प्राचीन भारत की सुव्यवस्थित उन्नत, सुदृढ़ शिक्षा प्रणाली-- गुरुकुल शिक्षा प्रणाली
प्राचीन भारतीय गुरुकुल शिक्षा प्रणाली विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और व्यवस्थित शिक्षण परंपराओं में से एक थी, जिसने भारत को ज्ञान, संस्कृति, दर्शन और नैतिक मूल्यों के क्षेत्र में विश्वगुरु बनाया। इस व्यवस्था में छात्र गुरु के आश्रम में रहकर वेद, शास्त्र, गणित, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, नीति, युद्धकला, योग और अध्यात्म जैसी जीवनोपयोगी शिक्षाएँ प्राप्त करते थे। गुरुकुल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं थे, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मअनुशासन, संस्कार और सर्वांगीण विकास के आधार स्तंभ थे। गुरु और शिष्य का संबंध श्रद्धा, समर्पण और ज्ञान के आदान-प्रदान पर आधारित होता था। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय इसी महान परंपरा के उत्कृष्ट उदाहरण थे, जहाँ दूर-दूर देशों से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। विदेशी आक्रमणों और मैकाले शिक्षा नीति के कारण यह प्रणाली धीरे-धीरे कमजोर होती गई, फिर भी गुरुकुल परंपरा आज भारतीय संस्कृति और शिक्षा की गौरवशाली धरोहर के रूप में प्रेरणा देती है।
प्राचीन भारत, सभ्यता, संस्कृति,भाषा, दर्शन एवं शैक्षणिक दृष्टि से विश्व का सर्वाधिक संपन्न राष्ट्र था। जब विश्व केअधिकांश देशों में सभ्यता अपने शैशव काल, में शनै- शनै आंखें खोल रही थी, तब भारत वेद लिख पढ़ रहा था। भारतीय वैदिक ग्रंथ ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ,आयुर्वेद एवं पुराण आदि इस तथ्य का ज्वलंत प्रमाण है जिन का ज्ञान आज भी प्रासंगिक है। वैदिक भारत ने अपनी उन्नत शिक्षा प्रणाली के माध्यम से विश्व में अपने ज्ञान का डंका बजा रखा था। नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला जैसे विश्व विख्यात विश्वविद्यालय यहां की उच्चतम शिक्षा प्रणाली के सुदृढ़ साक्ष्य रहे हैं। जहां विश्व के सुदूर देशों से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आया करते थे। तत्कालीन भारत में शिक्षा प्राप्ति हेतु भव्य गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की व्यवस्था थी । इसी व्यवस्था के अंतर्गत समस्त छात्रों को शिक्षा प्रदान की जाती थी। आश्रमों के अतिरिक्त विश्वविद्यालयों में भी गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था का ही वर्चस्व था जिसे समाज में बहुत श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। अधिकांश आश्रम और गुरुकुलों को राजकीय संरक्षण प्राप्त होता था। शिक्षा का माध्यम प्रधानतया संस्कृत भाषा थी, जो स्वयं में बहुत सशक्त,समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा है। उस समय संस्कृत भाषा कुलीन वर्ग की भाषा तो थी ही, अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में भी विकसित हो रही थी।
गुरुकुल ( गुरुकुलम)
गुरुकुल , 'गुरु' तथा 'कुल' इन दो शब्दों के योग से मिलकर बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ है गुरु का कुल या वंश। 