अरे हाँ.. मैंने तो आप लोगों को अपना और अपने जौनपुर का परिचय ही नहीं दिया- ओहो! ये तो सबसे पहले देना चाहिए था ष्ठलेकिन क्या करें - यादों की बारिश में भीगते-भीगते
कभी-कभी नाम तक भीग जाते हैं।
खैर.. अब सुनिए, मेरा नाम आमोद है - और मैं उस शहर का रहने वाला हूँ जिसे इतिहास ने कभी ‘शहर-ए-इश्क’, तो कभी `उजड़ा हुआ वैभव' कहा है।
मुझे आज भी पापा जी की वो पंक्तियाँ कंठस्थ हैं - जो उन्होंने याद करवाया था और जो भी आता था उसके सामने खड़ा करके सुनाने को कहते :
है जौनपुर जो शहर काशी के आस-पास,
वाजिद अली नवाब जहाँ खेलते थे ताश।
मस्जिद जहाँ बनी है अटाला के नाम से,
माता हैं चौकिया करती जहाँ निवास।
उसको फ़लक ने लूट कर बर्बाद कर दिया,
आमोद रहने वाले हैं उसी उजड़े बाज़ार के।
इन पंक्तियों में केवल जौनपुर नहीं है - यहाँ पापा के बचपन की गलियाँ हैं,
बड़े पापा के झरोखे हैं, बड़ी अम्मा की थाली की खुशबू है, और पिताजी की वो उँगली है - जिसने पहली बार मुझे शहर की धूल से दोस्ती कराई थी।
मैं उसी उजड़े बाज़ार का रहने वाला हूँ, जहाँ वीरानी में भी वफ़ा है, जहाँ खंडहरों में भी इतिहास साँस लेता है, जहाँ हर मुसाफिर लौटकर अपना कोई टुकड़ा खोज लेता है।
जौनपुर -
एक शहर नहीं,
वो मेरी आत्मा का स्थायी पता है।
`दोस्तों, हुआ कुछ यूँ...' कि पापा, मम्मी और हमारे आलोक दादा - जिन्हें हम बड़े स्नेह से ‘आल्दा’ कहते हैं -वाराणसी में रहते थे, और मैं जौनपुर में रहकर पढ़ाई करता था।
दरअसल, हमारी जड़ें, हमारी मिट्टी, हमारा अस्तित्व -सब कुछ जौनपुर से ही उपजा है।
जौनपुर...
सिर्फ एक शहर नहीं, इतिहास की वे परतें हैं जिन्हें छूने से मन श्रद्धा से भर उठता है।
कहते हैं, ११९४ ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने जब यहाँ के शासक राजा उदयपाल को हराया, तो मानो समय की दिशा ही बदल गई। कालांतर में कन्नौज के राजा यशोवर्मन ने इसका नाम ‘यवनपुर’ रखा-शायद यह सोचकर कि यह नगर अब केवल मिट्टी का नहीं, संघर्ष की एक कहानी बन चुका है।
और फिर आया १३५९ ईस्वी...
जब फिरोजशाह तुगलक ने इस यवनपुर को नया नाम दिया- जौनपुर, मगर नाम बदलने से आत्मा कहाँ बदलती है?
उस आत्मा को आकार दिया शर्क़ी वंश के उन राजाओं ने, जिन्होंने इस नगरी को `पूर्व का शिराज़' बना डाला।
वो दौर... जब जौनपुर की गलियों में इल्म की गूंज थी, कला की आत्मा दीवारों पर सांस लेती थी, और वास्तुकला - मानो पत्थरों में कविता उकेरी गई हो।
आज भी जब मैं जौनपुर की तंग गलियों से होकर गुजरता हूँ, तो हर ईंट, हर दरार, हर खंडहर कुछ कहता है। वो खंडहर नहीं हैं, वो समय के चेहरे हैं... जिन पर झुर्रियाँ तो हैं, मगर गरिमा भी है। और मन अनायास ही कह उठता है 'खंडहर को देखकर लगता है कि इमारत बुलंद रही होगी...'
