आज की राजनीति की दशा!

यह लेख 21वीं सदी के वर्तमान दौर में भारतीय राजनीति की जटिलताओं और चुनौतियों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अंतरराष्ट्रीय दबाव, घरेलू चुनावी पारदर्शिता, सामाजिक-सांप्रदायिक तनाव, मीडिया की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता जैसे मुद्दों के माध्यम से यह लेख बताता है कि भारत की राजनीति किस निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।

Jan 2, 2026 - 17:29
Jan 2, 2026 - 17:34
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आज की राजनीति की दशा!
The state of politics today!

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र की राजनीति कभी स्थिर नहीं रहती। यहाँ हर दिन नए मुद्दे, नए विमर्श और नए संघर्ष जन्म लेते हैं। २१वीं सदी के इस दौर में, जहाँ सूचना का प्रवाह तीव्र है, वैश्वीकरण और तकनीक का दबदबा है, वहीं राजनीति भी नए-नए रूप धारण कर रही है।
आज की तारीख (१३ अगस्त २०२५) में भारत की राजनीति को देखें तो यह कई स्तरों पर जटिल चुनौतियों से गुजर रही है, एक ओर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तनाव, दूसरी ओर घरेलू राजनीति में चुनावी ईमानदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल, और तीसरी ओर सामाजिक-सांप्रदायिक मुद्दों की बढ़ती तीव्रता।


१. अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य और भारतीय राजनीति

भारत की राजनीति पर आज अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का गहरा असर है।
भारत–अमेरिका संबंधों में तनाव
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर उच्च शुल्क (tariffs) लगा दिए हैं, जो कपड़ा, आभूषण और अन्य निर्यात-आधारित उद्योगों को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। इससे भारत के GDP  विकास दर में गिरावट का खतरा है। अमेरिकी दबाव है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद करे, जबकि भारत ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से आयात जारी रखना चाहता है। यह तनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कूटनीतिक चुनौती बन गया है - एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, दूसरी ओर ऊर्जा और आर्थिक हित।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की भूमिका- सितंबर २०२५ में प्रधानमंत्री मोदी का संयुक्त राष्ट्र में भाषण होने वाला है। यह भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी, क्योंकि अमेरिका के साथ चल रहे तनाव और रूस से निकटता दोनों ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा का विषय बनेंगे।


२. घरेलू राजनीति की स्थिति

भारत में राजनीति का सबसे बड़ा आधार जनता का विश्वास है, और हाल के दिनों में इस पर कई तरह के प्रश्न खड़े हुए हैं।
(a) चुनावी पारदर्शिता और विश्वसनीयता
पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में मतदाता सूची में गड़बड़ी, डबल वोटिंग और मतदाता दमन के आरोप लगे हैं।
विपक्ष का आरोप है कि अगर मतदाता सूची दोषपूर्ण है तो लोकसभा को भंग कर पुनः चुनाव होने चाहिए।
त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने सत्ताधारी दल पर मतदाता सूची में हेरफेर करने का आरोप लगाया है।
इसके जवाब में भाजपा ने कांग्रेस और उसके सहयोगियों पर 'वोट बैंक राजनीति' करने का आरोप लगाया है।
( b) राज्यों में टकराव-
तेलंगाना में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को नजरबंद करने की घटना को भाजपा ने 'लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला' बताया है।
कई राज्यों में कानून-व्यवस्था और राजनीतिक विरोधियों के साथ व्यवहार को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

३. सामाजिक और सांप्रदायिक परिदृश्य-

भारत में राजनीति और समाज का संबंध हमेशा गहरा रहा है, और आज भी कई संवेदनशील मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं।
(a) वक्फ (संशोधन) अधिनियम, २०२५
सरकार का कहना है कि यह अधिनियम वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता और सुशासन लाने के लिए है। विपक्ष और कई मुस्लिम संगठनों का आरोप है कि यह भेदभावपूर्ण है और अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों का हनन करता है। इस मुद्दे पर पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और अन्य राज्यों में विरोध प्रदर्शन और हिंसक घटनाएँ हुई हैं।
( b)  साम्प्रदायिक तनाव
नागपुर हिंसा (मार्च २०२५) अभी भी राजनीतिक बहस में है। इस घटना ने हिंदू–मुस्लिम संबंधों में तनाव को फिर से उजागर कर दिया।
विभिन्न पार्टियों ने इस पर अलग-अलग रुख अपनाया है—कुछ ने शांति और संवाद की बात की, तो कुछ ने इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया।

