विकास और सिसकते पहाड़

यह लेख भारत के पर्वतीय और पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, मिट्टी के कटाव, नदी के मार्ग बदलने और प्राकृतिक असंतुलन के कारणों तथा समाधान पर केंद्रित है। अनियंत्रित निर्माण, वनों की कटाई, पहाड़ों की सीधी कटिंग, सड़क और फोरलेन विस्तार, सुरंग निर्माण, ब्लास्टिंग, खनन, जलविद्युत परियोजनाओं तथा नदी-नालों के किनारे अवैज्ञानिक बसावट को पर्वतीय आपदाओं के प्रमुख कारणों के रूप में रेखांकित किया गया है। लेख विशेषज्ञों के सुझावों के माध्यम से पर्वत-विशिष्ट विकास मॉडल, वैज्ञानिक भूगर्भीय अध्ययन, सुरक्षित भवन निर्माण, बेहतर ड्रेनेज, वनीकरण, नदी क्षेत्रों में निर्माण पर नियंत्रण और जलविद्युत परियोजनाओं की समीक्षा की आवश्यकता बताता है। साथ ही पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और संवेदनशील पर्यटन को भविष्य के सुरक्षित एवं टिकाऊ पर्वतीय विकास की आधारशिला माना गया है।

Oct 8, 2026 - 17:07
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विकास और सिसकते पहाड़
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भारत के पर्वतीय राज्यों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड, अरावली क्षेत्र (राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली), छत्तीसगढ़ के पठारी क्षेत्र, ओडिशा के पूर्वी घाटी तथा दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट के क्षेत्र आज जिस भूस्खलन, दरकती पहाड़ियाँ, फ्लैश फ्लड, मिट्टी के कटाव, नदी तल के खिसकने और प्राकृतिक असंतुलन से जूझ रहे हैं, उसका प्रमुख कारण पिछले ३-४ दशकों से बढ़ता वन का कटाव (Deforestation), अनियंत्रित निर्माण कार्य (Unregulated Construction), पर्यावरणीय अनुमति के बिना विकास परियोजनाओं की मंजूरी, सड़कों का अत्यधिक विस्तार, सुरंग निर्माण, होटल और टाउनशिप विकास के नाम पर पहाड़ों की अंधाधुंध खुदाई और वृक्षों की बेतहाशा कटाई है।
समय के साथ-साथ पहाड़ के लोगों ने अब अपनी पुरानी परंपरा को भुला दिया है। वह भी विकास की दौड़ में शामिल होकर आगे बढ़ने के लिए प्रयास कर रहे हैं।
उत्तराखंड जब से नया राज्य बना है, उसके बाद ही यहाँ सड़कों की जरूरत महसूस की गई। गाँवों को सड़कों से जोड़ा गया। आज अधिकांश गाँव सड़क से जुड़ गए हैं। परंतु परिणाम क्या हुआ...
सड़कों का गाँवों से जुड़ जाना ही अब गाँवों के लिए आफत बन गया है। सड़क बनाने के लिए जगह-जगह पहाड़ काटे गए। पहाड़ काटने के लिए ब्लास्ट किए गए। उत्तराखंड हिमालय क्षेत्र में आता है और हिमालय की पहाड़ियाँ अभी अपनी शैशवावस्था में हैं। इसी कारण जेसीबी मशीन और ब्लास्ट से खोखले हुए पहाड़ बादल फटने या बारिश होने पर भरभरा कर गिरने लगते हैं और नीचे के गाँवों को मलबे से पाट देते हैं।