तो हुआ यूँ कि हर शनिवार हम वाराणसी निकलते - माँ-पापा और आल्दा से मिलने, कुछ पल जी लेने। और हर रविवार की शाम, जब सूरज अपना पाँव समेटता, हम भी जौनपुर की ओर लौटने लगते -पीठ पर बैग, आँखों में नमी, और मन में एक अधूरापन लिए।
उस दिन भोजीपुर तिराहे से एक पुरानी सी यूपी रोडवेज़ की बस मिली — धूलभरी खिड़कियाँ, उखड़े हुए सीट के गद्दे। देखने में तो जी नहीं कर रहा था चढ़ने का, पर लौटना तो था हीष्ठ ज़िंदगी का एक हिस्सा वहीं छूटता था, हर बार।
माँ उस सुबह कुछ ज़्यादा ही व्यस्त थीं- ‘ये भी खा लो बेटा, वहाँ क्या खाओगे...’, जैसे जौनपुर कोई जंगल हो जहाँ ममता की थाली नहीं पहुँचती। लेकिन अब समझ आता है- वो खाना नहीं था, उनकी बेचैनी थी, जो रोटियों में लिपटकर मेरी झोली में आ रही थी।
और पापाष्ठ वो तो हमेशा की तरह टीवी के सामने नज़रें गड़ाए बैठे थे — मानो कुछ ख़ास चल रहा हो। पर अब जान पाया हूँ- वो ‘नज़रें’ टीवी पर नहीं थीं, वो बस आँसुओं की राह रोके खड़ी थीं। पिता अक्सर उस सन्नाटे को जीते हैं, जो उनके शब्दों से बाहर होता है।
आल्दा बस स्टैंड तक छोड़ने आया था- कुछ बोला नहीं, पर जब मेरी बस चलने लगी तो वो चुपचाप हाथ हिला रहा था- और मैं उस हिलते हाथ में एक दोस्त, एक बड़ा भाई, और एक अधूरी बात महसूस कर रहा था।
बस का सफ़र शुरू होता है उस जानी-पहचानी खड़-फड़ की आवाज़ से-जो किसी और की नहीं, हमारी प्यारी रोडवेज़ बस की ही पहचान थी। आवाज़ें मानो ये कह रही हों कि हम फिर एक बार चल पड़े हैं-उस रास्ते पर, जहां सिर्फ मंज़िल नहीं होती, बल्कि यादें होती हैं, ठहराव होता है, और वो स्वाद होता है जो पूरे बचपन को अपने में समेटे होता है।
बस की सीटें-जिन्हें देखकर लगता था कि न जाने कितने मौसमों और मुसाफ़िरों की कहानियाँ इन पर दर्ज हैं। कुशन इतने घिस चुके थे कि नारियल के रेशे बाहर झाँकते हुए जैसे खुद अपना दर्द सुना रहे हों। और सीटों के हैंडले पर जमी धूल -इतनी मोटी कि उसे छूना भी मन को गवारा न हो। मैं भी किसी बच्चे की तरह सीट के साथ-साथ उछलता रहा-कहीं से पकड़े बिना, जैसे किसी पुराने साथी के साथ खेलते वक्त पकड़ने की ज़रूरत ही नहीं होती।
दिल बस यही चाहता था कि जल्दी से पिंडरा आ जाए-वही पिंडरा जो वाराणसी और जौनपुर के बीच बसा है, पर मेरी यादों में वो कहीं बीच नहीं, बल्कि केंद्र में बसा था। क्योंकि पिंडरा का मतलब होता था-काले जाम के रसगुल्ले।
वो भी मिट्टी के उस पुरवे में परोसे हुए-मिट्टी की खुशबू और चाशनी की मिठास एक साथ। और लकड़ी की चम्मच से जब उसमें से रस निकाला जाता था तो ऐसा लगता था जैसे किसी सूखे गले को रेगिस्तान में अचानक मीठा झरना मिल गया हो। वो चाशनी... उफ़... जैसे आत्मा तक को भिगो दे, और फिर भी जी न भरे।
और वहीं, कुछ ही क़दमों पर-महेश चौरसिया की पान की गुमटी।
गुमटी-यानी लकड़ी का छोटा-सा चौकोर घर, जिसके भीतर महेश भैया पान सजाते थे, मानो कोई कलाकार रंग भर रहा हो। सामने लाल भीगा हुआ कपड़ा, जिससे पान को ढँका जाता था-जैसे किसी दुल्हन को नज़र से बचाने की कोशिश हो। बगल में कांसे का कटोरा-एक में चूना, दूसरे में कत्था, और फिर वो भोला छाप ज़र्दा की हरी-पीली डिब्बियाँ, जो कतार में ऐसे सजी होती थीं जैसे कोई मंदिर में दीपों की माला।