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४. मीडिया और राजनीति-

आज की राजनीति में मीडिया की भूमिका पहले से कहीं अधिक है।
सोशल मीडिया- ट्विटर (अब X), फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफ़ॉर्म नेताओं के लिए सीधा जनता से संवाद करने का माध्यम बन गए हैं। हालाँकि, फेक न्यूज़, ट्रोलिंग और ध्रुवीकरण की राजनीति ने इसके नकारात्मक पहलुओं को भी उजागर किया है।
मुख्यधारा का मीडिया-
कई समाचार चैनलों पर पक्षपात के आरोप हैं। जनता का एक बड़ा वर्ग मानता है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रहा।
५. आज की राजनीति की प्रमुख चुनौतियाँ
१.लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता- चुनाव आयोग, न्यायपालिका और संसद जैसे संस्थानों पर जनता का भरोसा कमजोर होना गंभीर खतरा है।
२. आर्थिक दबाव और बेरोजगारी- अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण निर्यात प्रभावित हो रहा है, जिससे रोजगार के अवसर घट रहे हैं।
३. सामाजिक सद्भाव- सांप्रदायिक हिंसा और भेदभाव से समाज में विभाजन गहराता है, जिसे राजनीति अक्सर बढ़ावा देती है।
४. भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी- आज भी राजनीतिक दलों के फंडिंग और नीतियों में पारदर्शिता एक गंभीर मुद्दा है।
५. युवा और राजनीति- युवाओं में राजनीतिक भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन उनके मुद्दे (रोजगार, शिक्षा, तकनीकी नवाचार) राजनीति के केंद्र में नहीं हैं।
६. संभावित समाधान और आगे की राह
चुनावी सुधार-
मतदाता सूची को पूरी तरह डिजिटाइज़ और पारदर्शी बनाया जाए।
चुनाव आयोग को अधिक स्वतंत्र और सशक्त किया जाए।
सामाजिक संवाद- सांप्रदायिक तनाव कम करने के लिए समुदायों के बीच संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जाए।
आर्थिक नीति में संतुलन- विदेश नीति और व्यापारिक संबंधों में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ बनाए रखते हुए बहुपक्षीय व्यापारिक समझौते किए जाएँ।
मीडिया सुधार- 
फेक न्यूज़ पर सख्ती और मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए ठोस कानूनी प्रावधान हों।
युवा सशक्तिकरण- शिक्षा, स्टार्टअप, और रोजगार के अवसरों को राजनीतिक एजेंडे में प्राथमिकता दी जाए।
निष्कर्ष
आज की राजनीति की दशा को देखें तो यह स्पष्ट है कि भारत एक जटिल मोड़ पर खड़ा है।
एक ओर देश वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, दूसरी ओर घरेलू राजनीति में विश्वास, पारदर्शिता और सामाजिक एकता जैसे बुनियादी मूल्यों पर दबाव है।
यदि राजनीतिक नेतृत्व इन चुनौतियों का समाधान दूरदर्शिता, संवाद और संवेदनशीलता से करता है, तो भारत न केवल अपनी लोकतांत्रिक मजबूती बनाए रखेगा बल्कि दुनिया में एक मिसाल भी कायम करेगा।
लेकिन यदि वर्तमान प्रवृत्तियाँ-ध्रुवीकरण, पारदर्शिता की कमी और संस्थागत कमजोरियाँ-जारी रहीं, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो सकती हैं।
आज का समय हमें यह याद दिलाता है कि राजनीति सिर्फ सत्ता का खेल नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने की कला है।
इस कला को ईमानदारी, पारदर्शिता और जनता के हित में प्रयोग करना ही राजनीति की असली जीत है।

एड. मनीष कुमार 
गाज़ीपुर (उ.प्र.)

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