वर्ष दो हज़ार बाइस में हमारे भारत देश ने स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया।संयोग से उस वर्ष अगस्त में हम अपने पुत्र के पास यूके पहुँचे। वहाँ एक दिन हमारी पौत्री ने बताया कि वह स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में हिस्सा ले रही है। उसकी बात हमें कुछ पची नहीं, बेटे से पूछने पर मालूम हुआ कि इंडियन नॉर्थ ईस्ट एसोसिएशन ऑफ स्कॉटलैंड ने भारत के स्वतंत्रता अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया है। जिसमें हमारी सात वर्षीया नन्ही आद्रिका पाठक एक समूह नृत्य में भाग ले रही है। ब्रिटेन की धरती पर भारत की स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव! सोच कर रोमांच हो आया था।
इस कार्यक्रम में स्कॉटलैंड में भारतीय दूतावास के तत्कालीन कॉउंसलेट जनरल ऑफ इंडिया श्री बिजय सैल्वाराज जी मुख्य अतिथि थे। मेरा पुत्र कनु पाठक उस समय स्कॉटलैंड के एबरडीन नामक शहर में रह रहा था।स्कॉटलैंड अपने अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्व विख्यात है। एबरडीन समुद्रतटीय नगर है, विश्व में ऑयल एंड गैस कम्पनी के कारण भी जाना जाता है।
भारत की पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण चारों दिशाओं से आकर युवाओं ने स्कॉटलैंड को अपनी कर्मभूमि बनाई अवश्य है परन्तु अपने देश की सभ्यता और संस्कृति से मुख नहीं मोड़ा है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमें वहाँ के कार्यक्रमों में भाग लेने पर ज्ञात हुआ।
पूर्व अभ्यास के दौरान मैंने देखा कि नृत्य में भाग लेने वाली बालिकाएँ समान आयु की नहीं थीं और गुजराती, मराठी, तमिल यानी कि भारत के अलग अलग-अलग राज्यों से संबंधित हैं फिर भी वह प्रेमभाव से रह रहीं थीं। विदेश में कुटुंब की अवधारणा बनी रहे इस सोच को वहाँ के युवा बहुत गम्भीरता से समझते हैं और इसी सोच के साथ इस नई पौध का पालन पोषण हो रहा है। मुझे भी वह बच्चे अम्मा, आजी कहते थे।
हाँ तो मैं बात कर रही थी अमृत महोत्सव की, कार्यक्रम की निश्चित तिथि और समय पर तैयार होकर हम बच्चों के साथ अपने गंतव्य की ओर निकले। हमें एबरडीन शहर के दूसरे छोर पर बने कम्युनिटी हॉल जाना था।
यूँ तो वर्षा का होना वहाँ आम बात है लेकिन उस दिन की रिमझिम फुहार को देखकर मुझे अपने स्कूल-कालेज के दिन याद आने लगे, ऐसी ही तो वर्षा ऋतु होती थी जब हम पंद्रह अगस्त पर ध्वजारोहण में सम्मिलित होने स्कूल जाते थे। बड़े उत्साह और उमंग से हम उस दिन स्कूल जाते थे, वही उत्साह मैंने अब देखा। दरअसल बचपन में गीत संगीत, मेल जोल और समारोह बहुत आकर्षक लगते हैं, किस कारण क्या हो रहा है इसका विशेष प्रभाव बच्चों पर नहीं पड़ता।
प्रवासी बच्चों को यह नहीं बताया गया कि स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाया जाता है, क्योंकि अब वह ब्रिटिश नागरिक हैं।नकारात्मक बातें बच्चों का बचपना छीन लेती हैं। बड़े होने पर वह स्वयं इतिहास समझ लेते हैं।
गंतव्य पर पहुँचने पर हमने सड़क के मोड़ पर प्रारम्भ में ही एक बड़ा सा बैनर लगा हुआ देखा, जिस पर गाड़ी पार्किंग में खड़ी करने का निर्देश था। उस बड़े से बैनर पर बना था हमारा तिरंगा! यूके के हाईवे पर लहराते तिरंगे का चित्र देखकर मन गदगद हो गया। यह हमारा झंडा है, यह कह कर मैंने उसके सामने खड़े होकर फ़ोटो खिंचवाई। समय की गति कितनी बदल चुकी है, यह बैनर इसका उदाहरण था।
