दूसरों के सुख से परेशान एक रोग, ईर्ष्या
थोड़ी ईर्ष्या भोजन में नमक की तरह है। लेकिन बहुत ज्यादा ईर्ष्या रूपी नमक (कुंठा, जलन, मानसिक रोग) सारे आनंद को बिगाड़ सकता है या कई परिस्थितियों में जानलेवा घातक भी हो सकता है। ऐसे प्रेमी प्रेमिका शुरू शुरू में तो अच्छे लगते हैं लेकिन बाद में इनकी ईर्ष्या कब मानसिक रोग में बदल जाए पता नहीं चलता।

बचपन में एक पाठ पढ़ा था, ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से। इसके लेखक तो मुझे याद नहीं हैं, लेकिन ये वाक्य जेहन में अभी तक घूमता रहता है। इस विचारधारा की समर्थक प्रजाति चहुं ओर दिखाई देती है, ना चाहने पर भी ऐसे लोगों से सामना हो ही जाता है, जो अनावश्यक रूप से दूसरों की खुशी/सुख को देखकर परेशान रहते हैं। ईर्ष्या कमर के उस दर्द की तरह है जो एक्सरे में भी नहीं दिखता और चैन से बैठने भी नहीं देता। ईर्ष्या से भरा व्यक्ति बैचेन घूमता रहता है, उसे अपनी नहीं, दूसरे के बारे में पता करना होता है क्या, क्यों, कैसे? सूरत भी सात बजकर पच्चीस मिनट वाली रहेगी। हर वक्त इसी कोशिश में रहेगा कि स्वयं को दूसरों से बेहतर दिखा सके। बजाय अपनी लाइन बड़ी करने के, दूसरे की लाइन को छोटी करने की जुगत में लगा रहता है।
एक बात और, प्रशंसा झूठी हो सकती है लेकिन यदि ईर्ष्या है तो सोलह आने सच्ची ही होगी। ईर्ष्या ऐसा भी नहीं कि बाहर ही होती है ये घरों में, आपसी संबंधों में भी प्रवेश कर चुकी है। किसी का बच्चा विदेश पढ़ने जा रहा है तो, फालतू पैसा है औलाद ही ठिकाने लगाएगी या अपने शहर में ही पढ़ रहा है तो अरे! पैरेंट्स महाकंजूस हैं एक धेला नहीं खर्च कर सकते।
कई लोग ईर्ष्या को प्रेम या रोमांस में स्वाभाविक मानते हैं, थोड़ी ईर्ष्या भोजन में नमक की तरह है। लेकिन बहुत ज्यादा ईर्ष्या रूपी नमक (कुंठा, जलन, मानसिक रोग) सारे आनंद को बिगाड़ सकता है या कई परिस्थितियों में जानलेवा घातक भी हो सकता है। ऐसे प्रेमी प्रेमिका शुरू शुरू में तो अच्छे लगते हैं लेकिन बाद में इनकी ईर्ष्या कब मानसिक रोग में बदल जाए पता नहीं चलता।
किसी दूसरे की समृद्धि या सुख को देखकर यह भाव आना कि यह उसके पास क्यों है, मेरे पास होने चाहिए थी, बस इसी का नाम ईर्ष्या है। ईर्ष्या वह जलन है जो किसी मलहम, दवा, पानी से नहीं विवेक से शांत होती है। ईर्ष्या रखने वाला व्यक्ति अपने सुख, चैन, खुशियों को भी खो देता है। किसी की उन्नति को देखकर ईर्ष्या करना कहां की समझदारी है? क्योंकि आपकी ईर्ष्या से दूसरों पर तो कोई फर्क पड़ेगा, नहीं मगर आपकी प्रवृत्ति, आपका स्वभाव अवश्य चिड़चिड़ा हो जाएगा।
ऐसे ही हमारे एक मित्र तो नहीं, हां पति के पारिवारिक जानकार हैं, हम उम्र होने से दोस्ताना संबंध है। हमारे घर के पास ही हर रविवार को हाट लगती है, सो झोला (सब्जी, सामान के लिए) लिए अकसर आ जाते हैं। जब अच्छे मूड में होते हैं तो जमाने भर की चर्चा करते हुए चाय को पूरी सामर्थ्य और निष्ठा के साथ ग्रहण करते हैं। लेकिन जब कुछ उनके अनुकूल ना हो तो, बस एक ही बात बोलते हैं, बस अब बहुत हो गया। अब बर्दाश्त से बाहर है, सब जलते हैं मुझ से। वैसे तो हमारा भी समय अच्छे से व्यतीत हो जाता है उनके साथ, लेकिन कई बार समय का ध्यान नहीं रखने की ज्यादती कर देते हैं।
