निम्मी
यह कहानी एक स्कूल की कक्षा में घटित घटनाओं के माध्यम से बच्चों के व्यवहार, बुलीइंग और मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को उजागर करती है। निम्मी और सादिया के बीच की प्रतिस्पर्धा तथा निम्मी द्वारा रची गई चाल से यह स्पष्ट होता है कि छोटे बच्चे भी परिस्थिति को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए जटिल तरीके अपना सकते हैं। शिक्षिका मेधा इस स्थिति को समझते हुए संवेदनशीलता और समझदारी का परिचय देती है।
मेधा को यू.के.जी. सेक्शन ‘सी’ की कक्षाध्यापिका बनाया गया था। कक्षा के बच्चे आँधी-तूफान की तरह थे। इसी वजह से इस सेक्शन को ‘चंट’ सेक्शन कहा जाता था। इसकी सबसे ‘चंट’ स्टूडेन्ट थी, निम्मी। उसका पूरा नाम निमरत था। निमरत के पापा सरताज सिंह सोढ़ी, शहर के मशहूर पंजाबी रेस्टोरेन्ट के मालिक थे। निम्मी उनकी सबसे बड़ी फैन थी। वह उनकी और रेस्टोरेन्ट की तारीफ करते कभी नहीं थकती थी। एक दिन वह मेधा की टेबल के पास आयी और अपनी गोल और बड़ी-बड़ी काली आँखों को मटकाते हुये बोली, ‘पता है मैम! मेरे डैडी के रेस्टोरेन्ट में बहुत बड़े-बड़े लोग खाना खाने आते हैं।’ मेधा ने बिना उसे देखे, अपना काम करते हुये ही पूछा, ‘कितने बड़े-बड़े लोग निम्मी?’ निम्मी अभी सोचकर अभी जवाब दे पाती कि क्लास में पढ़ने वाली सादिया ने तपाक से कहा, ‘निम्मी जितने बड़े लोग मैम।’
निम्मी की हाइट सादिया से कम थी। सादिया क्लास की सबसे लंबी लड़की थी। उसे इस बात का घमण्ड भी था। निम्मी गोल-मटोल, तंदरुस्त से कुछ ज्यादा ही थी। इस वजह से वह दिखने में छोटी लगती थी। सादिया इस बात को लेकर उसे हमेशा चिढ़ाती रहती थी। आज मेधा के सामने जब सादिया को यह मौका मिला तो इस मौके को उसने हाथ से जाने नहीं दिया। निम्मी बिदक गयी और पैर पटकते हुये अपनी सीट पर जाकर बैठ गयी। मेधा ने गुस्से से सादिया को देखा, लेकिन कहा कुछ नहीं। सादिया भी जाकर अपनी सीट पर बैठ गयी।
विद्यालय बच्चों का एक समाज होता है। इसमें हर तरह के घटक पाये जाते हैं। समाज की मुख्य धारा के समान ही इस समाज में भी श्रेष्ठता के अनेक पैमानों के आधार पर श्रेणिया विभाजित हो जाती हैं। लेकिन शिक्षा का मन्दिर होने के बावजूद इस श्रेणी में अकादमिक योग्यता का उतना मोल नहीं होता, जितना कि धन और ताकत का होता है। इसके अलावा जो बच्चे लंबे, हट्टे-कट्टे, ताकतवर और खेलकूद में आगे रहते हैं, वे भी दूसरे बच्चों को परेशान करने में पीछे नहीं रहते। सामान्य रूप से इसे ‘बुलीइंग’ कहा जाता है। मेधा जानती थी कि स्कूलों में आजकल होने वाली यह एक बेहद आम घटना है। इसीलिये उसने कापी और पेन वहीं छोड़ा और निम्मी के पास जाने के लिये खड़ी हुई। ठीक इसी समय उसने देखा कि निम्मी अपने सीने को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से साँस लेने लगी। मेधा दौड़कर उसके पास पहुँची। क्लास के सारे बच्चे भी निम्मी को देखने लगे। मेधा ने उसके सिर को सीधा किया और सीने को मलने लगी। उसने क्लास मॉनीटर रोहित को चपरासी को बुलाने के लिये भेज दिया। थोड़ी देर में चपरासी दौड़ते हुये क्लास में पहुँच गया। ‘इसे प्रिंसिपल के ऑफिस में ले चलो।’ चपरासी को देखते ही मेधा ने कहा। चपरासी ने निम्मी को गोद में उठाया और तेज कदमों से चलते हुये क्लास के बाहर ले जाने लगा। निम्मी का सिर चपरासी के बाहों से लटका हुआ था। अपने सिर को थोड़ा बायीं ओर घुमाया और सादिया को देखने लगी। इसके बाद मेधा ने जो देखा, उसकी कल्पना उसने सपने में भी नहीं की थी। निम्मी सादिया को देखकर मुस्करा रही थी। मेधा सारी बात समझ गयी। लेकिन उसे यकीन नहीं हुआ। छह साल की एक बच्ची इतना सब कुछ कैसे सोच सकती है? मेधा ने एक नजर सादिया पर डाली। सादिया अपनी जगह पर खड़ी थी। उसकी आँखों में डर के साथ चिन्ता भी दिखाई दे रही थी। उसने निम्मी के पूरे ‘खेल’ को समझा था या नहीं, मेधा यकीन के साथ नहीं कह सकती थी।
