बच्चों का वाचनालय
यह प्रेरणादायक कहानी पारुल और उसके भाइयों की पहल की है, जो गांव के बच्चों को तेज धूप से बचाने और उनके खाली समय को ज्ञानवर्धक बनाने के लिए एक पुराने खंडहर को बच्चों के वाचनालय में बदलने का विचार देते हैं। गांव के बच्चे मिलकर सफाई करते हैं, पुरानी किताबें और पत्रिकाएं जुटाते हैं तथा हर शनिवार कहानी सुनाने की परंपरा शुरू करते हैं। उनकी मेहनत देखकर प्रशासन भी प्रभावित होता है और खंडहर को एक सुंदर पुस्तकालय तथा पास में खेल का मैदान बना दिया जाता है। कहानी बच्चों की रचनात्मक सोच, पुस्तक-प्रेम, सामूहिक प्रयास और शिक्षा के महत्व का संदेश देती है।
पहाड़ की तलहटी में बसे उस गांव के हरे-भरे खेत, तलहटी में बहती नदी, ठंडी-ठंडी हवा, पक्षियों का कलरव और खुले मैदान पारुल को बहुत पसंद थे। इस बार भी वह अपने भाइयों अमित व रोहन के साथ गर्मियों की छुट्टियों में अपने नानाजी के गांव आ गई थी।
नानाजी के मोहल्ले में बहुत सारे बच्चे थे। सब दिन भर खेलते रहते। बड़ा मजा आता, लेकिन एक बात पारुल को बहुत अखरती थी। बच्चे तेज धूप में बाहर ही खेलते रहते थे। इस वजह से कई बार बीमार भी हो जाते थे।
आज रात को भी जब पारुल सोने लगी तो उसे पड़ोस में रहने वाली रागिनी का ध्यान आने लगा। धूप लगने से उसे तेज बुखार हो गया था और उसके घर में इलाज के लिए पैसे भी नहीं थे। पारुल बहुत उदास हो गई। इसी विचार में वह कब सो गई, पता ही नहीं चला।
अगले दिन उसने अपने भाइयों अमित व रोहन को बुलाया। वह उन्हें घर की छत पर ले गई। वहां से कुछ दूरी पर बिखरा हुआ जंगल दिखाई दे रहा था। थोड़ी ही दूर एक खंडहर भी दिखाई दे रहा था। पारुल ने अपने भाइयों को बताया कि यह खंडहर राजा-महाराजाओं के जमाने का बना हुआ है, जो राज्य की सुरक्षा के लिए आने-जाने वाले सैनिकों के विश्राम के लिए बना था। उसने अपने भाइयों को बताया कि यह खंडहर अभी भी काफी अच्छी हालत में है और इसकी छत मजबूत है।
अमित व रोहन ने आश्चर्य से पूछा, ठपर, तुम यह सब हमें क्यों बता रही हो?ठ
पारुल कहने लगी, ठयहां दिन भर बच्चे धूप में खेलते हैं और इसी वजह से कई बीमार भी हो जाते हैं। घर में नानाजी व मामाजी की कई पुस्तकें व पत्रिकाएं धूल चाट रही हैं। हम सब बच्चों से सलाह कर इस खंडहर को छोटे-मोटे पुस्तकालय में बदल सकते हैं। इस तरह से गांव के सब बच्चे अपना समय अच्छी तरह से बिता सकेंगे तथा ज्ञान भी प्राप्त करेंगे। छाया भी मिल जाएगी और पढ़ने की आदत भी पड़ेगी।ठ
ठहां, अच्छी पुस्तकें व पत्रिकाएं पढ़ने से हमारा मनोरंजन ही नहीं होता, बल्कि इससे हमारे शारीरिक व मानसिक विकास में भी सहायता मिलती है।ठ अमित ने समर्थन किया।
ठयही नहीं, अच्छी पुस्तकें पढ़ने से हमारा विचार-तंत्र समुचित तरीके से विकसित होता है और हममें सोचने-समझने की शक्ति बढ़ती है। अच्छे संस्कार पाने के लिए सद्साहित्य को पढ़ने की ललक पैदा होती है।ठ रोहन ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ठमाना कि शहरी बच्चों का एक वर्ग इंटरनेट व अन्य माध्यमों से ज्ञानार्जन कर रहा है, पर आज भी देश के आम बच्चे ज्ञानार्जन करने, मनोरंजन हेतु और भावी चुनौतियों का सामना करने योग्य बनने के लिए पुस्तकों पर ही निर्भर हैं।ठ
