भारत की नदियाँ : एक राष्ट्रीय परिदृश्य
This article highlights the spiritual, cultural, historical, and national significance of Indian rivers. Rivers like the Ganga, Yamuna, Saryu, Narmada, and Kaveri have long been more than water bodies—they are symbols of India’s cultural consciousness, religious heritage, agrarian life, and national unity. The narrative explains how rivers transcend regional boundaries, nurturing traditions, festivals, livelihoods, and emotional bonds that unify the nation across centuries. यह लेख भारतीय नदियों के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व को दर्शाता है। प्राचीन काल से गंगा, यमुना, सरयू, नर्मदा, कावेरी आदि नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं रहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक विश्वास, कृषि आधारित जीवन और राष्ट्रीय एकता की मजबूत कड़ी बनकर प्रवाहित होती रही हैं। लेख बताता है कि किस प्रकार नदियाँ भौगोलिक सीमाओं से ऊपर उठकर लोगों की भावनाओं, परंपराओं, त्योहारों, व्यापार और एक-दूसरे से जुड़ाव को सदियों से संजोए हुए हैं।
राष्ट्रीय एकता के अनेक माध्यमों में एक विशिष्ट माध्यम नदियों का भी होना है। देश के सभी दिशाओं में तीर्थ स्थान की स्थापना की गई थी, इसलिए कि देश के सभी स्थानों के लोगों का संगम होता रहे। उन्हें एक-दूसरे से मिलने-जुलने, समझने-बूझने का अवसर मिलता रहे, कि भाषाओं, रहन-सहन के तरीकों, वेशभूषा, खान-पान की अनेकता के बावजूद वे सभी एक हैं, पूरा देश एक है।
नदियों का जूट अपने आप में ही विविध प्राकृतिक सौंदर्य का अलंकार लेकर प्रवाहमान होता है। प्राकृतिक छवियां हमारे सौंदर्य बोध का भी विकास करती हैं, उसे अनेक नए आयाम देती हैं। वह अन्य स्थानों से प्राप्त सौंदर्य बोध में अपने को जोड़ता है और हमारा सौंदर्य अनुभव अधिक सघन और बहुआयामी बनता चला जाता है। आज के व्यावसायिक और उपभोक्तावादी युग में हमारी सौंदर्य चेतना कुंठित होती जा रही है।
प्रकृति के सहज व खुले वातावरण में जाकर हम अपने को वापस अपना लगते हैं। मनुष्यता का अहम राज कहीं ना कहीं हमारे अनुभव में उतरने लगता है। प्रकृति का सौंदर्य अनादिकाल से ही हमारी राष्ट्रीयता का एक आयाम रहा है। राष्ट्रीय कविता के क्षेत्र में वे कविताएं भी आती हैं जिनमें अपने देश की प्रकृति की विविध छवियों और महिमा का गुणगान किया गया है। इन छवियों में महाकाव्य मान्य कवियों आदि के वैभव और चिंतन स्वर भी समाहित हैं, जो प्रकृति के संचार बने और बन गए।
जब हम प्रकृति के सौंदर्य अनुरूप रूप को देखते हैं, तो उनमें स्वयं को अनुग्रहीत भी अनुभव करने लगते हैं और हमारा वर्तमान अतीत के सतत से शाश्वत जुड़ जाता है। हमारे महान भारत देश में ७ से ८ ऐसी महान नदियां हैं, जो युगों से राष्ट्रीय एकता का निर्माण करती हैं — सिंधु, गंगा, यमुना, गोदावरी, सरयू, नर्मदा, कावेरी आदि को पूजनीय, स्मरणीय माना गया है।
इसमें गंगा का विशेष स्थान है। हमारे मनीषी, ऋषि-मुनियों और पूर्वजों ने यह व्यवस्था का प्रयत्न किया कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवाहित कुछ नदियों को विशेष धार्मिक स्थान देकर उनके माध्यम से देश के सभी दिशाओं की जनता को जोड़ दिया जाए। आज के डिजिटल माध्यम से इस मानव को वैश्विक रूप से जोड़ने का कार्य किया गया है।
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कुंभ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। महाकुंभ एक ऐसा महापर्व है जिसमें पूरा भारत एक स्थान पर एकत्रित हो जाता है, जो अपने आप में बेमिसाल है। उनमें विदेशी भी बहुत संख्या में अपनी उपस्थिति कर रहे हैं, जो अविश्वसनीय व अनूठा है। यह एकत्रीकरण केवल शारीरिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक एकत्रीकरण भी है।
नदियों का महत्व यातायात व व्यापार के लिए भी रहा है। सदियों से व्यापारिक सुविधा के कारण बड़े-बड़े शहर नदियों के किनारे विकसित हुए। किंतु इससे बड़ी बात यह है कि हमारे कृषि प्रधान देश में नदियां गांव के जीवन उत्सर्ग में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं।
