विरोधात्मक विचारों के बीच दलित चिंतन

यह लेख समाज में विभिन्न विचारधाराओं, ऐतिहासिक विकास और सामाजिक समानता के संघर्ष का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि विरोधाभासी विचारधाराएं समाज के विकास का हिस्सा हैं। साथ ही जातिगत भेदभाव, आरक्षण, और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर डॉ. अंबेडकर, कबीर, रविदास और अन्य समाज सुधारकों के योगदान को भी रेखांकित किया गया है।

Apr 11, 2026 - 14:24
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विरोधात्मक विचारों के बीच दलित चिंतन
आदिकाल से लेकर ही समाज में विभिन्न प्रकार की विचारधाराएं प्रचलित रही हैं। विरोधाभासी विचारधाराओं के समानांतर ही समाज ने अपने विकास का सफर तय किया है। अवरोध तो प्रकृति के कण-कण में समाविष्ट है। दिन के साथ रात,धूप के साथ चांदनी है। अंधकार के साथ प्रकाश, स्त्री के साथ पुरुष, सत्व के साथ तमस है। परस्पर विरोध से ही प्रकृति का विकास संभव हो पाया है। हमें दोनों ही की महत्ता को स्वीकार करना होगा। दोनों ही सृष्टि के विकास के अनिवार्य अंग हैं। यदि ऐसा न होता तो प्रकृति केवल एक तत्व का ही निर्माण करती और उसी से सारी सृष्टि का विकास होता है । 
किसी भी विचारधारा को सर्वजन का समर्थन कभी नहीं मिलता । एक पक्ष सदैव ही उसके विरोध में खड़ा पाया जाता है; क्योंकि पक्ष के साथ ही विपक्ष मौजूद है। सिक्के के सदैव दो ही पहलू होते हैं और दोनों ही पहलू सच हैं। आपके स्वीकार करने या न करने से उस पर किंचित मात्र भी अंतर नहीं पड़ेगा। ज्ञात इतिहास से लेकर वर्तमान समय तक यदि हम सभी विचारधाराओं पर दृष्टिपात करें और विश्व इतिहास को भी देखें तो हमें अनेक प्रकार की विचारधाराएं देखने मिलेगी, और इसी कारण समाज में संघर्ष की स्थिति भी सदैव रही है।
           इतिहास से हमें सबक लेना चाहिए,इतिहास केवल इसीलिए होता है ताकि हम उससे सीखे और भविष्य के लिए सावधान हो जाएं न कि उन त्रुटियों की पुनरावृत्ति करते रहें जो हमने बरसों पहले की थीं। इतिहास का महत्व मनुष्य के लिए मात्र इतनी ही है जितनी कि किसी गाड़ी में लगे हुए साइड मिरर की , जिससे चालक पीछे की तरफ भी दृष्टि रखें और आगे की तरफ भी देखता रहे। केवल इतना ही सोचो अगर किसी गाड़ी का चालक पीछे को मुंह करके बैठे तो क्या गाड़ी चला पाना संभव है? यदि हम वर्तमान पर विचार किए बिना केवल इतिहास को ही सर्वश्रेष्ठ मानते रहे तब न तो भविष्य की और चिंतन उन्मुख हो सकेगा न ही कुछ सृजनात्मक हो सकेगा। विद्वान कहते हैं सृष्टि उत्पन्न नहीं हुई, सृष्टि का विकास हुआ है और यह विकास प्रक्रिया निरंतर जारी है। यदि हम देखें प्राचीन समय से लेकर आधुनिक काल तक मनुष्य ने अत्यधिक मात्रा में विकास किया है और वह विकास निरंतर जारी है।
 
