पी.आई. का चक्कर : एक शिक्षिका के अंतर्द्वंद की संवेदनशील कहानी
यह कहानी मोनिका नामक एक समर्पित शिक्षिका की है, जो बच्चों को रटाने के बजाय समझाकर और जीवन से जोड़कर शिक्षा देने में विश्वास रखती है। लेकिन विद्यालय की पी.आई. प्रणाली और दिखावटी मूल्यांकन उसे मानसिक द्वंद्व में डाल देते हैं। अंततः उसके पिता उसे समझाते हैं कि सच्चा शिक्षक वही है जो बच्चों के जीवन में स्थायी बदलाव लाए। यह कहानी शिक्षा व्यवस्था, शिक्षक की संवेदनशीलता और वास्तविक सफलता के अर्थ को उजागर करती है।
मोनिका कुछ दिनों से बहुत परेशान थी उसके हृदय क्षेत्र में एक घमासान चल रहा था। मोनिका एक प्रतिष्ठित विद्यालय में शिक्षिका थी वह अपने कार्य में दक्ष थी। उसकी बचपन से चाहत थी टीचर बनना जो उसने अनेक विषम परिस्थितियों से लड़कर प्राप्त किया था।
उसके लिए सबसे बड़े आनंद का विषय था बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हे पढ़ाना, उनकी समस्याओं के समाधान के लिए वक्त देना। अभी तो सब मन के अनुरुप था तो फिर यह अन्तर्द्वंद क्यों?
यह वह भी समझ नहीं पा रही थी ।
जब र्ण्इ २००५ आया उसे पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई कि चलों अब शिक्षा की दशा में सुधार होगा, यह एक क्रांतिकारी कदम होगा, कम से कम बच्चों को रट्टा लगाने से आजादी मिली।
उसे अपना बचपन याद आया जब उसके दोस्त विषय याद करके न आते तो गुरुजी कैसे? सटा-सट डंडा मारते। यहाँ तक कि ऊँगलियों में पेंसिल फंसा देते तब मारते ताकि चोट अधिक लगे ।
बेचारे बच्चे कितनी देर तक रोते रहते यह रोज का हाल था गुरु जी कहते : याद किया?
बच्चे- नही गुरु जी भूल गया। इसके बाद गुरु जी का डण्डा और बच्चे का शरीर। डण्डा कहाँ पड़ेगा? ये भी गुरु जी को याद नही। ये सब देखकर मोनिका डर जाती और पहले ही सब-कुछ याद कर लेती। कैसे तीन बजे के बाद हमें पहाड़ा रटाया जाता। दो बच्चे आगे खड़े होकर गाते; दो एक्का दो, दो दूनी चार ।
और बाकी बच्चे पीछे वही गाते पढ़ाई का मतलब था रटना। इस भयावह शिक्षा के माहौल में भी एक-दो गुरु जी ऑक्सीजन का काम करते। बिना किसी बेहतरीन शिक्षा नीति के बगैर भी पढ़ाने का काम जीवन से जोड़कर करते। मारते वे भी थे लेकिन फिर भी बच्चे खुश रहते, बिना रट्टा लगवाए ही पाठ समझा देते मजा आता। बच्चें उनके पीरियड का इंतजार करते कि कब गुरु जी कक्षा लेंगे। वे गुरु जी उसके सबसे प्रिय गुरु जी थे। एक मैडम थी वह बस स्वेटर बुनती या सोती.. कभी-कभी तो ढेर सारा मटर घर से लाती और विद्यालय में बैठकर छीलती।
अगर कोई बच्चा आवाज करता तो डण्डा फेककर मारती। ये मैडम बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। जब वह प्राइमरी छोड़कर सेकेंडरी में गई तो पूरे स्कूल में केवल एक मैडम थी जो कुछ पढ़ाती नहीं केवल मीटिंग में जाती। पर उसी विद्यालय में एक रिटायर्ड टीचर थे। अपनी स्वेच्छा से पढ़ाने आते थे अवैतनिक ।
उनके पढ़ाने से बहुत आनंद आता था खेल-खेल में टॉपिक समझा देते आपस में स्वस्थ प्रतियोगिता का भाव भर देते। उनके पढ़ाने में पैनापन था हम सब कक्षा आठ में थे और दसवी के अंग्रेजी के प्रश्नपत्र साल्व करते।
मम्मी-मम्मी सलोनी ने पुकारा:
मैं कब से आपको पुकार रही हूँ?
मोनिका अपने स्मृति कक्ष का द्वार बंद करते हुए सलोनी से कहती है: क्या हुआ बेटा?
सलोनी : मम्मी देखो ना अथर्व ने दीवार पर फिर से कलम चलाई और मैं मना कर रही थी तो मेरे मुंह पर स्केच चला दी।
सलोनी को देखकर मोनिका को हंसी आ गई उसके माथे पर और गालों पर स्केच चले थे। वह एकदम छोटी सी चंबल की डाकू दिख रही थीं।
मोनिका ने नकली गुस्सा दिखाते हुए पुकारा: अथर्व,अथर्व ....
