कमलेश्वर - नई कहानी के प्रणेता

कमलेश्वर हिंदी साहित्य के उन बहुआयामी रचनाकारों में थे जिन्होंने कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, फिल्म, दूरदर्शन और संपादन के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ी। नई कहानी आंदोलन के प्रमुख स्तंभ के रूप में उन्होंने आम आदमी के संघर्ष, सामाजिक विडंबनाओं और बदलते समय की संवेदनाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया। ‘राजा निरबंसिया’, ‘काली आँधी’ और ‘कितने पाकिस्तान’ जैसी कृतियों ने उन्हें हिंदी साहित्य में विशिष्ट पहचान दिलाई। वे केवल लेखक ही नहीं बल्कि संवेदनशील संपादक, पटकथा लेखक और दूरदर्शन के अग्रणी व्यक्तित्व भी थे। साहित्य अकादमी पुरस्कार और पद्मभूषण से सम्मानित कमलेश्वर का जीवन संघर्ष, सृजन और मानवीय करुणा का अद्भुत उदाहरण है।

May 11, 2026 - 14:31
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कमलेश्वर -  नई कहानी के प्रणेता
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कमलेश्वर का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में ६ जनवरी, १९३२ में हुआ था। जब वे तीन साल के थे तब उनके पिता जी का देहाँत हो गया था। कमलेश्वर सात भाई थे जिनमें से पाँच का देहाँत हो गया था। जब वे किशोर थे तभी उन्हें क्रांतिकारी समाजवादी दल में संदेशवाहक के तौर पर शामिल कर लिया गया था। वे क्रांतिकारियों के पत्र एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाया करता था। मैनपुरी क्रांतिकारियों का एक प्रमुख केंद्र था। अँग्रेज़ों ने आगरे पर कब्ज़ा कर लिया था पर मैनपुरी तब तक मुक्त था। अतः बड़ी संख्या में क्रांतिकारी वहाँ शरण लिया करते थे। इसी कारण से उनका क्रांतिकारियों मिलना संभव हुआ और पार्टी में शामिल कर लिए गए। कमलेश्वर का पूरा नाम कमलेश्वर सक्सेना था। लेकिन क्रांतिकारी पार्टी में शामिल होने के कारण उनमें यह भावना बलवती हो गई थी कि जातिसूचक उपनाम इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसीलिए उन्होंने अपना नाम सिर्फ़ कमलेश्वर रखा। 
प्रारंभिक पढ़ाई के पश्चात्‌ कमलेश्वर ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य विषय से परास्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। २००३ में उन्हें `कितने पाकिस्तान' (उपन्यास) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और २००५ में कमलेश्वर को `पद्मभूषण' पुरस्कार दिया गया । वे `सारिका' `धर्मयुग', `जागरण' और `दैनिक भास्कर' जैसे प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के संपादक भी रहे। उन्होंने दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक जैसा महत्वपूर्ण दायित्व को भी निभाया। कमलेश्वर ने अपने ७५ साल के जीवन में १२ उपन्यास, १७ कहानी संग्रह और क़रीब १०० फ़िल्मों की पटकथाएँ लिखीं।


उन्होंने फिल्मों के लिए पटकथाएँ तो लिखी ही, उनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी। `आंधी', `मौसम (फिल्म)', `सारा आकाश', `रजनीगंधा', `मिस्टर नटवरलाल', `सौतन', `लैला', `रामबलराम' की पटकथाएँ उनकी कलम से ही लिखी गईं थीं। लोकप्रिय टीवी सीरियल `चन्द्रकांता' के अलावा `दर्पण' और `एक कहानी' जैसे धारावाहिकों की पटकथा लिखने वाले भी कमलेश्वर ही थे। उन्होंने कई वृतचित्रों और कार्यक्रमों का निर्देशन भी किया।
`विहान' जैसी पत्रिका का १९५४ में संपादन आरंभ कर कमलेश्वर ने कई पत्रिकाओं का सफल संपादन किया जिनमें `नई कहानियाँ'(१९६३-६६), `सारिका' (१९६७-७८), `कथायात्रा' (१९७८-७९), `गंगा' (१९८४-८८) आदि प्रमुख हैं। कमलेश्वर जी के द्वारा संपादित अन्य पत्रिकाएँ इस प्रकार हैं- `इंगित' (१९६१-६३) `श्रीवर्षा' (१९७९-८०)। हिंदी दैनिक 'दैनिक जागरण'(१९९०-९२) के भी वे संपादक रहे हैं। `दैनिक भास्कर' से १९९७ से वे लगातार जुड़े हैं। इस बीच जैन टीवी के समाचार प्रभाग का कार्य भार भी सम्हाला। सन १९८०-८२ तक कमलेश्वर दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक भी रहे।

