स्वतंत्र भारत, अहसास एवं अनुभूत अभिव्यक्ति

यह लेख स्वतंत्रता के 78 वर्षों में भारतीय समाज, राजनीति, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों में आए व्यापक परिवर्तनों का विश्लेषण करता है। इसमें लोकतंत्र, संविधान, नैतिकता, राजनीति, आरक्षण, शिक्षा, सामाजिक विघटन, परिवार व्यवस्था और सांस्कृतिक चेतना जैसे विषयों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया गया है। लेख यह दर्शाता है कि समय के साथ समाज और राजनीति में अनेक बदलाव आए, लेकिन राष्ट्र आज भी प्रगति और वैश्विक सम्मान की ओर अग्रसर है।

May 20, 2026 - 13:36
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स्वतंत्र भारत, अहसास एवं अनुभूत अभिव्यक्ति
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स्वतंत्रता के ७८ वें वर्ष में हमारे सामाजिक चरित्र और आचरण ने न जाने कितने परिवर्तन देखे,परखे,अपनाए और ठुकराए। जनवरी के माह से ही नए साल की शुरुआत होती है और आता है एक मात्र ऐसा त्यौहार संक्रांति जो पूरे देश में अलग अलग नामों से एक ही दिन मनाया जाता है। जनवरी की ही २६ को हमारे देश की छोटी छोटी रियासतों के समूह को राष्ट्र संबोधन संज्ञा मिली। प्रजातंत्र की रीढ़ के रूप में सशक्त संविधान अस्तित्व में आया। इसी जनवरी की ३० ता को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भी महाप्रयाण दिवस है। देश राजशाही से मुक्त हुआ और प्रजातंत्र से युक्त हुआ। प्रजातंत्र के शासक दिनोदिन स्वेच्छाचारी और प्रजा स्वतंत्रता की आड़ में उच्छृंखल होती गई। लोग स्वतंत्र तो हुए लेकिन आत्म अनुशासित और स्वाधीन नहीं रह पाए। नैतिकता किताबी भाषा का शब्द होकर रह गई। व्यवस्थाएं बदलने पर आचरण का बदलना स्वाभाविक है। स्वतंत्रता के जोश और उत्साह में लोग देश,राष्ट्र और संस्कृति को गौड़ मानने लगे, उनके व्यक्तिगत स्वार्थ,झूठे अहम मुख्य हो गए। 
ये वस्तुतः राष्ट्र और समाजिक एकता की उस शक्ति पर भारी पड़ने लगे जिसने  ब्रिटिश शासकों को खदेड़ने में अहम भूमिका अदा की थी। आजादी के बाद सत्ता की मलाई की बंदर बांट में तथाकथित स्व नाम धन्य सत्ताधीशों ने साम्प्रदायिकता की आग में देश को बांट कर न जाने कितने निर्दोष निरीह अबोध देशवासियों की बलि पर खुद को सत्ता पर काबिज कर लिया। इस यथार्थ को दर्द को झेलने वाले ही जानते हैं। राजनीति लंबे समय तक आम जनता के लिए रेगिस्तान में छद्म मृगतृष्णा की पर्याय जैसी रही। जो दिखाया जाता था वो होता नहीं था, जो होता था वो दिखाया नहीं जाता था। खैर ये सब प्रकृति के काल चक्र और नियति के अंग हैं और राजनीति की समाजिक परिभाषा भी। 
इसी दौरान राजा महाराजाओं के उत्तराधिकारी के रूप में नेता नामक व्यक्तित्व का उदय हुआ। जिसकी सोच वहां से शुरू होती है जहां आम आदमी की सोच की ऊंचाई खत्म होती है। इस प्रजाति ने इसी योग्यता के दम पर सत्ता शीर्ष को हथियाये रखने का काम किया। समय-समय पर सूखा बाढ़,भूकंप,कोरोना जैसे प्राकृतिक प्रकोप और तीन युद्ध झेलते हुए देश और समाज सहज प्रवृति से चलता रहा। समय के साथ समाज से सामंजस्य,भाईचारा, सौजन्य और शिष्टाचार से युक्त संबंध क्षीण होते गए। समय के साथ संस्कार और संस्कृति भी करवट लेती रही, संयुक्त परिवार न्यूक्लियर होते गए। एक समय के लोग साधन सुविधाओं से विपन्न थे पर संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों से विपुल सम्पन्न थे। आगे इसका उल्टा होता गया। स्वतंत्रता की इस लंबी यात्रा में कर्तव्यों का प्रति जिम्मेदारी कम होती गई, अधिकारों के आंदोलन बढ़ते गए। सेवा परक राष्ट्र हित एवं नैतिक मूल्य आधारित राजनीति सत्ता के जाल में जकड़ती गई। शिक्षा और चिकित्सा ने भी देखते देखते पवित्र सेवा से व्यवसाय का चोला पहन लिया। शिक्षा रोजगारुन्मुखी हुई लेकिन व्यवहारिक संस्कारों से विमुख करती गई। सत्ता और वोट बैंक के लोभियों ने नाम,रूप और भेष बदल बदल कर लोगों को कभी आरक्षण तो कभी धर्म,संप्रदाय,अगड़े पिछड़े संवर्गों में बांटकर अपने हित साधने का कार्य किया। 
शिक्षा और नौकरी में आजादी के बाद आरक्षण की सुविधा ले रही चौथी पीढ़ी के अधिकारों पर कोई भी सत्ताधारी लगाम नहीं लगा सका। राजनीति का एक वो दौर भी लंबे समय तक देखा गया जिसमें एक मंत्र नेताओं बड़ा सिद्ध मंत्र रहा है। जिसके मूल में था कि जनता को किसी भी काम के लिए कभी मना मत करो और काम पूरा भी मत करो। मना कर दोगे तो वोट नहीं मिलेगा और यदि पूरा काम कर दोगे तो कद्र और वोट दोनों पूरे से मिलना बंद हो जाएंगे। समय के साथ प्रिंट और सोशल मीडिया ने लोगों की जागरूकता बढ़ाई और नेताओं की सोच,समझ और नीतियों के तौर तरीके में परिवर्तन आया। परिवर्तन के दौर में राजनीति जो आजादी की लड़ाई में क्रांति के बिगुल और सेवा के रास्ते शुरू हुई फिर आरक्षण, (प्रâीबीज) मुफ्तखोरी, भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी जैसे ऊबड़ खाबड़ अंधे रास्तों से आगे बढ़ती गई। इसी दौर में देश ने आतंकवाद से जनित सांप्रदायिक दंश को भी झेला। आतंकवाद के कहर ने जहां निरीह निर्दोषों की जान ली वही लोगों के मन से सेक्युलरवाद का भ्रम धीरे धीरे कम होने लगा। समाज और राजनीति में भी सनातन धर्म,संस्कृति और संस्कारों का प्रभाव बढ़ने लगा। देश की अंतरराष्ट्रीय छवि का भी यथेष्ठ उन्नयन हुआ। कुल मिलाकर देश अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में प्रगति की राह में नित नए कीर्तिमान की ओर अग्रसर है यह हम सभी के लिए गौरव का विषय है।
अशोक श्रीवास्तव

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