मजरूह सुल्तानपुरी ( मोहब्बत, इंक़लाब और इंसानियत के अमर शायर)

यह लेख मजरूह सुल्तानपुरी के जीवन, शायरी और उनके विचारों का विस्तृत परिचय प्रस्तुत करता है। उनकी शायरी में इश्क़, इंसानियत और इंकलाब का अनूठा संगम देखने को मिलता है। उन्होंने न केवल उर्दू साहित्य बल्कि हिंदी सिनेमा को भी अपने शब्दों से समृद्ध किया। यह लेख उनके संघर्ष, रचनात्मकता और विरासत को उजागर करता है।

Apr 13, 2026 - 11:37
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मजरूह सुल्तानपुरी  ( मोहब्बत, इंक़लाब और इंसानियत के अमर शायर)
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हिन्दुस्तानी शायरी की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं जो सिर्फ़ अल्फ़ाज़ के जादूगर नहीं, बल्कि एक पूरी विचारधारा के प्रतीक बन जाते हैं।
मजरूह सुल्तानपुरी उन्हीं में से एक हैं-जिनकी शायरी में इश्क़ की नर्मी, इंक़लाब की गूंज और इंसानियत की ख़ुशबू एक साथ मिलती है।
वे एक ऐसे शायर थे जिन्होंने अपने कलाम से न सिर्फ़ दिलों को छुआ, बल्कि समाज को सोचने पर भी मजबूर किया।
प्रारंभिक जीवन और शायरी की शुरुआत
मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म १ अक्टूबर १९१९ को सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) में एक सुसंस्कृत मुस्लिम परिवार में हुआ।
उनका असली नाम असगर हुसैन रिज़वी था। प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय मदरसे और स्कूलों में प्राप्त की।
उन्होंने यूनानी चिकित्सा (हकीमी) की पढ़ाई की और कुछ समय तक हकीम के रूप में कार्य किया,
मगर दिल की धड़कनें तो कविताओं की रूह में बस चुकी थीं।
कहते हैं कि शायरी की ओर उनका रुझान एक मुशायरे से शुरू हुआ,
जहाँ उन्होंने पहली बार अपना कलाम पढ़ा और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उनके गुरु मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी थे, जिन्होंने मजरूह की प्रतिभा को निखारा।
शायरी की विशेषताएँ
मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी को तीन प्रमुख धाराओं में बाँटा जा सकता है -
१. रुमानियत (प्रेम और संवेदना)
२. इंक़लाब (क्रांति और सामाजिक चेतना)
३. इंसानियत और अमन का संदेश
रुमानियत की कोमलता
उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत का रंग बेहद गहरा और सच्चा दिखाई देता है।
वे प्रेम को केवल प्रेमिका तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे इंसान के जज़्बात और आत्मा की ताक़त के रूप में देखते हैं। 
‘हम को उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।’
‘मोहब्बत जो नहीं देता वो नफ़रत क्या करेगा,
ये दिल जो टूट जाएगा तो किस्मत क्या करेगा।’
इन पंक्तियों में प्रेम के साथ एक गहरा सामाजिक बोध भी छिपा है।
जैसे वे कहना चाहते हों - इंसानियत में भी वफ़ा और करुणा ज़रूरी है।
उनकी शायरी में रुमानियत की वही मिठास फिल्मों के गीतों में भी झलकी-
‘तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं,
जहाँ भी ले जाए राहें हम संग हैं।’ (फ़िल्म: Guide)
‘पहला नशा, पहला खुमार,
नया प्यार है, नया इंतज़ार।’ (फ़िल्म: Jo Jeeta Wahi Shikandar)
इन गीतों में मजरूह का काव्य-संवेदन, रोमांस की ऊँचाई और ज़िंदगी की धड़कन एक साथ सुनाई देती है।
इंक़लाब और समाज की आवाज़
मजरूह सिर्फ़ दिल के नहीं, बल्कि ज़मीर के शायर थे।
उनकी कविताओं में समाज की असमानता, अन्याय और वर्गभेद के ख़िलाफ़ आग और उम्मीद दोनों जलती दिखाई देती हैं।
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।’
