फाइल का ‘पोषक आहार’ और बाबूशाही का बढ़ता पेट

गोविन्द सेन के ‘बाबू के दोहे’ सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, दलाल तंत्र और आम जनता की परेशानियों पर तीखा व्यंग्य करते हैं। यह लेख युवा पीढ़ी, महिलाओं और जागरूक नागरिकों से संगठित होकर सूचना के अधिकार, डिजिटल प्रमाण और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों के माध्यम से भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने की अपील करता है। लेख का मूल संदेश है—न रिश्वत देंगे, न रिश्वत लेने देंगे; संविधान के मार्ग पर चलकर पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार-मुक्त भारत का निर्माण करेंगे।

Oct 9, 2026 - 14:36
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फाइल का ‘पोषक आहार’ और बाबूशाही का बढ़ता पेट
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आज भारत देश में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहराई में उतर गई हैं, जिसको उखाड़ फेंकना बहुत ही मुश्किल जान पड़ता है।
लेकिन हाल ही में दिल्ली, जंतर-मंतर, पटना, रांची में जो शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन हुए हैं और सरकार से अपनी बातों को मनवाकर जो शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया और अन्य माँगों को भी समय रहते पूर्ण करवाने का आश्वासन दिया गया, इससे सोशल मीडिया से गाँव-गाँव में जागरूकता पैदा हो चुकी है और परिणाम भी अच्छे ही मिल रहे हैं।
सरकारी कार्यालय जनता की सेवा, समस्याओं के समाधान और योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए बनाए गए हैं। लेकिन जब इन्हीं कार्यालयों में रिश्वत नियम और ईमानदारी अपवाद बन जाए, तब लोकतंत्र का मंदिर धीरे-धीरे भ्रष्टाचार का बाजार बनने लगता है। रचनाकार गोविन्द सेन के ‘बाबू के दोहे’ इसी कड़वी सच्चाई को सरल भाषा, लोकप्रचलित प्रतीकों और तीखे व्यंग्य के माध्यम से उजागर करते हैं।

ङ्खदफ्तर है जंगल बना, जिसमें बाबू शेर।
मूक बने चुपचाप हम झेल रहे अंधेर॥ङ्ग

दफ्तर को जंगल और बाबू को शेर कहना अत्यंत सटीक व्यंग्य है। जंगल में शक्तिशाली का शासन चलता है; उसी प्रकार भ्रष्ट कार्यालय में कई बार कानून से अधिक बाबू की इच्छा प्रभावी हो जाती है। आम आदमी आवेदन लेकर ऐसे खड़ा रहता है, मानो अपना अधिकार माँगकर उसने कोई अपराध कर दिया हो। मेज के उस पार बैठा कर्मचारी जनता का सेवक कम और फाइलों का स्वयंभू राजा अधिक दिखाई देता है।

ङ्खदफ्तर-दफ्तर देखिए, फैला भ्रष्टाचार।
बिन पोषक आहार के, फाइल पड़े बीमार॥ङ्ग
यहाँ रिश्वत को फाइल का ‘पोषक आहार’ कहना व्यंग्य की चरम अभिव्यक्ति है। रिश्वत न मिलने पर फाइल को कभी नियमों का बुखार चढ़ जाता है, कभी दस्तावेजों की कमी का दर्द और कभी वह रिकॉर्ड रूम में जाकर कोमा में चली जाती है। लेकिन जैसे ही लिफाफे का ‘टॉनिक’ मिलता है, वही बीमार फाइल अचानक स्वस्थ होकर एक मेज से दूसरी मेज तक दौड़ने लगती है।
सरकारी दफ्तर का ‘कल’ भी बड़ा विचित्र होता है। वह रोज आता है, लेकिन नागरिक का काम लेकर कभी नहीं आता। कभी साहब बैठक में होते हैं, कभी कंप्यूटर खराब होता है, कभी सर्वर बंद और कभी संबंधित कर्मचारी अवकाश पर। आश्चर्य यह कि रिश्वत मिलते ही साहब भी मिल जाते हैं, सर्वर भी चलने लगता है और नियम भी रास्ता छोड़ देते हैं।

ङ्खशुभचिंतक की शक्ल में, मिलते यहाँ दलाल।
चुपके-चुपके आपकी, खींचेंगे जो खाल॥ङ्ग

कवि ने बाबूशाही के आसपास पनपते दलाल तंत्र पर भी करारा प्रहार किया है। अनेक कार्यालयों के बाहर ऐसे बिचौलिए सक्रिय दिखाई देते हैं, जो स्वयं को अधिकारी का करीबी बताकर परेशान नागरिक से कहते हैं-ङ्खचिंता मत कीजिए, साहब अपने ही हैं!ङ्ग इस अपनेपन की कीमत नागरिक को अपनी जेब से चुकानी पड़ती है।
दलाल रिश्वत को ‘चाय-पानी’, ‘सेवा-पानी’, ‘खर्चा’ या ‘सुविधा शुल्क’ जैसे सभ्य नाम देकर भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का वस्त्र पहना देते हैं। नागरिक समझता है कि उसका काम कराया जा रहा है, जबकि वास्तव में उसकी मजबूरी का सौदा हो रहा होता है।