भारत जैसा देश जो धर्म प्रधान रहा है, यद्यपि उसके धर्म में विज्ञान और उसके सिद्धांतों का समावेश भी स्वभावत: मिलता ही है; किंतु उस विज्ञान का क्षेत्र केवल धर्म और धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित है। किंतु पश्चिम के विज्ञान ने जिस प्रकार तकनीकी एवं औद्योगिक उन्नति की है,उसने सारी दुनिया का नक्शा बदल कर रख दिया है। यदि हम विज्ञान का परित्याग कर केवल पौराणिक समय का ही चिंतन करते रहेंगे और यह विचार करते रहेंगे की वैदिक युग अथवा पौराणिक युग ही स्वर्ण काल था तथा वर्तमान काल उस दृष्टिकोण से अच्छा नहीं है और भविष्य अंधकार में है, तो किसी भी प्रकार का विकास संभव न हो सकेगा। आज मनुष्य पूर्व के काल से अधिक समझदार और विकसित मस्तिष्क वाला है, यद्यपि नैतिक दृष्टि से उसका पतन भी हुआ है। विकास की प्रक्रिया निरंतर गतिशील है। इतिहास में यदि हमने बहुत अच्छी चीजों को ईजाद किया है, तो भविष्य में और भी अच्छी चीजें ईजाद हो सकती हैं इस बात पर हमें दृढ़ विश्वास रखना होगा।
प्रगतिशील विचारधारा एवं स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति ऐसे समाज को ही सदैव प्रश्रय देगा जो समानता की बात करता हो, जाति और धर्म के दायरे से ऊपर उठकर विश्व मानवता की महत्ता को समझता हो। वसुधैव कुटुंबकम की धारणा को सच्चे अर्थों में धारण करता हो। ऐसा व्यक्ति मानवीय समता का विरोधी कैसे हो सकता है? कोई समाज यदि मानवीय समता का विरोधी है तो यह समझ लेना चाहिए कि वह जाति, समाज अत्यधिक स्वार्थी और लोभी है और समाज में अपनी एकात्मकता या एक छत्र राज्य या स्वयं को सर्वोत्कृष्ट रूप में स्थापित रखना चाहता है। ऐसा कई बार दूसरों के हितों को कुचल कर ही कर पाना संभव है, जैसा कि अतीत में हुआ है।
          लेकिन आज हम वास्तव में एक स्वर्ण युग या एक समता के युग में जी रहे हैं, जहां प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति की आजादी के साथ-साथ अपना व्यवसाय चुनने की भी आजादी है। सभी को शिक्षा का अधिकार है। समाज में मुख्य धारा से हटे लोगों के लिए आरक्षण इत्यादि की सुविधा है। और कमजोर वर्ग के लिए प्राप्त यह सुविधा ही कुछ सुविधा संपन्न उच्च वर्णीय लोगों के लिए दुविधा का विषय बनी हुई है। जिसके जन्मदाता भी स्वयं उच्च वर्णीय लोग ही हैं ,जिन्होंने सदियों तक कुछ मनुष्यों को निम्न मानकर उनके साथ अमानवीय अत्याचार किये, आवश्यकता इस बात की थी कि वह सामूहिक रूप से उस समाज से क्षमा मांगे, जिनके साथ सदियों तक धर्म और जाति के नाम पर उत्पीड़न किया जाता रहा। न केवल यह इतिहास की बात है वरन हम वर्तमान में भी इसी प्रकार के प्रकरण रोज ही समाचार पत्रों इत्यादि में देखते हैं। वर्तमान युग में भी इस प्रकार के प्रकरण अति भयावह दिखाई पड़ते हैं।
        भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव समाज का एक कोढ़ है, जिसकी भयावहता को देखते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान में उनके लिए संरक्षण प्रदान किया तथा कुछ सुविधाएं भी प्रदान की ताकि वह समाज की मुख्य धारा में आ सकें। लेकिन सदियों से आततायी रही कौमों को शायद यह बर्दाश्त न हो सका। इसीलिए उच्च वर्णीय सुविधा संपन्न वर्ग सदैव आरक्षण का विरोध करता रहा। और साथ ही साथ जातिगत भेदभाव कायम