कृष्ण महामंत्र और कीर्तन के आविष्कारक

बंगाल का कीर्तन संगीत-संस्कृति के क्षेत्र में एक अद्वितीय देन था और चैतन्य द्वारा स्थापित वैष्णव भक्ति के अत्यंत भावनात्मक उपासना से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था। लेकिन यह उल्लेखनीय है कि चैतन्य के प्रकट होने से पहले भी बंगाल में संगीत और वैष्णव पंथ एक दिलचस्प रूप से परस्पर जुड़े हुए थे।

Jun 10, 2024 - 18:24
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कृष्ण महामंत्र और कीर्तन के आविष्कारक
Inventor of Krishna Mahamantra and Kirtan

बंगाल का कीर्तन संगीत-संस्कृति के क्षेत्र में एक अद्वितीय देन था और चैतन्य द्वारा स्थापित वैष्णव भक्ति के अत्यंत भावनात्मक उपासना से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था। लेकिन यह उल्लेखनीय है कि चैतन्य के प्रकट होने से पहले भी बंगाल में संगीत और वैष्णव पंथ एक दिलचस्प रूप से परस्पर जुड़े हुए थे।
बंगाल में राधा- कृष्ण उपासना विख्यात कवि संगीतज्ञ जयदेव द्वारा चैतन्य के उदय से कम से कम 300 वर्ष पहले  लोक प्रचलित की गई थी। इस तरह, वैष्णव पंथ और बंगाल के संगीत परंपराओं का रिश्ता बारहवी शताब्दी के अंतिम चरणों में बन गया था, जबकि जयदेव ने सुप्रसिद्ध ‘गीत गोविंदम’ की रचना की थी। बंगाल में चैतन्य पूर्व वैष्णव पंथ के प्रथम और सर्व प्रमुख अभिलेख वैष्णव जयदेव द्वारा रचे गए गान रूपी भक्ति परक पद है। जयदेव उत्तर भारत के अंतिम स्वाधीन हिंदू राजा, गौ‌ड़ देश के संगीत प्रेमी और विष्णु पूजक महाराजा लक्ष्मण सेन के दरबारी कवि थे। बंगाल में भक्ति और राधा कृष्णा उपासना का तत्व पूर्ण  साहित्यिक रूप में जयदेव की संस्कृत पदावलियो में प्रकट हुआ। “गीत गोविंदम” के गानो में ब्रह्म वैवर्त पुराण की तरह राधा की प्रतिष्ठा के जरिए कीर्तन पूजा के माधुर्य और ऐश्वर्य दोनों पक्षों की अभिव्यक्ति हुई थी।
जयदेव के इन भक्ति पद गानों के प्रति चैतन्य भी आकृष्ट थे ।वे “गीत गोविंदम “ के बड़े प्रशंसक थे और उन गानों का श्रवण उन्हें बहुत प्रिय था। वे जय देव की रचनाओं के प्रति न केवल आकर्षित हुए थे ,वल्कि यह रचनाएं नवदीप के युवा संन्यासी द्वारा शुरू किए गए गौडीय वैष्णव पंथ के लिए प्रेरणा स्रोत मानी जाती थी। जयदेव के गान मानवीय आकांक्षा के रूप में अभिव्यक्त थे पर उनमे ईश्वर अनुभूति के लिए वास्तव में तीव्र भक्ति परक अभिलाषा‌ निहित थी। इस रूप में जयदेव की राधा कृष्णा उपासना उन्मुख पदावलियो ने चैतन्य द्वारा प्रचारित गौडीय वैष्णव पंथ की उपासना प्रवृत्तियों को प्रभावित किया।
जयदेव के बाद बंगाल के वैष्णव पंथ की प्रबंध संगीत की अपनी परंपरा स्थापित होने लगी जयदेव की संगीत काव्यात्मक प्रतिभा ने बंगाल में राधा कृष्णा उपासना को इतना जनप्रिय बना दिया था कि बंगाल के वैष्णव पंथ की सभी   परवर्ती संगीत रचयिता पीढियो की कल्पना में यह विषय व्याप्त रहा।
जयदेव के बाद वैष्णव पथं या राधा कृष्णा उपासना की सर्वाधिक प्रसिद्ध संगीत रचना वादु चंडी दास की “श्री कृष्ण कीर्तन”थी ।“गीत गोविंदम” संस्कृत में था पर “श्री कृष्ण कीर्तन” की रचना बांग्ला भाषा में की गई थी ।
