नेतृत्व का मौन पाठ

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Oct 9, 2026 - 16:34
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नेतृत्व का मौन पाठ
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सभागार की बत्तियाँ धीमी करके मंच पर एक स्पॉटलाइट डाली जा रही थी। फूलों की महक हवा में तैरती हुई पीछे तक आ रही थी और सामने की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था-ङ्खराज्य कर विभाग, सेवानिवृत्त अधिकारी संघ, वार्षिक अधिवेशन।ङ्ग तालियों की गूँज अभी थमी नहीं थी कि मंच संचालक ने माइक की ओर झुककर अगला नाम पुकारा-ङ्खश्री आनन्द शंकर लाल जी।ङ्ग पूरा हॉल एक बार फिर खड़ा हो गया, कुर्सियों के सरकने की आवाज़ें एक साथ गूँज उठीं।
लाल साहब धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़े। उनका चाल-ढाल आज भी वैसा ही संयत था, जैसा तीस साल पहले हुआ करता था-न जल्दबाज़ी, न प्रदर्शन, बस एक शालीन गरिमा, जो उम्र के साथ और गहरी हो गई थी। सफ़ेद कुर्ते पर हल्के भूरे रंग की शॉल, चेहरे पर वही स्थिर मुस्कान और चलने का वही ठहराव, जिसे मैंने बरसों पहले उनके दफ़्तर में महसूस किया था। माला पहनाई गई, फूल भेंट किए गए और जब वे धन्यवाद के दो शब्द कहने माइक के पास आए, तो उनकी आवाज़ में वही पुरानी नरमी थी, जैसे समय ने उसमें कुछ भी नहीं बदला हो।
मैं पीछे की पंक्ति में बैठा उन्हें देख रहा था, तालियाँ बजा रहा था औरों के साथ, पर भीतर-ही-भीतर कहीं और था।
नवनियुक्त बिक्री कर अधिकारियों को फील्ड-प्रशिक्षण के लिए किसी खण्ड में अतिरिक्त अधिकारी के रूप में तैनात किया जाता था। पूरा प्रदेश व्यापारिक गतिविधियों के घनत्व के अनुसार खण्डों में बँटा था-किसी सामान्य ज़िले में दो-तीन खण्ड, किसी महानगर में दस के आसपास। हमारा मूल काम था व्यापारियों के वार्षिक टर्नओवर के आधार पर बिक्री कर का असेसमेंट करना और अतिरिक्त अधिकारी को सीखने के लिए कुछ केस अलग से सौंप दिए जाते थे, ताकि वह ख़ुद फ़ाइल देखे, बही-खातों की जाँच करे और अपने वरिष्ठ की निगरानी में निर्णय लेना सीखे।
मुझे भी वहीं, लाल साहब के मातहत, प्रशिक्षण पर भेजा गया था। पर मेरे स्टेनो को पूरे एक महीने तक अपना टाइपराइटर नहीं मिला। पुरानी मशीन कहीं मरम्मत के लिए भेजी गई थी और नई अभी आई नहीं थी। महीने के अन्त में मैं लाल साहब के पास गया और सारी परेशानी उन्हें बता दी-टाइपराइटर की कमी, स्टेनो की मजबूरी, फ़ाइलों का ढेर, जो टाइप होने के इन्तज़ार में मेज़ पर जमा होता जा रहा था। उन्होंने ध्यान से सुना और बड़ी सहजता से कहा-ङ्खचिन्ता मत करो, मैं आज ही ऊपर लिख देता हूँ, जल्द ही टाइपराइटर दिलवा दूँगा।ङ्ग
अगले दिन दफ़्तर पहुँचा तो मेज़ पर उनका एक पत्र रखा था-कोटा पूरा न होने पर नाराज़गी जताते हुए, शीघ्र काम पूरा करने का सख़्त निर्देश। कल ही तो उन्होंने ख़ुद सुना था, ख़ुद आश्वासन दिया था-और आज यह पत्र? हाथ काँप उठे। गुस्सा इतना चढ़ा कि विवेक कहीं पीछे छूट गया। मैंने उसी वक़्त क़लम उठाई और जवाब लिखने बैठ गया-कि मैं मिलकर सारी परेशानियाँ स्वयं बताऊँगा-और साथ में कुछ और भी, कुछ तीखे, कुछ उलटे-सीधे शब्द, जो शायद न लिखे होते तो बेहतर होता। कुछ ही दिनों बाद मेरी भी तैनाती एक अन्य ज़िले में खण्ड अधिकारी के पद पर हो गई-पहली स्वतन्त्र ज़िम्मेदारी, अपना दफ़्तर, अपने मातहत। और संयोग ऐसा कि वह ज़िला उन्हीं लाल साहब के अधीन आता था।
अगले दिन समय लेकर मैं उनके कार्यालय पहुँचा। कमरे में घुसते ही देखा, वे किसी फ़ाइल में व्यस्त थे। आख़िर उन्होंने फ़ाइल बन्द की, चश्मा उतारा, आँखें मलीं और मेरी ओर देखा। चेहरे पर वही पुरानी, सौम्य मुस्कान थी, जैसे बीच के दो साल कभी हुए ही न हों।
ङ्खऔर कैसे आना हुआ, आशुतोष जी?ङ्ग उन्होंने पूछा। मैंने कुछ सामान्य-सा उत्तर दिया।
इसी बीच दरवाज़े पर किसी ने ज़ोर से दस्तक दी। लाल साहब ने बिना किसी झुँझलाहट के कहा, “आ जाओ।” 
एक कर्मचारी भीतर आया, तेज़ क़दमों से, और आते ही ऊँची आवाज़ में बोलना शुरू कर दिया-ङ्खसर, मुझे दो दिन की छुट्टी चाहिए।ङ्ग स्वर में एक अजीब-सी तेज़ी थी, जैसे बात कम, आवेश ज़्यादा हो, जैसे शब्द नहीं, बल्कि कोई भीतरी दबाव बाहर निकल रहा हो। लाल साहब ने उसकी ओर देखा-पल भर को उनकी नज़र उसके चेहरे पर टिकी, फिर बिना किसी हिचक के इजाज़त दे दी।
“ठीक है, जाओ।”
पर वह कर्मचारी टस से मस नहीं हुआ। कमरे के बीचों-बीच खड़ा रहा, पैर थोड़े फैलाकर, हाथ हवा में लहराते हुए और बोलता चला गया-ङ्खमैं आपसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा हूँ, सर।ङ्ग
मुझसे और नहीं रहा गया। मैं कुर्सी से उठ खड़ा हुआ, पर लाल साहब ने हाथ के हल्के-से इशारे से मुझे रोक दिया-ङ्खबैठो, शान्त रहो।ङ्ग
वह कर्मचारी अपनी बात कहकर, बिना किसी और प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए, कमरे से बाहर निकल गया।