'गुरुकुल' शब्द का प्रयोग वर्षों से भारत की शैक्षणिक संस्थान के संदर्भ में किया जाता रहा है। वास्तव में गुरुकुल में रहने वाले सभी छात्र अथवा शिष्य गुरु के सानिध्य में रहकर उनके क्रियाकलापों में हाथ बंटाते हुए शिक्षा ग्रहण करते थे,जिससे शिष्यों पर गुरु का विशेष प्रभाव रहता था। गुरु भी परिवार की ही भांति उनका संरक्षण एवं पोषण करते थे। आश्रम में रहने वाले सभी छात्र गुरु के संरक्षण में सुरक्षित रहते और गुरु की शिक्षण- प्रशिक्षण व्यवस्था में, अध्ययन,मनन करते हुए अपने गुरु की शिक्षण परंपरा का निर्वहन किया करते थे। अतः इन अर्थों में 'गुरुकुल' शब्द 'आश्रम शिक्षा व्यवस्था' को पूर्णतया सार्थक करता प्रतीत होता है। सत्य कहें तो,गुरुकुलों का इतिहास भारत की शिक्षा प्रणाली का इतिहास है जिसने गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र, नीति शास्त्र, दर्शन और अध्यात्म जैसे जीवनोपयोगी विषयों को जन्म दिया। गुरुकुलो ने ही भारतीय संस्कृति को पुष्पित,पल्लवित किया। गुरुकुल में ब्रह्मचारी (छात्र) , सत्य के खोजी, परिव्राजक, आवास में दूर-दूर से शिक्षा ग्रहण करने आते थे। जो छोटे बड़े सभी वर्गों के होते थे। गुरु शिष्य के संबंधों पर आधारित यह शिक्षा प्रणाली एक बहुत ही उन्नत एवं समृद्ध शिक्षा प्रणाली थी। जहां गुरु एक अभिभावक, अध्यापक, मार्गदर्शक और आध्यात्मिक अधिकारी के रूप में बहुत ही महत्वपूर्ण एवं बहुमुखी भूमिका निभाते थे।
गुरुकुलों की संरचना एवं स्वरूप-
गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था प्राचीन भारत की अद्वितीय शिक्षण प्रणाली थी। यह एक ऐसा शिक्षण मॉडल था जो समग्र शिक्षा के द्वारा छात्रों (शिष्यों) के सुदृढ़ चारित्रिक निर्माण और चतुर्दिक व्यवहारिक,विकास पर विशेष बल देता था। जिससे प्रत्येक छात्र ( शिष्य) का सर्वांगीण विकास संभव हो पाता था।
गुरुकुल शिक्षा प्रणाली एक आवासीय शिक्षा प्रणाली थी। जिसके अंतर्गत छात्रों (शिष्यों) को शिक्षा प्राप्ति हेतु अपने परिवार से पृथक अपने गुरु या अध्यापक के सानिध्य में ही रहना पड़ता था । गुरुकुलों में वैदिक शिक्षा प्रणाली समग्र शिक्षा पर केंद्रितत थी, जिसमें वेद शास्त्र, दर्शन, कला, युद्ध और अध्यात्म जैसे व्यवहारिक विषयों का पठन-पाठन किया जाता था। जिन्हें छात्र अवलोकन एवं व्यवहारिक भागीदारी के अनुभव के माध्यम से सीखते थे। यह ज्ञान बहुत ही व्यवहारिक, परिस्थितिपरक और पर्यावरण पर आधारित होता था। छात्र प्रकृति के सानिध्य में रहकर अध्ययन, मनन, एवं अन्वेषण किया करते थे। भारतीय शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत कथा प्रणाली के द्वारा सुनाकर भी शिष्यों को सिखने के अनुभव से समृद्ध किया गया। इसी कारण वेदों को श्रुति भी कहते हैं । गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत गुरु की वाणी के स्मरण, श्रवण के माध्यम से ज्ञान का हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होता था। जब कागज का निर्माण नहीं हुआ था तब श्रुति के माध्यम से शिक्षा का प्रचलन बहुतायात में था जिसके अंतर्गत गुरु शिष्य को सुनाता था और शिष्य स्मृति द्वारा इसकी पुनरावृत्ति करके गुरु को सुनाया करता था। छात्र ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सुबह के दैनिक कार्यों, परंपराओं, शारीरिक गतिविधियों, योग, चिंतन, ध्यान-मनन एवं शिक्षण में व्यस्त रहते थे। गुरुकुलों के कड़े अनुशासन ने समय की सीमा, समय का विभाजन, समय का सम्मान और आत्म अनुशासन के मूल्यों को स्थापित किया। गुरुकुल में होने वाले अनुष्ठान छात्रों को सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों से जोड़ते थे। गुरुकुल में गुरु का महत्व शैक्षणिक मार्गदर्शक से इतर छात्रों के नैतिक मूल्य के स्थापना एवं जीवन कौशल के संवर्धन पर आधारित होता था। भारतीय संस्कृति में गुरु शिष्य-परंपरा गुरुकुल प्रणाली की समृद्ध विरासत है। गुरु शिष्य संबंध श्रद्धा, निष्ठा, आदर और ज्ञान के हस्तांतरण की गहरी लोक कल्याण की भावना से प्रोत्साहित थे। प्राचीन गुरुकुल प्रणाली भारतीय शिक्षा व्यवस्था में छात्र, ज्ञान एवं मार्गदर्शन हेतु अपने गुरुओं के सानिध्य में उनके आश्रम में ही प्रवास किया करते थे ।