महेश चौरसिया के दोनों हाथ-जैसे लाल चूड़ियों से सजे हों-हर दिन कत्था लगाते-लगाते कत्थे में रंग चुके थे। वो लालिमा उनके हाथों की नहीं थी अब, वो बनारस के स्वाद, सेवा और संकल्प की पहचान बन चुकी थी। उनका चूना और कत्था लगाना किसी साधक की तरह होता था-दोनों कटोरों से छोटी-सी डंडी उठाते, बड़ी श्रद्धा से उसे पान के पत्ते पर फेरते-जैसे कोई पुजारी शंख और घंटी के बीच शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ा रहा हो।
जब वो डंडी कटोरे से निकालते तो कांसे या पीतल के उन बरतनों की खनक होती-एक पवित्र सी ध्वनि, जैसे मंदिर की आरती के पहले घंटा बजता है। और उसी समय, बगल में जलती धूपबत्ती-जिसकी धीमी लहराती लौ और गाढ़े धुएं से सारा वातावरण एक अलौकिक आभा से भर जाता था। वह दुकान अब महज एक गुमटी नहीं रहती थी-वह क्षण में एक मंदिर बन जाती थी, एक जीवित स्थल जहाँ स्वाद नहीं, श्रद्धा बसती थी।
हर गुमटी में, लगभग हर पान की दुकान में, एक कोने में बाबा विश्वनाथ की छोटी-सी मूर्ति रखी होती थी-कुछ धूल से ढँकी, कुछ फूलों से सजी, मगर वहाँ मौजूद-जैसे यह कह रही हो कि यहाँ स्वाद नहीं, प्रसाद मिलता है।
वो दुकानें सच में दुकाने नहीं थीं-वो जीवन की स्थायी शरणस्थली थीं, जहाँ प्रेम भी मिलता था, परंपरा भी, और एक शहर की आत्मा भी।
पान का वो टुकड़ा, जिसमें कत्था, चूना, ज़र्दा और मीठा नहीं, बल्कि आत्मीयता लिपटी होती थी-उसे खाते ही ऐसा लगता था मानो बनारस की मिट्टी, महेश चौरसिया के हाथों की तपस्या, और बाबा विश्वनाथ की कृपा — सब एक साथ ज़ुबान पर उतर आए हों।
यह सब कुछ बस एक स्वाद नहीं था-यह एक पूरा समय था, एक पूरी दुनिया थी, जो हर सफ़र में मेरे साथ चलती थी।
ख़ैर, मंज़िल तो पिंडरा कभी थी ही नहींष्ठ मंज़िल तो जौनपुर थी।
और उसी जर्जर बस की खड़खड़ाहट में, जब कभी लगता कि अब गिर-तब न जाने कैसे खुद को समेट लेते।
हाथों में हेंडिल नहीं था, लेकिन मन में एक पकड़ थी-उम्मीद की, पहुँच जाने की।
बस हिचकोलों के बीच जब ज़रा संभलने लगे तो देखा-लाइन बाजार आ चुका था।
वाराणसी से जौनपुर आने वालों के लिए ये पहला संकेत होता था, कि अब शहर पास है - बहुत पास।
इसके बाद टी.डी. कॉलेज आता थाष्ठ और फिर आता था वो बस अड्डा —
जहाँ सफ़र खत्म नहीं होता था...
बल्कि यादों की एक नई परत शुरू हो जाती थी।
जौनपुर का बस अड्डा थोड़ा ऊँचाई पर है।
बस जैसे ही ऊपर पहुँची, खिड़की से बाहर झाँकते हुए सोचा-
‘अब अड्डे के अंदर क्यों जाएँष्ठ बाहर से ही रिक्शा कर लेते हैं, सीधे घर।’
लेकिन जैसे ही कदम बाहर निकालने को हुए,
मन के किसी कोने से आहट आई —
‘चलो, एक बार फिर से वही सीढ़ियाँ उतर लें.. वही ज़मीन छू लें जिस पर बचपन की हँसी कभी नंगे पाँव दौड़ी थी।’
बस से उतरा ही था कि अचानक बारिश आ गई -
वो पुरानी, बारिश-जो बिना इत्तला दिए आ गिरती है, जैसे कोई भूला हुआ दोस्त सालों बाद गले लग जाए।
चारों तरफ अफरातफरी मच गई-
कोई ‘मिश्रा होटल’ के गलियारे की तरफ दौड़ा, कोई रोडवेज के अंदर पनाह खोजने लगा, और कुछ तो ऐसे भागे जैसे अगर भीग गए तो वजूद ही मिट जाएगा।