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“अच्छा,अब बताओ, उन्होंने पूछा, कुर्सी पर थोड़ा पीछे टिककर, ङ्खआने का कारण क्या था?
मैं उस क्षण किसी शिकायत के मूड में नहीं रह गया था। मन उसी दृश्य में अटका था, जो अभी-अभी घटा था, उस अजीब शान्ति में, जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था। तभी उन्होंने ख़ुद ही बात आगे बढ़ाई-ङ्खमैं भी तुम्हें बुलाने ही वाला था।ङ्ग
और फिर, बातों-बातों में, बिना किसी भूमिका के, उन्होंने वह पुराना पत्र छेड़ दिया, जैसे कोई पुरानी फ़ाइल फिर से खोल रहे हों।
ङ्खतुम्हारे जवाब को पढ़कर मुझे दुख हुआ था,ङ्ग उन्होंने कहा। स्वर में कोई शिकायत नहीं, बस एक सहज स्वीकृति, ङ्खपर मैंने उस वक़्त तुम्हें बुलाना ठीक नहीं समझा। नई उम्र में, नौकरी की शुरुआत में, परिपक्वता कम रहती है-ऐसे पत्र-व्यवहार रूटीन कामकाज का हिस्सा होते हैं, आशुतोष। इनका एक सीधा, सकारात्मक जवाब ही काफ़ी होता है। बस इतना कि ‘निर्देश का पालन किया जाएगा’, और बात वहीं समाप्त।
मैंने हिम्मत करके उस कर्मचारी के व्यवहार की बात छेड़ दी। लाल साहब मुस्कराए।
वह बहुत मेहनती और जानकार आदमी है,उन्होंने कहा, ङ्खपर मानसिक रूप से थोड़ा अस्वस्थ है। इस तरह के दौरे उसे पड़ते रहते हैं। पहले महीने में दो-तीन बार आते थे, अब दो महीने में एक बार।
आप उसकी देखभाल करते हैं? मैंने पूछा। अब मेरी आवाज़ में वह पुराना आवेश नहीं था, बल्कि एक सच्ची जिज्ञासा थी।
सरकारी इलाज तो चल ही रहा है,उन्होंने कहा, ङ्खपर मैं ख़ुद भी उसे दवा देता हूँ-होम्योपैथी में मेरी थोड़ी दिलचस्पी है, कुछ पढ़ता रहता हूँ और एक होम्योपैथिक चिकित्सक से भी बात कर लेता हूँ। फ़ोन पर उसे लक्षण बता देता हूँ।
होम्योपैथी में उन्होंने आगे कहा, ङ्खमैं उसके चेहरे के भाव देख रहा था, उसकी आँखों में क्या था, उसके हाथ कैसे हिल रहे थे। अब उसी के आधार पर उस चिकित्सक से बात करके इसकी खुराक तय करूँगा।ङ्ग
यह कहकर वे फिर मुस्करा दिए-वही मुस्कान, जो पूरी मुलाक़ात भर उनके चेहरे से हटी ही नहीं थी, जैसे यह मुस्कान उनके स्वभाव का हिस्सा हो, कोई बनावट नहीं।
जिस कमरे में मैं तबादले का बहाना ढूँढ़ने आया था, वहाँ से मैं एक ऐसा पाठ लेकर निकला, जिसका मोल मुझे बरसों बाद, अपनी ख़ुद की कुर्सी पर बैठकर, ख़ुद अधीनस्थों से जूझते हुए समझ में आया-कि अधिकार जितना बड़ा हो, धैर्य उतना ही बड़ा माँगता है; कि हर ऊँची आवाज़ के पीछे कोई कहानी छिपी होती है, जिसे समझे बिना निर्णय लेना अन्याय है; और जो आदमी दूसरों के आवेश के पीछे झाँकना जानता है, अपने ग़ुस्से को थामकर दूसरे के दर्द को देखना जानता है, वही असल में नेतृत्व करता है। 

अरविन्द कुमार सिंह

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