बेटी हुई परायी

यह कहानी प्रियंका की है, जो अपने परिवार के लिए बचपन से ही त्याग करती रही। आर्थिक कठिनाइयों में उसने घर संभाला, लेकिन शादी के बाद वही घर उसके लिए पराया हो गया। जब वह अपनी गंभीर बीमारी (ब्रेन ट्यूमर) के इलाज के लिए चुपचाप मदद लेती है, तो उसी बात को लेकर उसे अपनों के ताने और आरोप झेलने पड़ते हैं। अंततः वह बिना सच्चाई बताए घर छोड़ देती है, हमेशा के लिए।

Apr 13, 2026 - 11:14
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बेटी हुई परायी
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    ‘ऐसा क्यों है कि जिस घर में बेटी का जन्म हुआ, जिस आँगन को अपना मानकर,खेली, बड़ी हुई, जिन रिश्तों को अपना मानकर वह उन पर हक जताती रही – वे रिश्ते और वह आँगन विवाह होने के पश्चात् उसके अपने नहीं रहते? ऐसा क्या है, कि जिन आँखों में उसके लिए स्नेह और अपनापन रहता था, उन्हीं आंखों में विवाह के पश्चात बेटी के लिए परायापन झलकने लगता है? किसकी गलती है यह? समाज की? परिवार की? बेटी की? या किसी और की? प्रियंका दीवार पर टंगी एक तस्वीर को देखकर यही सब सोच रही थी। इस तस्वीर में उसके माता पिता, भाई, भाभी, दीदी सभी तो थे, केवल उसे छोड़कर। प्रियंका ने उस तस्वीर को धीरे से उतारा और गौर से तस्वीर को देखने लगी। आँखों से बहती अविरल अश्रुधारा ने उस तस्वीर को भिगोना शुरू कर दिया था। उसे धीरे-धीरे उसका बचपन याद हो आया, जब उसके मम्मी-पापा उसे बहुत प्यार करते, उसकी हर जिद पूरी करने की कोशिश करते, पापा तो भैया और दीदी से ज्यादा उसे ही प्यार करते थे धीरे-धीरे जब वह बड़ी हुई तब उसके घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई, पर पापा ने हमारी ज़रूरतों और घर के हालात ठीक करने के लिए कुछ लोगों से कर्ज़ लिया। वे लोग रोज़ सुबह घर आते और कर्ज़ चुकाने की बात करते। पापा उनसे विनती करते और कुछ दिनों की मोहलत माँगते। मम्मी के सारे गहने बिक चुके थे और घर गिरवी पड़ा था। मम्मी अब चुपचाप रोने लगी थीं। घर में ऐसा माहौल था कि डर लगने लगा था। ईश्वर से हमेशा प्रार्थना करती कि हे प्रभो ! मुझे इतना सक्षम बना कि मैं अपने माता-पिता के चेहरों पर खुशी बिखेर सकूँ'. पैसे कैसे कमाऊँ, मुझे समझ नहीं आ रहा था, क्योंकि मैं स्वयं मात्र १७ वर्ष की थी'.


`फिर भी मैने पढ़ाई के साथ-साथ छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और यह सिलसिला तब तक चला, जब तक कि मेरी शादी नहीं हो गई. घर को आर्थिक बोझ से मुक्त कराने और परिवार की जिम्मेदारी उठाने में मैं इतनी खो चुकी थी कि स्वयं के अस्तित्व को भी भुला बैठी थी. बस जीवन का एक ही लक्ष्य था - परिवार की खुशी और अब... अब शादी हो गई, बच्चे भी हो गए और वह घर, जिसकी एक-एक ईंट हमने बड़े अरमानों से रखी, उसी घर के आँगन से पराएपन की बू आती है। घर की हवा भी अब अपनी नहीं लगती। आज जो कुछ भी मेरे साथ हुआ, शायद उसे मैं ताउम्र ना भुला पाऊं। शायद अब मैं हक के साथ न कह पाऊं कि वह घर मेरा भी है।’ सोचते-सोचते प्रियंका की आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली।
पास ही बैठी प्रतिज्ञा, काफी समय से प्रियंका को देखे जा रही थी। प्रियंका के अश्रुपूरित मुख को देखकर वह बोल पड़ी
`रो मत प्रियंका!' प्रतिज्ञा ने उसके आँसुओं को पोंछते हुए कहा.
`क्या हुआ था वहाँ तेरे साथ?'