वह क्लास से बाहर निकली। चपरासी कॉरीडोर के अन्तिम छोर पर पहुँच चुका था। वहीं बायीं तरफ स्कूल प्रिंसिपल मि. दास का ऑफिस था। मेधा तेजी से, लंबे-लंबे कदमों से चलती हुई चपरासी के पीछे-पीछे ही ऑफिस में दाखिल हुई। निम्मी को गोद में लेकर ऑफिस में प्रवेश करते हुये चपरासी को देखते ही मि. दास अपनी कुर्सी से खड़े हो गये। चपरासी ने निम्मी को सोफे पर लिटा दिया। निम्मी अभी भी लंबी-लंबी साँसे ले रही थी। ‘क्या हुआ इसे?’ मि. दास के चेहरे पर चिन्ता की लकीरे साफ-साफ दिखाई दे रही थीं। मेधा निम्मी के पैताने पहुँचकर अपने आपको संयत कर चुकी थी। ‘सादिया ने थोड़ी देर पहले इस पर कुछ कमेन्ट कर किया था। इसी वजह से यह अपसेट हो गई। शायद इसका बी.पी. बढ़ गया है।’ निम्मी ने साँस लेते हुये कहा, ‘मुझे घर जाना है।’ मेधा सोफे के नीचे घुटने के बल बैठकर निम्मी के सीने को सहलाते हुये बोली, ‘इसकी कोई जरूरत नहीं है सर। अभी थोड़ी देर में आराम हो जायेगा।’ मि. दास की त्यौरियाँ चढ़ गईं पर उन्होने अपने आपको संयत करते हुये कहा, ‘आपको यकीन है कि इसे घर भेजने की जरूरत नहीं है।’ मेधा निम्मी का असली रूप देख चुकी थी। उसने मि. दास को आश्वस्त किया। ‘मैं देख लूंगी सर। आप चिन्ता मत कीजिये।’ मि. दास ने चपरासी को हिदायत देते हुये कहा, ‘तुम मेधा मिस के पास ही रहो।’ कहकर वह ऑफिस से निकलकर राउण्ड पर चले गये। चपरासी वहीं खड़ा रहा। मेधा ने उसे देखते हुये कहा। ‘मोहन, तुम अपना काम कर सकते हो। मैं देख लूंगी। कोई जरूरत हुई तो पुकार लूंगी।’ चपरासी को मुँहमांगी मुराद मिल गई। वह तुरंत वहाँ से चला गया।
ऑफिस पूरी तरह खाली हो गया था। मेधा ने लंबी साँस लेते हुये निम्मी को देखा। ‘निम्मी...’ उसने यकीन न कर पाने के भाव से कहा, ‘एक्टिंग में तो तुम्हे नेशनल अवार्ड मिलना चाहिये।’ मेधा उसका असली रूप देख चुकी है, यह निम्मी नहीं जानती थी। उसने ब्लफ करते हुये कहा, ‘मेरे सीने में बहुत दर्द हो रहा है मिस, मुझे घर जाना है।’ मेधा उसकी हिम्मत की दाद देते हुये बोली, ‘अब बस करो निम्मी। मैं जानती हूँ कि तुम्हे कुछ नहीं हुआ है। तुमने सादिया को फँसाने के लिये यह सारा ड्रामा किया है।’ निम्मी अब जाकर समझी कि उसकी जल्दबाजी पकड़ी जा चुकी है। ‘तो मेधा मिस इसीलिये इतनी ज्यादा कान्फिडेन्ट हैं। लेकिन शायद उन्हे नहीं पता कि मैं भी ‘निम्मी’ हूँ। अगर मुझे घर जाना है, तो जाना है। किसी भी हालत में।’ उसने मन ही मन सोचा। मेधा एकटक उसे ही घूर रही थी। निम्मी ने अपनी आँखें मटकाते हुये कहा, ‘लेकिन आप मुझे घर जाने से रोक नहीं सकती मिस।’ निम्मी ने जिस आत्मविश्वास, गर्व और उपेक्षा से यह बात कही, मेधा को अगले ही पल उसके रूप में एक प्रतिद्वन्दी नजर आने लगा। उसने अपने आपको भी तैयार करते हुये कहा, ‘क्यों नहीं रोक सकती? कैसे घर जाओगी तुम?’ निम्मी ने कुछ कहा नहीं, बस आँखों से ही अपने स्कर्ट की ओर इशारा कर दिया। मेधा हड़बड़ा कर उठ गयी। वह निम्मी के पैरों की ओर गयी।
उसने ध्यान से देखा। निम्मी ने स्कर्ट में ही यूरीन पास कर दिया था। मेधा को लगा कि वह गिर जायेगी। उसने निम्मी की ओर देखा। वह उसे देखकर मुस्करा रही थी। बिल्कुल उसी तरह, जैसे वह सादिया को देखकर मुस्करायी थी।
सुरेन्द्र पटेल
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