अखंड सौभाग्य, श्रद्धा और नारी शक्ति का पावन पर्व:-
वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागन महिलाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र त्यौहार है। यह व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या (और कुछ क्षेत्रों में पूर्णिमा) को मनाया जाता है। यह व्रत विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु ,सुख समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना से रखा जाता है। भारतीय नारी की अटूट निष्ठा, प्रेम, त्याग और संकल्प का यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। वट अर्थात बरगद का वृक्ष और सावित्री पौराणिक कथा के अनुसार वह आदर्श नारी जिसने अपने तप, बुद्धि और पतिव्रत धर्म के बल पर अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए। इस व्रत में महिलाएँ बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं क्योंकि यह वृक्ष दीर्घायु, स्थिरता और अमृत का प्रतीक माना जाता है।
बरगद का वृक्ष अपनी विशालता और दीर्घ जीवन के कारण भारतीय संस्कृति में पूजनीय है। इसकी जड़े और शाखाएँ जीवन की निरंतरता तथा परिवार की मजबूती का संदेश देती हैं। महिलाएँ इस दिन वट वृक्ष के चारों धागा बाँधकर अपने दांपत्य जीवन की सुख समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत तेजस्विनी, विदुषी और पतिव्रता स्त्री थीं। उन्होंने सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना, जबकि उन्हें यह ज्ञात था कि सत्यवान अल्पायु हैं। विवाह के पश्चात जब सत्यवान की मृत्यु का समय आया, तब यमराज स्वयं उनके प्राण लेने पहुँचे। सावित्री ने अपने अटूट प्रेम,तर्क, तपस्या और दृढ़ संकल्प से यमराज को प्रसन्न कर लिया, यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। माना जाता है कि जब सावित्री यमराज के पीछे जा रहीं थीं तब उन्होंने सत्यवान के पार्थिव शरीर को वट वृक्ष के नीचे ही रखा था। वट वृक्ष को हिंदू में त्रिमूर्ति (ब्रह्मा विष्णु और महेश) का रूप माना जाता है।
इस प्रकार सावित्री भारतीय नारी के साहस, निष्ठा और समर्पण की अमर प्रतीक बन गईं। वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएँ प्रातः स्नान कर स्वच्छ और सुन्दर वस्त्र धारण करती हैं सोलह श्रृंगार करतीं हैं।उसके बाद में पूजा की थाली सजा कर बरगद के पास जाती हैं। वृक्ष की जड़ों में जल अर्पित करतीं हैं। रोली, अक्षत, बांस का पंखा, फल (विशेष कर आम और खरबूजा),फूल और मिठाई चढ़ाती है। महिलाएँ वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूत लपेटते हुए ७,११,२१,या १०८ परिक्रमा करती हैं सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती है। इस व्रत में संयम, श्रद्धा और भक्ति का विशेष महत्व होता है। कई महिलाएँ निर्जला उपवास भी रखती हैं वट सावित्री व्रत केवल पति की लंबी आयु के लिए किया जाने वाला धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि वह नारी के आत्मबल, धैर्य और परिवार के प्रति समर्पण का उत्सव भी है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रेम, विश्वास और दृढ़ निश्चय से बड़ी से बड़ी कठिनाई को भी पराजित किया जा सकता है। आज के आधुनिक युग में भी यह व्रत भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पर्व पति पत्नी के संबंध में विश्वास, सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव को सुदृढ़ करता है।
वट सावित्री व्रत भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का प्रतीक है जहाँ नारी को शक्ति, श्रद्धा और समर्पण का स्वरूप माना जाता है सावित्री की कथा प्रत्येक व्यक्ति को यह प्रेरणा देती है कि सच्चा प्रेम, निष्ठा और आत्मविश्वास जीवन की सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था नहीं बल्कि भारतीय जीवन दर्शन और आदर्श पारिवारिक मूल्यों का जीवंत उत्सव है।
वट-वृक्ष सा अटल रहे, जीवन में विश्वास,सावित्री सा प्रेम हो, मधुर बने हर स्वांस, हाथों में चूड़ी खनके, दिल में गहरी प्रीत, वट-वृक्ष तले गूँज उठे, सावित्री के गीत, अखंड रहे सुहाग सदा, मंगलमय हो भाग्य, हर नारी के जीवन में, खिल उठे सौभाग्य।
नीलम पाठक