पारिजात वृक्ष : स्वर्ग से धरती तक आया दिव्य कल्पवृक्ष और उसके अद्भुत औषधीय रहस्य

पारिजात वृक्ष, जिसे हरसिंगार और नाइट जैस्मिन भी कहा जाता है, भारतीय पुराणों में वर्णित एक दिव्य एवं पवित्र वृक्ष है। समुद्र मंथन से उत्पन्न यह कल्पवृक्ष भगवान श्रीकृष्ण द्वारा स्वर्ग से धरती पर लाया गया माना जाता है। इसके सुगंधित पुष्प रात में खिलते हैं और सुबह स्वतः धरती पर गिर जाते हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ पारिजात में अनेक औषधीय गुण भी पाए जाते हैं, जो जोड़ों के दर्द, वात-कफ और अन्य रोगों में लाभकारी माने गए हैं।

May 18, 2026 - 16:00
 0  0
पारिजात वृक्ष : स्वर्ग से धरती तक आया दिव्य कल्पवृक्ष और उसके अद्भुत औषधीय रहस्य
parijat-vriksh-divya-kalpavriksh-aur-aushadhiya-gun
पारिजात वृक्ष सबसे अप्रत्याशित स्थानों पर लगने वाला एक दुर्लभ वृक्ष है। इस वृक्ष को स्वर्ग का देववृक्ष माना जाता है। यह धरती पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा लाया गया था। पुराणों में कहां जाता है कि पारिजात वृक्ष अत्यंत पवित्र वृक्ष है जिसे स्पर्श करने का अधिकार मात्र स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी को ही था। समुद्र मंथन के समय निकले बहुमूल्य रत्नों में एक पारिजात वृक्ष भी था। पारिजात वृक्ष को कल्पवृक्ष भी कहा गया है। यह वृक्ष अपने पुष्पों की सुगंध पुरी रात बिखेरता है और भोर होते ही अपने सभी पुष्प पृथ्वी पर बिखेर देता है। अलौकिक सुगंध से सराबोर पारिजात के पुष्प मन को ही प्रसन्न नहीं करता, अपितु तन को भी शक्ति देता है। इसका उपयोग आयुर्वेद में भी किया जाता है एक कप गर्म पानी में इसका पुष्प उबालकर कर ठंडा होने पर  पियें, शरीर को अद्भूत ताजगी मिलती हैं। पारिजात वृक्ष पश्चिम बंगाल का राजकीय पुष्प भी है।
स्वर्गलोक में देवताओ के राजा इंद्र के उद्यान में स्थित पारिजात वृक्ष को मात्र अप्सरा उर्वशी को स्पर्श करने का अधिकार था। पारिजात वृक्ष के नीचे बैठने, या छूने मात्र से शरीर की थकान दूर हो जाती है और नई ऊर्जा का संचार होता है। स्वर्ग में इसको छूने से देव नर्तकी उर्वशी की थकान मिट जाती थी। पारिजात वृक्ष के पुष्पों को देवमुनि नारद ने श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को दिया था। पारिजात वृक्ष के अदभुत पुष्पों को पाकर सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण से जिद कर बैठी कि पारिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी वाटिका में रोपित किया जाए। पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति क्षीरसागर से बताई गई है। वह का दिव्य और चमत्कारी स्वर्ग का वृक्ष है। इन्द्र ने पारिजात को शची का क्रीडावृक्ष बताकर भगवान शिव से ले लिया था। वह शचीदेवी और इन्द्र को मनोवांछित पदार्थ देता था। श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के पुण्यकार्य सम्पादन के लिए उसको स्वर्ग से लाने का संकल्प किया था :
मया मुने प्रतिज्ञातं पुण्यार्थं सत्यभामया ।
स्वर्गादिहानयिष्यामि पारिजातमिति प्रभो 
सत्यभामा पारिजात वृक्ष को पाकर बहुत प्रमुदित हुई :
ननन्द सत्या कौरव्य देवी प्राप्य मनोरथम् ।
पुण्यकार्थं तु सम्भारान् सम्भर्तुमुपचक्रमे 