रखा। संविधान निर्माता की विचारणा थी कि जैसे-जैसे समाज शिक्षित होगा वैसे-वैसे समाज में जातिगत विद्वेष इत्यादि समाप्त होता चला जाएगा और एक दिन मुख्य धारा से जुड़ने के साथ ही आरक्षण इत्यादि की व्यवस्था स्वत: ही समाप्त हो जाएगी। स्पष्ट है हमारे संविधान निर्माता आशावादी थे। क्योंकि विकास के क्रम में यह निश्चित परिणाम होना चाहिए था । किंतु समाज पुरानी रूढ़ियों से जकड़े रहने के कारण, द्रुत गति से अपनी यात्रा पूरी न कर सका। वर्तमान समाज भी जाति का दंश झेल रहा है। राजनीति समाज को वैचारिक विद्र्पता की तरफ ले जा रही है,  धर्म का एक असहिष्णु चेहरा दिखाया जा रहा है, जो कौम  सहिष्णुता की मिसाल हुआ करती थी, धर्म के नाम पर दूसरों की जान लेने पर आमादा हैं। समाज में सभी वर्गों को समान रूप से जीने की आजादी है ,समाज में रहकर मत्स्य न्याय का कानून नहीं चल सकता। इसीलिए संवैधानिक कानूनों की आवश्यकता होती है। कबीर दास और रविदास जैसे महान संतों ने समाज में सामाजिक समरसता लाने हेतु समता की भावना का रोपण किया। धार्मिक आडंबरवाद और उच्च वर्णीय समाज को निम्न वर्णों के साथ अत्याचार करने हेतु लताड़ा भी।
आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से समानता की लड़ाई सदियों से चली आ रही है, इसका कारण यही है कि समाज का एक वर्ग समाज के समस्त संसाधनों पर अपना एकाधिकार रखना चाहता है। किंतु प्रजातंत्र में जहां कानून समाज संरक्षक एवं हितैषी के रूप में कार्य करता है ,ऐसा कदापि संभव नहीं। जब सामाजिक समरसता , अवसर की समता, अभिव्यक्ति की आजादी व्यक्ति को अपना कार्य करने की आजादी इत्यादि की बात की जाती है तो धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक सभी प्रकार की स्वतंत्रता की बात होती है। क्योंकि धर्म ही वह आधार रहा है, जिसके कारण एक वर्ग दूसरे वर्ग से घृणा की भावना रखने लगा। धर्म तक पर व्यक्ति अपना आधिपत्य स्थापित करने लगा।  यह स्थिति विद्वानों, संतों और समाज सुधारकों से छुपी न रह सकी उन्होंने शीघ्र इसके लिए तार्किक रूप से लड़ाई लड़ना प्रारंभ कर दिया। जिन बातों को ईश्वर कृत कहकर जनमत को भ्रम में रखा जाता था, उनका विरोध कुछ तार्किक लोगों ने किया । उससे धर्म को महत्ता ही मिली, कूड़ा करकट छंटा और धर्म अपने शुद्ध रूप में प्रकट होने लगा। हमें याद हैं राजा राममोहन राय जिन्होंने स्त्री जाति के प्रति हो रहे धार्मिक अत्याचार और अनाचार को रोकने हेतु कई सारे कानून बनवाए। हमें याद हैं वे दयानंद सरस्वती जिन्होंने आर्य समाज की स्थापना इस विचार से प्रेरित होकर की कि वह सभी हिंदुओं को एक सूत्र में बांधना चाहते हैं ,जिसका आधार उन्होंने वेदों को बताया। जब मूलशंकर नामक एक बालक ने मंदिर में मूर्ति के ऊपर चूहा घूमता हुआ देखा तो उसके मन में प्रश्न उठा ,यदि एक मूर्ति स्वयं की रक्षा नहीं कर सकती तो वह हम मनुष्य की रक्षा भला कैसे करेगी?