राज्य के पुराने अधिकतर गाँव पहाड़ों की चोटियों पर मिला करते हैं। पहले गाँवों को बसाते हुए जमीन की मजबूती देखी जाती थी। आज गाँव सड़कों के किनारे बस रहे हैं। सड़कें सारी तलहटी में हैं। घर बनाने से पहले कोई यह जानने की कोशिश नहीं करता कि यह जमीन कहीं आस-पास बहने वाली नदी की तो नहीं है। उत्तराखंड आपदा में अधिकतर संख्या में वे घर बहे, जो नदी की जमीन का अतिक्रमण करके बने थे। नदी ने आपदा के समय अपनी जमीन पर दावा किया और उसे वापस ले लिया।
पहाड़ों का सीना छलनी कर किए गए विकास कार्य आज मनुष्य पर ही भारी पड़ने लगे हैं। दरकते पहाड़ विकास के नाम पर अब विनाश लीला करते दिखाई पड़ रहे हैं। पहाड़ों के साथ जिंदगियाँ तबाह हो रही हैं। जब-जब मनुष्य ने अपनी हदें पार की हैं, प्रकृति ने उसे उसके बौनेपन का एहसास करा दिया है। परंतु मनुष्य आज भी अनजान बना बैठा है।
विद्युत परियोजनाओं के नाम पर ब्लास्टिंग, टनल, खनन ने पहाड़ों को खोखला कर दिया है, रही-सही कसर बेतरतीब निर्माण ने पूरी कर दी है। देश को पालने वाली अधिकतर नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। जहाँ विकास के नाम पर छोटे-बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट लगाए गए, जो नियम-कानून को ताक पर रखकर पहाड़ों का दोहन कर रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। बारिश के साथ पत्थरों की भी बारिश हो रही है। अकेले किन्नौर में सतलुज नदी के बेसिन पर ही २२ बिजली प्रोजेक्ट का निर्माण किया गया है।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के भूगोल शास्त्र विभाग के अध्यक्ष बी. आर. ठाकुर का कहना है कि प्रदेश की बर्बादी के लिए आदमी खुद जिम्मेदार है।
इस वर्ष आई आपदा के कारण हजारों लोग बेघर हो गए हैं और शरणार्थियों जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। तबाही ने मौजूदा विकास के मॉडल पर भी प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। पहाड़ों की क्षमता का अंदाज लगाए बिना यहाँ दशकों से विकास गाथा लिखने की जिद बनी रही। बिजली प्रोजेक्टों के लिए पहाड़ों का सीना चीरकर सुरंगें खोदी गईं। फोरलेन, अनियोजित सड़क निर्माण, खनन आदि ने धरती को हिला कर रख दिया है। नदियों-नालों को रोककर अवैज्ञानिक निर्माण ने उन्हें रास्ता बदलने को मजबूर कर दिया। रही-सही कसर बादल फटने और मूसलाधार बारिश ने पूरी कर दी।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण से रिटायर्ड डॉ. के. सी. पाराशर कहते हैं, बिना किसी अध्ययन के कि कौन-सा क्षेत्र किस तरह का है, बेतरतीब निर्माण कार्य और खनन ने इस तबाही की पृष्ठभूमि रची है।
नियम-कायदे ताक पर रख दिए... कंक्रीट के जंगल में हिमाचल के शहर बदल रहे हैं। सेवानिवृत्त भू-विज्ञानी रजनीश शर्मा कहते हैं कि शिमला ही नहीं, प्रदेश के कई शहरों में क्षमता से ज्यादा आबादी है और बसावटें भी... पौने दो सौ साल पहले जब अंग्रेजों ने शिमला बसाया, तो यहाँ २५,००० से ज्यादा लोगों को नहीं बसाने की योजना थी। आज वर्तमान में शिमला की आबादी ढाई लाख को पार कर चुकी है...