यह शेर उनके जीवन और विचार दोनों का प्रतीक है।
आज़ादी की लड़ाई के दिनों में उन्होंने जेल की दीवारों के भीतर भी अपनी कलम की लौ को बुझने नहीं दिया।
वह मानते थे कि सच्चा शायर केवल प्रेम का ही नहीं, बल्कि इंक़लाब का भी पैग़ाम देता है।
इंसानियत और एकता का संदेश-
मजरूह सुल्तानपुरी ने हमेशा मज़हब से ऊपर उठकर इंसान को प्राथमिकता दी।
उनकी नज़्में और गीत इंसानियत की राह दिखाते हैं 
‘हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी,
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी।’
‘लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती,
बस एक माँ है जो कभी ख़फ़ा नहीं होती।’
इन शेरों में उनके अंदर का दार्शनिक और मानवीय पक्ष उजागर होता है।
वे दिलों को जोड़ने वाले शायर थे, तोड़ने वाले नहीं।
‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को,
नज़र नहीं चुराना सनम।’ (फ़िल्म: भ्aa्दह ख्ग् ँaaraaू)
यह गीत उनकी इंसानियत और मोहब्बत की जुड़ी हुई सोच को आज भी ज़िंदा रखता है।
फ़िल्मी दुनिया में मजरूह-
१९४० के दशक में मजरूह ने फ़िल्मी गीत लेखन की शुरुआत की।
उन्होंने फ़िल्मी गीतों को भी साहित्यिक गरिमा दी,
जहाँ शब्द संगीत से नहीं, बल्कि दिल से जुड़े होते थे। 
‘जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा।’ (फ़िल्म: ऊaर श्aप्aत्)
‘ओ मेरे दिल के चैन, चैन आए मेरे दिल को दुआ कीजिए।’ (फ़िल्म: श्ीा वान्aह एaaूप्ग्)
‘चल अकेला चल अकेला, तेरे भाग में है सवेरा न तेरा।’ (फ़िल्म: एaस्ंaह्प्)
उनके गीतों में कभी मोहब्बत की नर्मी, तो कभी ज़िंदगी की सच्चाई झलकती रही।
फ़िल्मी गीतों को उन्होंने शायरी के दर्जे तक पहुँचा दिया।
लेखन शैली-
मजरूह की भाषा सरल, पर भावों में गहराई लिए होती थी।
उनकी पंक्तियों में नाटकीयता नहीं, बल्कि आत्मीयता और सच्चाई बोलती है।
उनकी ग़ज़लों में क्लासिकल उर्दू का लहजा तो है ही, पर हर शब्द आम आदमी के दिल तक पहुँचता है।
उनका यह आत्मपरिचय अपने आप में अमर हो गया —
्न ‘मैं शायर हूँ, मजरूह नाम है मेरा,
मोहब्बत मेरा पैग़ाम है मेरा।’
प्रमुख कृतियाँ और सम्मान
मजरूह सुल्तानपुरी के कई कविता-संग्रह प्रकाशित हुए —
‘ग़ज़ल’, ‘आवाज़-ए-मजरूह’, ‘गए दिनों का सुराग’।
उन्हें जीवनभर अनेक सम्मान मिले —
फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार, ग़ालिब पुरस्कार और
दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (१९९३),
जो उन्हें पहले गीतकार के रूप में प्राप्त हुआ —
यह ख़ुद इस बात का प्रमाण है कि वे साहित्य और सिनेमा दोनों के शिखर पर थे।
मजरूह की विरासत
उनकी शायरी ने आने वाली पीढ़ियों को गहराई से प्रभावित किया।
मजरूह के अल्फ़ाज़ सीमाओं के पार जा पहुँचे —
वो हिन्दुस्त्ाान की मिट्टी, प्रेम की सच्चाई और आत्मसम्मान की आवाज़ थे।
्न ‘कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता।’
्न ‘मोहब्बत अब नहीं होगी, ये कुछ दिन बाद में होगी,
गुज़र जाएँगे जब ये दिन, ये दिल के ख़्वाब में होगी।’
उनके कलाम में जो सच्चाई है, वह आज भी नई लगती है —
हर दौर में प्रासंगिक और हर दिल के करीब।
निष्कर्ष
मजरूह सुल्तानपुरी सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि एक सोच, एक ज़मीर और एक युग हैं।
उन्होंने कलम से मोहब्बत की बात की, और अपने जीवन से साहस का परिचय दिया।
उनकी शायरी आज भी इंसानियत की आवाज़ है —
एक ऐसी आवाज़ जो दिलों को जोड़ती है और नफरतों को मिटाती है।
‘प्रेम ही सबसे बड़ी शक्ति है,
और इंसानियत सबसे बड़ी जीत।’
यासमीन तरन्नुम "कँवल"

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