यहीं से उस बच्चे के अंदर एक महापुरुष का जन्म हुआ जिसने आगे चलकर आर्य समाज की स्थापना की। ऐसे समाज सुधारकों के प्रति सम्मान  होना चाहिए न कि उनसे विद्रोह करके उनको हानि पहुंचानी चाहिए। ऐसी विचारधाराएं समय-समय पर अंकुरित होती रही हैं और समाज के सड़े गले नियम कानून धार्मिक आडंबर इत्यादि को दूर करती रही हैं। गौतम बुद्ध के वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के पश्चात कबीर सरीखे  संतों ने धार्मिक और सामाजिक समानता की आवाज को बुलंद किया। उसके बाद आधुनिक समय में शिक्षा और कानून का सहारा लेकर वही लड़ाई डॉक्टर अंबेडकर ने लड़ी। यद्यपि डॉक्टर अंबेडकर उन सभी समाज सुधारकों से सबसे अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुए। क्योंकि उन्होंने इस समाज सुधार को एक ठोस आधार कानून के द्वारा प्रदान किया।
यह बात स्वेच्छा कि नहीं थी बल्कि अनिवार्य रूप से सामाजिक समरसता स्थापित करने की थी। महात्मा ज्योतिबा फूले को अपना गुरु मानने वाले डॉक्टर अंबेडकर ने एक ब्राह्मणवादी विचारधारा ,एक सवर्णवादी विचारधारा के खिलाफ यह लड़ाई लड़ी वह समाज में आज भी प्रचलित है। भारतीय संविधान दलितों एवं कमजोर वर्गों के लिए एक सुरक्षा चक्र की भांति है । इसके पश्चात भी आए दिन  सवर्णों द्वारा अवर्णों पर किए जा रहे अत्याचार को देख सकते हैं। जिसमें कमजोर और गरीब दलित और पिछड़ा वर्ग ही नहीं बल्कि उच्च पद पर आसीन दलित और पिछड़ा वर्ग के लोगों के साथ भी भेदभाव ,जातीय विद्वेष की घटनाएं घटित हो रही हैं। 
आजादी के इतने वर्षों बाद भी इस प्रकार की घटनाएं बताती हैं कि समाज में अभी द्रुत गति से समानता की भावना उत्पन्न नहीं हुई है और शिक्षा भी इस जाति विभेद की खाई को पाट नहीं सकी है। इस स्थिति में कुछ वर्ग आरक्षण को हटाने, एससी एसटी कानून को खत्म करने की बात करते हैं। यह वही लोग हैं जो किसी भी प्रगतिशील विचारधारा का सदैव विरोध करते हैं, यह वही देवदत्त हैं, जिन्होंने गौतम बुद्ध को पत्थर मारकर उनकी जान लेनी चाही, यह वही लोग हैं जिन्होंने सुकरात को जहर का प्याला पीने पर विवश कर दिया, यह वही लोग हैं, जिन्होंने संत मंसूर के हाथ और पैर काट डाले, यह वही लोग हैं, जिन्होंने सावित्रीबाई फूले पर बालिका स्कूल खोलने के कारण कीचड़ फेंका। 
इतिहास चाहे कैसा भी रहा हो लेकिन हम भविष्य को सुंदर, सुरक्षित और उज्ज्वल बना सकते हैं यह हम सबके हाथ में है। आज समाज को तोड़ने की नहीं बल्कि जोड़ने की जरूरत है, जो उत्पीड़ित लोग हैं उनको सहारा देने की आवश्यकता है,उनको स्वीकारने की आवश्यकता है। और स्वीकार करने का यही भाव एक नए भारत के उदय का साक्षी होगा। हमें एक दूसरे की मनोभावनाओं को समझना चाहिए और प्रगतिशील विचारों से स्वयं अपनी बुद्धि को उत्कृष्ट करना चाहिए तथ्यों को स्वीकार करना चाहिए,निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाते हुए किसी निर्णय पर पहुंचना बुद्धिमान व्यक्ति की पहचान है। केवल जातिगत विद्वेष के कारण डॉक्टर अंबेडकर या उनके लिखित संविधान का विरोध करना केवल एक घृणित मानसिकता का परिचायक है और कुछ नहीं।
डॉ. संदीप कुमार सचेत

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