पिता के लिए ज़रूरी भाई थे या बच्चे!

अम्बर की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की मार्मिक दास्तान है, जिसने गरीबी से संघर्ष करके सरकारी नौकरी हासिल की और अपने पूरे परिवार की जिंदगी सँवारने में अपना जीवन लगा दिया। पिता की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए उसने बंधक खेत छुड़ाए, मकान बनवाया, भाइयों को पढ़ाया-लिखाया, उनकी शादियाँ कराईं और उनके बच्चों की जरूरतें भी पूरी कीं। लेकिन इस निस्वार्थ त्याग के बदले उसे धोखा और अपमान मिला। यहाँ तक कि छोटे भाई की धोखाधड़ी के कारण उसे जेल भी जाना पड़ा। परिवार के प्रति अपने कर्तव्य निभाते-निभाते अम्बर अपनी पत्नी और बच्चों की जरूरतों, शिक्षा और भविष्य को नजरअंदाज कर बैठा। अंततः जिन भाइयों के लिए उसने अपना सब कुछ न्योछावर किया, उन्होंने ही उससे मुँह मोड़ लिया, जबकि उसके अपने बच्चे अभावों में जीवन बिताने को मजबूर हो गए। यह कहानी समाज के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखती है—क्या परिवार के प्रति त्याग की भी कोई सीमा होनी चाहिए? यह हमें सिखाती है कि दूसरों की जिम्मेदारियाँ निभाते समय अपने जीवनसाथी और बच्चों के अधिकारों, जरूरतों तथा भविष्य को भूल जाना उचित नहीं है। सच्चा कर्तव्य वही है, जिसमें प्रेम के साथ विवेक और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन भी हो।

Oct 9, 2026 - 16:44
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पिता के लिए ज़रूरी भाई थे या बच्चे!
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अम्बर आज बहुत खुश था। नन्हा मेहमान जो आया था, बेटा हुआ था। शाम को उसकी खुशी दोगुनी हो गई, जब उसे एक पत्र मिला। खोलकर देखा तो पता चला, सरकारी नौकरी के लिए ज्वॉइनिंग लेटर था। और अगले दिन शहर चला गया ज्वॉइन करने के लिए।
अम्बर के पिता बहुत गरीब परिवार से थे। सब्जी बेचकर गुजारा होता था। थोड़ा खेत था, तो वो भी बंधक था। अम्बर पाँच भाई था। अम्बर ही सबसे बड़ा था, चारों भाई छोटे-छोटे थे, लेकिन एक बहन भी थी, जो अम्बर से बड़ी थी। अम्बर ने अपनी पढ़ाई जैसे-तैसे पूरी की। स्कूल भी जाता तो फटे हुए कपड़े पहनकर, जहाँ उसके दोस्त उसका मज़ाक उड़ाते थे, लेकिन सहयोग कोई नहीं करता था।
अब नौकरी मिलने से पिता की सारी जिम्मेदारी अम्बर के कंधे पर थी। अम्बर और उसकी पत्नी ने खुशी-खुशी जिम्मेदारी उठा ली।
धीरे-धीरे अम्बर ने अपने खेत बंधक से छुड़ाए, दो मंजिला मकान बनाए। जिस समय लोग एक झोपड़ी के लिए भी तरसते थे, उस समय अम्बर ने अपना मकान बनवाया था। और सारी सुविधाएँ पूरी कीं, जिसकी जरूरत सबको थी।
अम्बर ने अपने भाइयों को पढ़ाया-लिखाया, खाने से लेकर पहनने तक का खर्चा उठाया, उनके शौक पूरे किए, उन्हें अपने पैर पर खड़ा किया, भाइयों की शादी की, कुछ समय तक उनके बच्चों का भी खर्चा उठाया।
सब ठीक चल रहा था अम्बर के परिवार में। अम्बर के भाई अम्बर को धोखा दे रहे थे, बेवकूफ बनाकर अम्बर से पैसा ठग रहे थे। ये बात अम्बर के पिता ने बताया था, लेकिन अम्बर शहर में रहता था, गाँव से दूर, इसलिए ध्यान नहीं दे पाता था। कुछ दिन बाद अम्बर के पिता चल बसे। 

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एक बार अम्बर का छोटा भाई अम्बर के ऑफिस से सारा पैसा चुराकर भाग गया, जिसकी वजह से अम्बर को जेल भी हुई थी। पर समय बीतने के साथ अम्बर सब भूल गया।
अम्बर एक बेटा और भाई का फ़र्ज़ निभाते हुए ये भूल गया था कि उसके अपने बच्चे भी हैं, उसे पिता का भी फ़र्ज़ निभाना है।
अम्बर ने उन लोगों का खर्चा पूरा किया, अपने बच्चों और अपनी पत्नी का मन मारकर, आधा पेट खाना खिलाकर, अपने बच्चों के शौक अधूरे छोड़कर, अपने बच्चों की शिक्षा अधूरी छोड़कर, अपने बच्चों को तरसा कर एक-एक चीज़ के लिए, यहाँ तक कि अच्छे कपड़े के लिए भी तरसाया! 
अम्बर अपने बच्चों का भविष्य संवार सकता था, पर नहीं संवारा! बच्चे जैसे-तैसे भटक कर गुजारा कर रहे हैं।
फिर उसी भाई और उनकी पत्नियों ने ठेंगा दिखाकर अपना और अपने बच्चों का भविष्य संवार लिया...
एक सवाल समाज से... अम्बर ने जो किया, वो सही था क्या...? 

रुख़साना अंसारी

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