गुलाब के वो सूखे पत्ते

कुछ देर मैंने सोचा फिर कपड़े बदलने के लिए अपने कमरे में गया । कमरे का सारा हुलिया बदला हुआ था । सारा सामान करीने से सजा हुआ । कपड़े तह कर रखे हुए । सारी किताबें दराज में रखे हुए । सारी खिड़कियां दरवाजे साफ सुथरे । टेबल पर एक डायरी रखी हुई थी  सुनहरे रंग के चमकीले कागज में लिपटी हुई । उठाकर देखा तो गुलाब का फूल रखा हुआ था उसके अंदर । जो सुख कर गहरे काले रंग का हो चुका था । उसकी पत्तियां कब का मुरझा कर सूख चुकी थी । गुलाब के वो सूखे पत्ते कुछ और ही कहानी कह रहे थे ।हमारी अधूरी और छोटी सी अनोखी प्रेम कहानी की दास्तान । कुछ तो बात थी उस दीक्षा में कि मैं आज खींचा चला आया था । जब से उसने मुझे चाहने की बात सामने रखी थी थोड़ी देर के लिए असहज जरूर हो गया था पर एक अनजानी चाह मुझे उसकी ओर हमेशा से खींचती रही थी । एक अनजानी डोर मुझे अपनी ओर खींचती थी जिसे मैं सहज ही इन दिनों महसूस कर रहा था । क्या मैं भी दीक्षा को पसंद करने लगा था । ये एक बड़ा सवाल था । मेरे अंदर एक घमासान चल रहा था । वह एक बच्ची थी बस पंद्रह सोलह साल की । पर क्या किया जाए उसके पास समय भी तो कम था । शायद इसी पंद्रह सोलह साल की उम्र में ही  उसकी पूरी जिंदगी ऊपरवाले ने लिख दी थी । इस कारण मैं मजबूर था या उसकी चाहत के आगे विवश था ये मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा था। एक बात जरूर थी कि मैं भी अब उसे पसंद करने लगा था । किसी के हृदय के अंदर जिस भावना को प्रेम कहते है उसका बीजारोपण मेरे दिल मे दीक्षा के प्रति फौज में जाने के बाद ही हो गया था । पर मैं अब भी सच्चाई से भागना चाहता था । 

Nov 13, 2023 - 17:40
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गुलाब के वो सूखे पत्ते
those dried rose leaves

दीवाली की तैयारी जोर शोर से चल रही थी । मैं साफ सफाई में लगी हुई थी । मेरी छोटी ननद शगुन मेरा हाथ बंटा रही थी । मैं स्टूल में खड़ी होकर खिड़की और रौशनदान में लगे धूल और मकड़ियों के जाल साफ कर रही थी। तभी मेरी नजर अलमारी के ऊपर रखी एक छोटी सी डायरी पर पड़ी । जिसके ऊपर कई सारे किताब और अन्य सामान रखे थे । मेरी नजर उस डायरी पर ही क्यों पड़ी इसका भी एक कारण था । उसे एक चमकीले कगज से लपेट कर रखा गया था । मैंने शगुन से नजर बचाकर उस डायरी को अपनी आँचल में छिपा लिया और बहाना बना कर अपने बेडरूम में चली आयी । वह डायरी मेरे पतिदेव आरव की थी । इधर उधर देखा और उस डायरी को धीरे से... धड़कते दिल से खोला । कई सारे पन्ने पढ़ने थे जो अभी तुरंत पढ़ नहीं सकती थी ।क्योंकि आरव एक महीने की लंबी छुट्टी लेकर घर आये थे और आज घर पर ही थे। वे फौज में थे । मैं कुछ पलों के लिए सोचती रही कि क्या करना चाहिए ।
अचानक ही पीछे से आकर आरव ने मुझे गोद में उठा लिया और  मुझे उठाये उठाये कमरे में ही गोल गोल घूमने लगे । मैंने लाख मना किया कि कोई आ जायेगा पर वह कहाँ मानने वाले थे । मुझे बिस्तर पर लिटाते हुए जैसे ही बालों पर हाथ फिराया ... डायरी उनके हाथ से छू गयी जिसे उन्होंने सहज ही जान लिया । पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ।
आगे कुछ और भी होता पर शगुन ने रंग में भंग डाल दिया । वह कमरे का दरवाजा खटखटाते हुए बोली - क्या हो रहा आरव भैया अभी शाम भी नहीं हुई और आपलोग अभी से चालू हो गए ...! आरव ने झट से मुझे छोड़ा और दरवाजा खोलने को बढ़ गए ।
मैंने वह डायरी उन दोनों की नजरों से बचाने के लिए बिस्तर के नीचे छिपा दिया ।
कुछ देर बाद आरव अपने दोस्तों के साथ बाहर चले गए ।  मैं उनके जाने का इंतजार ही कर रही थी ताकि डायरी पढ़ सकूं । मैने अपने बेडरूम का दरवाजा बंद किया और उस डायरी को लेकर बिस्तर में धंस गयी । जैसे ही उसे खोला एक सूखा, लाल रंग का गुलाब बिस्तर पर गिरा । मैंने सावधानी से उसे उठाकर मेज पर रखा और पढ़ने लगी । पर ये लिखावट तो आरव की नही है फिर किसकी हो सकती है ।
शिया बेटी शिया बेटी ...। तभी बाहर से सासु माँ ने आवाज दी । वह दोपहर के खाने के लिए बुला रही थी शायद । मैंने वह डायरी मेज की दराज में रख दी और बाहर चली गयी । खाने के बाद अपने कमरे में जा ही रही थी कि उनके कई दोस्त अचानक ही आ धमके । उनकी खातिरदारी में ही कब दिन समय निकल गया पता ही नहीं चला । शाम को मम्मी जी  कहने पर फिर से सफाई पर लग गयी । एक गलती कर आई थी मैं । उस सूखे गुलाब के फूल को कमरे में ही टेबल के ऊपर छोड़ आई थी ।