पर मैं वहीं था... उस ऊँचाई से नीचे उतरते हुए, बिना किसी जल्दबाज़ी के हर सीढ़ी पर एक याद साथ उतरती चली आई।
मन ने कहा-‘क्या हुआ अगर बारिश है, भीग जाने दोष्ठ हम कोई बताशा थोड़े ही हैं जो गल जाएँगे।’
बस फिर क्या था ... पैरों में एक नई मस्ती भर आई, जैसे स्कूल से लौटते हुए बारिश से भरे गढ़ढ़े मे पैर को मारकर पानी को उछालते हुये मस्ती से भीगते हुये वो दिन लौट आए हों ....हर बूँद अब सिर्फ पानी नहीं था...कभी दादा (बड़े भाई ) की डांट थी, कभी माँ की साड़ी की छाँव, तो कभी पापा की वो पुकार- ‘जल्दी आओ, भीग जाओगे।’
जब अड्डे की भीड़ को चीरता हुआ बाहर निकला, मैं पूरी तरह भीग चुका था.. सिर्फ शरीर से नहीं, बल्कि यादों से भी। पर अजीब बात ये थी कि उस भीगेपन में कोई बोझ नहीं था-उल्टे एक अजीब-सी राहत थी, एक हल्कापन.. जैसे बरसों की थकान इस पानी ने अपने संग बहा दी हो। उस दिन मुझे सच में समझ आया-कि जौनपुर सिर्फ मेरा शहर नहीं है, वो तो मेरा पानी है, मेरी मिट्टी है..वो आंगन है जहाँ मेरे बाप-दादा ने अपने पसीने से इतिहास लिखा था। यहाँ लौटना, जैसे अपने आप में लौट आना हो।
मैं पैदल ही चल पड़ा-ये सोचकर कि आज भीगना ही है... और सिर्फ भीगना है। जैसे ही रोडवेज से बाहर निकला, अचानक एक टेंपो वाला ज़ोर से हॉर्न बजाता हुआ बगल से निकला। उसके पहिये जैसे ही सड़क के गड्ढे में पड़े, एक पूरा पानी का छपक्का मेरे ऊपर आकर गिरा-जैसे किसी ने प्रेम से, यादों से भरी बाल्टी उड़ेल दी हो। लेकिन गुस्सा नहीं आया.. क्योंकि आज तो भीगने निकला ही था, और हर भीगाव एक पुराने एहसास को फिर से जगा रहा था।
रोडवेज के किनारे मुन्ना हलवाई बेसन की सेव छान रहा थाष्ठ बेसन और पानी की मिली-जुली वो खुशबू, उसके चूल्हे से उठता धुआँ, जैसे बचपन की किसी गली से गुजर रहे हों-वो गली जहाँ मां की चुनरी सूखती थी, और नानी की रसोई से कुछ तलता हुआ बाहर आता था। मन एक पल को भटक गया -सोचा कि यहीं रुक जाऊं, चाय पिऊँ, सेव खाऊंष्ठ मगर फिर सोचा, अभी और भीगना है। घर लौटकर अदरक वाली गरम चाय के साथ इस पल को पूरी तरह जिया जाएगा।
तिराहे पर पहुंचा.. बाईं ओर टी.डी. कॉलेज की ओर जाने वाली सड़क थी, जो आगे लाइन बाजार तक जाती है। दाईं ओर जेसीज़ चौराहा-और वहीं नुक्कड़ पर खड़ा वो बूढ़ा कॉलेज.. बी.आर.पी. कॉलेज। पापा बताया करते थे कि वहीं से पढ़े थे-जब भी वो इसका नाम लेते थे, एक अलग ही गरिमा उनके चेहरे पर तैर जाती थी। आज जब उस इमारत को देखा, तो लगा जैसे वो दीवारें अब भी किसी अपने का इंतज़ार कर रही हैं। पीली पुताई अब कहीं-कहीं काई से ढकी हुई थी, लेकिन वो पुरानी दीवारें अब भी सीना ताने खड़ी थीं-जैसे बरसों की कहानियाँ अपने भीतर दबाए बैठी हों। एक-एक ईंट बोलना चाहती थी. कोई सुने, कोई ठहरे, कोई कहे- `हाँ, मैं भी यहीं से गुज़रा हूँ.. मैं भी जौनपुर का हूँ।'
पापा जी... इसी बी.आर.पी. कॉलेज के टीचरों पर एक कविता सुनाया करते थे। अफ़सोस.. अब वो पूरी कविता याद नहीं रही। बस कुछ टुकड़े हैं, जो अब भी कानों में गूंजते हैं-जैसे पुरानी रेडियो की कोई अधूरी धुन। वो कहते थे-
`भक छला की दना दन... मारा है भाई मारा है... लंगड़ा तीर मारा है... आंड्रू बांड्रू सांड्रू... भक छला की दना दन...'