कमलेश्वर का नाम नई कहानी आंदोलन से जुड़े अगुआ कथाकारों में आता है। कमलेश्वर नई कहानी के प्रचारित त्रिकोण की एक महत्वपूर्ण कड़ी थे। नई कहानी का त्रिकोण, यानी राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर। इन तीनों में केवल कमलेश्वर ही ऐसे रहे जिन्होंने स्वयं को केवल कहानी-उपन्यासों तक सीमित नहीं रखा। उनकी पहली कहानी १९४८ में प्रकाशित हो चुकी थी परंतु `राजा निरबंसिया' (१९५७) से वे रातों-रात एक बड़े कथाकार बन गए। कमलेश्वर ने तीन सौ से ऊपर कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियों में `मांस का दरिया,' `नीली झील', `तलाश', `बयान', `नागमणि', `अपना एकांत', `आसक्ति', `ज़िंदा मुर्दे', `जॉर्ज पंचम की नाक', `मुर्दों की दुनिया', 'क़सबे का आदमी' एवं `स्मारक' आदि उल्लेखनीय हैं। उन्होंने दर्जन भर उपन्यास भी लिखे हैं। इनमें `एक सड़क सत्तावन गलियाँ', `डाक बंगला', `तीसरा आदमी', `समुद्र में खोया आदमी' और `काली आँधी' प्रमुख हैं। `काली आँधी' पर गुलज़ार द्वारा निर्मित' आँधी' नाम से बनी फ़िल्म ने अनेक पुरस्कार जीते। उनके अन्य उपन्यास हैं- `लौटे हुए मुसाफ़िर', `वही बात', `आगामी अतीत', `सुबह-दोपहर शाम', `रेगिस्तान', `एक और चंद्रकांता' तथा `कितने पाकिस्तान' हैं। `कितने पाकिस्तान' ऐतिहासिक उथल-पुथल की विचारोत्तेजक महागाथा है। कमलेश्वर ने नाटक भी लिखे हैं। `अधूरी आवाज़', `रेत पर लिखे नाम', `हिंदोस्ताँ हमारा' के अतिरिक्त बाल नाटकों के चार संग्रह भी उन्होंने लिखे हैं। आलोचना के क्षेत्र में उनकी `नई कहानी की भूमिका' तथा `मेरा पन्ना: समानांतर सोच' (दो खंड) महत्वपूर्ण पुस्तकें समझी जाती है। उनके यात्रा विवरण `खंडित यात्राएँ' और `कश्मीर: रात के बाद' तथा संस्मरण `जो मैंने जिया', `यादों के चिराग़' तथा `जलती हुई नदी' (१९९७) शीर्षक से प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने `संकेत', `नई धारा', `मेरा हमदम मेरा दोस्त' इत्यादि हिंदी, मराठी, तेलगु, पंजाबी एवं उर्दू कथा संकलनों का भी संपादन किया है।

