अतीत के झरोखे से - संस्मरण डॉ. धर्मवीर भारती – मेरे साहित्यिक गुरु

यह लेख लेखक की प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. धर्मवीर भारती से पहली मुलाकात का भावपूर्ण वर्णन है। इस मुलाकात ने लेखक के जीवन और लेखन दोनों को नई दिशा दी। उनके विचार, व्यक्तित्व और साहित्यिक दृष्टि ने लेखक को गहराई से प्रभावित किया और उसे साहित्य के वास्तविक अर्थ से परिचित कराया

Apr 11, 2026 - 13:40
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अतीत के झरोखे से - संस्मरण  डॉ. धर्मवीर भारती – मेरे साहित्यिक गुरु

    जीवन में कुछ मुलाक़ातें ऐसी होती हैं जो क्षणभर की नहीं, बल्कि सदा के लिए मन में बस जाती हैं। मेरे जीवन में ऐसी ही एक पवित्र भेंट थी- डॉ. धर्मवीर भारती से पहली मुलाक़ात। वह दिन जैसे मेरे जीवन की दिशा बदल गया। लगा, मानो किसी अंधेरे में अचानक दीपक जल उठा हो और भीतर तक प्रकाश फैल गया हो।
धर्मवीर भारती जी का मुंबई स्थित आवास मानो साहित्य का मंदिर था। समुद्र की लहरों की ध्वनि, हवा में घुली स्याही की गंध और चारों ओर फैली पुस्तकों की आत्माएँ-सब कुछ एक आध्यात्मिक वातावरण रचते थे। भीतर प्रवेश करते ही ऐसा लगा जैसे शब्दों के समंदर में उतर आया हूँ। दीवारों पर उनके हस्ताक्षरित पत्र, मेज़ पर बिखरे संपादकीय नोट्स, और अलमारियों में सजे ग्रंथ-सब उनके साहित्यिक जीवन की जीवंत गवाही थे।
उनकी पत्नी, पुष्पा भारती जी, सादगी और आत्मीयता की प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘आइए, भारती जी आपका इंतज़ार कर रहे हैं।’ वह मुस्कान मेरे भीतर की घबराहट मिटा गई। जब धर्मवीर जी सामने आए, तो लगा जैसे गंभीरता और विनम्रता ने एक साथ रूप ले लिया हो। उनकी आँखों में गहराई थी, पर स्वर में अपनापन।

उन्होंने मुझसे ‘कामायनी’ पर बात करते हुए कहा-
‘यह काव्य केवल शब्दों की यात्रा नहीं, यह आत्मा की साधना है। जब तक तुम इसे अनुभव नहीं करोगे, मंच पर नहीं जी सकोगे।’
उनकी यह पंक्ति मेरे लिए किसी मंत्र जैसी थी। उसी क्षण मैंने निश्चय किया कि ‘कामायनी’ को मंच पर आत्मा के भाव से साकार करूँगा।
कुछ ही दिनों बाद उनके घर पर एक साहित्यिक गोष्ठी हुई, जिसमें अमृता प्रीतम और विंदा करंदीकर जैसे महान कवि उपस्थित थे। वह शाम शब्दों का उत्सव बन गई थी। अमृता जी के स्वर में प्रेम की व्यथा थी, तो विंदा जी के विचारों में सामाजिक यथार्थ की गूँज। धर्मवीर

 जी ने दोनों को जोड़ते हुए कहा—
‘साहित्य वह धारा है जो भाषा से नहीं, भाव से बहती है। जहाँ भाव सच्चे हैं, वहाँ साहित्य स्वयं प्रकट होता है।’
उस क्षण लगा, मैं उस पवित्र गंगा में स्नान कर रहा हूँ जहाँ शब्द नहीं, संवेदनाएँ बहती हैं।
धर्मवीर जी के यहाँ की हर गोष्ठी विचारों की पाठशाला थी। उन्होंने सिखाया कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, समाज की आत्मा का दर्पण है।
एक दिन मैंने देखा-वह और पुष्पा जी चर्चा कर रहे थे, विषय था क्या फ़िल्मी गीत साहित्य का अंग हो सकते हैं?
धर्मवीर जी ने कहा, ‘फ़िल्मी गीत क्षणिक होते हैं, उनमें स्थायी चिंतन का अभाव है।’

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पुष्पा जी मुस्कराईं-‘पर भावनाओं का सच्चा चित्रण भी तो साहित्य है। ‘तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा नहीं’ जैसी पंक्तियाँ क्या कविता से कम हैं?’
उनकी इस बहस ने मुझे सिखाया कि साहित्य सीमाओं में नहीं बंधता। वह गीत में भी है, मौन में भी।
हर मुलाक़ात में धर्मवीर जी मुझे नयी दृष्टि देते। वे कहते,
‘लेखन में अगर जीवन की आँच नहीं होगी, तो शब्द ठंडे पड़ जाएँगे।’
उनकी बातें मेरे भीतर गूँजती रहीं। उन्होंने सिखाया कि साहित्य का उद्देश्य केवल रचना नहीं, समाज की चेतना को जगाना है।
अपने अंतिम दिनों में जब मैं उनसे मिलने गया, वे बहुत कमज़ोर थे, पर आँखों में वही तेज़ था।

 उन्होंने मेरा हाथ थामकर कहा-
‘लिखना कभी मत छोड़ना, क्योंकि शब्द ही आत्मा का श्वास हैं।’
उनकी वह वाणी मेरे हृदय में स्थायी रूप से बस गई। उस क्षण मुझे लगा, जैसे किसी ऋषि से दीक्षा मिली हो।
आज जब मैं अपने लेखन की ओर देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि धर्मवीर जी ने न केवल मेरी लेखनी को दिशा दी, बल्कि मेरे सोचने का तरीका भी बदल दिया।
वे केवल मेरे साहित्यिक गुरु नहीं, जीवन के पथप्रदर्शक थे।
उनके विचारों ने मुझे यह विश्वास दिया कि जब तक शब्द सच्चे हैं, तब तक लेखक अमर है।
धर्मवीर भारती जी अब नहीं हैं, पर उनका साहित्य आज भी जीवित है-हर उस पंक्ति में जहाँ संवेदना और सच्चाई एक साथ साँस लेती है। वे मेरे गुरु हैं-क्योंकि उनका दिया हुआ ‘शब्द’ आज भी मेरी आत्मा का स्वर है।'

मिलिंद

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