न्याय और संवैधानिक संरक्षण की दरकार है हिंदी को

यह आलेख भारतीय संविधान, न्याय व्यवस्था और कानूनी शिक्षा में हिंदी भाषा की स्थिति, संभावनाओं और चुनौतियों का विश्लेषण करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी संघ की राजभाषा है, किंतु न्यायपालिका और विधिक शिक्षा में आज भी अंग्रेजी का व्यापक वर्चस्व बना हुआ है। लेख में हिंदी को न्यायिक भाषा के रूप में स्थापित करने, कानूनी शब्दावली के विकास तथा न्यायालयों में भारतीय भाषाओं के प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया गया है। साथ ही यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि हिंदी में राष्ट्रभाषा बनने की पूर्ण क्षमता है और इसके संवैधानिक संरक्षण तथा व्यापक प्रयोग की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए।

May 15, 2026 - 16:18
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न्याय और संवैधानिक संरक्षण की दरकार है हिंदी को
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किसी भी देश का संविधान और कानून वहां के नागरिकों के लिए सर्वोपरि और सर्वमान्य होता है। हमें हमारी बात संविधान और कानून के दायरे में रहकर ही कहनी होती है और अभिव्यक्ति के इस उल्लंघन को अपराध और सजा की श्रेणी में माना गया है।
भारत में जब-जब हिंदी को राष्ट्रभाषा और सर्वमान्य भाषा बनाने की बात की जाती है तब-तब भाषाई विवाद गहरा जाता है और खासकर महाराष्ट्र एवं दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों से हिंदी के विरोध के स्वर मुखर हो जाते हैं। जबकि हिंदी जैसी सरल,सहज,सुगम और माधुर्य की भाषा भारत तो क्या समूचे विश्व में नहीं है और विश्व में तीसरे स्थान पर सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा भी है हिंदी। भारत की सर्वमान्य भाषा बनने का सामर्थ्य केवल और केवल हिंदी भाषा में ही है, किसी अन्य भाषा में नहीं है और गुलामी की भाषा अंग्रेजी तो हमारी राष्ट्रभाषा तो कतई नहीं हो सकती है। यह अलग बात है कि हमें हमारी मातृभाषा में अपनी बात कहने का संवैधानिक अधिकार प्रदत्त है।
भारतीय संविधान और हिंदी
भारतीय संविधान को डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा में ही लिखा गया था। हालांकि इसे बाद में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवादित किया गया। भारत का संविधान २६ जनवरी,१९५० को लागू हुआ। वैसे भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। अनुच्छेद ३४३(१) के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। भारतीय संविधान के अनुसार संसद का कार्य हिंदी या अंग्रेजी में ही किया जा सकता है लेकिन विशेष परिस्थितियों में अपनी मातृभाषा में भी बोलने की अनुमति अध्यक्ष द्वारा दी जा सकती है।

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भारतीय न्याय प्रणाली में हिंदी
भारतीय न्याय व्यवस्था में धीरे-धीरे हिंदी का चलन बढ़ा है किंतु इसे नकारा नहीं जा सकता है कि अभी भी अंग्रेजी का वर्चस्व, प्रभुत्व और एकाधिकार है। सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय में शत-प्रतिशत कार्य अंग्रेजी में ही किया जाता है लेकिन जिला न्यायालय में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग किया जाता है। किंतु हिंदी भाषियों के लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि अधीनस्थ न्यायालय के न्यायाधीश को अपनी पदोन्नति हेतु आज भी अपने आदेश (जजमेंट) का कुछ प्रतिशत भाग अंग्रेजी भाषा में ही लिखना होता है।
कानूनी शिक्षा और हिंदी

कानूनी शिक्षा में भी अंग्रेजी भाषा का ही बहुतायत उपयोग किया जाता है किंतु हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी कानूनी शिक्षा प्राप्त करने का प्रावधान है। उत्तर भारत में तो अधीनस्थ न्यायालयों में अभिभाषकों द्वारा हिंदी भाषा में ही बहस (जिरह) की जाती है। यहां तक कि जज (न्यायाधीश) द्वारा बेंच को ठोंककर जो शब्द बारम्बार दोहराया जाता है, `ऑर्डर...ऑर्डर' वह भी अंग्रेजी भाषा का ही है और तो और गुलामी मानसिकता वाले शब्द, मुल्तवी, करारनामा, दरखास्त, मौका मुआयना, चश्मदीदगवाह, रोजनामचा, जिरह, हुक्मनामा, वारिस, हर्जाना, मुजरिम, इस्तगासा, इजरा, देहातीनालसी, तलबी, तलब, मुचलका, हलफनामा, हुलिया, बरी, मुलजिम, मुलाजिम, तलबाना आज भी कोर्ट की दैनंदिनी भाषा में उपयोग में लाए जाते हैं। हम इन्हें जबरिया क्यों ढो रहे हैं,यह समझ से परे हैं। इनके स्थान पर हमें भारतीय संस्कृति में रचे-बसे हिंदी शब्दों को उपयोग में लाया जाना चाहिए। भारत के कानून मंत्री,भारत के प्रधान न्यायाधीश और माननीय प्रधानमंत्री जी को गंभीरता से इस पर विचार करना चाहिए।

हिंदी में व्यापक कानूनी शब्दावली तैयार किए जाने की नितांत जरूरत है जिससे कि भारतीय न्याय व्यवस्था में हिंदी का हस्तक्षेप (दखल) अधिकाधिक बढ़ सकें और हिंदी राजभाषा के पथ से राष्ट्रभाषा के व्यापक फलक की ओर बढ़ सकें। वैसे भारतीय न्याय व्यवस्था में हिंदी के व्यापक उपयोग को हमें एक चुनौती (चैलेंज) के रूप में स्वीकार करना ही होगा तभी हिंदी विश्व की अग्रणी भाषा बनने की ओर अग्रसर हो सकेंगी। वास्तव में हिंदी को आज न्याय की दरकार तो है ही साथ ही इसे संवैधानिक संरक्षण की भी आवश्यकता है।

नलिन खोईवाल 

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