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कमलेश्वर भारतीय दूरदर्शन के पहले स्क्रिप्ट लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने टेलीविजन के लिए कई सफल धारावाहिक लिखे हैं जिनमें `चंद्रकांता', `युग', `बेताल पचीसी', `आकाश गंगा', `रेत पर लिखे नाम' आदि प्रमुख हैं। भारतीय कथाओं पर आधारित पहला साहित्यिक सीरियल `दर्पण' भी उन्होंने ही लिखा। दूरदर्शन पर साहित्यिक कार्यक्रम `पत्रिका' की शुरुआत इन्हीं के द्वारा हुई तथा पहली टेलीफ़िल्म `पंद्रह अगस्त' के निर्माण का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। तकरीबन सात वर्षों तक दूरदर्शन पर चलने वाले `परिक्रमा' में सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं पर खुली बहस चलाने की दिशा में साहसिक पहल भी कमलेश्वर जी की थी। वे स्वातंत्र्योत्तर भारत के सर्वाधिक क्रियाशील, विविधतापूर्ण और मेधावी हिंदी लेखक हैं।
कमलेश्वर जी के समकालीन लेखक और उनके अभिन्न मित्र दुष्यंत कुमार जी ने कमलेश्वर जी के बारे में बहुत सारे संस्मरण लिखे हैं इसकी एक बानगी देखिये, ‘एक पूरी किताब कमलेश्वर के ऐसे संस्मरणों पर लिखी जा सकती है, मगर उससे भी उसके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं हो सकता। यह तो मात्र प्रासंगिक सत्य है कि अपनी विलक्षण मेघा द्वारा उसने अल्पकाल में, इच्छामात्र से, व्यंग्य विनोद की प्रकृति को आत्मसात कर लिया। मूल सत्य यह है कि उसके असल व्यक्तित्व की अन्तरधारा में न तो व्यंग्य है हास्य। वह स्वभाव से अत्यन्त संवेदनशील, भावप्रवण और गम्भीर व्यक्ति है, उसका करुणा है- सघन पूँजीभूत करुणा जिसके कारण वह अपने व्यंग्य में भी अनुदार नहीं हो पाता, यहाँ तक कि उसकी फबती से आपको कहीं जरा भी चोट पहँची तो पहला वही होगा जो तत्काल इस बात को भाँप लेगा और अवसर मिलते ही, झिझकते हुए, आपका हाथ अपने हाथ में लेकर इस कदर प्यार से दबाएगा कि उसकी हथेलियों की ऊष्मा में (अगर आप थोड़े भी समझदार हैं तो) असल कमलेश्वर को खोज निकालने में आप भूल नहीं करेंगे।’ कमलेश्वर किसी का दुख नहीं देख पाते थे और उसे भरसक आर्थिक मदद भी करते थे। उनका आखिरी और चर्चित उपन्यास रहा `कितने पाकिस्तान', जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। इसे काफी शोध के बाद उन्होंने लिखा था। इस शोध में आज के एक बेहद चर्चित पत्रकार और एक टीवी चैनल के प्रमुख ने मदद की थी। कमलेश्वर ने इसके लिए उन लोगों को आर्थिक मेहनताना दिया था। यह बात और है कि उन्होंने दोनों में से किसी को भी नाम नहीं दिया। इसका मलाल उन सज्जन को आज भी रहता है। वैसे तो कमलेश्वर जी लेखकों को महत्व देने में पीछे नहीं रहते थे। चाहे लेखक उनके विरोधी विचारधारा का ही क्यों न हो। शायद उन्होंने भी लंबे वक्त तक लेखन के सहारे जीविका जुटाई थी। इसलिए वे लेखकों के साथ अन्याय नहीं होने देना चाहते थे। १९९९ का एक किस्सा याद आता है। तब प्रसार भारती की मौजूदा चेयरमैन मृणाल पांडे, दैनिक हिंदुस्तान और एनडीटीवी छोड़ चुकी थीं, जबकि वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र जनसत्ता से रिटायर हो गए थे। उन दिनों कमलेश्वर ने दोनों से दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट के लिए कुछ कवर स्टोरियाँ लिखवाई थीं। उनमें से मृणाल जी की एक कवर स्टोरी किसी और अखबार में प्रकाशित हो गई थी। इसकी स्टाफ के एक सदस्य ने शिकायत की तो कमलेश्वर जी ने उस सदस्य से पूछा कि आप एक लेख के लिए लेखक को कितना भुगतान करते हैं। तब वह रकम कुछ सौ रुपए होती थी। उन्होंने सिगरेट का छल्ला बनाते हुए जवाब दिया कि जब आप एक लेख के लिए लेखक को पांच हजार देने लगें तब जाकर ऐसी शिकायत कीजिएगा।  एक बार कार्यालय के काम के लिए एक अनुभव प्रमाण पत्र की जरूरत पड़ी। एक सरकारी दफ्तर ने कमलेश्वर जी को फोन किया तो उन्होंने उन्हें घर बुलाया लेकिन उनका टाइपिस्ट उस दिन आया ही नहीं और ऐसा लगा कि आज प्रमाण पत्र जमा नहीं हो पाएगा। लेकिन डनहिल सिगरेट का छल्ला बनाते हुए कमलेश्वर ने इसका भी हल निकाल लिया। उन्होंने तत्काल लेटर हेड निकाला और अपने मोतियों जैसे अक्षर उस पर टाँक दिए और नीचे अपना हस्ताक्षर कर दिया। उसकी फोटो कॉपी जब संबंधित दफ्तर में जमा की गई तो जांच अफसर उन अक्षरों को देर तक देखते रह गया।