वे तरह-तरह से उनकी फसलों में सिंचाई का माध्यम बनती हैं। नहाना, धोना, पर्व, त्योहार, लोकगीतों में समाई हुई हैं। वे अपने जीवन में दी चल दांवों का स्वयं वहन करती हैं। अनेक छोटे-छोटे नदी-नालों का निर्माण कर वहां से वे कहां से कहां तक फैली होती हैं।
हमारे ऋषि-मुनियों ने नदी के जीवन की जीवनदायी, सभ्य प्रकृति तत्वों की महानता को समझते हुए उनकी पूजा का विधान कर दिया है। नदियां मां के रूप में पूजी जाती हैं और गंगाजल तो अपनी प्रतिष्ठा में अद्वितीय है। इसमें न जाने कौन सी संजीवनी शक्ति है कि इसमें कभी विकार नहीं आता है। कहा जाता है कि वह तमाम औषधीय रस बटोरती हुई पहाड़ों से उतरती है। इसके जल में कभी विकृति नहीं पाती है।
सभी नदियों में गंगा को सर्वाधिक पवित्र माना जाता है और यह वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध हो गया है कि इसके पवित्र जल से और जीवित पदार्थ को कुछ समय में शुद्ध कर देने की क्षमता है। इससे यह पूजनीय क्या, पूजा भावना को सनातन और संजीव बनाए रखता है।
प्राचीन काल में प्रथम भागीरथ की कठोर तपस्या से गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई। वह विष्णु के चरण से निकलकर ब्रह्मा के कमंडल में होती हुई शिव की जटा में समा गई और फिर वहां से निकलकर धरती के विस्तार में व्याप्त हो गई जिससे पृथ्वी का ताप दूर हुआ, जीवन में समृद्धि फलने-फूलने लगी, सागर पुत्रों का उद्धार हुआ।
धार्मिक अभिप्रायों से और अपनी पौराणिक महत्त्व से जुड़ जाने के कारण गंगा का वास्तविक महत्व और भी व्यापक और घना हो गया है। रामायण और महाभारत के अनेकों प्रसंग गंगा नदी से जुड़े हुए हैं। यह सांस्कृतिक एकीकरण तो है ही, एक धार्मिक और आध्यात्मिक अभिप्राय से लोग जुड़ जाते हैं। एक सी मनोभूमि बन जाती है। एक से क्रियाकलाप से संचालित हो उठते हैं।
यह स्थिति अलग-अलग क्षेत्र में पवित्र मानी जाने वाली सभी नदियों के साथ है। वे सभी किसी न किसी धार्मिक, आध्यात्मिक या प्रणाली से जुड़ी हुई हैं और अपने में स्नान करने वालों को पुण्य फल प्रदान करती हैं।
यमुना सूर्य की बेटी तो है ही, श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं से उसे और भी अधिक आध्यात्मिक स्पर्श दे दिया है। सरयू का आध्यात्मिक महत्व अयोध्या के कारण है, उसमें श्रीराम के सान्निध्य की महक और स्पर्श व्याप्त है।
राष्ट्रीय एकता राष्ट्र के स्तर पर एकाएक छा जाने वाला कोई उत्सव नहीं है। अनेकता इसे देने की विशेषता रही है। अनेकता की विविध छवियां अनेक को बनाए हुए, एक-दूसरे से मिलती हैं, जिससे विशेष सामूहिक छवि बनती है।
इसी तरह विविध भू-भागों की अपनी-अपनी नदियां हैं। वहां के लोगों के बड़े गहरे सरोकार होते हैं। यह केवल नदी नहीं होती, उनके लिए वह एक आत्मीयता, एक व्यक्तित्व होती है, जिसके साथ दिन-रात चलते हैं, हंसते हैं, गाते हैं। उनसे उनका सुंदर, बहुत अमृत होता है। सुख-दुख के विविध अनुभव बांटे हैं।
उनकी संघर्ष क्षमता बढ़ती है। उन्हें लिए दिए संजाल में जब वे निकलते हैं, तब अन्य नदियों के साथ भी उनके सरोकार बनते हैं। छोटी नदियां बड़ी नदियों में मिलती हैं और बड़ी नदी समुद्र में।
इस तरह से छोटी-छोटी अनेक नदियां स्थानीय रूप से राष्ट्रीय एकता के आधार सूत्र तैयार करती हैं और आमजन की जीवन शिराओं में रक्त की तरह बहती हैं। उनके जीवन-मरण के गहरे संबंध तो अपनी नदियों से ही होते हैं।
वे जो अन्न फल खाते हैं, जो पानी पीते हैं, बिजली का प्रकाश जो पाते हैं — उन सब में उनकी नदियां होती हैं। प्रतिदिन शरीर को स्वच्छ, शीतल करने वाली नदियां होती हैं। विद्युत द्विध्रुव में उनकी विविध छवियां करने वाली अपनी नदियां होती हैं।
सही अर्थों में मां होती हैं, सहेली होती हैं, स्वप्न होती हैं, जागृति होती हैं। उनके विविध अनुभव और सुंदर चेतना में ही वे सभी समय हैं।
जब देश के इस कोने से उस कोने तक के लोग आपस में ना मिलते, तब मानव की नदियां ही आपस में मिल रही होती हैं। वही अपने-अपने क्षेत्र के लोगों के अनुभव में समाहित हो एक-दूसरे से धुल-मिल जाती हैं और एक ठोस महान राष्ट्रीय परिदृश्य की रचना होती रहती है।
डॉ. सीमा शेखर
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