`रहने दे प्रतिज्ञा, मत पूछ, मैं बता नहीं पाऊँगी'।
`ठीक है तेरी मर्ज़ी, लेकिन मैंने सुना है कि बताने से बोझ हल्का हो जाता है. बता ना यार... तेरा मन हल्का हो जाएगा'।
`क्या बताऊँ यार, यही कि मेरे जन्मदाता ही आज मेरे लिए अजनबी हो गए? यह कि मैं शायद जीवन भर उस घर में कदम भी नहीं रख पाऊँगी?'
`ऐसा क्या हुआ था वहाँ?' प्रतिज्ञा ने सहमी-सहमी नज़रों से प्रियंका के चेहरे को बड़े गौर से देखा, जो कि गुस्से के साथ-साथ अश्रुओं से भी भरा था।
प्रियंका आज सुबह घटित घटना को याद करते हुए कहने लगी, `आज सुबह मैं अपने पीहर गई थी। बहुत खुश थी मैं यह सोचकर कि आज का दिन मम्मी-पापा और भाई-भाभी के साथ बिताऊँगी, लेकिन मुझे क्या पता था कि आज का दिन मेरा उस घर में अंतिम दिवस सिद्ध होगा!' कहते-कहते प्रियंका शांत हो गई और खिड़की से बाहर देखने लगी, जहाँ चंद्रमा और बादलों के बीच आँख-मिचौली का खेल चल रहा था।
`फिर?' प्रतिज्ञा की आवाज ने प्रियंका की तंद्रा भंग की।

`फिर क्या? मैं घर के बाहर मम्मी के साथ बैठकर बातें कर रही थी कि तभी मुझे भाभी और भाई के लड़ने की आवाजें सुनाई देने लगीं'।
`किस बात को लेकर?' कहते हुए प्रतिज्ञा एकाएक अपने स्थान पर खड़ी हो गई।
`कुछ देर तक तो मैंने सबकुछ अनसुना कर दिया, किन्तु भाई की कुछ बातें मेरे कानों तक पड़ीं तो मैं स्तब्ध रह गई. मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई'।
`ऐसा क्या सुना तुमने?' प्रतिज्ञा ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को बिल्कुल छोटा करते हुए पूछा।
`क्या? भाई, भाभी से कह रहे थे - `हमने इतने रुपये उसको दे दिए?''
`हाँ', भाभी की दबी सी आवाज़ आई.

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`मगर... तुम्हें पता है ना मुझे उन रुपयों की कितनी ज़रूरत थी? मैंने तुमसे कहा था कि इन रुपयों को संभालकर रखना, मुझे व्यापार में इनकी ज़रूरत पड़ेगी. तो फिर? अब मैं क्या करूँ?' भाई ने चिल्लाकर कहा।
`लेकिन... वह भी तो तुम्हारी बहन है. यदि मैं समय पर उन्हें उसे रुपये न देती तो हो सकता था कि तुम्हारी बहन किसी बड़ी मुसीबत में पड़ जाती'।
`अरे कैसी मुसीबत? ये सब उसके नाटक हैं, तुमसे पैसे ऐंठने के। तुम इतनी सीधी क्यों हो? किसी की भी चिकनी-चुपड़ी बातों में आ जाती हो? आज के बाद मैं तुम्हें रुपये लाकर कभी नहीं दूँगा और यह मेरा आखिरी फैसला है'। चिल्लाकर भाई ने कहा और गुस्से से कमरे से बाहर निकले। घर से बाहर निकलते ही जब उनकी दृष्टि मुझ पर पड़ी तो ठिठक कर खड़े हो गए, एक कठोर दृष्टि मुझ पर डालते हुए बाहर चले गए। मैंने आँखें झुका लीं। मैं आत्मग्लानि से ज़मीन में गड़ी जा रही थी। मुझे इस बात की ग्लानि हो रही थी कि मेरी वजह से आज भाई और भाभी के बीच झगड़ा हो चुका था। उधर मम्मी ने भी जब इस पूरी घटना को सुना और बेटे को गुस्से में बाहर जाते देखा तो वे भी मुझे गुस्से भरी नज़रों से देखने लगीं और कहने लगीं, `तूने तेरी भाभी से रुपये लिए और हमें किसी को नहीं बताया. आज तुझे बेटी कहते मुझे शर्म आती है। तेरी वजह से देख, घर में कितना क्लेश हो गया है। तेरा भाई बिना कुछ खाए पीए ही घर से चला गया। उसका न जाने कितना महत्वपूर्ण काम रुक गया होगा। वह चिंता से भरा जा रहा है, लेकिन तुझे इससे क्या फर्क पड़ता है'? मम्मी बिना रुके गुस्से में मुझ पर बरसती रहीं और मैं उनके सामने अपना पक्ष भी नहीं रख सकी। मैं वहाँ से उठकर भीतर चली गई। मैंने भी अपना बैग उठाया और एक बार घर की ओर देखा और जाने के लिए मुड़ी ही थी कि भाभी की आवाज़ आई - `दीदी, रुको!'
`अब मुझे जाना ही होगा... नहीं भाभी, मत रोको मुझे, शायद सही मायनों में आज ही मेरी विदाई हो रही है, वापस ना आने के लिए। तुमने मेरा बहुत साथ दिया भाभी, बस इतना ध्यान रखना - यह राज़, राज़ रहे कि तुमने मुझे रुपये क्यों दिए थे?'
`नहीं दीदी, मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगी. ऐसे तो आप उनकी नज़रों में बुरी ही बनीं रहेंगी?' भाभी ने रोते हुए कहा।
भाभी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए और उन्हें ढांढस बंधाते हुए मैंने कहा - `नहीं भाभी, तुम्हें हिम्मत नहीं हारनी है. अगर तुमने सभी को बता दिया कि तुमने रुपये मुझे क्यों दिए थे तो शायद ये सब जीते-जी मर जाएंगे'।
`मगर दीदी..?'