ऐसा नहीं कि कमलेश्वर के व्यक्तित्व में सिर्फ अच्छाइयाँ ही थीं। उन्होंने अपनी कमियों को अपने संस्मरण `आग का दरिया' में जाहिर भी किया है। लेकिन उनमें सबसे बड़ा गुण यह था कि वे नकचढ़े नहीं थे। संघर्षशील व्यक्ति की मदद के लिए वे हमेशा आगे रहते थे और आगे बढ़कर काम करते थे। यही वजह है कि जब २७ जनवरी २००७ को उनका निधन हुआ और उन्हें आखिरी विदाई देने के लिए दिल्ली के लोधी रोड श्मशान घाट पर लाया गया तो वहाँ तिल रखने की जगह नहीं थी। देश के नामी लेखक, पत्रकार और फिल्मकार ही नहीं, राजनेता भी उन्हें विदा देने पहुंचे थे। यह एक संयोग ही है कि कमलेश्वर का जन्म और मृत्यु दोनों ही जनवरी में हुए। पैदा वे उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में हुए, तारीख थी ६ जनवरी १९३२ और निधन की तारीख थी २७ जनवरी २००७।
कमलेश्वर की अंतिम अधूरी रचना अंतिम सफर उपन्यास है, जिसे कमलेश्वर की पत्नी गायत्री कमलेश्वर के अनुरोध पर तेजपाल सिंह धामा ने पूरा किया और हिन्द पाकेट बुक्स ने उसे प्रकाशित किया और जो बेस्ट सेलर भी रहा।  कमलेश्वर नये पन के आकर्षण से हमेशा आकर्षित रहे उन्होंने जीवन को जिस तरह से भोगा उसी रूप रूप में उसे चित्रित भी किया। एक प्रसिद्ध समालोचक का मानना है, ‘कितने पाकिस्तान’ लिखकर कमलेश्वर ने सभी कथाकारों के सम्मुख एक चुनौती पेश की है। भाषा के स्तर पर भी कमलेश्वर ने जो प्रयोग किया है उस स्तर को छू पाना किसी भी कथाकार के लिए बहुत दुःसाध्य कार्य है। एक ओर इतिहास को साधना है और दूसरी ओर वर्तमान को भी अपनी लेखनी द्वारा बाँधना है और यह कार्य कमलेश्वर जैसे सिद्धहस्त लेखक ही कर सकत्ो हैं। कमलेश्वर एक व्यक्ति नहीं अपितु व्यक्तित्व का नाम है। कमलेश्वर जी को सभी साहित्य प्रेमियों की ओर से शत-शत नमन।

रचना दीक्षित 

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