पठन-पाठन के विषय
गुरुकुल में वैदिक शास्त्र,खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, दर्शनशास्त्र, नीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, ज्योतिष, गणित, अध्यात्म, भाषा, दर्शन कला, नृत्य संगीत, युद्ध कौशल एवं तत्कालीन युग से संबंधित अन्य अनेकों व्यावहारिक ज्ञान एवं कौशल पढ़ाए जाते थे। शैक्षणिक पाठ्यक्रम का उद्देश्य छात्रों के सर्वांगीण विकास एवं उनके चरित्र को दिशा देना होता था। शिक्षा का उद्देश्य एक सभ्य ,सुसंस्कृत, चरित्रवान नागरिकों का निर्माण करना था जो परंपरागत रूप से शिक्षित तो हो ही ,नैतिक और राष्ट्रीय मूल्यों से भी सराबोर हो।
चयन प्रक्रिया
गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था में छात्रों का चयन उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, सामाजिक स्थिति एवं गुरुकुल की कठोर जीवन शैली एवं अनुशासन को अपनाने की छात्रों की सम्मति, के आधार पर किया जाता था। गुरुकुल शिक्षा परम सौभाग्य की बात मानी जाती थी । शिष्य गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण में सम्मान प्रदर्शित करते थे दूसरी ओर गुरु भी शिष्य का मार्गदर्शन अभिभावक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में बहुत ही सावधानी और कर्तव्य परायणता के साथ किया करते थे। गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण एवं पूजनीय था। वह विद्यार्थियों को ज्ञान, जीवनमूल्यों और अनुशासन के प्रति सजगता प्रदान करते थे। परिणाम स्वरूप एक दृढ़ संयमित व्यक्तित्व का निर्माण होता था।
गुरुकुल शिक्षण परंपरा में छात्र एकांत वनों में, नगर एवं परिवार से दूर आश्रमों में, आश्रम के नियम अनुसार, गुरु के मार्गदर्शन में, आवासीय शिक्षा ग्रहण करते थे। जिसके लिए बहुत लगन, समर्पण और मेहनत की आवश्यकता होती थी पारिवारिक पृष्ठभूमि से दूर छात्र गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित होकर ही शिक्षा में सफलता प्राप्त कर सकता था अतः उन्हीं शिष्यों का चयन किया जाता था जो इन सभी परिस्थितियों को पूर्ण समर्पण के साथ अपना कर शिक्षा ग्रहण की इच्छा रखता हो।
शिक्षण व्यवस्था का उद्देश्य
गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था बहुत ही उच्च कोटि की सुव्यवस्थित विकसित व्यवस्था थी जिसमें वेद दर्शन आदि तत्कालीन युग से संबंधित अन्य अनेकों व्यवहारिक विषयों के आधार पर शिक्षा दी जाती थी। इस शिक्षा व्यवस्था को समाज में बहुत ही सम्माननीय स्थान प्राप्त था। शिक्षा का मूल उद्देश्य छात्रों का जीवन के प्रत्येक पटल ( सामाजिक, आर्थिक, नैतिक आदि ) पर चतुर्दिक विकास करना था। गुरुकुल में व्यावहारिक ज्ञान पर विशेष बल दिया जाता था।
आश्रम और गुरुकुल छोटे बड़े मध्य सभी प्रकार के होते थे। कुछ बड़े आश्रमों ,गुरुकुलों में तो दस हजार ऋषि मुनियों का पालन पोषण करने का उल्लेख भी मिलता है और इस उत्तरदायित्व का निर्वहन करने वाले को कुलपति कहते थे-मुनीनम् दशसहस्त्र योन्नादि पोषणम्। /उच्चयति विप्रज्ञानरसौ:स्मृत:।
यहां 'स्मृति' शब्द का प्रयोग कुलपति के विशेष अर्थ में ग्रहण करने की प्राचीन परंपरा रही है। आश्रम एक एकेडमिक परिवार की तरह होता था छात्रों के मानसिक विकास और शारीरिक विकास का उत्तरदायित्व इन्हीं पर होता था।। कुलपति छात्रों के शिक्षण और स्वास्थ्य के विषय में चिंतित रहते थे। आजकल भी इस शब्द का प्रयोग विश्वविद्यालय में कुलपति के लिए किया जाता है।
गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य भारत में धार्मिक परंतु धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रदान करना भी था। इस व्यवस्था का प्रारंभ वैदिक युग से हुआ था जब मौखिक परंपराओं के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। गुरु शिष्यमें , श्रवण परंपराओं के द्वारा गुरु का ज्ञान शिष्यों में पीढी दर पीढ़ी हस्तांतरित होकर निरंतर गतिमान बना रहा। जिससे भारतीय विचार और दर्शन विकसि, संवर्धित होता रहा और भारतीय संस्कृति ने सशक्त एवं जीवंत रूप धारण किया। धीरे-धीरे इन गुरुकुलों ने संस्थागत रूप ले लिया गुरुकुल ऐतिहासिक रूप से संगठित शिक्षा प्रदान करने लगे।
गुरुकुल शिक्षा का उद्देश्य, संस्कारी, शिक्षित, कौशलपूर्ण प्रशिक्षण एवं व्यवहारिक शिक्षायुक्त सभ्य नागरिकों का निर्माण करना था। जिससे गरिमा पूर्ण जीवन निर्वाह में सुगमता हो सके। स्वास्थ्य से लेकर धर्म-कर्म और अध्यात्म तक तथा समाज से लेकर राजनीति तक, जीवन कि प्रत्येक आयामों की आवश्यकता के आधार पर सभी प्रकार की व्यवहारिक शिक्षा गुरुकुल में दी जाती थी । गुरुकुल की आश्रम व्यवस्था पूरी तरह प्रकृति के सानिध्य में होती थी। अतः शिष्य शुद्ध प्राकृतिक वातावरण का लाभ उठाते हुए पर्यावरण के महत्व को भी स्वीकार करते थे। शिक्षक के साथ ही भाषा और साहित्य के उत्थान और विकास में भी गुरुकुलों का विशेष योगदान रहा है। इस प्रकार गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में शिक्षा का उद्देश्य बहुत गहन,विस्तृत एवं विकसित था।
महत्व
भारत के गुरुकुल के प्रमाण वैदिक काल से मिलते हैं। गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था ने ज्ञानलब्धता एवं ज्ञान के प्रचार - प्रसार के अतिरिक्त सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस शिक्षा प्रणाली में जीवन मूल्यों एवं सिद्धांतों पर बल दिया जाता था। जिससे छात्रों में चारित्रिक, नैतिक मूल्यों एवं समुदायिकता की भावना विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता था। सभ्य समाज और संस्कृति को आकार देने में गुरुकुल और गुरुकुल प्रणाली की महती भूमिका रही है। गुरुकुलों ने भारत के समग्र विकास में तो योगदान दिया ही, राष्ट्र को सामाजिक एवं बौद्धिक स्तर पर समृद्ध बनाकर कर्तव्य परायण नागरिकों का निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जीवन का कोई पहलू ऐसा नहीं था जो गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था के पाठ्यक्रम में अछूता रहा हो। इसी गुरुकुल प्रणाली ने भारत को वारह मिहिर, आर्यभट्ट ,आचार्य चाणक्य, भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त आदि महान एवं विश्व प्रसिद्ध, अन्वेषक, खगोल विद एवं गणितज्ञ, दार्शनिक, प्रदान किये । रामायण, महाभारत के काल में भी गुरुकुल एवं गुरुओं के उल्लेख मिलते हैं भारतीय संस्कृति के धर्म-प्राण राम व कृष्ण भी क्रमशः वशिष्ठ व संदीपनी ऋषि के अधीन गुरुकुल में अध्यनरत रहे हैं। गायत्री मंत्र के रचयिता प्रसिद्ध महर्षि विश्वामित्र भी गुरुकुल व्यवस्था के प्रणेता थे। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि और वेदज्ञ वेदव्यास गुरुकुल प्रणाली की ही देन थे।
गुरुकुल प्रणाली के कुछ प्रसिद्ध आश्रम एवं विश्वविद्यालय