रात के दस बजे के बाद जब मैं बिस्तर पर आई तो देखा वे सो रहे थे । मैंने टेबल लैंप जलायी और उस डायरी को पढ़ने का प्रयत्न करने लगी । तभी आरव ने मुझे अपनी बाहों के गिरफ्त में ले लिया । और धीरे से बोले - तुम उस डायरी के बारे में सोच रही हो शायद ?
मैं घबरा गई क्योंकि मुझे लगा था कि उन्हें मालूम नहीं चलेगा पर अचानक चोरी पकड़े जाने पर थोड़ी घबराहट जरूर हुई । पर अपने आप को संभालते हुए कहा - क ..कौन सी डायरी ?
तुम मुझसे कुछ नहीं छुपा सकती । मैं दोपहर में ही जान गया था की तुम्हारे हाथ मेरी दस साल पुरानी डायरी लग गयी है । पर मैं घबराया नहीं । बल्कि सारा कुछ बताने के बाद मैं तुम्हे पूरी आजादी देना चाहता हूँ कि तुम जो भी सोचोगी या जो भी फैसला लोगी वह उस पर मैं और मेरे घरवाले  कभी ऐतराज नहीं करेंगे । बल्कि तुम्हारा साथ देंगे ।
यह डायरी मेरी पहली पत्नी दीक्षा की लिखी हुई है। जो मेरी पत्नी सिर्फ कुछ पलों के लिए बनी थी । अस्पताल के बिस्तर पर मेरी आँखों के सामने इन्ही बाहों में उसने अपना दम तोड़ा था । मैं तुम्हे पूरी कहानी सुनाता हूँ फिर तुम्हे उस डायरी को पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी । दीक्षा हमारे घर मे ही रहती थी । मेरे पैदा होने के सालों बाद तक मेरी कोई बहन नही हुई । डॉक्टरों ने जवाब दे दिया कि किसी खास बीमारी की वजह से वह अब दुबारा माँ नहीं बन सकती । मेरे पापा को एक बेटी चाहिए थी । इसी जिद को पूरा करने को उन्होंने एक गरीब और विधवा औरत जो हमारे पापा के ऑफिस में झाड़ू देने का काम करती थी की पैदा हुई जुड़वा बेटियों में से छोटी बेटी दीक्षा को गोद ले लिया ।
वह मुझसे पांच छः साल छोटी थी । हमदोनों साथ  साथ खेल कूद कर बड़े होने लगे।
अचानक एक दिन वह अपने कमरे में ही गिर कर बेहोश हो गयी ।
उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया । वह तब चौदह पंद्रह साल की रही होगी । मैं उस समय स्नातक की पढ़ाई रहा था । वह दसवी में थी । उसके बाद शुरू हुआ उसके बीमार होने का सिलसिला । किसी अज्ञात बीमारी की शिकार हो गयी थी वह । बहुत इलाज करवाया गया पर विशेष फायदा नहीं हुआ । डॉक्टरो ने बताया कि जन्म के समय ही जटिलता के कारण बच्ची के हृदय का विकास समुचित ढंग से नहीं हो पाया ।जिससे एनीमिया के साथ साथ उसे हृदयाघात का काफ़ी खतरा है । शरीर मे खून बनने की मात्रा बहुत कम है जो समय के साथ कम होता जाएगा ।  इसके शरीर में खून बनाने के लिए आवश्यक तत्त्वों की भारी कमी है ।