वादु चंडी दास मिथिला के विख्यात कवि विद्यापति के समकालीन थे। विद्यापति की पदावली को भी बांग्ला ने अपना मानकर अपनाया।
इस तरह बांग्ला भाषा में वैष्णव विषय की प्राचीनतम संगीतआत्मक साहित्यिक रचना वादू चंडीदास की “श्री कृष्ण कीर्तन”थी, जिसकी रचना चैतन्य के उदय के लगभग एक शताब्दी पहले हुई थी ।बंगाल में वादु चंडी दास के “श्री कृष्ण कीर्तन” का कृष्ण विषय था, या निश्चित रूप में राधा कृष्ण तब तक जयदेव के पद गानो और चैतन्य उत्तरपदावली  कीर्तन गीतों को जोड़ने वाली कड़ी थी ।
वादु चंडी दास रचित “श्रीकृष्ण कीर्तन “और उत्तर कालीन कीर्तन गायको के युग के  बीच में चैतन्य हुए।
नव वैष्णव मत के प्रचारक चैतन्य की 16वीं शताब्दी के प्रथम चरण में नाम संकीर्तन की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है ।चैतन्य द्वारा प्रचलित की गई सरल और साथ ही सम्मोहक गान विधि सर्वसाधारण में कृष्ण भक्ति का संदेश पहुंचाने में काफी सफल हुई।
नाम संकीर्तन चैतन्य मत के आंदोलन और उपासना का अंग हो गया पहले के कुछ अध्यायो में चैतन्य के नेतृत्व में उनके शिष्यों के सामूहिक भाव विहवल कीर्तन गायन की कई घटनाओं का उल्लेख हुआ है ।पूरी के रथ यात्रा समारोह या जन्माष्टमी उत्सव आदि अवसर पर शोभा यात्रा में कीर्तन करती‌ हुई मंडलीय बंगाल में चैतन्य मत का अंग बन गई ।चैतन्य ने स्वयं अपनी नवदीप- लीला में संकीर्तन के वृद्ं -गान और कीर्तन शोभा यात्रा की शुरुआत की थी।
कीर्तन गान चैतन्य द्वारा प्रतिपादित धर्म का अंग हो गया और कीर्तन चैतन्य मत से अभिन्न रूप से जुड़ गया। इस तरह का भक्ति परक गायन चैतन्य मत के प्रचार का वाहन था।
चैतन्य के पूर्व भी किसी न किसी रूप में कीर्तन होता था, लेकिन चैतन्य के कीर्तन गायक के उदाहरण ने इस तरह के संगीत को बहुत लोकप्रिय बना दिया ।
यहां तक कि चैतन्य को कीर्तन गायन का आविष्कारक मान लिया गया ।यह ध्यान में रहे कीर्तन और संकीर्तन को एक ही माना जाता था।
राजा प्रताप रूद्र एक बार पूरी में चैतन्य का यह संकीर्तन सुनकर मुग्ध हो गए और उन्होंने राज पंडित से पूछा,-“ “यह कौन सा संगीत है?” 
पंडित सार्वभौम ने कहा –“चैतन्य देव ने इसकी रचना की है ।“ 
वृंदावन दास ने भी अपने “चैतन्य भागवत” में यह कहा है कि चैतन्य ने कीर्तन का प्रारंभ किया ।
अपने इस ग्रंथ में उन्होंने यह वर्णन किया है कि किस तरह चैतन्य हरि कीर्तन गायन में रत उन्मत्त हो गए। “तब  उनके टोले के विद्यार्थियों ने उनसे कहा- “आचार्य,हम भी आपके साथ कीर्तन करेंगे ।लेकिन हमें कीर्तन करना आता नहीं ।आप हमें सिखाएं “ तब शची पुत्र ने स्वयं उन्हें सिखाया –“हरये नमः कृष्ण यादवये नमः ।गोपाल,गोविंद राम,श्री मधुसूदन।“आचार्य ने स्वयं ताल देकर शिष्यों को कीर्तन की रीति बताई और उनके साथ कीर्तन किया।“ 
वृंदावन दास के उपर्युक्त वर्णन से यह समझा जा सकता है कि चैतन्य कीर्तन संगीत के निर्देशक भी थे। वे न केवल उसके गायन की, बल्कि इसके लेख के अनुसार उनकी भी शिक्षा दे सकते थे।
