वृतांत : भूख और ईमानदारी

यह कहानी एक फैक्ट्री मजदूर सोनू की है, जिसका टिफिन रोज कोई खा जाता है और वह भूखा रह जाता है। जब वह अपनी समस्या लेकर ऑफिस पहुंचता है, तो शुरू में उसे गलत समझा जाता है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी गरीबी, संघर्ष और परिवार की जिम्मेदारियों का दर्द सामने आता है। कहानी का सबसे भावुक क्षण तब आता है जब सोनू अपने टिफिन चुराने वाले पप्पू को माफ कर देता है। यह कहानी इंसानियत, करुणा और मानवीय संवेदनाओं का गहरा संदेश देती है।

May 20, 2026 - 13:00
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वृतांत : भूख और ईमानदारी
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कंपनी के मेन गेट पर हर सुबह की तरह आज भी चहल-पहल थी। कर्मचारी अपने-अपने निर्धारित समय पर काम पर पहुंच रहे थे, और सुरक्षा गार्ड्स बड़े मुस्तैदी से उनकी जांच कर रहे थे। यह वही सामान्य शिफ्ट का समय था, जो सुबह ८ बजे से शाम ५ बजे तक चलती है। चहल-पहल सबसे ज्यादा इसी समय पर होती है, जब लगभग सभी कर्मचारी एक साथ अंदर आ रहे होते हैं।
सुबह के ७:५० बज रहे थे, और गेट पर सफाई कर्मचारी बड़े जोश से झाड़ू लगा रहा था। हर बार की तरह, जैसे ही उसने किसी बड़े अधिकारी को आते देखा, वह झाड़ू रोक देता, ताकि धूल उड़ने से अधिकारी परेशान न हों। अधिकारी हमेशा की तरह बिना किसी प्रतिक्रिया के, सिर्फ रोब से चलते हुए, गुजर जाते। मैं भी हर रोज की तरह अपनी बस से उतरा और मेन गेट की ओर बढ़ा। सुरक्षा अधिकारी से औपचारिक दुआ-सलाम की, परंतु मेरा ध्यान आसपास की हलचल पर था, जैसे मेरा यह रोज़ का कार्य हो। मैं अपनी आदत के अनुसार पंचिंग मशीन तक पहुंचा और उंगली को मशीन पर रखा। मशीन से तेज़ आवाज़ आई, जो यह संकेत देती थी कि मेरी उपस्थिति दर्ज हो गई है।
ऊपर ऑफिस में पहुंचते ही, मेरी मेज पर फोन की घंटी बज उठी। दूसरी तरफ सीसीटीवी ऑपरेटर था, जिसने मुझे बताया कि एक मजदूर अपने टिफिन के बारे में देखना चाहता है कि कौन उसके  टिफिन से खाना रोज खा लेता है और उसे रोज़ भूखा छोड़ देता है।
मुझे यह सुनते ही गुस्सा आ गया। `जरूर यह मजदूर नेता बनने की कोशिश कर रहा है,' मैंने सीसी टीवी ऑपरेटर से कहा। सीसीटीवी फुटेज को देखने की इजाजत माँगने की उसकी हिम्मत देखकर मैं अचंभित था। मन में पहले ही तय कर लिया था कि उसे ऑफिस में बुलाकर उसे जमकर डाँट लगाऊंगा। हमारे कंपनी में यह एक स्थापित तथ्य था- जिसे भी ऑफिस में अंदर से बुलाया गया, उसे डाँट तो जरूर पड़ती थी। और कभी-कभी, डाँट इतनी सख्त होती कि सामने वाले की आँखें तक भर आतीं।
वो मजदूर मेरे के सामने शीशे वाले दरवाजे के सामने खड़ा था मैंने उसे इशारे से अंदर बुलाया। वह मजदूर अंदर आया, उसके चेहरे पर गहरी चिंता और भय की लकीरें साफ़ दिख रही थीं। उसकी आंखों में हल्की सी चमक थी, जैसे उसने उम्मीद की आखिरी किरण दिख रही हो।

`क्यों, क्या बात है?' मैंने सख्ती से पूछा, `क्या तुम नेता बनने की कोशिश कर रहे हो? सीसीटीवी फुटेज देखने की हिम्मत कैसे की बिना किसी से पुछे’? क्या नाम है तुम्हारा? कब से काम कर रहे हो कंपनी मे?’
वह कांपती आवाज़ में बोला, `साहब, मेरा नाम सोनू है, मैं लगभग २.५ साल से काम कर रहा हूँ। मैं नेता बनने नहीं आया हूँ साहब, मैं बस यह जानना चाहता हूँ कि कौन है जो रोज़ मेरा टिफिन खा लेता है। बस साहब और कुछ नहीं।'
इतना कहते-कहते, उसकी आंखों में आंसू आ गए। वह माफी मांगते हुए बोला, `साहब, गलती हो गई, अब कभी नहीं करूंगा। माफ कर दीजिये।'
मैंने उसे देखा और उसकी आंखों में छुपे दर्द को महसूस किया। मुझे शब्द नहीं मिल रहे थे, लेकिन मेरा दिल कह रहा था कि सोनू से और बात करूँ, उसके घर के बारे में पूछूं। मैंने धीरे से पूछा, `सोनू, तुम्हें कैसे पता कि किसी ने तुम्हारा टिफिन खा लिया है?'
सोनू ने कहा, `साहब, अम्मा मुझे रोज सुबह ९-१० रोटियाँ देती है। लोडिंग पर काम करता हूँ तो बहुत मेहनत लगती है और भूख भी बहुत लगती है साहब। और आज तो अम्मा ने रोटी और चटनी बनाई थी साहब। रोटी इतनी कम अम्मा नहीं दे सकती, और चटनी भी बर्तन से गिरा हुआ मिला था साहब। मेरा टिफिन रोज कोई खा लेता है और साहब मैं भूखा रह जाता हूँ।'
उसकी बातें सुनकर मेरा दिल भारी हो गया। मैंने धीरे से पूछा, `सोनू, घर में कौन-कौन है?' सोनू ने जवाब दिया, `चार भाई हैं साहब, सब मुझसे बड़े हैं। सबकी शादी हो गई है, और सब अलग-अलग रहते हैं। मेरे पास अम्मा, पापा और बहन हैं साहब।' उसकी आवाज़ अब थोड़ी कांपने लगी थी। `साहब, पापा को लकवा मारा हुआ है, घर पे रहते हैं। जो कमाता हूँ, उसी से चारों लोग खाते हैं साहब।'
मैंने पूछा, `और बहन? उसे पढ़ा रहे हो?'