अथर्व आकर आंख नीचे किया सर झुका कर चुपचाप खड़ा था।
मोनिका :तुमने दीदी के मुंह पर क्यों स्केच चलाया ।
अथर्व : मेले से थकेज तीन (छीन) रही थी।
मोनिका ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा : अब कान पकड़ो ऐसा दोबारा नहीं करोगे `सॉरी' बोलो दीदी को ।
अथर्व मुंह फुला कर बोला : `छाली' दीदी ।
अथर्व चला गया तब मोनिका सलोनी को समझाते हुए बोली क्यों छीन रही थी स्केच वह छोटा है ना उसे करने दो करेगा तभी तो सीखेगा सलोनी भी मुंह फुला कर चली गई।
सलोनी ६ साल की थी और अथर्व ढाई साल का सलोनी अथर्व को बहुत प्यार करती थी पर दीदी होने का रोब भी झाड़ती।
मोनिका ने जब स्कूल ज्वाइन किया था तब कितनी खुश थी अंततः वह जिस संस्था से जुड़ना चाहते थी उससे जुड़ गई। उसने खूब हाड़-तोड़ मेहनत की। बच्चों को तब तक समझाती जब तक हर बच्चा समझ न जाए।
खेल द्वारा पढ़ाना, जीवन से जोड़कर पढ़ाना। बच्चों को भी मोनिका के साथ मजा आ रहा था। जिन बच्चों को लिखना पढ़ना नहीं आ रहा था वे अब धाराप्रवाह पढ़ने लगें थे।
वह पाठ को समझने पर बल देती रटने को मना करती। धीरे-धीरे बच्चे उसके अनुसार ढलने लगें वे भी कॉन्सेप्ट समझने का प्रयास करते! वे वाद - विवाद में भाग लेते उनकी सोच में पारदर्शिता और तार्किकता आ गई थी। मोनिका को भी बच्चों के साथ बहुत मजा आ रहा था उनके अंदर आए बदलाव को देखकर वो बहुत प्रसन्न होती।
उसे लगता चलो मेरा यहां आना सार्थक हो गया है। मैं अपने काम के साथ न्याय कर पा रही हूं। यहां तक की मोनिका बच्चों की काउंसलिंग करने लगी कितने बच्चों ने अपनी बुरी आदतों को छोड़ा ,अब तो पेरेंट्स का भी फोन आने लगा की जरा मेरे बच्चे को समझाइएगा मैडम।
वह आपकी ही बात करता है आपके ही बात मानता है।
सब अच्छा चल रहा था।
बच्चे, पैरंटस और प्रिंसिपल सब खुश थे मोनिका के काम से। आज बच्चों का रिजल्ट आया था सब बच्चे बहुत खुश थे। क्योंकि जिन बच्चों से बहुत उम्मीद नहीं थी वह भी सितारे की तरह जगमगा रहे थे।
मोनिका के दिमाग में हलचल तब मची जब उसने अपना पी आई देखा।
उसका पी आई ५६ज्ञ् था ज्ाो टीचर केवल रटने पर जोर देते हैं उनका पी आई ७५ज्ञ् और ९०ज्ञ् तक पहुंच गया था वह बहुत हैरान परेशान थी।
उसने अपने सह अध्यापक से पूछा कि क्या चक्कर है?
सर ने कहा : मैडम यह जो आपने मेहनत की ना वह एकदम फालतू की थी।
मोनिका : ऐसा क्यों कह रहे हैं सर? बच्चों के अंदर जो बदलाव आया वह तो आपको भी दिख रहा होगा ।
सर : मैडम आपको राज की बात बताऊं! यहां पी आई अच्छा बनाना बहुत मायने रखता है। मोनिका : वो कैसे हैं सर?
सर : मैडम जो आप अपने - आप को इतना थकाते हो,बच्चों को इतना टाइम देते हो एक्स्ट्रा चीजे सिखाते हो इससे पी आई नहीं बनता ।
मोनिका : तो फिर।
सर : मैडम एक बात जान लो बच्चों को कितना आता है ।कोई देखने नहीं आता, आपने साल भर क्या पढाया? उससे भी कोई मतलब नही है समझो आपको वहीं पढ़ाना है जो परीक्षा में आता है उसे रटा देना है।
मोनिका : लेकिन रटना तो मना है।
सर : मैडम यह सब कहने की बात है।
कुछ नहीं बंद हुआ है। जिन टीचर्स को कुछ नहीं आता उनका पी. आई ९०ज्ञ् कैसे आया ? आप दिन भर बच्चों से घिरी रही बच्चों को सिखाती रही आपका पी आई ६० ज्ञ्भी नहीं पहुंचा।
मोनिका : जी सर, सही कह रहे हैं। लेकिन अपनी आत्मा का क्या करें? जो बैठने नहीं देती ।
सर : देखिए मैम आप जिस संस्था हो जुड़ी हैं न वहाँ पर पढ़ाने से ज्यादा कागजी काम व पी आई ये सब आपका अच्छा रहना चाहिए जरूरी है।
मोनिका :लेकिन सर ....