कभी हँसी आ जाती थी, कभी हैरानी होती थी कि इन शब्दों में आखिर था क्या-लेकिन पापा की आंखों की चमक देखकर लगता था, जैसे वो कुछ छुपा कर हँस रहे हों... कुछ ऐसा जो सिर्फ वो जानते थे और हम कभी नहीं जान पाएंगे।
वैसे तो पापा जी की झोली में न जाने कितनी कविताएं थीं, कितने किस्से... और उनमें से एक सबसे रहस्यमयी किरदार-‘अलीमाश’। पता नहीं वो वाकई कोई व्यक्ति था या पापा की कल्पना का कोई टुकड़ा, मगर जब भी उसका नाम आता, हम सब सावधान हो जाते। पापा की आवाज़ बदल जाती, आँखों में कोई दूसरी ही चमक आ जाती-जैसे वो किसी दूसरे समय में चले गए हों।
बी.आर.पी. कॉलेज की पुरानी इमारत को देखकर,जैसे पापा की वो कहानियाँ फिर से हवा में तैरने लगीं। और मैंष्ठ मैं खुद को रोक न सका-अपने कदम तेज़ कर दिए, जेसीज़ चौराहे की ओर। ऐसा लग रहा था, जैसे वहां कुछ और टुकड़े पापा की दुनिया के, मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंष्ठ बारिश अब भी गिर रही थी,लेकिन भीतर अब भीगना कुछ और ही था-वो बचपन था, वो पिता की आवाज़ थी, और उनका `भक छला की दना दन...'।
जैसे ही आगे बढ़ा, तो समझ में आ गया कि अब बारिश केवल गिर नहीं रही थी-उमड़ रही थी, बरस रही थी, जैसे आसमान ने खुद को खोल दिया हो। सड़कें अब सड़कें नहीं रहीं-छोटी-छोटी नदियाँ बन चुकी थीं। पानी की परत में शहर की छवि धुंधला चुकी थी, लेकिन सामने जेसीज़ चौराहा अब भी वैसे ही खड़ा था-अपना जेसीज़, जो थोड़ी ऊँचाई पर होने के कारण आज भी अपनी ठाठ में दिख रहा था।
बाएँ तरफ़ की सड़क इलाहाबाद की ओर जाती थी - जैसे कोई पुरानी, शांत यात्रा। सीधी सड़क ओलंदगंज की ओर-जहाँ बाज़ारों की चहल-पहल की यादें होती थीं। और दाईं ओर वो सड़क, जो नए पुल से होकर सिपाह होते हुए आज़मगढ़ की ओर जाती थी-जैसे कोई नई उम्र का रास्ता, थोड़ा तेज़, थोड़ा खुला।
जौनपुर में दो ही पुल थे-एक शाही पुल, और दूसरा नया पुल। शाही पुल इतिहास था, और नया पुल वर्तमान की ज़रूरत।
मुझे अपने घर रासमंडल जाना था-तो सोचा, नया पुल पकड़ लूं.. वही रास्ता जो बलुआ घाट की ढलान से माणिक चौक होता हुआ मेरी गली तक पहुंचता है। बारिश की वजह से रास्ते भले भीग गए थे, लेकिन दिल में एक सूखा कोना था, जिसे शायद ये भीगापन ही भरने वाला था।
जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ता गया, पानी की धार तेज़ होती गई -और लोगों की आवाजाही थम-सी गई थी।
नया पुल, अपने पूरे रौब में, ऊँचाई पर खड़ा था -जैसे कोई पहाड़, जिसे पार करने का साहस चाहिए। और मैं उसी साहस के साथ तेज़ क़दमों से चढ़ रहा थाष्ठ हर कदम पर, बारिश का संगीत था, और हर साँस में एक पुराना जौनपुर बस रहा था।
पुल के दोनों ओर मैदान थे -जहाँ बारिश ने धान नहीं, भैंसें उगाई थीं। वो शांति से खड़ी थीं, मानो उन्हें पता हो कि ये बारिश सिर्फ पानी नहीं, कोई पुराना गीत है-जिसे हर कोई सुन नहीं सकता।
और जब मैं पुल के बीचों-बीच पहुँचा-तो एक पल के लिए सब ठहर गया।
मेरे सामने गोमती नदी था-अपने पूरे उबाल, पूरे आवेग में। उसका पानी चढ़ा हुआ था, कुछ लोग कह रहे थे कि बलुआ घाट वाले हनुमान मंदिर में पानी घुस गया है। पर उस उफनती नदी को देखकर डर नहीं लगा-बल्कि एक गहरा रोमांच हुआ, जैसे माँ अपने सारे गुस्से के बाद भी तुम्हें पहचानती हो।
मैं वहीं, नए पुल के मध्य, खड़ा होकर पुराने शाही पुल को देख रहा था।
वो पुल-जो समय से आँख मिलाता है।
वो पुल-जो कहता है, ‘मैंने अकबर के दिन देखे हैं, अब तेरा भी देख रहा हूँ।’
ये वही पुल है जिसे १५६४ से १५६८ के बीच मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में मुनीम ख़ानख़ाना ने बनवाया था। सोचता हूँ, उस वक़्त न तो मोबाइल थे, न कैमरेष्ठ फिर भी यह पुल बना-इतना मजबूत, इतना सुंदर, इतना जीवित-जैसे इतिहास की धड़कन आज भी इसके भीतर चल रही हो। इसकी अनोखी वास्तुकला, इसकी टिकाऊ बनावट... और ये एहसास कि इतने बरसों बाद भी यह पुल आज भी चल रहा है न जाने कितनी बाढ़ें देखी, न जाने कितने किरदारों को देखा, कितने तूफानों को देखा मगर अपने जज़्बे को लिए वो आज भी सीना ताने खड़ा है और लोग उसपे आ जा रहे हैं। शाही पुल जौनपुर की शान है, आन है, अभिमान है और क्या गजब की खूबियाँ हैं जैसे –
पुल का मार्ग ज़मीन के स्तर पर है.
