स्वतंत्रता के सानिध्य से मुखरित राष्ट्रीयता का धर्म

यह लेख स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय चरित्र, आत्म-जागृति, ईमानदारी और नागरिक कर्तव्यों के महत्व पर केंद्रित है। इसमें स्वतंत्रता की वास्तविक सार्थकता, राष्ट्रहित के प्रति सजगता, त्याग और बलिदान का सम्मान, मानसिक गुलामी से मुक्ति तथा साधन और साध्य की पवित्रता के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। लेख भारतीय संस्कृति के “सर्वे भवन्तु सुखिनः”, “वसुधैव कुटुंबकम्” और “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” जैसे आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में अपनाने का संदेश देता है।

Oct 7, 2026 - 13:22
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स्वतंत्रता के सानिध्य से मुखरित राष्ट्रीयता का धर्म
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[स्वर्ण पदक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सहस्राब्दी पुरस्कार–संयुक्त राष्ट्र संघ। अंतरराष्ट्रीय ध्यान एवं मानवतावादी चिंतक और मनोविज्ञान सलाहकार प्रमुख–विश्व हिंदी महासभा, अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष–विश्व हिंदी महासभा; अखिल भारतीय हिंदी महासभा–समन्वय, एकता एवं विकास–नई दिल्ली–भारत।] स्वतंत्रता के सानिध्य से मुखरित राष्ट्रीयता के नैसर्गिक धर्म ने ईमानदारी और पवित्रता को अंतःकरण की ध्वनि के रूप में स्वीकार करने की शक्ति प्रदान कर दी है, जो मेरे विशाल हृदय में सबलता के साथ राष्ट्रीय अपेक्षाओं को पूर्ण करने में दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ सदा के लिए स्थिर हो जाएगी। इस सत्य की स्वीकारोक्ति के पश्चात् कि-'ईमानदारी से परिपूर्ण पवित्र मनुष्य आत्मा उच्च कोटि के चरित्र की गरिमा का श्रेष्ठतम प्रतीक और उज्ज्वल प्रतिबिंब है'-और उसे स्वतंत्रता का सानिध्य भी प्राप्त है, तो यह पूर्णतया मान लिया जाना चाहिए कि वह राष्ट्रीय चरित्र की मूल भावना से न केवल परिचित, अपितु जीवन संग्राम में भी संपूर्ण पारदर्शिता को आत्मसात् कर चुका होगा।ठ 


राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में स्वयं की महत्वपूर्ण भूमिका:

स्वयं के मूल्यांकन के संदर्भित प्रसंग में अंतःकरण की ध्वनि के प्रति सजग मानवीय वृत्ति कहीं न कहीं से यह अवबोध व्यक्ति को अवश्य करा देती होगी कि आख़िर राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में स्वयं की अति महत्वपूर्ण संवेदनशील भूमिका क्या है? क्योंकि यक्ष प्रश्नों से बेखबर मन के लिए यही सर्वाधिक उपयुक्त खुराक भी है। मानसिक संकीर्णता से युक्त विविध व्यथित हृदयों की दास्तान सुनने का अर्थ यह हो जाना चाहिए कि हमारी समझ का विकसित स्वरूप गुलामी से मुक्त अभी नहीं हुआ है, और यदि ऐसी ही अनुभूति के मध्य अपनी उपस्थिति को हमने दर्ज करा भी रखा है, तो कम से कम आज—'स्वाधीनता की शक्ति-संपन्नता के पावन' अवसर पर—इस व्याधि से मुक्त होने का दृढ़ संकल्प करना स्वयं के जीवन का अति महत्वपूर्ण कार्य है, जिसे किसी भी स्थिति में संपूर्णता के स्वरूप तक पहुँचाना आवश्यक है। 


राष्ट्रीयता का नैतिक धर्म निभाने में सजगतापूर्ण दृष्टिकोण:

स्वतंत्रता के सानिध्य से मुखरित राष्ट्रीयता का धर्म निभाने के प्रति अनजान बनने की विवशताएँ जब हमारे अस्तित्व को ही संपूर्ण रूप से नेस्तनाबूद कर देंगी, उस समय क्या हम इस क़ाबिल रह पाएँगे कि राष्ट्राद्रोह का पश्चाताप भी कर सकें? राष्ट्रीय अपेक्षाओं पर कुठाराघात करने की परिणति जब हमें स्वयं की नज़रों से ही बेदखल कर देगी, तब अभिशप्त मानव जाति का बोझ क्या यह 'पवित्र राष्ट्र' और उसका उज्ज्वल चरित्र वास्तविक स्वरूप में सहन कर पाएगा? केवल दृढ़ प्रतिज्ञा के आत्मबल को जीवन में धारण करके ही, जीवन की व्यावहारिक स्थितियों में क्रियान्वयन की अनुभूति के साथ परिवर्तन के अंतर्द्वंद्व से मुक्त होकर ही राष्ट्रीयता के पथ का अनुगमन किया जा सकता है। सत्य के प्रति संवेदनशीलता का समावेश कहीं न कहीं हमारे व्यवहार में झलकता रहे, इसकी तमाम कोशिशें मानव जाति के द्वारा की जाती हैं; परन्तु वास्तविकता के मुखर होने पर 'लोमहर्षक घटनाओं' का खुलासा कहीं से कहीं तक भी व्यक्ति और उसके कृत्य को जोड़ने में सहायक नहीं हो पाता है।


ठझंडा ऊँचा रहे हमाराठ का उत्तरदायित्वपूर्ण गरिमामयी उद्घोष:


जीवन के विशाल प्रांगण में अंतःकरण की ध्वनि को झुठलाने का ख़ामियाज़ा भुगतने के बावजूद भी मन की आँखें यदि नम नहीं हों, तो-ठझंडा ऊँचा रहे हमारा...ठ-का उत्तरदायित्वपूर्ण उद्घोष भला क्यों और किसके लिए हम कर रहे हैं? केवल नारेबाज़ी के साथ नगाड़े बजाने की परंपरा को टूटे हुए कंधों पर ढोने का नाटक, विरासत में मिली स्वतंत्रता को छलने का षड्यंत्र, हमारे द्वारा आख़िर कब तक किया जाता रहेगा? स्वयं के चरित्र से खिलवाड़ करने की दीर्घकालीन प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने में विवश 'हम भारत के लोग' क्या राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण की उज्ज्वलताओं की ओर अपने लड़खड़ाते कदमों के साथ बढ़ सकेंगे? यक्ष प्रश्नों से बेखबर 'मन' स्वतंत्रता के बोध को कुछ समय के लिए हृदय में संजोता तो है, लेकिन स्वार्थ की मलिनता के कारण स्वयं को अपनी इंद्रियों का गुलाम समझ पुनः वह स्वच्छंदतायुक्त वातावरण में प्रवेश कर जाता है। राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में 'स्वयं' की आहुति का दृढ़ चरित्र ही कर्तव्यान्मुखी भूमिका के निर्वहन का स्वप्न पूर्ण कर सकता है।
 स्वतंत्रता के स्वर्णिम प्रकाश में आत्म-जागृति का स्वरूप: 