श्री कृष्ण ने पारिजात वृक्ष लाकर सत्यभामा की वाटिका में रोपित कर दिया। भगवान श्री कृष्ण ने पारिजात को लगाया तो सत्यभामा की वाटिका में था,परन्तु उसके पुष्प उनकी दूसरी पत्नी रूकमणी की वाटिका में भी गिरते थे। पुराणों के अनुसार पारिजात वृक्ष के‌ मूल में हनुमानजी का वास होता है। यह वृक्ष एक हजार से पांच हजार वर्ष तक जीवित रह सकता है। पारिजात वृक्ष के वे ही पुष्प  उपयोग में लाए जाते है, जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते है,यानि वृक्ष से फूल तोड़ने की पूरी तरह मनाही है ।
यह वृक्ष आसपास लगा हो खुशबू तो प्रदान करता ही है, साथ ही नकारात्मक उर्जा को भी भगाता है। अत: पारिजात जैसे उपयोगी वृक्ष को अवश्य ही घर के आसपास लगाना चाहिए। पारिजात एक पुष्प देने वाला वृक्ष है, यह वृक्ष १० से १५ फीट ऊँचा होता है। पारिजात वृक्ष पर सुन्दर व सुगन्धित पुष्प लगते हैं। पारिजात वृक्ष की सबसे बड़ी पहचान सफ़ेद फूल और केसरिया डंडी होती है, इसके फूल रात में खिलते है और सुबह सब गिर जाते है। पारिजात वृक्ष के पुष्प और पत्ते में अत्यंत लाभकारी औषधीय गुण हैं जो अनेक रोगों को दूर करने में सहायक है। अब यह वृक्ष धरती पर है, इस पेड़ के बीज बनते हैं और इसको कलम विधि के द्वारा पैदा किया जा सकता है। रात को जब इसके फूल खिलते हैं और जब दिव्य गंध आती है तब लगता की यह सुगंध  इस लोक की नहीं है। ईश्वर के आशीर्वाद अद्भुत और विचित्र हैं। पारिजात,जिसे हरसिंगार और नाइट जैस्मिन भी कहते हैं, एक सुगंधित पुष्प वाला वृक्ष है जो रात में खिलकर सुबह जमीन पर गिर जाता है। यह अपने दिव्य महत्व, औषधीय गुणों (खासकर जोड़ों के दर्द के लिए) और अनोखी विशेषताओं (जैसे फूल का नारंगी डंठल) के लिए प्रसिद्ध है। पारिजात को प्राजक्ता, शेफाली, शिउली आदि नामो से भी जाना जाता है। विभिन्न भाषाओं में पारिजात के नाम: संस्कृत- शेफालिका हिन्दी- हरसिंगार, मराठी- पारिजातक, कोंकणी-पार्दक, गुजराती-हरशणगार,  बंगाली- शेफालिका, शिउली, असमिया-शेवालि, तेलुगू-पारिजातमु, पगडमल्लै, तमिल-पवलमल्लिकै, मज्जपु, मलयालम-पारिजातकोय, पविझमल्लि, कन्नड़- पारिजात,  उर्दू- गुलजाफरी, इंग्लिश- नाइट जेस्मिन,  मैथिली- सिंघार, सिंगरहार। पारिजात हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है। सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है। पारिजात के पुष्पों  में सुगंधित तेल होता है। 
रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में ०.१ज्ञ् होता है, जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है।  बीज मज्जा से १२-१६ज्ञ् पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है। पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड (१ज्ञ्), मैनिटाल (१.३ज्ञ्), एक राल (१.२ज्ञ्), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो क्षाराभ होते हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी शहर में एक मंदिर है जिसमें ५००० साल पुराना पारिजात का पेड़ है। मनोकामना पूरी करने वाले कल्पवृक्ष के रूप में माना जाने वाला यह प्राचीन वृक्ष पांडवों की माता कुंती से जुड़ा है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने इसी वृक्ष के पास आत्मदाह किया था। मंदिर में हर मंगलवार को एक विशेष मेला लगता है, जहां श्रद्धालु पारिजात के पेड़ की पूजा करने के लिए एकत्रित होते हैं    
-(साभार विभिन्न स्रोत)
डॉ विजय पाटिल
  

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0