कोट की क़ीमत
यह भावुक कहानी सच्ची मित्रता, निस्वार्थ प्रेम और बिना कहे किसी की परेशानी समझ लेने की खूबसूरत मिसाल प्रस्तुत करती है। लंबे समय बाद मिलने वाला एक मित्र अपने साथी के साथ बाजार जाता है, जहाँ उसे ठंड से बचने के लिए एक सुंदर ऊनी कोट पसंद आता है। लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वह उसे खरीद नहीं पाता और फिटिंग का बहाना बनाकर दुकान से लौट जाता है। उसका मित्र उसकी मजबूरी समझ लेता है और बिना कुछ बताए वही कोट खरीदकर स्टेशन पर उसके लिए ले आता है। मित्र का यह अप्रत्याशित उपहार उसकी आँखों में आँसू ला देता है। विदाई के समय मित्र का मुस्कुराता चेहरा और कोट के फिट होने को लेकर किया गया मजाक उनके रिश्ते की आत्मीयता को और गहरा बना देता है। कहानी बताती है कि सच्चा दोस्त वही है, जो हमारी खामोशी में छिपे दर्द को पहचानता है, हमारी जरूरतों को बिना जताए समझता है और कठिन समय में सम्मान के साथ हमारा साथ देता है।
बहुत दिनों के बाद आज मित्र से मुलाकात होने वाली थी। मेरा आज का टिकट था। मित्र को मैंने ही मिलने के लिए बुलाया था। मित्र आया और हम गर्मजोशी से मिले। चूँकि ठंड ज़्यादा थी, इसलिए मैंने ऊनी कोट खरीदने की इच्छा ज़ाहिर की। इस पर मित्र ने भी अपनी सहमति व्यक्त की। उसने अपने मोबाइल में समय देखा और गाड़ी का 'लाइव स्टेटस' चेक किया तो पता चला, अभी काफी समय है। हम दोनों बाज़ार की ओर रवाना हुए। चाय-नाश्ता भी किया। कपड़ों की तीन-चार दुकानों में पता करने के बाद एक दुकान में मेरी पसन्द की चीज़ मिल गयी। मैं भी ख़ुश हुआ और मेरा मित्र भी। कोट दिखने में काफी अच्छा लग रहा था। उसकी 'क़्वालिटी' भी अच्छी थी। वह मुझे पसन्द भी आ गया। मैंने उसका दाम पूछा और अपने 'फ़ोन पे अकाउंट' का बैलेंस चेक किया तो पता चला कि कोट की क़ीमत मेरे 'फ़ोन पे अकाउंट' से अधिक थी। मैंने कोट को बग़ल में रख दिया और बहाना बनाया कि यह 'फ़िट' नहीं बैठ रहा। मैंने मित्र से स्टेशन की ओर चलने को कहा।
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हम दोनों स्टेशन पहुँच चुके थे। कुछ देर बाद 'अनाउंसमेंट' हुआ कि गाड़ी एक घण्टा 'लेट' है। मेरे मित्र को सिगरेट की तलब हुई। उसने मुझसे कहा, वो थोड़ी देर में आ रहा है। मैं बैठा उसका इंतज़ार करता रहा। घर में बात भी कर ली। समय बीतता जा रहा था, लेकिन मित्र अभी आया नहीं था। गाड़ी स्टेशन पर भी आ चुकी थी। मुझे बेचैनी होने लगी। मैंने मित्र को फ़ोन किया तो उसने बताया कि उसने गाड़ी को आते हुए देख लिया है और एक मिनट में आ रहा है। अपनी सीट के पास वाली खिड़की से मैंने मित्र को आते हुए देखा तो कुछ तसल्ली हुई। वह आया। उसके हाथ में एक थैला था। उसने वो थैला मेरे पास रख दिया। मैंने जिज्ञासावश उस थैले को खोला तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। देखा तो उसमें वही गर्म कोट था, जिसे थोड़ी देर पहले मैं उस दुकान पर पसन्द कर आया था। मेरी आँखें छलछला उठीं। मित्र ने मुझे गले लगा लिया। मैंने कहा कि मैं इसे नहीं लूँगा। ये मेरे 'फ़िट' नहीं बैठ रहा। मुझे लगा कि मैंने जब 'फ़ोन पे' का 'बैलेंस' चेक किया होगा तो शायद मित्र ने देख लिया होगा। मित्र ने कहा, ठथोड़ा पेट कम कर लो, फिट बैठ जाएगा।ठ
गाड़ी का 'हॉर्न' बजा। मित्र उतर गया। यात्रियों का चढ़ना-उतरना जारी था। मेरी 'अपर' वाली सीट थी। मैं 'लोअर' वाली में बैठा था। उस सीट का यात्री आया और उसने थैले की ओर इशारा करते हुए पूछा, ठक्या ये आपका सामान है?ठ मैंने खिड़की के बाहर देखा तो मित्र मुस्कुराता हुआ अपना दाहिना हाथ हिलाकर अपनी उपस्थिति की सूचना दे रहा था। उस यात्री से मैंने कहा, ठहाँ, ये मेरा सामान है।ठ मैंने उस थैले को उठाकर अपनी सीट पर रख दिया। गाड़ी को सिग्नल मिल चुका था। वह स्टेशन छोड़ने के लिए आतुर थी।
डॉ. पीयूष कुमार
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