ङ्खसीधा-सादा आदमी, यहाँ अगर फँस जाय।
बाबू उसको नोंचकर, जीवित ही खा जाय॥ङ्ग

पेंशन, नामांतरण, प्रमाण-पत्र, अनुदान, मुआवजा, राशन कार्ड या किसी सरकारी योजना का लाभ लेने पहुँचे सीधे-सादे व्यक्ति को नियमों के मकड़जाल में उलझा दिया जाता है। उससे बार-बार वही दस्तावेज माँगे जाते हैं, जो पहले से फाइल में लगे होते हैं। उसे इतने चक्कर कटवाए जाते हैं कि अंततः वह थककर दलाल की शरण में जाने को विवश हो जाता है।
इस व्यवस्था में गरीब आदमी की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी गरीबी नहीं, बल्कि उसका अकेलापन है। वह कार्यालय में अकेला जाता है, अकेला अपमान सहता है और अकेला ही वापस लौटता है। भ्रष्ट तंत्र इसी अकेलेपन का लाभ उठाता है।

ङ्खखाने को गर ना मिले, करे नियम की बात।
खाने को मिल जाए तो, दे नियमों को लात॥ङ्ग

यह दोहा भ्रष्ट व्यवस्था के दोहरे चरित्र को बेनकाब करता है। रिश्वत न देने वाले के सामने नियमों की मोटी पुस्तक खोल दी जाती है, जबकि रिश्वत मिलने पर उसी पुस्तक को मेज के नीचे रख दिया जाता है। निर्धन व्यक्ति के लिए कानून लोहे का दरवाजा बन जाता है और पैसे वाले के लिए वही दरवाजा अपने आप खुलने लगता है।
विडंबना यह है कि कुछ लोग रिश्वत लेते समय महँगाई, कम वेतन और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बहाना बनाते हैं—मानो भ्रष्टाचार उनका महँगाई भत्ता हो! जनता की सेवा के लिए वेतन पाने वाला कर्मचारी उसी सेवा की दूसरी कीमत जनता से माँगता है।

ङ्खलम्बोदर से भी बड़ा, बाबूजी का पेट।
जुड़ा है उसके पेट से, साहब का भी पेट॥ङ्ग

इन पंक्तियों में ‘पेट’ केवल लालच का प्रतीक नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर तक जुड़ी भ्रष्टाचार की शृंखला का संकेत है। बाबू की रिश्वत में यदि साहब की हिस्सेदारी और साहब को किसी प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त हो, तो भ्रष्टाचार व्यक्तिगत बुराई न रहकर संगठित तंत्र बन जाता है।
इसीलिए केवल छोटे कर्मचारी को पकड़ लेने से समस्या समाप्त नहीं होगी। दलाल, बाबू, अधिकारी, ठेकेदार और संरक्षण देने वाले प्रभावशाली लोगों की पूरी शृंखला की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। भ्रष्ट व्यक्ति सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, नेता हो या अधिकारी, स्थायी कर्मचारी हो या संविदाकर्मी-कानून सबके लिए समान होना चाहिए। रिश्वत के नोट पर किसी राजनीतिक दल का झंडा नहीं होता; वह केवल जेब का रास्ता पहचानता है।
यदि कोई व्यक्ति पैसा देकर नौकरी खरीदता है, तो वह सेवा को कर्तव्य के बजाय निवेश समझ सकता है। फिर उसके मन में नौकरी पर खर्च किया गया पैसा जनता से वसूलने की विकृत मानसिकता जन्म लेती है। लेकिन इससे रिश्वत लेने का अपराध उचित नहीं हो जाता। नौकरी खरीदने वाला दोषी है, बेचने वाला उससे बड़ा दोषी और इस कारोबार को संरक्षण देने वाला पूरे तंत्र का अपराधी है।