२६ फीट चौड़ा, २ फीट ३ इंच चौड़ी मुंडेरें.
ताखों के बीच गुंबदियां, जिनमें पहले दुकानें लगती थीं.
पुल के बीच में एक चतुर्भुजाकार चबूतरे पर शेर की मूर्ति.
उत्तर में १० और दक्षिण में ५ ताखें, अष्टकोणीय खंभों पर.
शाम उतरने लगी थी...
और जैसे ही अंधेरा पसरने को हुआ, पुराने शाही पुल पर लगी लाइटें एक-एक कर जगने लगीं। वो रोशनी जब नीचे बहती गोमती की सतह पर पड़ती थी, तो ऐसा लगता था जैसे कोई पुराना सपना पानी में तैर रहा होष्ठ हिलता, डोलता, टूटता और फिर से जुड़ता हुआ।
उस पर गोमती के पानी का बहाव -उसका निरंतर बहना, और साथ में चलती हुई ठंडी हवा, मानो कोई अनकहा गीत गुनगुना रही थी। पूरा मौसम जैसे कुछ कहना चाहता था.. कोई पुरानी बात, कोई भूली हुई यादष्ठ या शायद कोई ऐसा राज़ जिसे सिर्फ वही समझ सकता है जो थमकर सुनना जानता है।
मैं वहीं पुल पर खड़ा रहा-
न कुछ बोला, न कुछ सोचा।
बस निहारता रहा.. महसूस करता रहाष्ठ जैसे अपनी ही ज़िन्दगी को किनारे से देख रहा हूँ-बहती हुई, टिमटिमाती हुई।
लेकिन तभी अचानक बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट हुई-और बिजली की एक तीखी रेखा आकाश को चीरती हुई चमकी। एक पल को ऐसा लगा जैसे वह बिजली सीधे यहीं गिर जाएगी। बारिश फिर से तेज़ हो गई थीष्ठ और मैं अब पुल के दूसरी ओर तेज़ कदमों से भागने लगा।
जहाँ पुल खत्म होता है, वहीं एक बूढ़ी अम्मा की बड़भुजे की झोपड़ी मिलती है, एक झोपड़ी जो वक्त से थकी हुई लगती है, जैसे ज़िंदगी के आख़िरी पन्नों में से कोई पन्ना हो-टाट से सिली, किनारों से बूंद-बूंद रिसती, फिर भी उसमें एक आत्मा बसती है।
उस झोपड़ी से उठती महक-भुने हुए चनों, गरम रेत, और अम्मा के बरसों पुराने हाथों की छुअन से -
ऐसी होती है कि बरसों की भूख भी फिर से जी उठे... वो बड़ी-सी कढ़ाही में चना और लाई भून रही थीं...
आग की लपटें जैसे समय को पिघला रही हों, रेत की खुशबू जैसे किसी गाँव की स्मृति बन जाए
और चने की महक... मानो भूख नहीं, कोई पुराना संबंध जगा रही हो। मन हुआ कि रुक जाऊँ... बैठ जाऊँ वहीं, उस झोपड़ी की देहरी पर, पर तन बहुत भीग चुका था... तो दिल को मनाया और भीगते हुए भाग निकला — बलुआ घाट की ढलान की ओर।
ढलान के नीचे पहुँचा ही था कि लक्ष्मण दिख गया-वही पुराना, जाना-पहचाना लक्ष्मण, भतीजे अभिषेक को हर सुबह स्कूल छोड़ने वाला। रिक्शे की हैंडल पर कपड़ा लपेटे, पानी में पैर भीगे, पर आवाज़ वही अपनापन लिए-`भैया, जल्दी बैठ जाइए... छोड़ देता हूँ आगे तक... बहुत पानी है, बीमार हो जाएंगे आप।'
मैं चुपचाप बैठ गया, और वो रिक्शा खींचता रहा... जैसे कोई बीते रिश्तों की छाया फिर से साथ चलने लगी हो।
जैसे ही ढलान खत्म हुई, उल्टे हाथ पर एक कमरा दिखा-जहाँ से आ रही थी ठका-ठक-ठक की आवाज़... नियमित, अनवरत, जैसे कोई तपस्वी सांस ले रहा हो। अंदर कारिंदा हथौड़े से चांदी के वर्क पर चोट कर रहा था-राखी चमड़े की तहों के भीतर, जैसे चुप्पी के भीतर कोई प्रार्थना आकार ले रही हो।
यह दृश्य नहीं था, यह जौनपुर की आत्मा थी-हथौड़ों की आवाज़, चांदी की चमक, और पसीने की गंध से बुनी हुई।
जौनपुर की गलियों की एक अलग ही बास होती है-जिसे आप सूंघते नहीं, महसूस करते हैं...