समय बीतता रहा ।

पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगता था कि वह कोई बात अपने अंदर छिपा कर रखी हो । ब्यक्त तो करना चाहती है पर उसे शब्द नहीं मिल पा रहे हों । पिछले कुछ महीनों से देख रहा था कि उसके व्यवहार में काफी परिवर्तन हो गया था । वह चुपचाप , न जाने किन ख्यालों में खोई रहती । कभी सोचते सोचते मुस्कुरा उठती तो कभी चेहरे पर निराशा छा जाती ।
एक दिन कॉलेज से आने के बाद मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ाई कर रहा यह कि अचानक पीछे से आकर दीक्षा मेरे पीठ पर झूल गयी और बोली - क्या कर रहे हो ?
तुम यहाँ क्या कर रही हो इस वक्त ? तुम्हे तो आराम करना चाहिए अभी ! मैंने उसे प्यार से समझाते हुए कहा ।
मुझे पता है आरव मुझे इस वक्त आराम करना चाहिए पर क्या करूँ बात ही कुछ ऐसी है । उसने गंभीर होते हुए कहा।

बोलो क्या बात है ?मैंने फिर उससे प्यार से पूछा । मुझे उस समय कुछ भी अंदाजा नहीं था कि वह क्या कहने वाली है ।
फिर उसके एक वाक्य ने मानो वहाँ एक ऐसा धमाका किया जिसने मेरे दिल और दिमाग पर गहरा चोट किया ।

मैं  एक दिन के लिए तुम्हारी पत्नी बनना चाहती हूँ ...!

तड़ाक ... की आवाज़ के साथ मेरा हाथ घुमा और एक जोरदार चांटा पड़ा दीक्षा के गाल पर । आश्चर्यजनक रूप से वह थप्पड़ खाने के बाद भी मुस्कुरा रही थी । मुझे कुछ समझ मे नहीं आया की मैंने सही किया या गलत । घर मे मम्मी पापा भी नहीं थे । मैं डर गया कि मेरे थप्पड़ की वजह से वह कुछ कर न बैठे या फिर उसे कुछ हो न जाये ।
पापा मम्मी और मैंने खुद उसे बड़े ही लाड़ प्यार से पाला था ।
एक और थप्पड़ लगा सकते हो तुम । इतना तो बर्दाश्त कर ही सकती हूं । उसने मुस्कुराते हुए कहा ।
मैंने अपने हाथों को भींचते हुए कहा - प्लीज दीक्षा यहाँ से चली जाओ और फिर कभी ऐसी बात मत करना । मैने तुम्हे उस नजर से कभी देखा ही नहीं । तुम्हारे सामने तो आ ही नहीं सकता मैं फिर शादी की बात तो बहुत दूर है ।
मेरे पास समय बहुत कम है आरव ! मैं अपनी जिंदगी के बचे चंद  समय मे ही अपनी पूरी जिंदगी जी लेना चाहती हूँ । तुम शायद नहीं जानते कि मैंने बचपन से तुम्हारे अलावा किसी को नहीं देखा न ही किसी और को जानती हूँ । मेरी कोई बड़ी ख्वाहिश नहीं है । मैं चाहती हूँ कि मेरा दम तुम्हारी बाहों में निकले तुम्हारी पत्नी के रूप में । मैं जानती हूँ कि मैं कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हूँ और चाह कर भी ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकती ।

तुम जानती हो तुम क्या कह रही हो ? अगर पापा मम्मी को ये बात पता चलेगी तो उन्हें कितना दुख होगा इसका एहसास भी है तुम्हे ? मैंने झूठमुठ  का गुस्सा होने जा नाटक किया ।

