मीरा

कान्हा-प्रेम के प्रसून-सी प्रीत के पालने में पली 

Jun 21, 2024 - 16:50
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मीरा
MEERA

थार की धूल में
पावन बयार बन बही
अभिमंत्रित अविरल
अभिसंचित थी जग में
महकी कुडकी की
मोहक मिट्टी में
कान्हा-प्रेम के प्रसून-सी
प्रीत के पालने में पली 
झील के निर्झर किनारे पर
भक्ति की गूँज-सी 
अंतरमन को कचोटती 
व्याकुल कथा-सी 
जेठ की दोपहरी
लू के थपेड़ों में ढलती 
खेजड़ी की छाँव को
तलाशती तपिश-सी 
सूर्यास्त के इंतज़ार में
जलती धरा-सी
क्षितिज के उस पार
आलोकित लालिमा-सी 
अकल्पित अयाचित
उत्ताल लहर बन लहरायी 
मेवाड़ के चप्पे-चप्पे में
चिर-काल तक चलती 
हवाओं में गूँजती
प्रेमल साहित्यिक सदा थी 
जग के सटे लिलारों पर लिखी
प्रेम की अमर कहानी   
उदासी, वेदना, करुणा की
एकांत संगिनी 
पीटती लीक पगडंडियाँ-सी   
प्रीत की पतवार से खेती नैया
लेकर आयी मर्म-पुकार 
रेतीले तूफ़ान में 
स्पंदित आनंदित हो ढली 
शीतल अनल-शिखा-सी 
मीरां थी वह। 

अनीता सैनी 

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