जैसे आपकी आत्मा को बताया जाए कि `तुम अब जौनपुर में हो...' और फिर आप आँखें बंद करके भी पहचान लेते हैं अपना शहर-क्योंकि कुछ जगहें याद से नहीं, रगों से जुड़ी होती हैं।
आगे माणिक चौक का चौराहा नजर आने लगा-भीड़, हलचल, आवाज़ें-सब में एक पुराना संगीत था।
जौनपुर की शामें... जैसे अवध की शामों की कोई बिछुड़ी हुई बहन हों -थोड़ा कम भव्य, पर उतनी ही मोहक, थोड़ी ठहरी हुई, पर उतनी ही बोलती हुई।
यहाँ पान नहीं, दोहरा चलता है-शायद पान का कोई दूर का रिश्तेदार-जिसे लोग मुंह में दबाकर, कुर्ता-पायजामा सँभालकर, और सर को हल्का-सा ऊपर उठाकर कहते हैं -
-का राजू, कहाँ जात हऊवा...'
उस एक वाक्य में पूरा जौनपुर समा जाता है। सर उठाने की वजह सिर्फ़ यही कि कहीं दोहरा मुंह से बाहर न छलक पड़े।
जैसे ही माणिक चौक पहुँचा, तो नज़र सीधे हाथ की उस पान की दुकान पर पड़ी-कल्लू की दुकान। वही दुकान, जहाँ बड़े भाई साहब, दादा और जाने कितने अपने लोग खड़े होकर पान बनवाते थे। कोई चलते-चलते ही पत्ते को होंठों में सजा लेता, तो कोई दुकान पर ही टिककर गपशप में खो जाता। उस छोटे-से ठेले पर शहर का आधा किस्सा सजता और बाकी आधा वहीं घुलकर खत्म हो जाता।
उसके ठीक बगल में आनंद भैया की मिठाई की दुकान थी। मीठे से चेहरों वाली दुकान, जहाँ से गुजरते हुए बरबस ही हाथ जुड़ जाते- `नमस्ते भैया।' फिर वही नम्रता कल्लू भैया को भी अर्पित कर, मैं आगे बढ़ा।
चौक से मेरे घर तक जाने वाली सड़क कभी चौड़ी नहीं रही, लेकिन उसकी सड़कों में भी एक अजीब-सा अपनापन घुला रहता था। बरसात का पानी जगह-जगह ठहरा होता, और बीच-बीच में गौ माता का `अंशदान' राहगीरों की परीक्षा लेता। उस पगडंडी-सी सड़क पर कदम रखना किसी पुरानी याद में डूब जाने जैसा था-कीचड़, गोबर, और भीगी मिट्टी की सोंधी महक मिलकर मानो बीते समय का एक चित्र बना देते थे।
उल्टे हाथ पर डाकखाना खड़ा था-जैसे किसी बूढ़े संत की तरह-चुपचाप आते-जाते लोगों को निहारता हुआ। चेहरे बदल गए थे; पुराने जाने कहाँ खो गए, नए चेहरे आकर वही जगह भर रहे थे। लेकिन डाकखाना? वह तो अडिग प्रहरी की तरह अब भी वहीं खड़ा था। उसकी दीवारों में न जाने कितनी चिट्ठियों की धड़कनें कैद थीं, कितनी खुशियाँ और कितने दुःख उसके लकड़ी के काउंटर पर टिककर गुज़र चुके थे। लोग बदल गए, वक्त बदल गया, मगर डाकखाना आज भी वैसा ही था-अपनी चुप्पी में शहर की कहानियाँ सँजोए हुए।
आगे उसी सड़क पर कन्हैया भैया की राशन की दुकान थी। गुजरते हुए स्वाभाविक ही हाथ जुड़ गए, प्रणाम अर्पित किया और कदम जैसे अपने आप ही पुरानी यादों की ओर लौट गए।
याद आया-यही वह दुकान थी जहाँ से न जाने कितनी घर की शादियों के लिए लड्डुओं का सामान गया था, और न जाने कितनी अंतेष्ठियों के लिए चावल-चना। हर शुभ-अशुभ अवसर पर कन्हैया भैया की दुकान किसी अदृश्य रीति से घर-आँगन का हिस्सा बन जाती थी।
आज उन्हें देखकर लगा, जैसे समय ने उनके कंधों पर कोई अदृश्य बोझ रख दिया हो। वे पहले से और ज्यादा झुके हुए लगे। पहले ही कद से छोटे थे, पर अब लगता था कि समय ने उनकी पीठ को और भी झुका दिया है। उनके झुके कंधों में वर्षों की थकान, दुकान की गंध, और जीवन की अनगिनत कहानियाँ छिपी हुई थीं।