सब एहसास है मुझे , मैं जो भी बोल रही हूँ पूरे होशोहवास में बोल रही हूं । मैं जानती हूँ कि उन्हें दुख होगा । मैं उनकी उम्मीद पर खरी नहीं उतर सकी । उन्हें अपने जन्म से ही दुख देती रही । पर अब ज्यादा दिन नहीं दूँगी । मुझे पता चल चुका है कि मैं ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं । मैं तुमपर भी ज्यादा दबाव नहीं दूँगी नही जबरदस्ती करूँगी,  बल्कि सोचने जा पूरा मौका दूँगी ।पर जब तक जिंदा हूँ बस तब तक ही...। कहती हुई दीक्षा कमरे से बाहर निकल गयी ।

अगले एक दो महीनों के बाद मेरा चयन फौज में हो गया । मैं फौज की नौकरी के लिए चला गया । एक दिन अचानक ही मुझे तार मिला कि दीक्षा की तबियत ज्यादा खराब हो गयी है । मैंने दिल पर पत्थर रखकर घर न जाने का फैसला किया । अपना फोन भी बंद कर दिया ।
पर कहते है न कि सच्चे प्यार में बहुत ताकत होती है । इसके आगे ऊपर वाला हार मान लेता है , मैं तो फिर भी एक जीता जागता इंसान था । एक दो दिनों से मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। शायद दीक्षा का सच्चा प्रेम मुझे अपनी ओर खींच रहा था । वह अपने अंतिम समय की ओर बढ़ रही थी । मैंने छुट्टी की अर्जी डाली । फौज में छुट्टी की अर्जियां वैसे भी ज्यादातर नामंजूर हो जाया करती है पर मेरी अर्जी पहले दिन ही मंजूर हो गयी । मैं शाम की ट्रेन से घर के लिए निकल पड़ा ।देखा रास्ते की सारी अड़चने खुद- ब- खुद दूर होती चली गयी । शायद दीक्षा मुझे पुकार रही थी । उसकी अंतिम चल रही सांसें मेरा रास्ता देख रही थी । अक्सर आते जाते रास्ते मे मुझे कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था पर आज सारी दिक्कतें अपने आप ही खत्म होती जा रही थी । एक दिन और दो रातों के सफर के बाद मैं अपने घर पहुँचा । टैक्सी से उतरते मेरी दिल की धड़कनें बढ़ गयी थी । न जाने क्यों मेरे कदम आगे बढ़ने के बजाय पीछे की ओर जाना चाहते थे । ये सोच कर की मम्मी पापा क्या सोच रहे होंगे मेरा दिल बैठा जा रहा था । कहीं वो मुझे गुनहगार न समझ लें । अपना सामान लेकर घर के अंदर गया तो अंदर एक गहरा सन्नाटा छाया हुआ था । नौकर को आवाज़ दी तो वह किचन से बाहर आया और बोला - बेटा मालिक मालकिन तो पिछले एक हफ्ते से हॉस्पिटल में है दीक्षा बेटी की तबियत बहुत ज्यादा खराब है ।
कुछ देर मैंने सोचा फिर कपड़े बदलने के लिए अपने कमरे में गया । कमरे का सारा हुलिया बदला हुआ था । सारा सामान करीने से सजा हुआ । कपड़े तह कर रखे हुए । सारी किताबें दराज में रखे हुए । सारी खिड़कियां दरवाजे साफ सुथरे । टेबल पर एक डायरी रखी हुई थी  सुनहरे रंग के चमकीले कागज में लिपटी हुई । उठाकर देखा तो गुलाब का फूल रखा हुआ था उसके अंदर । जो सुख कर गहरे काले रंग का हो चुका था । उसकी पत्तियां कब का मुरझा कर सूख चुकी थी । गुलाब के वो सूखे पत्ते कुछ और ही कहानी कह रहे थे ।