`बस! भाभी, अब इस बिंदु पर हम कभी बात नहीं करेंगे। मुझे क्षमा करना कि मेरी वजह से तुम्हारे और भाई के बीच झगड़ा हुआ। घर का और अपना, सभी का अच्छे से ख्याल रखना, मैं चलती हूँ'. कहते-कहते मेरी आँखों में आँसू भर आए, और मैंने उस घर से, जहां मेरा जन्म हुआ,से हमेशा के लिए विदाई ले ली, प्रतिज्ञा.हमेशा के लिए विदाई!’ कहकर, प्िरयंका फूट-फूटकर रोने लगी।
`मुझे पता है, तू गलत नहीं है. तुझे गलत हालात ने बनाया है। लेकिन सच-सच बता, तूने वे रुपए भाभी से क्यों लिए थे? मुझे तो बता ही सकती है न'।
काफ़ी देर तक मौन रहने के पश्चात् प्रियंका ने कहना शुरू किया, 'प्रतिज्ञा,काफी समय से मेरे सिर में असहनीय दर्द बना रहता था, एक दिन मैंने जाँच करवाई तो पता चला कि मुझे ब्रेन ट्यूमर है। हालाँकि यह ऑपरेशन से निकल जाएगा और डॉक्टर ने कहा है कि घबराने की कोई बात नहीं है, ट्यूमर इतना फैला नहीं है, लेकिन समय से ऑपरेशन करवा लेना आवश्यक है, इसलिए मैं रुपयों का इंतज़ाम कर रही हूँ। घर की आर्थिक स्थिति तो तू जानती ही है। मैंने घर पर किसी को नहीं बताया, वो तो मेरी रिपोर्ट्स भाभी ने देखी और मेरी हालत समझकर मुझे रुपये दे दिए उन्होंने'।

`क्या?...... तुझे ब्रेन ट्यूमर है?' प्रतिज्ञा अवाक रह गई।
`पागल! और तू मुझे अब बता रही है? घरवालों को किसी को नहीं बताया तूने? सब कुछ अकेले ही करने की जिम्मेदारी ली है तूने? बचपन से ही तू ऐसी है, सब कुछ अकेले ही करना है। तू कल भी अपने घर वालों के लिए मर रही थी और आज भी मर रही है। जीजाजी और बच्चों के बारे में भी सोच लिया कर। चल उनके लिए ना सही, अपने खुद के बारे में तो सोच सकती है तू?' बोलते-बोलते प्रतिज्ञा का चेहरा लाल हो गया और आँखों में क्रोध और चिंता के भाव उतर आए।
`अरे! बस कर प्रतिज्ञा, इतना गुस्सा मत कर, वरना पता चला कि तेरी भी तबीयत खराब हो गई तो जीजाजी मार डालेंगे मुझे' प्रियंका ने हँसकर कहा।
`बस ऐसे ही हँसती रहा कर! तू जल्दी ही ठीक हो जाएगी। रहा तेरा इलाज, वो हम करेंगे, तू घबरा मत। तू मुझे अपनी रिपोर्ट्स मेल कर दे, मेरी पहचान में एक न्यूरोलॉजिस्ट है, उनका अपॉइंटमेंट मैं आज ही ले लेती हूँ। तू चिंता मत कर. मैं बात कर लूँगी। चलती हूँ, वो घर पहुँचने वाले होंगे, फिर मिलते हैं, बाय!'

`बाय प्रतिज्ञा..!' प्रियंका ने हाथ हिलाकर प्रतिज्ञा को अलविदा कहा और मेज़ पर पड़ी तस्वीर को उठाकर पुनः दीवार पर टाँक दिया. कुछ देर तक तस्वीर को निहारती रही और हल्की सी मुस्कान के साथ बड़बड़ाने लगी - `सही मायनों में मैं आज परायी हो गई'. और एक लम्बी साँस छोड़कर फिर से अपने रोज़मर्रा के काम में लग गई।

डॉ. पीतांबरी

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