फोरलेन और बिजली प्रोजेक्ट के लिए जिस तरह से पहाड़ों को छलनी किया गया, वह वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से सही नहीं है। किन्नौर निवासी रिटायर्ड आई.पी.एस. अधिकारी आई. बी. नेगी कहते हैं कि पहाड़ काटकर फोरलेन बनाना जरूरी नहीं है। नदियों के किनारे १०० मीटर तक निर्माण कार्य नहीं हो सकता, इस नियम को भी ताक पर रखकर निर्माण कार्य होते रहे। सरकार की भी आँखें बंद रहीं। जब नदियों ने अपना रौद्र रूप दिखाया, तो किनारे की बस्तियाँ बह गईं।
तबाही के कारण
पहाड़ों की सीधी कटाई - नेशनल हाईवे, फोरलेन के लिए पहाड़ों की ९० डिग्री एंगल यानी वर्टिकल कटिंग होती है। यही फोरलेन किनारे तबाही का कारण है। वर्टिकल कटिंग के लिए पर्याप्त जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाता। पैसा बचाने के लिए अंधाधुंध कटान जारी है।
अवैज्ञानिक और अंधाधुंध निर्माण कार्य - बेतरतीब निर्माण कार्य की वजह से शहर कंक्रीट के जंगल बन गए हैं। नदी-नालों के किनारे बेहिसाब आबादी बस गई है। पहाड़ों को काटकर बहुमंजिला भवन खड़े हो गए हैं। शहरों में क्षमता से अधिक घर बनते जा रहे हैं। बिना किसी जाँच के कच्ची मिट्टी पर निर्माण कार्य किया जा रहा है। बड़ी कंपनियाँ अनुभवहीन ठेकेदारों से कार्य करवा रही हैं।
पेड़ों की कटान - अंधाधुंध पेड़ों की कटान भी पहाड़ों को कमजोर कर रही है। सड़कों और इमारतों के निर्माण के लिए पेड़ों की कटान तबाही का कारण बन रही है।
नदियों में मलबा - सड़कों और नदी-नालों के किनारे मलबा अवैध रूप से डंप किया जा रहा है। मलबा नदियों में फेंका जा रहा है। ब्यास में माइनिंग न होने से रिवरबेड फैल रहा है। बाकी जगह गड्ढों और नालों में तय मानकों से अधिक अवैध रूप से खनन हो रहा है। इस कारण नदियाँ राह बदलने को मजबूर हो रही हैं।
अत्यधिक ब्लास्ट - बिजली प्रोजेक्ट लगाने के लिए पहाड़ों को छलनी किया जाता रहा है। नदियों का पानी टनलों से गुजारा जा रहा है। टनल बनाने के लिए ब्लास्टिंग से पहाड़ हिल रहे हैं।
ड्रेनेज सिस्टम नहीं - कंक्रीट के जंगल तो बना लिए, परंतु ड्रेनेज सिस्टम विकसित नहीं किए गए। ज्यादा बारिश के समय पानी को जहाँ से राह मिली, बहाव तेज हो गया और मकान ढह गए। हाईवे किनारे भी नालियों की सफाई बरसात से पहले नहीं की जाती।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण अतिवृष्टि - मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियर पिघल रहे हैं, अब बर्फ कम पड़ रही है और बारिश ज्यादा हो रही है। बादल फटने की घटनाएँ भी इसी वजह से ज्यादा हो रही हैं।

विशेषज्ञों ने इस समस्या के समाधान के लिए उपाय बताए हैं

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१ - डॉ. बी. आर. ठाकुर, भूगोल शास्त्र विभाग के अध्यक्ष का विचार है... भवन निर्माण में नींव का खास ध्यान रखना होगा। जब तक पक्की जगह न आए, भवन निर्माण न करें। सड़कों के निर्माण में गुणवत्ता की निगरानी होते रहना आवश्यक है। सड़कों के निर्माण के समय उसकी गुणवत्ता के लिए थर्ड पार्टी की निगरानी जरूरी हो।