सर: लेकिन-वेकिन कुछ नहीं आपने कक्षा में बहुत कुछ किया लेकिन उसका आपने रिकार्ड नहीं रखा तो सब बेकार है। जो माल दिखता है, वहीं बिकता है ये तो आप भी मानती हो ।
मोनिका : लेकिन ये तो दिखावटी पन है।
सर : दिखावटी पन में ही तो दुनिया जी रही मैडम।
मोनिका : लेकिन सर मैं हमेशा यही सोचती हुं कि जैसे हमारे टीचर पढ़ाके चले जाते थे। हमारे कुछ भी समझ नहीं आता बस रट लेते और अच्छे नंबरों से पास हो जाते ,वैसा कम से कम मैं तो ना करूं।
सर : मैडम वही तो पी आई का चक्कर है।
समझिए मैडम एक क्लास में कितने प्रकार के बच्चे होते हैं कुछ बहुत अच्छे, कुछ औसत, कुछ न्यून इनका बुद्धि स्तर ऐसा होता है इनके साथ ९०ज्ञ् पी आई मतलब रटने पर जोर दिया गया उनकी कल्पना शक्ति और तार्किकता पर नहीं।
मोनिका: अच्छा सर अब समझी!
मोनिका जब स्कूल से बाहर निकली तो अथर्व के लिए चाक, स्लेट, सादे कागज, कलरफुल पेन खरीदते हुए गई।
जैसे ही उसने घर की घंटी बजाई अथर्व और सलोनी दोनों आए दौड़कर दरवाजा खोलने के लिए आपस में लड़ाई करने लगे कि पहले मैं खोलूंगा पहले मैं खोलूंगी आखिर दरवाजा खुला।
उन दोनों को देखकर सलोनी को फिर से हंसी आ गई दोनों सफेद भूत लग रहे थे, वे भूत-भूत खेल रहे थे,दोनों पूरे शरीर पर पाउडर पोत रखा था। अथर्व एकदम नागा भूत लग रहा था क्योंकि नंगू-पंगु था उन्हें देखकर मोनिका खिलखिला पड़ी दोनों : मम्मी क्या लाई? क्या लाई?
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मोनिका ने सामान पकड़ा दिया वे दोनों खुश होकर चले गए। अथर्व कहता है : दीदी देखा मेले लिए आया है।
मोनिका ने कपड़े बदले, पानी पीकर अपने लिए कॉफी बना कर उसे लेकर बैठी फिर से विचारों के समुद्र में गोते लगाने लगी। अचानक से फोन की घंटी घनघनाई और तब उसकी तंद्रा टूटी।
देखा तो पापा का फोन था, उसने राहत की लंबी सांस ली क्योंकि इस दुविधा से वही उसे निकाल सकते थे उसके चेहरे पर एक मुस्कान तैर गई। अपने पापा को मोनिका अपना आदर्श मानती थीं वह हमेशा अच्छे कार्यों के लिए उसे प्रोत्साहित करते रहते हैं।
मोनिका ने फोन उठाकर प्रणाम किया उनका हाल पूछा और विस्तार से अपनी बातें पापा को बताई।
पापा : तो इसमें दुविधा की क्या बात है? बेटा।
मोनिका: पापा मेरा पी आई डाउन हो जाता है।
पापा : यह बताओ तुम टीचर क्यों बनना चाहते थी?
अपने बचपन की बातें याद है जब तुम घर पर आकर रोती की पता नहीं टीचर कैसे पढ़ाता है? कुछ समझ नहीं आता।
तो क्या तुम भी ऐसा ही टीचर बनना चाहती हो?
मोनिका: नहीं पापा पर पी आई.....
पापा: देखो बेटा पी आई कम ज्यादा होने से बहुत फर्क नहीं पड़ता,वह कुछ समय का होता है। पर तुम बच्चों के पीछे जो मेहनत करोगी उन्हें सिखाओगी वह उनके जीवन में स्थाई रहेगा। वे जीवन भर तुम्हें अपना आदर्श मानते रहेंगे और तुम्हारा सम्मान करते रहेंगे और एक शिक्षक के लिए इससे बड़ा कोई पी आई नहीं होता कि तुम्हारे बताए रास्ते पर चलकर बच्चा अच्छा इंसान और सफल व्यक्ति बने।
मोनिका: पापा आपने मेरी सारी उलझन समाप्त कर दी। थैंक यू सो मच। प्रणाम। उधर से फोन रखा जाता है। अब मोनिका पूर्णत: खुश थी और हल्का महसूस कर रहे थी उसने अथर्व और सलोनी को बुलाया।
मोनिका : चलो! आइसक्रीम खा कर आते हैं।
वंदना मिश्रा "वाणी"
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