ्ग
अर्थात् मानव-हित तभी संभव है, जब पर्यावरण सुरक्षित हो। सतत विकास का अर्थ ही यही है कि 'सबका साथ और सबका विकास' इस तरह हो कि आने वाली पीढ़ियों का अहित न हो।
हिंदी कथा साहित्य में एस. आर. हरनोट की कहानी ‘एक नदी तड़पती है’
कहानी के माध्यम से लेखक ने नदी का मानवीकरण करते हुए उसके मर जाने का चित्रण किया है कि किस प्रकार आधुनिकीकरण की दौड़ ने विनाश का भयावह रूप ले लिया है, किस प्रकार नदियों का दोहन हो रहा है और प्राकृतिक संसाधन नष्ट होते जा रहे हैं।
इसी प्रकार आधुनिक युग के अनेकों उपन्यासकारों ने भी अपनी लेखनी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की अवधारणा के प्रति समाज को जागरूक करने का प्रयत्न किया है।
निष्कर्ष
समग्रतः हम कह सकते हैं कि दिन-प्रतिदिन विकृत होते जा रहे पर्यावरण का वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करने में हिंदी साहित्य ‘पर्यावरण चेतना एवं सतत विकास’ की अवधारणा को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। यह चेतनायुक्त अभिव्यक्ति जनमानस को पर्यावरण के प्रति जागरूक कर उसके संरक्षण का सफल संदेश प्रसारित करती है।
संदर्भ सूची
१. अब्दुल रहमान। संदेश रासक। साहित्य अकादमी, २०००।
२. कबीर। कबीर ग्रंथावली। संपादक श्यामसुंदरदास, राजकमल प्रकाशन, २००७।
३. द्विवेदी, हजारीप्रसाद। हिंदी साहित्य की भूमिका। राजकमल प्रकाशन, २०११।
४. पंत, सुमित्रानंदन। पल्लव। लोकभारती प्रकाशन, २००५।
५. रहीम। रहीम के दोहे। लोकभारती प्रकाशन, २००९।
६. हरनोट, एस. आर. एक नदी तड़पती है। वाणी प्रकाशन, २००९।
तृप्ति ढाका
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