हमारी अधूरी और छोटी सी अनोखी प्रेम कहानी की दास्तान । कुछ तो बात थी उस दीक्षा में कि मैं आज खींचा चला आया था । जब से उसने मुझे चाहने की बात सामने रखी थी थोड़ी देर के लिए असहज जरूर हो गया था पर एक अनजानी चाह मुझे उसकी ओर हमेशा से खींचती रही थी । एक अनजानी डोर मुझे अपनी ओर खींचती थी जिसे मैं सहज ही इन दिनों महसूस कर रहा था । क्या मैं भी दीक्षा को पसंद करने लगा था । ये एक बड़ा सवाल था । मेरे अंदर एक घमासान चल रहा था । वह एक बच्ची थी बस पंद्रह सोलह साल की । पर क्या किया जाए उसके पास समय भी तो कम था । शायद इसी पंद्रह सोलह साल की उम्र में ही  उसकी पूरी जिंदगी ऊपरवाले ने लिख दी थी । इस कारण मैं मजबूर था या उसकी चाहत के आगे विवश था ये मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा था। एक बात जरूर थी कि मैं भी अब उसे पसंद करने लगा था । किसी के हृदय के अंदर जिस भावना को प्रेम कहते है उसका बीजारोपण मेरे दिल मे दीक्षा के प्रति फौज में जाने के बाद ही हो गया था । पर मैं अब भी सच्चाई से भागना चाहता था । 
घर की हालत देख मैं चकित रह गया । नौकर को आवाज देने ही वाला था कि वह चाय लेकर पीछे पीछे चला आया था ।
मुझे इस तरह हैरान देख कर बोला - क्या देख रहे है साहब , ये सब दीक्षा बिटिया का किया हुआ है । आपके जाने के बाद जैसे वह इस कमरे में ही रच बस गयी थी । एक तरह से इस कमरे में कैद होकर रह गई थी वो । मुझे तो पता नहीं बेटा आपके और दीक्षा बिटिया के बीच क्या रिश्ता रहा था पर एक बात तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि उसकी सांसें सिर्फ आपके आने की राह देख रही है । पागल है वह ....मालिक ने उन्हें काफी समझाया पर वह टस से मस नहीं हुई । एक ही जिद पकड़ रखी है उन्होंने ।
क्या ..। मैंने सबकुछ जानते हुए भी पूछा ।
यही कि वह आपको  पसंद करती है और सिर्फ एक दिन के लिए आपकी सुहागन बनना चाहती है । फिर वह चैन से मरना चाहती है ।
मैंने कुछ नहीं कहा चुपचाप कपड़े बदले और हॉस्पिटल के लिए निकल गया । ओ0पी0डी0 में पता किया और दीक्षा के कमरे में गया । देखा वह बिस्तर पर निढाल हो लेटी हुई है।सिरहाने में पापा बैठे हुए है। मम्मी पास बैठी पंखा झल रही है । मुझे देखते ही पापा की नजरें झुक गयी । वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि मेरा कोई भी दोष नहीं। मम्मी एकटक मुझे देखने लगी । मैं धीरे से पापा के नजदीक गया और उन्हें अपने सीने से लगा लिया । वे फफक कर रो पड़े । मम्मी की आँखे भी भर आयी । मेरे आहट मात्र से दीक्षा भी जाग गयी । उसकी आँखों से गर्म गर्म आँसुओं की धार बह निकली ।
ये क्या हो गया पापा ...मेरे मुंह से बस इतनी ही आवाज
निकली ।
मेरी मांग नहीं भरोगे ? दीक्षा ने भर्राए गले से कहा तो कमरे का माहौल और ही गमगीन हो गया । माँ ने सिंदूर की पुड़िया निकाली और मेरी ओर बढ़ाया । मैंने कांपते हाथों से उसकी मांग भर दी । दीक्षा के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी थी । उसकी आँसुओं से भरी आँखे चमक उठी थी ।  थोड़ी ही देर बाद उसका सिर एक ओर लुढ़क गया । मम्मी दहाड़ मारकर रोने लगी । पापा खामोश हो गए । डॉक्टरों की भीड़ लग गयी । मैं चुपचाप एक कोने में रखे कुर्सी पर बैठ गया  और आसमान की तरफ देखने लगा ताकि मेरी आँखों से आँसू नीचे न गिर पाए ।

बस यही कहानी थी मेरी । मैंने शिया की ओर देखते हुए कहा ।
पर ते बात आपने मुझे बताया क्यों नहीं ? शिया ने मुझे प्यार से डांटते हुए कहा । मुझे आप पर पूरा भरोसा है । और आपकी अतीत जानने के बाद तो भरोसा और भी बढ़ गया है ।
मैंने उसे बाहों में के लिया और प्यार से माथे को चूम लिया । बस इतना ही मुंह से निकला " थैंक यू शिया , मेरी पहली अधूरी प्रेम कहानी को स्वीकार करने के लिए " ।

जे०पी० नारायण भारती
बलसगरा हजारीबाग

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