मानवीय दृष्टिकोण के सबल पक्षों को समझ लेने के पश्चात् यह सहज ही ज्ञात हो जाता है कि जो लोग अभी तक 'मानसिक संकीर्णता' की व्याधि से ग्रसित हैं और अपनी आत्मा को गिरवी रखकर गोरखधंधे में गुप्त रूप से लगे हुए हैं, उनकी सुप्त आत्मा को 'स्वर्णिम प्रकाश' के माध्यम से ही जाग्रत किया जा सकता है। इन व्यथित हृदयों की दास्तान को निरंतर रूप से श्रवण करने के बजाय उन्हें संपूर्ण रूप से 'स्वाधीनता की शक्ति-संपन्नता' से परिचित कराने की आज आवश्यकता है, जिससे स्वयं के परिवर्तन के लिए आत्म-जगत को सक्षम बनाया जा सके। किसी भी कीमत पर संकुचित दायरे की दुःखद एवं दोषारोपित करने वाली शैली को समर्थन देने की भूल करने का दुस्साहस ही व्यक्ति के विनाश का प्रायः कारक बन जाता है और 'राष्ट्रीय हितों' को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न स्थितियों के अंतर्गत क्षति पहुँचाते हुए आहत करता रहता है।


राष्ट्रीय चरित्र के गरिमामयी भावार्थ की यथार्थता का सानिध्य:


राष्ट्रीय चेतना के विकास हेतु स्वतंत्र राष्ट्र द्वारा निरंतर रूप से की जाने वाली सात्विकता से युक्त सकारात्मक पहल और उन पर अमल करने की अपेक्षा का आशय यह लगाया जा सकता है कि शायद हम अभी तक स्वतंत्र हुए ही नहीं हैं, क्योंकि स्वतंत्रता की रक्षा में पूर्णतः सफल न हो पाने के कारण ही तो हम आज आंतरिक स्वरूप के अंतर्गत कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में घायल राष्ट्र का प्रतीक बनकर रह गए हैं। अपनी मनःस्थिति की सुदृढ़ता और उसमें उत्साह के संचार हेतु जब तक राष्ट्रीय चरित्र के गरिमामयी भावार्थ को यथार्थता के सानिध्य में हमारी आत्मा में समाविष्ट करके उसे व्यावहारिक स्वरूप में जीवन की कर्म-कहानी में प्रत्यारोपित नहीं किया जाएगा, तब तक राष्ट्रीयता के प्रति हमारी आस्था संदिग्ध ही बनी रहेगी।

मानसिक गुलामी के दीर्घकालीन दौर से मुक्त होने की स्थितियाँ:

स्वतंत्र राष्ट्र में रहते हुए जहाँ एक नागरिक बोध के कर्तव्यों से संबंधित समग्र विकास की ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते हुए श्रेष्ठ नागरिक की भूमिका निभाने के बजाय राष्ट्र-धर्म से विमुख हो जाने की विवशताएँ क्या हमारे अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाती हैं? जहाँ पर केवल देशद्रोही का अपराध ही सिद्ध होता है। आख़िर कब तक अपनी आत्मा की आवाज़ का ख़ून करके-ठबड़े भाग मानुष तन पावा...ठ-के स्वर्णिम चरित्र को लज्जित कराने का घृणित खेल हमारे द्वारा जारी रहेगा? राष्ट्र-रक्षा हेतु सुप्त संवेदनाओं की जागृति के लिए कितने और स्वतंत्रता दिवसों की स्मृतियाँ चाहिए, जिससे कि मानसिक गुलामी के दीर्घकालीन दौर से मुक्त हुआ जा सके? कर्तव्यों एवं दायित्वों का बोध कराने वाले आदर्श के सम्मुख नतमस्तक होने की प्रचलित शैली में राष्ट्रहित हेतु युगांतरकारी परिवर्तन करने की आज व्यावहारिक स्वरूप में आवश्यकता है। 


त्याग और बलिदान को आत्मसात् करने की व्यावहारिकता:

राष्ट्र के लिए पूर्णतः समर्पित राष्ट्र के रक्षकों के प्रति नैसर्गिक स्वरूप में सम्मान का दृष्टिकोण अपनाते हुए उनके त्याग और बलिदान को व्यर्थ न जाने देने की दृढ़ता को आत्मसात् करने की व्यावहारिक शैली को अपनाना होगा, तभी भविष्य के गर्भ में स्वयं का अस्तित्व संपूर्ण रूप से सुरक्षित और संरक्षित रह सकेगा। किसी भी स्तर पर जाकर जीवित रहने का विकृत स्वरूप अपना लेने की कौन सी बाध्यता किसी स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक के सामने आ जाती है कि वह राष्ट्र को अपमानित करने का दुस्साहस कर बैठता है? जीवन में अनजान बनने का ढोंग मानव जाति को शर्मसार कर अपने अस्तित्व को ही कोसने पर आख़िर क्यों विवश कर देता है, जिसकी परिणति केवल विनाश है, क्योंकि इसमें आत्मीय पश्चाताप की तनिक भी गुंजाइश किसी भी स्थिति में नहीं होती है। 

राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में साधन और साध्य की पवित्रता: 

राष्ट्रीय अपेक्षाओं पर खरा न उतरने का ख़ामियाज़ा जब 'स्वयं की नज़रों में गिर जाने की भयावह स्थिति' के रूप में प्रकट होता है, तो यह अभिशाप झेलती पीढ़ी राष्ट्र के लिए एक अनावश्यक दायित्व बनकर रह जाती है। स्वतंत्र राष्ट्र में रहते हुए अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों का बोध और उसे क्रियान्वित करने की पहल हेतु समर्पण की आवश्यकता क्या आज भी समझने और समझाने की विषय-वस्तु रह गई है? राष्ट्रीय हितों का आदर्श ध्यान में रखते हुए विकासात्मक परिवेश और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में जब तक 'साधन और साध्य की पवित्रता' को अक्षुण्ण रखते हुए व्यावहारिक प्रयास नहीं किए जाएँगे, तब तक 'व्यथित लोक और कथित विकास' की व्यथा और उसकी कथा को हमारा राष्ट्र सहता रहेगा। हम क्या थे और क्या हैं, इसका स्पष्टीकरण देने की आज आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि कथनी एवं करनी के दीर्घ अंतराल ने पारदर्शिता के इस युग में सब कुछ स्पष्ट कर दिया है। 

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वीर राष्ट्र 'भारत भूमि' द्वारा क्षमा रूप आभूषण का प्रयोग: 

विश्वास का इतिहास इस बात का मुख्य गवाह है कि राष्ट्रीय अपेक्षाओं के साथ किस तरह उपेक्षाओं का कुठाराघात किया गया तथा पवित्र राष्ट्र और उसके उज्ज्वल चरित्र ने इस दंश की पीड़ा को किस प्रकार झेला है, इसके प्रमाणीकरण की आवश्यकता अब नहीं रह गई है। एक वीर राष्ट्र के स्वरूप में भारत भूमि द्वारा 'क्षमा' को अपना आभूषण स्वीकार करते हुए दानवीय एवं मानवीय संस्कृति के मध्य आख़िर कब तक संतुलन स्थापित रखा जा सकेगा? क्योंकि भारतीय संस्कृति का अतीत जब-ठसर्वे भवन्तु सुखिनः...ठ-के उद्घोष को संपूर्ण जगत के समक्ष प्रकट करता है, तब विश्व की समस्त मानवता यह प्रश्न करती है कि ठसर्वधर्म समभाव...ठ के साथ ठबहुजन हिताय, बहुजन सुखाय...ठ के स्वप्न को धरा पर स्थापित करने का व्यवहार ही जब क्रियान्वित नहीं हो सका, तो कैसे इस राष्ट्र के लोगों अर्थात् जनमानस के द्वारा यह अपेक्षा की जा सकती है कि उनके द्वारा-ठवसुधैव कुटुंबकम्...ठ-के समग्र वटवृक्ष की भाँति विशालतम एवं विराटतम सिद्धांत को स्वीकार करके, व्यावहारिक जगत में अंतरमन से आत्मसात् करके उसे क्रियान्वित भी किया जा सकेगा?
जय हिंद! भारत माता की जय...। 

 डॉ. अजय शुक्ल

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