अपने हिस्से की ज़िन्दगी

यह कहानी कक्षा 12 की छात्रा सोनिका की है, जो अपने भविष्य के बारे में बात करते हुए एक गहरी सच्चाई उजागर करती है—कि अधिकांश लड़कियाँ अपनी ज़िंदगी खुद के लिए नहीं जीतीं। वह अपनी माँ के अधूरे सपनों का उदाहरण देकर बताती है कि कैसे समाज, परिवार और “लोग क्या कहेंगे” के डर से महिलाएँ अपने सपनों को त्याग देती हैं। सोनिका यह संकल्प लेती है कि वह अपनी ज़िंदगी का कुछ हिस्सा अपने लिए भी जिएगी और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करती है।

Apr 13, 2026 - 11:20
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अपने हिस्से की ज़िन्दगी
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आज स्कूल में सामान्य दिनों से ज्यादा चहल-पहल थी। प्रार्थना के बाद अन्य कक्षाओं के बच्चे तो क्लास रूम में चले गए  पर कक्षा १२ के बच्चे वहीं रुके रहे। ऐसा लग रहा था जैसे वे इस स्कूल की एक-एक चीज को एक-एक बात को, एक-एक याद को अपनी आँखों अपने दिमाग में संजो लेना चाहते हो। तभी घंटी की आवाज़ से सबका ध्यान प्रधानाध्यापिका जी के रूम की तरफ चला गया। मांगी बाई आदेश लेकर आये कि सभी बच्चों को असेम्बली हॉल में जा कर बैठना है मैडम थोड़ी देर में आ रही है।
सभी बच्चे असेम्बली हॉल में पंहुच गए। थोड़ी देर में प्रधानाध्यापिका जी श्रीमती रेनू आ गई। उन्हें आता देख बच्चों की आवाज़े धीमी होती चली गयी। उनके आने के साथ बच्चे उनके स्वागत में खड़े हो गए। बच्चों को बैठने का इशारा कर वे भी उन्हीं के बीच में बैठ गयी। 
बच्चों से उनकी बातचीत की शुरुआत पेपर कैसे हुए? रिजल्ट कैसा रहेगा? से होती हुई बच्चों ने आगे क्या सोचा है? की तरफ मुड़ गयी। बच्चों ने अपनी-अपनी बात रखना शुरू किया कुछ का बी.एड करने का, कुछ ने बी.ए. कुछ ने अन्य कोर्स करने, कुछ ने एमबीए करने के बाद अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बांटने अथवा स्वयं का व्यवसाय शुरू करने के विषय में बताया तथा कुछ ने बी.ए करके शादी के निर्णय अथवा माता-पिता जो कहेंगे वह करने  के बारे में बताया। 
इस दौरान सोनिका की बहुत बार बारी आई, पर उसने हर बार ये कह कर टाल दिया कि वो बाद में बताएगी।
 परन्तु अब सब बच्चों की बारी आ चुकी थी, और सिर्फ वही बची थी उसने अपने आगामी जीवन के बारे में बताते हुए कहा- ‘मेम, मैं अपनी पढाई को इसी तरह आगे जारी रखना चाहती हूँ। मैं आरएएस ऑफिसर बनना चाहती हूँ इसलिए उसकी तैयारी भी साथ-साथ करुँगी। इसके साथ ही मैं अपनी ज़िन्दगी का कुछ हिस्सा अपने लिए भी जीना चाहती हूँ।’ सब ने उसकी इस बात पर उसे देखना शुरू कर दिया।
बच्चों में खुसर-पुसर शुरू हो गई मेम ने उन्हें
 शांत करते हुए सोनिका से कहा –
‘सोनिका सब लोग अपनी ज़िन्दगी अपने लिए ही जीते है। तुम्हारे ऐसा कहने के पीछे क्या वजह है? अपनी बात को स्पष्ट करों।’ सोनिका बोली-‘मेम ये हम सब की बहुत बड़ी गलतफहमी है विशेष तौर से लड़कियों की, कि वे अपनी ज़िन्दगी अपने लिए  जीती हैं। यहाँ आपने जब सबसे यह पूछा कि तुम क्या करना चाहती हो? सबके जवाब में कहीं घर वाले, कहीं  मम्मी पापा, कहीं बुजुर्गों की इच्छा तो कहीं उनसे जुड़े उनके परिजनों के सपने थे किसी ने भी यह नहीं कहा कि वो खुद से , खुद के लिए यह करना चाहता है या यह चाहती है। यहाँ तक कि शादी जैसे बड़े निर्णय में भी उनकी मंजूरी शामिल नहीं थी।’ सभी बच्चे विशेष तौर पर लड़कियां अपनी कही बात पर पुनः विचार करने लगी। 
रेनू मेम को उसकी बात काफी हद तक सही लगी, पर ना जाने क्यों उन्होंने फिर भी पूछ लिया – ‘क्या तुम्हे लगता है कि हम भी अपनी ज़िन्दगी खुद के लिए नही जीते?’ सोनिका बोली – ‘हाँ मेम,  मुझे माफ़ कीजियेगा लेकिन हकीक़त यही है कि लड़कों या पुरुषों को एक बार अपनी ज़िन्दगी अपने लिए जीने का मौका मिल जाता है लेकिन  अधिकांश लड़कियां या महिलायें अपनी ज़िन्दगी खुद के लिए नहीं जीती।’
अपनी बात को पूरा करते हुए उसने कहा ‘मैं आपको मेरी मदर का उदाहरण बताती हूँ। मेरी नानी ने मुझे बचपन में बताया था, कि मेरी मम्मी बहुत होशियार लड़की थी। वाकपटु होने के साथ बेहद समझदार और कला प्रतिभा की धनी। वे वकील बनना चाहती थी, डांसर बनना चाहती थी। लेकिन परिवार को लगता था कि वकालत का क्षेत्र लड़कियों के लिए उचित नहीं है और डांस अच्छे परिवार की लड़कियां नहीं करती। माता-पिता और परिवार की इज्जत ख़राब होती है। उन्होंने समझा-बुझाकर माँ से अपनी बात मनवा ली और परिवार की इज्जत की खातिर माँ भी बी.ए ,एम.ए करने के बाद शादी के लिए तैयार हो गई। शादी के बाद ससुराल में उन्होंने सोचा कि अब मैं वकालत तो नहीं कर पाऊँगी पर अपने डांसर बनने का सपना तो पूरा कर ही पाऊँगी। पर परिवार की सोच को जान कर अपने विचार को मन में ही दफ़न कर लिया। फिर बच्चे हो गए और उस के बाद तो वे गृहस्थी में इतना व्यस्त हो गई कि खुद को ही भूल गई तो फिर अपने सपने को याद रख पाना कहाँ मुमकिन था ?’  
‘पहले अभिभावक, फिर परिवार फिर बच्चों की खातिर जीना ही उनकी ज़िन्दगी का उद्देश्य बन गया। जब मुझ में समझदारी आई और मुझे माँ के सपने का पता चला तो मैंने उनसे कहा माँ चलो हम दोनों मिल कर डांस सीखते हैं।’ तो उनका कहना था-  ‘नहीं बेटा अब उम्र कहाँ रही? और लोग क्या कहेंगे?’  तब मैंने उनसे कहा-  ‘माँ मैं आपका सपना पूरा करुँगी मैं डांसर बनूँगी।’ तो उन्होंने मुझसे सिर्फ इतना कहा ‘बेटा तू मेरा सपना पूरा करने का माध्यम नहीं है तेरी अपनी ज़िन्दगी है तू अपनी ज़िन्दगी अपने अनुसार जी। मैं नहीं चाहती कि भविष्य में तुझे इस बात का अफ़सोस हो कि मैंने अपनी ज़िन्दगी तो जी ही नहीं।’
 