वैदिक काल के वशिष्ठ आश्रम, विश्वामित्र आश्रम,वाल्मीकि आश्रम, व्यास आश्रम कण्व ऋषि आश्रम, संदीपनी ऋषि आश्रम आदि ऐसे अनेको-अनेक ख्यातिलब्ध आश्रम हैं,जो आज भी जाने जाते हैं। कालांतर में तक्षशिला विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय विक्रमशिला विश्वविद्यालय ओदंती पूरी विश्वविद्यालय पुष्पगिरी विश्वविद्यालय शारदा पीठ विश्वविद्यालय आदि अनेकों विश्वविद्यालयअपने समय के विश्व विख्यात विश्वविद्यालय रहे जो इसी गुरुकुल प्रणाली के अंतर्गत शिक्षा प्रदान करते थे। जिन में दर्शनशास्त्र, गणित, चिकित्सा, धर्मशास्त्र जैसे विभिन्न विषयों में शिक्षा प्रदान करने के लिए पूरे एशिया से छात्रों का आवागमन होता था। इन्हीं ज्ञानालयों के ज्ञानालोक और गुणवत्ता के आधार पर भारत को विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त था । प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ( XuanZang) और फाहियान(Fa-Hien) के यात्रा विवरण व अन्य कई संदर्भ यह तथ्य प्रमाणित करते हैं कि, इन विश्वविद्यालयों में विश्व के अनेक दुर्गम क्षेत्रों से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते थे। तक्षशिला के कुछ प्रसिद्ध छात्रों में कौटिल्य चाणक्य जिन्होंने अर्थशास्त्र की रचना की, चंद्रगुप्त मौर्य जिन्होंने मौर्य वंश की नींव रखी और व्याकरण विद् पाणिनी जिन्होंने अष्टाध्यायी की रचना की, का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वाराणसी प्राचीन काल में शिक्षा का मुख्य केंद्र था और वर्तमान तक यह अपने शैक्षणिक महत्व को समाहित किए हुए हैं। गुरु शिष्य परंपरा के आधार पर चलने वाली इस शिक्षण व्यवस्था ने हमारी संस्कृति की संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारतीय समाज को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से विकसित संगठित और संवंर्धित करने में इनकी महती भूमिका रही है। लगभग 1500 ईसा पूर्व प्रारंभ हुई गुरुकुल की यह परंपरा समय के साथ एक अति उन्नत और संगठित शिक्षण व्यवस्था बन गई । जो 11वीं शताब्दी तक सुचारू रूप से चलती रही। बाद में विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों ने बताया हमारे गुरुकुलों और पुस्तकालयको ध्वस्त किया। विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को बख्तियार खिलजी ने अग्नि की भेंट किया जो कई महीनो तक जलता रहा। तत्पश्चात मुस्लिम शासन की स्थापना के बाद गुरुकुलों का पतन प्रारंभ हो गया। इसी प्रकार के अन्य आक्रमणों के कारण विक्रमशिला ओदंतीपुरा का भी विनाश हुआ, निरंतर उत्पीड़न ,दमन और विनाश ने गुरुकुल व्यवस्था को बहुत अधिक क्षति पहुंचाई।
ब्रिटिश शासन काल में थॉमस बंविगटन मैकाले नामक एक ब्रिटिश राजनीतिज्ञ ने भारतीय शिक्षा क्षेत्र में नई शिक्षा प्रणाली स्थापित करके, शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया और यही शिक्षा पद्धति वर्तमान में भी क्रियान्वित है जिसे मैकाले शिक्षा नीति के नाम से जाना जाता है। जिसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के लिए सिर्फ और सिर्फ क्लर्क वर्ग को उत्पन्न करना ही था। भारतीय समाज के उत्थान से इसका कम ही सरोकार था। इस नीति के चलते गुरुकुलों की फंडिंग बंद कर दी गई मुस्लिम शासको के दमन की मार झेल रही गुरुकुल प्रणाली इस नियम से मृतप्राय ही हो गई। शीघ्र ही समाज में कॉन्वेंट शिक्षा का प्रचलन स्थापित हो गया। जिसमें अंग्रेजों का वर्चस्व था तथा भारतीय शिक्षापद्धति को समयानुसार पिछड़ी एवं व्यर्थ शिक्षा प्रणाली बाताकर प्रचार किया गया और व्यावहारिक, आर्थिक दृष्टि से भी इसे अनुपयोगी बना दिया गया। ब्रिटिश काल में संपूर्ण भारत में गुरुकुल की संख्या में भारी कमी आई। 