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संगठित नागरिक और जागती नई पीढ़ी
भ्रष्टाचार की जड़ें ऊपर से दिखाई नहीं देतीं। वे भर्ती, ठेकेदारी, दलाली, प्रशासनिक संरक्षण और राजनीति के भीतर गहराई तक फैली रहती हैं। केवल शाखाएँ काटने से काम नहीं चलेगा; इन जड़ों को सूचना के अधिकार, डिजिटल प्रमाण, सामाजिक अंकेक्षण, स्वतंत्र जाँच और संगठित जनदबाव से उखाड़ना होगा।
आज जेन-जी अर्थात युवा पीढ़ी और जेन-अल्फा अर्थात किशोर पीढ़ी मोबाइल तथा डिजिटल तकनीक में दक्ष है। उनकी ऊर्जा को केवल नारे, ट्रेंड और वायरल वीडियो तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्हें संविधान, सूचना का अधिकार, तथ्य-जाँच, साइबर सुरक्षा और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन की जानकारी देकर परिवर्तन की शक्ति बनाया जा सकता है।
दिल्ली, पटना और रांची जैसे शहरों में विद्यार्थियों द्वारा उठाई गई आवाज़ों से यह स्पष्ट है कि युवा अपने भविष्य से जुड़े प्रश्नों पर मौन रहने को तैयार नहीं हैं। किसी भी छात्र या नागरिक संगठन की वास्तविक शक्ति भीड़ में नहीं, उसके अनुशासन, तथ्यों, पारदर्शिता और अहिंसक चरित्र में होती है। आंदोलन के आरोप प्रमाणित हों और उसका नेतृत्व निजी या राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर रहे-तभी वह स्थायी परिवर्तन ला सकता है।
मोबाइल के माध्यम से राजधानी की आवाज़ राज्य, महानगर, जिला, तहसील, विकासखंड, पंचायत और गाँव तक आग की तरह फैल सकती है। लेकिन यह आग हिंसा की नहीं, जागरूकता की होनी चाहिए। प्रत्येक सूचना को साझा करने से पहले सत्यापित करना आवश्यक है, क्योंकि झूठी सूचना आंदोलन की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाती है।
महिलाओं की भागीदारी भी भ्रष्टाचार-विरोधी संघर्ष को नई शक्ति प्रदान कर रही है। राशन, पेंशन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और सुरक्षा से जुड़े भ्रष्टाचार का सीधा प्रभाव महिलाओं तथा परिवारों पर पड़ता है। महिला स्व-सहायता समूह, छात्राएँ, शिक्षिकाएँ और सामाजिक कार्यकर्ता स्थानीय निगरानी समितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

मशाल जले, पर आगजनी नहीं

भ्रष्टाचार के विरुद्ध मशाल अवश्य जलनी चाहिए, लेकिन वह किसी कार्यालय, बस या सार्वजनिक संपत्ति को जलाने वाली मशाल नहीं हो। आगजनी से जनता की ही संपत्ति नष्ट होती है और वास्तविक मुद्दा पीछे छूट जाता है। संघर्ष तीखा हो, लेकिन शांतिपूर्ण; आवाज़ बुलंद हो, लेकिन कानूनसम्मत; विरोध व्यापक हो, लेकिन प्रमाण-आधारित।
नागरिक प्रत्येक आवेदन की प्राप्ति रसीद लें, निर्धारित समय-सीमा पूछें, आरटीआई से फाइल की स्थिति जानें और रिश्वत माँगे जाने पर कानूनी तरीके से प्रमाण सुरक्षित करें। शिकायत को लोकायुक्त, सतर्कता विभाग अथवा सक्षम जाँच संस्था तक पहुँचाया जाए। गाँव और वार्ड स्तर पर नागरिक सहायता समूह बनाकर पीड़ितों को अकेला पड़ने से बचाया जाए। साथ ही ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों को सम्मानित करना भी आवश्यक है।
गोविन्द सेन के दोहे हँसाते अवश्य हैं, लेकिन उनके पीछे आम आदमी की पीड़ा और अपमान छिपा है। भ्रष्टाचार केवल पैसों का लेन-देन नहीं, गरीब के अधिकार की चोरी, युवा के भविष्य की बिक्री और लोकतंत्र के विश्वास पर आघात है।
अब समय केवल बाबू के बढ़ते पेट पर हँसने का नहीं, बल्कि उसके पीछे जुड़े भ्रष्ट तंत्र को प्रमाण सहित कानून के सामने लाने का है। युवा, महिलाएँ, किसान, श्रमिक, विद्यार्थी, पत्रकार और जागरूक नागरिक यदि संगठित होकर अहिंसक संघर्ष करें, तो भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को भी उखाड़ा जा सकता है।
आइए, मशाल जलाएँ-आगजनी की नहीं, जागरूकता की; व्यवस्था को तोड़ने की नहीं, सुधारने की।

न रिश्वत देंगे, न रिश्वत लेने देंगे।
न अफवाह फैलाएँगे, न भ्रष्टाचार छिपाएँगे।
प्रमाण जुटाएँगे, आवाज़ उठाएँगे-
संविधान के मार्ग पर देश को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाएँगे।

विजय शिंदे ‘मनपसंद

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