वर्षा की फुहारों में भीगते हुए हम हॉल में प्रविष्ट हुए, वहाँ मैं चिहुंकी- अरे यहाँ तो छोटा सा भारत आगया है! सच में अपने अपने पारम्परिक वेशभूषा में सजे बड़े और बच्चे, युवक-युवतियां मनोहारी छटा बिखेर रहे थे। विदेश में गहने और साड़ी पहनने का दुर्लभ अवसर प्रवासी महिलाओं के हाथ आया था, उन्होंने उसका भरपूर लाभ उठाया, ऐसा प्रतीत हो रहा था। गुजराती, कन्नड़, मराठी,हिंदी में होती बातचीत की मधुर गुंजन हॉल में फैल रही थी।
इस सबके बीच से गुज़रते हुए हमने अपना स्थान ग्रहण ही किया था कि मंच से उद्घोषणा हुई कि भारतीय दूतावास से काउंसलेट श्री बिजॉय सैलवाराज का आगमन हो गया है। सभी दर्शकों ने खड़े होकर ताली बजाते हुए उनका स्वागत किया।
सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का प्रारंभ हुआ। उसके पश्चात सभी प्रतिभागी बच्चे मंच पर आकर खड़े हुए और एक छोटी सी बच्ची भारतमाता की पोशाक में बड़ा सा झंडा लेकर सबसे आगे खड़ी होगई।
राष्ट्रगान प्रारंभ हुआ। दर्शकों ने भी खड़े होकर राष्ट्रगान गाने में साथ दिया। इसके बाद बच्चों ने गीत, कविता, संगीत की प्रस्तुति दी, कत्थक और भरतनाट्यम्, बाँसुरी वादन ने खूब मन मोहा और फिर आयी हमारा दीर्घ प्रतीक्षित प्रस्तुति- सुनो गौर से दुनिया वालों, बुरी नज़र न हम पर डालो, चाहे कितना ज़ोर लगा लो, सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी!
खचाखच भरे हॉल में रोमांचक दृश्य उत्पन हो जाता था जब दर्शक गीत के साथ ताल देते देते हवा में मुट्ठी लहराते हुए जोश से समवेत स्वर से गा उठते -होंगे हिंदुस्तानी!
विशेष बात यह भी है कि उन दर्शकों में बहुत से भारतीय ऐसे भी थे जिन्होंने ब्रिटिश नागरिकता ले ली है, फिर भी वे हैं -हिंदुस्तानी! स्कॉटलैंड के ठंडे और शांत वातावरण में इस कार्यक्रम ने धूम मचा दी थी।
अंत में मुख्य अतिथि का अभिभाषण हुआ।अपने भाषण में उन्होंने सभी का मनोबल बढ़ाया तथा आशा व्यक्त की कि भारत की स्वतंत्रता के सौवें अमृतमहोत्सव में अप्रवासी भारतीयों का विशेष योगदान रहेगा । बच्चों के उत्साहवर्धन के लिए पुरस्कार वितरण हुए एवं सभी के साथ प्रेमपूर्वक फ़ोटो खिंचवाए।
कार्यक्रम के बाद भोजन का प्रबंध था।सभी लोग पंक्तिबद्ध, अपनी प्लेट में शांत भाव से भोजन लेकर आगे बढ़ते जा रहे थे। बाहर बच्चों के लिए आतिशबाजी प्रारंभ हो गई, वर्षा की रिमझिम अब भी थी लेकिन वाटर प्रूफ़ जैकेट पहनकर सब आनंद उठा रहे थे। हाँ हम सब वर्षा से और आनंद से सराबोर थे! उस अवर्णनीय दृश्य का वर्णन करने में मैं आज भी रोमांचित हो उठी हूँ।
वन वर्ल्ड डे मेला
अगस्त माह में पार्क के खुले मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ । यह आयोजन प्रतिवर्ष यूके में शहर-शहर आयोजित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य है अप्रवासी जनता को अभिव्यक्ति का अवसर देना।