1800 के दशकों में दुनिया की सर्वाधिक बड़ी अर्थव्यवस्था वाला भारत 1914 में विश्व के सर्वाधिक निर्धन देशों की कतार में आ खड़ा हुआ। परिणामत: अधिकांश भारतीय शिक्षा का व्यय वहन करने योग्य ही नहीं रह गए और शीघ्र ही गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था भी रसातल में चली गई क्योंकि अब कोई भी राजकीय संरक्षण एवं सुविधा गुरुकुल को प्राप्त नहीं थी और निर्धनता और अशिक्षा के कारण जन समुदाय ने भी शिक्षा के महत्व को समझना बंद कर दिया था। यद्यपि 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के प्रारंभ में, स्वामी दयानंद सरस्वती, और फिर श्रद्धानंद जी ने गुरुकुलों की स्थापना की जिससे इस व्यवस्था को थोड़ा-सा जीवन अवश्य मिला। तभी से आर्य समाज भारत में वैदिक गुरुकुलों का संचालन कर रहा है परंतु वर्तमान के गुरुकुलों का पारंपरिक स्वरूप परिवर्तित हो चुका है और इनमें से अधिकांशआवासीय कान्वेंट स्कूल भर रह गए हैं। जिम सनातनी वैदिक शिक्षा का अभाव देखा जा सकता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी गुरुकुलों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। स्वदेशी शिक्षा प्रणाली की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित ही नहीं हुआ आज भी गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था की दशा उतने ही दयनीय है जितनी पिछली सदी में थी। पिछले दशक में गुरुकुल की संख्या में आवश्यक थोड़ी सी बढ़ोतरी हुई है किंतु अभी भी समझ में इस उत्कृष्ट शिक्षण व्यवस्था के प्रति उदासीनता देखी जा सकती है। अप्रैल 2022 की गणना के अनुसार भारत में गुरुकुल की संख्या लगभग 4500 है।
प्राचीन गुरुकुल प्रणाली भारतीय उपमहाद्वीप की स्वदेशी , किंतु अति उन्नत शिक्षाप्रणाली थी जो पूरे भारत में डे बोर्डिंग के आगमन तक प्रचलित रही। यह शिक्षणव्यवस्था शिक्षा का ऐसा पारंपरिक रूप थी जहां छात्र ज्ञान एवं मार्गदर्शन हेतु गुरु के सानिध्य और संरक्षण में उनके आश्रमों में सुरक्षित रहते हुए अध्ययन करते थे। गुरुकुल प्रणाली वैदिक काल में विकसित हुई और हमारे ऋषि मुनियों द्वारा इसकी संरचना और सिद्धांतों को परिष्कृत किया गया। ऋषियों ने गुरुकुल के निर्माण में जिन सारगर्भित मूल सिद्धांतों की परिकल्पना की थी वह अद्यतन प्रासंगिक दृष्टिगत होते हैं। वेदों के अध्ययन के लिए स्थापित की गई है प्रणाली धीरे-धीरे एक उन्नत, व्यवस्थित, सर्वांगीण विकास पर बल देने वाली उच्च कोटि की ऐसी शिक्षा व्यवस्था बन गई जिसने समाज में, सामाजिक उत्थान एवं समुदायिकता की भावना को स्थापित किया। जिसके अंतर्गत छात्र ज्ञान,मार्गदर्शन एवं जीवन मूल्यों की स्थापना के साथ सफलता, सुरक्षा और सुगमता पूर्वक जीवन यापन करने में सफल हो पाता था। अतः यह व्यवस्था पूर्ण रूपेण बहु उपयोगी एवं शारीरिक मानसिक विकास के साथ व्यक्ति को आध्यात्मिक ऊंचाई तक पहुंचाने वाली साबित हुई। लगभग 1500 इस पूर्व प्रारंभ हुई यह परंपरा छात्रों के माध्यम से समाज के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, और आध्यात्मिक ढांचे को परिवर्धित एवं विकसित करती चली गई।
कालांतर में परिवर्तित समाजिक और राजनीतिक अवस्थाओं के कारण समाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ जिस कारण गुरुकुल शिक्षा प्रणाली पिछड़ गई और नवीन शिक्षण प्रणाली विकसित हुई। आधुनिक शिक्षा पद्धति नें गुरुकुल प्रणाली को बहुत अधिक प्रभावित किया और परिस्थिति वश इसका प्रचलन कम होता चला गया। यद्यपि गुरु शिष्य परंपरा पर आधारित गुरुकुल शिक्षा प्रणाली भारत की महान,समृद्ध, संस्कृतिक विरासत है जो प्रत्येक भारतीय को गर्व का अनुभव करती है। संपूर्ण विश्व को ज्ञानालोक से आलोकित करने वाला, हमारी महान भारतीय संस्कृति का विश्व विख्यात संपूर्ण तर्कपूर्ण और उत्कृष्ट दर्शन इसी गुरुकुल परंपरा की देन है। अतः प्राचीन भारतीय गुरुकुल शिक्षा प्रणाली वास्तव में एक सुगठित, उन्नत, सुदृढ़ तथा गर्व करने योग्य शिक्षा व्यवस्था है।
सीमा तोमर
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0