२ - कुलभूषण उपमन्यु, पर्यावरणविद् का कहना है कि पर्वत-विशिष्ट विकास मॉडल लागू करके इस होने वाले विनाश से भविष्य में बचा जा सकता है। नदियों के किनारे भवन निर्माण, बहुमंजिला इमारत, जमीन की क्षमता से ज्यादा भवनों के निर्माण पर तुरंत रोक लगाई जाए। हिमाचल में फोरलेन की आवश्यकता नहीं, टिकाऊ टू-लेन बने।
अब और बिजली प्रोजेक्ट नहीं - आर. एल. जस्टा, जो पनबिजली इंजीनियर हैं, वे कहते हैं कि अधिक बिजली उत्पादन के बाँध स्थल से आगे नदियों में १० फीसदी वांछित जल नहीं छोड़ा जा रहा है। सतलुज नदी को १५० किलोमीटर तक सुरंगों से बहाया जा रहा है। दो प्रोजेक्टों के बीच की दूरी बनाकर जलग्रहण क्षेत्र में ट्रीटमेंट चलाना जरूरी है। छोटे-बड़े नदी-नालों पर अधिक बिजली परियोजनाओं से परहेज करना चाहिए।
नदी-नालों के निर्माण के लिए नीति बनानी जरूरी है - डॉ. जे. सी. कुनियाल, जो जी. बी. पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान से संबंध रखते हैं। उनका कहना है कि भूस्खलन को रोकने के लिए जंगलों का दायरा बढ़ाना आवश्यक है। संवेदनशील जगहों पर जहाँ मिट्टी कच्ची है, वहाँ पौधे लगने चाहिए। नदी-नालों के किनारे बने मकानों की सुरक्षा के लिए तटीकरण हो और नए घरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगना चाहिए।
इसके अतिरिक्त सबसे आवश्यक है कि स्थान- विशेष के अनुकूल वनस्पतियाँ और पेड़ के जंगल पनपाए जाएँ, ताकि पर्यावरण की रक्षा हो सके। इसके अलावा पहाड़ी पर्यटन पर भी परिस्थिति के अनुसार नियंत्रण के साथ पर्यटकों पर भी नजर रखनी होगी।
साथ ही, राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर भूगर्भीय जोखिम मूल्यांकन आधारित योजना बनानी चाहिए। नागरिक समाज, युवा, छात्र, स्थानीय पंचायत आदि इन प्रयासों में शामिल होते हैं, तो एक नया हरित पर्वतीय मॉडल (उrााह प्ग्त्त् श्दत्) सामने आ सकता है। यदि आज हमने विनाश को नहीं रोका, तो न केवल पहाड़ दरकेंगे, वरन् मानव सभ्यता, संस्कृति और अस्तित्व भी इन दरकती चट्टानों के नीचे दब जाएगा।
इसलिए यह समय चेत जाने का है कि विकास के नाम पर विनाश न हो, वरन् विज्ञान, संवेदनशीलता और सतर्कता के साथ पर्वतीय राज्यों को सशक्त और सुरक्षित बनाया जाए - यही २०४७ के जल और पारिस्थितिक आत्मनिर्भर भारत की नींव बनेगी। मुख्य बात यह है कि अब समय बहुत कम है, जो भी करना है जल्दी करना होगा, वरना विलंब हमारे पहाड़ों की शृंखला के लिए बहुत भारी पड़ सकता है।यह शहर नियमित ट्रैकिंग के लिए मशहूर है। यहाँ ३०३ किलोमीटर लंबे ट्रैकिंग ट्रैक्स फैले हुए हैं। यहाँ पर लैंडस्केप संग्रहालय भी मौजूद है। यहाँ शास्त्रीय संगीत का उत्सव भी होता है। यहाँ पर एक और खासियत है, यहाँ की सबसे अधिक दूध देने वाली बकरियाँ। इनके दूध में कम से कम ३.२ज्ञ्-३.८ज्ञ् मिल्क फैट और २.७ज्ञ् प्रोटीन होता है। दूध में वसा की यह मात्रा विभिन्न प्रकार के डेयरी और दूध उत्पादों को बनाने के लिए आदर्श है। एक मादा बकरी औसतन १ दिन में ३.८ लीटर दूध देती है और यहाँ की बकरियाँ दुनिया भर के ८० से अधिक देशों में भेजी जाती हैं।
स्टाड बर्निश ओवरलैंड में स्थित ज़ानेन गाँव के आसपास के सर्वश्रेष्ठ आकर्षक और दर्शनीय स्थल, ऐतिहासिक, आकर्षक और प्राकृतिक दृश्यों का अनूठा संगम प्रस्तुत करते हैं। यह क्षेत्र अपने पारंपरिक छोटे घर, शांत पहाड़ी स्थलों और आउटडोर गतिविधियों के अवसरों के लिए प्रसिद्ध है। पर्यटक प्राचीन गिरजाघर, ट्रैकिंग मार्गों तक विभिन्न प्रकार के आकर्षणों का आनंद ले सकते हैं।