फिर उन तीनों ने अपने नानाजी को अपना विचार बताया। वे बहुत खुश हुए। नानाजी ने कहा, ठबहुत अच्छा विचार है बेटा! घर में पड़ी किताबों का उपयोग भी हो जाएगा और बच्चों को आनंद भी मिलेगा। मैं जब भी शहर जाऊंगा, बच्चों के लिए कुछ नई किताबें व पत्रिकाएं भी लाया करूंगा।ठ
अगले दिन पारुल ने गांव के सब बच्चों को इकट्ठा कर अपनी योजना बताई। पुस्तकों के पठन-पाठन का महत्व बताया। उसने कहा, ठयहां हम कहानियां पढ़ेंगे, कविताएं सुनेंगे, पहेलियां पूछेंगे और एक-दूसरे को सिखाएंगे।ठ सब बच्चों को यह बात बहुत पसंद आई।
सबसे पहले बच्चों ने मिलकर खंडहर तक पहुंचने का रास्ता साफ किया। फिर सभी ने अपने जेब-खर्च में से पैसा इकट्ठा कर मोहल्ले के जमादार को दो सौ रुपये देकर उस खंडहर की सफाई करवा दी। हर शनिवार को 'कहानी का घंटा' रखने का नियम भी बना, जिसमें बारी-बारी से हर बच्चा एक कहानी सुनाएगा।
घर से बच्चे पुरानी दरियां, चटाइयां भी ले आए, जिन्हें बिछाकर बैठने का स्थान बना लिया गया। पुराने टूटे शेल्फ में पुस्तकें, पत्रिकाएं रखने का इंतजाम किया गया। एक कोने में स्याही और स्लेट रख दी गई ताकि नए शब्द सीखे जा सकें। नानाजी ने ढेर सारी पुस्तकें व पत्रिकाएं उन्हें दे दीं। बच्चे भी अपने-अपने घरों से पुरानी पुस्तकें व पत्रिकाएं ले आए। दीवार पर उन्होंने खुद ही लिखा—'बच्चों का वाचनालय'।
अपने इस प्रयास से बच्चे बहुत खुश थे तथा उन्हें पढ़ने में खूब आनंद आने लगा। धीरे-धीरे दूसरे मोहल्ले के बच्चे भी वहां आकर पढ़ने लगे। कुछ बुजुर्ग भी वहां अखबार पढ़ने आने लगे। शाम को दादाजी बच्चों को महापुरुषों की कहानियां सुनाते।
एक दिन गांव में दो परिवारों में झगड़ा हो गया, तो थानेदार अपने सिपाहियों के साथ वहां पहुंचा। शाम के धुंधलके में थानेदार को वहां कुछ लोग नजर आए। प्रायः डाकू ऐसे स्थानों पर ही अपने अड्डे बनाते हैं, अतः किसी गड़बड़ी की आशंका में थानेदार भी वहां पहुंच गया। लेकिन वहां का दृश्य देखकर उसके आश्चर्य की सीमा न रही। साफ-सुथरे खंडहर में बच्चे अच्छी-अच्छी पुस्तकें व पत्रिकाएं पढ़ने में मगन थे। कुछ बच्चे ऊंची आवाज में कविता सुना रहे थे। बच्चों ने बड़े ही करीने से खंडहर को एक वाचनालय और पुस्तकालय में बदल दिया था।
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थानेदार ने जिलाधीश को बच्चों के इस कार्य के बारे में बताया। वह भी बच्चों के इस कार्य से बहुत खुश हुए। शीघ्र ही उन्होंने खंडहर की मरम्मत करवाकर उसे एक अच्छे-खासे पुस्तकालय में तब्दील करवा दिया व पास ही बच्चों के खेलने के लिए एक छोटा खेल का मैदान भी तैयार करवा दिया। उद्घाटन पर जिलाधीश ने कहा, ठईंट-पत्थर की इमारत को बच्चों ने ज्ञान का मंदिर बना दिया।ठ
छुट्टियां खत्म होते ही पारुल व उसके भाई तो चले गए, पर उनकी मुहिम रंग लाई। आज भी उस गांव के बच्चे रोज शाम को 'बच्चों के वाचनालय' में मिलते हैं, किताबें पढ़ते हैं और बड़े होकर देश का नाम रोशन करने का सपना देखते हैं।
राजकुमार जैन राजन
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