कन्हैया भैया की झुकी हुई देह देखकर मन के भीतर एक गहरी टीस उठी-जैसे इंसान का जीवन भी उस दुकान की पुरानी अलमारियों की तरह हो जाता है, जो समय के बोझ से धीरे-धीरे नीचे झुकती जाती हैं, पर फिर भी घर-परिवार की जरूरतें पूरी करने का काम कभी बंद नहीं करतीं।
आगे बढ़ा तो उल्टे हाथ पर जगन्नाथ मंदिर दिखाई दिया। वही मंदिर, जिसकी छाँव तले सरस्वती शिशु मंदिर चला करता था। उसे देखकर लगा जैसे वह आज भी बाहें फैलाए खड़ा है-पुराने दिनों की मासूमियत और बचपन की गूँज को संजोए हुए। उसी मंदिर के आगे खन्ना चाचा का घर था। कभी हँसी-ठिठोली और आवाज़ों से भरा वह आँगन अब जैसे इतिहास बन चुका है। शायद वह घर बिक गया है, और खन्ना चाचा की बस स्मृतियाँ ही बची हैं-यादें, जो अब भी उस घर की दीवारों पर धुंधले रंगों की तरह टिकी होंगी।
दोस्तों, उस घर के ठीक सामने की गली ही मेरे अपने घर को जाती है। गली में कदम रखते ही उल्टे हाथ पर जो पहला-दूसरा घर दिखता है, वही ‘आनंद भवन’ कहलाता है। और वही मेरा गंतव्य है। इस घर में भी न जाने कितनी कहानियाँ दबी पड़ी हैं- हँसी की, आँसुओं की, जश्न की और बिछोह की।
घर के सामने एक छोटा-सा चबूतरा हुआ करता था। वही चबूतरा जहाँ हमारा टोमी बंधा रहता था। कितना स्वामिभक्त, कितना जीवंत श्वान था वह! आँखों में सच्ची मोहब्बत और दुम हिलाकर हर आने-जाने वाले का स्वागत करने का अद्भुत अंदाज़। अब टोमी नहीं है, और न वह चबूतरा। समय ने उसे भी बदल डाला-तोड़ा गया और उसकी जगह कार खड़ी करने के लिए एक गैराज बना दिया गया। वक्त के साथ न जाने कितनी चीज़ें बदल गईं, पर दिल के किसी कोने में वे सब वैसी ही खड़ी हैं-टोमी की वफ़ादार आँखें, चबूतरे की ठंडी सतह, और घर की दीवारों पर लिखी न जाने कितनी अनकही कहानियाँ।
घर आ चुका था और आज की यात्रा बस यहीं तक समाप्त हो रही थी। मैंने अपने हाथों को उस बहुत पुराने लकड़ी के दरवाजे पर रखा - वही दरवाजा जो दशकों से हमारे घर का मूक प्रहरी बना खड़ा था। उसकी खुरदरी सतह पर मेरी उंगलियां फिसलीं, जैसे किसी पुराने ग्रंथ के पन्नों को पलट रहा हूं।
हौले से, बहुत ही धीमे से मैंने उसे धक्का दिया। दरवाजा एक गहरी सांस की भांति खुल गया, जैसे वो भी मेरी वापसी का बेसब्री से इंतजार कर रहा हो। उसकी कब्जों से निकली हल्की सी आवाज में जैसे सैकड़ों यादों की गूंज थी।
जब मैं अंदर कदम रखा, तो एक अजीब सा अहसास हुआ। यह दरव्ााजा महज लकड़ी और लोहे का टुकड़ा नहीं था - यह एक जीवंत साक्षी था। इसने देखा था बचपन इसने न जाने कितने पुरखों के स्पर्श को महसूस करा था । इसकी लकड़ी में समाए थे मेहमानों की आहटें, त्योहारों की खुशियां, और कभी-कभार आंसुओं की नमी भी। यह दरवाजा सिर्फ घर की सीमा नहीं बांटता था - यह अतीत और वर्तमान के बीच सेतु का काम करता था। मैंने महसूस किया कि यह केवल प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि एक पूरा इतिहास है - हमारे घर का, हमारे रिश्तों का, हमारी भावनाओं का। हर दरार में छुपी है कोई कहानी, हर निशान में दबी है कोई स्मृति। आज जब मैं इसे छूकर अंदर आया, तो लगा जैसे न सिर्फ घर में, बल्कि अपने अतीत में, अपनी जड़ों में वापस लौट आया हूं।
आमोद कुमार श्रीवास्तव