उनके कारण नवदीप की जनता कीर्तन या संकीर्तन के प्रति उत्साहित हुई। चैतन्य मत के इतिहास में श्रीवास के आंगन में उनके भाव-विहवल कीर्तन गायन का बड़ा महत्व है। वहां वे पर रात्रि पर रात्रि अपने निकट शिष्यों के साथ संकीर्तन गान में लगे रहे, जिसके फल स्वरुप गौडीय वैष्णव मत की पहली अनुयायी मंडली नवदीप में बनी।
ऐसा भी दृष्टिगत हुआ कि चैतन्य के कीर्तन गायन के साथ नृत्य भी चलता था। वह श्रीवास के घर में कीर्तन करते हुए धार्मिक भाव विहवलता से नाचने लगते थे ।चैतन्य की जीवनियों के अनुसार, नृत्य कीर्तन संगीत का अंग था। जब उन्होंने उत्कट धार्मिक गान के रूप में प्रतिष्ठा की, तब नृत्य को भी उसका अंग भूत माना गया।
चैतन्य को न केवल स्वयं कीर्तन करना प्रिय था, वे अपने अनुयायियों को भी संकीर्तन में भाग लेते देखना पसंद करते थे। वृंदावन दास ने अपने “चैतन्य भागवत” में लिखा है कि जब नवदीप के भक्त आचार्य के अभ्यर्थना के लिए आए तो उन्होंने उन सबको कृष्ण नाम का महामंत्र के रूप में जपने के लिए तथा “हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे ,धुन पर नाम संकीर्तन करने के लिए कहा। चैतन्य ने उन्हें हथेली पर ताली देते हुए –“हरये नमः, कृष्ण यादवये नमः
।गोपाल गोविंदराम श्री मधुसूदन।“ कीर्तन करने के लिए कहा।
इस तरह, लोग घर-घर में कीर्तन करने लगे और फिर यह कस्बे कस्बे में फैल गया। कहा जाता है कि कीर्तन में प्रयुक्त ताल वाद्य खोल (पखावज जैसा वाद्य यंत्र) का भी प्रयोग का प्रारंभ चैतन्य ने हीं कीर्तन के साथ किया था। खोल और मंजीरा (पीतल के बने दो बर्तन खंड)यह दो बाजे कीर्तन के दौरान साथ बजाए जाते थे ।इन दो सरल तालात्मक वाद्यो के साथ कीर्तन संगीत साधारण जनों की पहुंच के भीतर था।  जिनके बीच चैतन्य मत का संदेश इस प्रकार के भक्ति परक गायक के माध्यम से पहुंचा। गायन से एक सरल, किंतु मनोहारी प्रकार के रूप में कीर्तन संगीत सुदूर गांवो में भी हो सकता था, इसलिए चैतन्य कम सरल ग्रामीण जनों के बीच में प्रचलित हुआ।
यह पहले ही उल्लेखित हो चुका है कि चैतन्य किस तरह पूरी में रथ यात्रा उत्सव के समय अपने अनुयायियों के साथ वेतन किया करते थे। गुरु के नेतृत्व में होने वाले सामूहिक कीर्तनों का भक्तों के हृदय पर रोमांचकारी भावात्मक और उपासनात्मक प्रभाव पड़ा करता था।
चैतन्य ने प्रत्यक्षत  कीर्तन संगीत को जनप्रिय बनाया और यहां उनके द्वारा प्रवर्तित वैष्णव मत का अंग बना रह गया। इससे जो प्रक्रिया शुरू हुई वह बाद में शताब्दियों तक चलती रही। चैतन्य मत के साथ कीर्तन का भी विकास और प्रसार होता रहा। जब वैष्णव मत की प्रसार गति तीव्र हुई कीर्तन संगीत भी पल्लवित हुआ।
बंगाल की अद्वितीय और विशेष देन कीर्तन संगीत चैतन्य द्वारा शुरू किए गए कृष्ण आदि आंदोलन की उपज था बंगाल के संगीत संस्कृति के क्षेत्र में चैतन्य प्रेरित गौडीय वैष्णव मत की ऐतिहासिक भूमिका थी।

दीपाली कदम

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