एक दिन आते ही बोले, यार! बस बहुत हो गया परेशान हो गया हूं। पतिदेव ने कहा यह तो जीवन है इस जग में कौन परेशान नहीं है? कोई महंगाई से परेशान है, कोई ई डी से परेशान, कोई सी बी आई से परेशान है, कोई बेरोजगारी से, कोई मानसून की पूर्व आने / देरी से, कोई बीमारी से, कोई पति की आदतों (गीली तौलिया कुर्सी पर रखने ) से, कोई बीबी से, कोई बच्चों से, कोई कब्ज से, कोई जीत हार के गणित से, कोई भ्रष्टाचार से, कोई राजनीति से परेशान है, कोई बच्चों की पढ़ाई से, छुट्टियों में घूमने नहीं जा पाने से, और तो और पत्नी को सब्जी वाले ने फ्री में धनिया नहीं दिया, तो वह भी परेशान है। भई सबके अपने अपने कारण हैं, हजार लफड़े हैं परेशानी के। यानि कुल मिलाकर सब परेशान हैं।
इतने में जानकार मित्र बोले, आप मेरी बात को समझने की कोशिश कीजिए। मैं तो अपने स्कूल की राजनीति से परेशान हो गया हूं, इतनी राजनीति है कि बस पूछिए ही मत।
मैं ने पूछा क्या हुआ, बोले हुआ कुछ नहीं, बस मुझसे सारे साथ वाले अध्यापक जलते हैं, ईर्ष्या करते हैं कि मैं इसी शहर का रहने वाला हूं तो शाम को घर समय से पहुंच जाता हूं, घर का भोजन करता हूं। परिवार के साथ रहता हूं, तो किसी तरह की कोई चिंता नहीं करनी पड़ती, घर के पुश्तैनी बड़े मकान में रहता हूं आदि आदि। बाकी लोग बाहर से हैं उन्हें ये सुविधा नहीं मिल पाती इसलिए मुझसे चिढ़ते हैं। सबने मिलकर एक ग्रुप बना लिया है, जब मैं नहीं होता हूं तो मेरे खिलाफ प्रिंसीपल के कान भरते रहते हैं। अब इतने सारे लोग एक व्यक्ति के लिए कुछ कहेंगे तो कोई भी यकीन करेंगे कि मैं खराब हूं मेरा किसी से अफेयर है ...
अब आप ही बताइए मैं क्या करूं? इतने पर मैंने कहा देखो भाई इसका समाधान तो किसी के पास नहीं है, और क्या कहती। लेकिन इस वाकये से सोचने लगी कि आजकल मनुष्य का स्वभाव कितना असुरक्षित और ईर्ष्यालु होता जा रहा है। ईर्ष्यालु मन हमेशा यही सोचता है कि बस वही श्रेष्ठ का हकदार है दूसरा नहीं, किसी भी क्षेत्र के लिए यह बात सटीक बैठती है। जब भी उसे लगता है कि दूसरा मुझसे ज्यादा सुखी या सम्मानित है, तो बजाय इसके कि खुश हो, प्रशंसा के दो बोल ही बोल दे, वो स्वयं को बेहतर बनाने की कोशिश करे, वह इस प्रयास में रहता है कि दूसरे को कैसे नीचा दिखाया जाए। मेरे साथ भी कई बार ऐसा होता है कि जब तक अकेले व्यक्तिगत तौर पर मिलेंगे तो बहुत अच्छे से पेश आते हैं, लेकिन जैसे ही हम पांच सात लोगों के ग्रुप में साथ मिलते हैं कोई न कोई ऐसी बात करने की कोशिश में रहते हैं या ये जताने में कि मैं उन लोगों से कहीं कम हूं। कई बार तो पहचान ही नहीं पाते, अजब लोग हैं। मुझसे कहते वक्त कि ये तो लेखिका हैं, तो यह लेखिका शब्द का प्रयोग भी कमतर जैसा ही होता है। उन्हें लगता है कि मैं फालतू हूं इसलिए टाइम पास करती हूं, और उनके पास तो इतने सारे काम हैं, कारोबार है, सोशल एक्टिविटीज हैं कि उन्हें समय ही नहीं मिलता। इसलिए वे लेखन का बेकार कार्य नहीं करतीं। यह तो वही जानें इसके पीछे उनकी कौनसी भावना का तुष्टिकरण होता है। लेकिन एक बात तय है कि कुछ तो विशेष है आप में, तभी तो सारे सामान्य मस्तिष्क वाले आप को अलग थलग करने की कोशिश करते हैं और यही आपकी विजय है।
ईर्ष्या वह आग है जो आपकी खुशियों को जला डालती है आपका सुखचैन सब छीन लेती है, अतः संतोष और ज्ञान रूपी जल से इसे और अधिक भड़कने से रोको, ताकि आपके जीवन में खुशियां नष्ट होने से बच सकें। दूसरों की तरक्की में खुश होना सीखो। ईर्ष्या की यह जलन किसी "एंटासिड" से शांत नहीं होती। ईर्ष्या आपका बी. पी. बढ़ा देती है, आपको खुशियां नहीं दे सकती। क्योंकि खुशियां ईर्ष्या रखने से नहीं, अपितु दूसरों की खुशियों में शामिल होने से मिलती हैं।
मनु वाशिष्ठ कोटा राजस्थान
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