सोनिका की बात से सब की आँखे विचारवान हो उठी तभी सोनिका, मेम से बोली ‘मेम आप मेरे सवाल के बारे में जरुर सोचियेगा आप ज़िन्दगी जी रही है, पर क्या आपने अपने लिए थोड़ी से भी ज़िन्दगी जी है? ऐसी ज़िन्दगी जहाँ आपने अपने शौक, अपने जुनून को पूरा करने की दिशा में कोई कदम उठाया हो? क्या साधारणतः महिलाएं अपनी ज़िन्दगी का कुछ हिस्सा अपने लिए जी पाती है? कभी परिवार, कभी बच्चों के लिए और कभी लोग क्या कहेंगे? के डर से हम अपनी ज़िन्दगी अपने लिए ही नहीं जी पाती। मैं यह नहीं कहती कि दूसरों के लिए जीना गलत है, या आपको बिलकुल स्वार्थी होकर ही जीना चाहिए। परन्तु दूसरों के लिए जीते हुए अपने लिए भी जीना चाहिए। ताकि भविष्य में इस बात का  अपने मन में कोई मलाल नहीं रहे कि मैंने अपने मन का नहीं किया या अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। बस इसी मलाल से बचने के लिए मैं अपनी ज़िन्दगी का कुछ हिस्सा अपने लिए जीना चाहती हूँ। और मैं अपनी सभी सहेलियों से भी यही कहना चाहूंगी कि अपने लिए ,अपने बारे में भी सोचे और अपनी ज़िन्दगी को अपने अनुसार संवारने की, रूप देने की कोशिश करें।’ सोनिका की बात से वहां बैठी सभी लड़कियां विचारमग्न हो गई और रेनू मेम भी सोचने लगी कि उन्होंने भी अपनी ज़िन्दगी में समझौते किये है हर जगह दूसरों की खुशियों को खुद की खुशियों से ऊपर रखा है उनके मन में भी हमेशा यह मलाल रहा है कि यदि मुझे मौका मिलता या इतनी छूट होती तो मैं अपनी ज़िन्दगी से अपने लिए भी कुछ दिन चुरा पाती। पर अब वो ऐसा नहीं होने देंगी अभी समय बीता नहीं है वे भी अपने लिए  जीना शुरू करेगी और अपने बच्चों को भी यही कहेगी कि अपने लिए भी जीना जरुरी है। 
   संगीता दवे

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