स्टाड में आपको भव्यता, आराम और विलासिता का अनूठा संगम मिलेगा। यहाँ के गाँव में स्थित कार-मुक्त शहर और आसपास की दुकानें आपको मंत्रमुग्ध कर देंगी। स्टाड से आप सैनिक और फिनोल दर्रों के आसपास की रमणीय घाटियों और पर्वतीय दृश्य का आनंद ले सकते हैं। स्टाड में कई मशहूर हस्तियाँ छुट्टियाँ मनाने आती हैं।

हम भारतीयों के लिए ये शहर विशेष है, क्योंकि यह वो विशेष जगह है जहाँ पर मशहूर हिंदी फिल्म ठदिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगेठ की शूटिंग हुई थी। यहाँ स्टेशन के पास ही शोर-शराबे के साथ बहती नदी के पुल पर बनी दोनों तरफ की रेलिंग पर बहुत शान से शाहरुख और काजोल की तस्वीरें लगी हैं। हर भारतीय यहाँ आकर उनके पास खड़े होकर अपनी तस्वीर खिंचाना नहीं भूलता, सो हम भी नहीं भूले। आनन-फानन में हमने भी फोटो और वीडियो बना डाले।
वहीं पास है सानेन का छोटा-सा हवाई अड्डा, जिसको भी इस फिल्म में इस्तेमाल किया गया था। अपने भारतीय होने के प्रमाण को अपने कैमरे में कैद करके हम चल दिए स्टाड के उस कैफे की ओर, जिसके बाहर और अंदर के सीन भी फिल्म में हैं।
इस बीच हमने उसी अल्हड़ ज़ाने नदी (एaaहा) का किनारा पकड़ा, जिसने अपने पुल पर शाहरुख और काजोल को सहेजा हुआ है। हमने इसी नदी के किनारे से चलना शुरू किया। प्रकृति के आनंद के बीच एक खूबसूरत जगह की सैर का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता था।
इस खूबसूरत रास्ते में बीच-बीच में कुछ खेल-कूद की भी व्यवस्था थी। उस सबका आनंद लेते हुए हम आगे बढ़ ही रहे थे कि तभी उस जंगल में नजर पड़ी स्वामी विवेकानंद जी की एक तस्वीर पर। हमने वहाँ अपने भारतीय होने का प्रमाण दिया और आगे बढ़े।
कुछ ही दूरी पर कतारबद्ध खड़ी थीं बहुत सारी बड़ी गाड़ियाँ, जिनमें तंबू-कनात से लगे थे। पता चला, ये यहाँ वर्ष भर ऐसी ही बनी रहने वाली कैंपिंग साइट है। एक कैंप के बाहर कुर्सी पर महिला किताब पढ़ रही थी। एक जगह एक महिला स्वेटर बुन रही थी। एक पुरुष उस अल्हड़ ज़ाने नदी से ज़ुकिनी धोकर ला रहा था। अलग ही दृश्य था कैंपिंग का, शहर ही कहा जा सकता था वो छोटा-सा।
उसे पार करके खेतों के बीच से होते हुए हम स्टाड के रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़े, जहाँ हमें वह बेकरी देखनी थी। जल्दी ही हम वहाँ पहुँचे। वहाँ के दृश्यों को कैमरे में कैद करने के बाद हम वापस स्टाड से एक खास ट्रेन, जिसे गोल्डन पास ट्रेन कहते हैं, के द्वारा वेवे अपने होटल पहुँच गए।
यह ट्रेन पर्यटकों के लिए विशेष रूप  सेबनाई गई है, जिसमें प्रकृति की अनुपम छटा पूरी की पूरी दिखती है, क्योंकि इसमें सभी तरफ और छत में भी पारदर्शी काँच लगाया हुआ है। एक बात और, इन ट्रेनों का किराया दूसरी ट्रेनों की अपेक्षा काफी ज्यादा होता है, लेकिन स्विट्ज़रलैंड तो प्रसिद्ध ही प्रकृति की अनुपम छटा देखने के लिए है, इसलिए अधिक पैसा देना भी पैसा वसूल करा जाता है।
तो ये था एक सुंदर, रमणीय यात्रा का आँखों देखा हाल। 

पद्मा अग्रवाल

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