यूके की यह सोच वास्तव में प्रशंसनीय है क्योंकि इस तरह लोग परस्पर अपने देश की परम्परा, सांस्कृतिक विविधता बांटते हैं। भारत के अलावा बांग्ला देश, चीन, कोरिया, अफ़्रीका तथा अन्य देशों के नागरिक जो वहाँ पढ़ने, नौकरी करने अथवा व्यवसाय से जुड़े हैं, इस मेले में शामिल होते हैं। अलग-अलग मंच पर सभी के कार्यक्रम की प्रस्तुति चल रही थी। दर्शकों के लिए पूरा पार्क खुला था, बैठने की कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं। खड़े होकर देखें अथवा मैदान की घास पर बैठ जाए। दर्शक अफ़्रीकी मंच के सामने हों या भारत के यह उनकी रुचि पर निर्भर कर रहा था। अबरडीन में भारतीय नृत्य और बॉलीवुड गाने विशेष रूप से धूम मचाते हैं। भारी भीड़ मंच के सामने आ जुटती थी जब हमारे नन्हे मुन्ने बॉलीवुड गीत पर अपना नृत्य प्रस्तुत कर रहे थे।
यूक्रेन से विस्थापित एक युवती ने अपने देशवासियों को याद करके गीत गाया तो सभी के मन उदास हो गए। यूक्रेनी युवती ने अपने देश के छोटे छोटे झंडे बच्चों को बांटते हुए यूक्रेन में शांति के लिए प्रार्थना करने को कहा।
मेला तो मेला है! वहाँ खाने के स्टाल न हों यह कैसे संभव हो सकता है? विभिन्न देशों के विभिन्न व्यंजन वहाँ थे। अधिकतर स्टाल पर रखे खाद्य पदार्थ सामिष थे इसलिए उस ओर रुख़ नहीं किया।
हमारे देश के गरमा गरम समोसे के स्टाल के आगे लम्बी लाइन लगी थी जिसका सिरा तो दिखाई दे रहा पर अंत कहीं नहीं मिला। उस दिन मेले में समोसे न खाने का अफ़सोस मुझे आज तक है।
आईसक्रीम के ठेले पर बच्चों की भीड़ जुटी थी। मैंने ठेले शब्द का प्रयोग किया है, सच में वो ठेला था। जिसे ठेल कर यहाँ से वहाँ ले जाया जा सके वह ठेला ही तो कहलाएगा न?
भारतीय हस्तकला के स्टॉल पर, छोटे छोटे उपहार हेतु बनी कलात्मक वस्तुएँ प्रशंसा बटोर रही थीं। भारत के चटक रंग आकर्षण का मुख्य केंद्र होते हैं ।
हाथ पर मेहंदी लगवाने के लिए स्कॉटिश महिलाएँ विशेष रूप से उत्सुक दिखाई दीं ।मेंहदी का स्टॉल, एक भारतीय महिला का था ।
मेले वाले दिन मौसम बहुत अच्छा था। धूप खिल रही थी। स्कॉटलैंड में धूप का खिलना उत्सव का आनंद बढ़ा देता है। उत्साह, उल्लास और धूप इन सबसे जनता के मुख दमक रहे थे।
एक बात और सोचती हूँ यह मेला शब्द हिंदी का है या अंग्रेज़ी का? भीड़ तो हर मेले का अंग है पर संयमित और बिंदास बहुदेशीय मेले जैसी भीड़, हमारे देश में क्यों नहीं होती?
यहाँ यदि मैं एबरडीन में होने वाले भारतीय त्योहारों के बारे में न लिखूँ तो बड़ी भूल होगी। नवरात्रि में गरबा की धूम, बंगाल का सिंदूर खेला क्या कम आकर्षक थे? यह पंडाल भी पूरे प्रवासी समुदाय को अपनी ओर खींचते हैं।भारतीय जहाँ भी हैं अपनी मज़बूत जड़ों के साथ खड़े दिखाई देते हैं। मराठी दिवस पर हमारी आद्रिका ने ‘गुलाबी साड़ी’ पर एकल नृत्य कर खूब प्रशंसा बटोरी थी।
जन्माष्टमी पर हिंदू मंदिर में उत्सव मनाया गया। बालक-बालिकाएँ राधा कृष्ण की पोशाक पहन कर आए थे। महिलाएँ साड़ी और पुरुष वर्ग कुर्ता पजामा पहने थे। मधुर स्वर में भजन हुए।
भाषा अलग-अलग थी पर भाव एक ही था। हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की, छोटी छोटी गऊएं, छोटे छोटे ग्वाल छोटो सों मेरे मदन गोपाल, अधर मधुरं वदनं मधुरं, यह तीन भजन सबने सम्मिलित स्वर से गाए।
नृत्य और संगीत के अंत में प्रसाद वितरण हुआ। हम परिवार जन उल्लासित भाव से घर लौटे। दो हजार बाइस की स्कॉटलैंड यात्रा मेरी अविस्मरणीय यात्रा है। यह यात्रा केवल प्राकृतिक सौंदर्य अथवा स्मारक देखने तक सीमित नहीं थी बल्कि प्रवासी जन जीवन से जुड़ कर उन्हें परखने और समझने की यात्रा थी।
जीवन चलता रहेगा,यात्रा भी चलती रहेगी। और हम घुमक्कड़ अपने अनुभव की कहानियाँ सुनाते रहेंगे।
रश्मि पाठक
मोदीनगर, उ.प्र.