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सोनू ने निराश स्वर में कहा, `साहब, हम गरीब हैं, हम उसे पढ़ा नहीं पाए। अब उसकी शादी करनी है।'
इतना सुनकर मेरे दिल में करुणा उमड़ आई। मैंने अपनी जेब से ५० रुपए का नोट निकाला और सोनू को देते हुए कहा, 'इसे ले और जाकर कुछ खा ले। सीसीटीवी में जाकर जरूर देखना कि किसने तुम्हारा टिफिन खाया। और हाँ, मुझे आकर जरूर बताना।'
सोनू ने लपककर वह पैसा लिया और चला गया। उसके जाने के बाद, मैं अपनी कुर्सी पर बैठा रहा, सोचता रहा कि इस दुनिया में ऐसे कितने सोनू होंगे, जो अपनी भूख, अपनी मजबूरियों और अपने सपनों के बीच झूलते रहते हैं। उस दिन सोनू के चेहरे की उदासी और उसकी आँखों में छुपे दर्द ने मुझे सिखाया कि जीवन में कभी-कभी छोटी-छोटी चीज़ें भी बड़ी गहरी छाप छोड़ जाती हैं। उसकी सादगी और ईमानदारी ने मुझे यह अहसास दिलाया कि हर इंसान की अपनी एक अनकही कहानी होती है, जो सिर्फ समझे जाने की प्रतीक्षा करती है।

सोनू कुछ देर बाद खिड़की पर आकार बताया कि साहब वो लड़का पप्पू है जो फ़िल्टर विभाग मे काम करता है उसी ने मेरा टिफिन खाया है मैंने कहा ठीक है तुम जाओ, क्या तुमने समोसा खा लिया? क्या तुम्हारा पेट भर गया ? सोनू ने कहा हा साहब और कह कर चला गया । अब मैंने फ़िल्टर विभाग से पप्पू को बुलाया पप्पू आया मैंने उससे पूछा कि आज सुबह उसने खाना खाया  वो बोला हा साहब खाया, मैंने  कहा तुमने सोनू का टिफिन क्यूँ खाया वो हँसते हुये बोला भूख लगी थी तो खा लिया अब नहीं खाऊँगा मैंने उसे डांटते हुये बोला कि ये क्या बात होती है तुमको भूख लगी और तुमने सोनू का टिफिन खा लिया और वो बहकारा भूखा रहा ये गलत बात है । तुमको ऐसा नहीं करना चाहिए, पप्पू बोला ठीक है साहब आगे से नहीं खाऊँगा उसका टिफिन । मैंने कहा कि तुम्हारा टिफिन कहाँ है वो बोला कि गेट पे है मैंने कहा जाओ उसे ले आओ आज तुम्हारा टिफिन सोनू खाएगा और तुम भूखे रहोगे, यही सजा है तुम्हारी । वो चला गया और कुछ देर बाद अपनी टिफिन के साथ आया मैंने सोनू को भी बुला लिया सोनू से कहा ये पप्पू है इसी ने तेरा टिफिन खाया है तू इसका खा ले सोनू ने पप्पू को देखा और धीरे से कहा नहीं साहब ये भूखा रह जाएगा  जाने दो एसे ही खाने दो उसका टिफिन हैं साहब मैंने तो आपने जो पैसे दिये थे समोसे खा लिए हैं साहब  पेट भी भर गया है ...... जाने दो साहब इसे खा लेने दो साहब....... उसकी आवाज में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक इंसानियत की झलक थी, जो मेरी आँखों में आंसू ले आई।

मैंने उसे बैठने के लिए कहा और खुद को संभालने की कोशिश की। उसकी सरलता और उसकी दया ने मुझे अंदर तक हिला दिया था। 
जब वह मजदूर जाने लगा, तो मैंने उसे रोककर कहा, 'तुमने आज मुझे एक बहुत बड़ी सीख दी है। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। तुमने जिस दया का परिचय दिया है, वह हमें सबक सिखाती है कि हर इंसान की अपनी लड़ाई होती है, और हमें उसकी परिस्थितियों को समझने की कोशिश करनी चाहिए।'
वह मजदूर हल्के से मुस्कुराया और मेरे ऑफिस से बाहर चला गया। उसकी सरलता, उसका दिल, और उसकी दया ने उस दिन मुझे यह सिखाया कि जीवन की असली कीमत उन छोटी-छोटी अच्छाइयों में छुपी होती है, जो हम एक-दूसरे के लिए करते हैं।

आमोद कुमार श्रीवास्तव

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