थप्पड़
यह कहानी समाज में व्याप्त सत्ता, गुस्से और हताशा की उस श्रृंखला को दर्शाती है, जहाँ एक व्यक्ति का अपमान दूसरे पर निकलता है। एक मंत्री द्वारा पुलिसवाले को मारा गया थप्पड़, फिर पुलिसवाले से रिक्शेवाले तक और अंततः एक बेबस महिला तक पहुँचता है। यह कहानी बताती है कि कैसे ताकतवर की हिंसा कमजोर पर उतरती चली जाती है और अंततः सबसे कमजोर वर्ग उसका शिकार बनता है।
जनपद मुख्यालय पर आज बहुत चहल-पहल थी। जिले के पाँच बार के माननीय सांसद जी कैबिनेट में मंत्री बना दिये गये थे। वह आज पहली बार अपने गृहजनपद आ रहे थे। उनके स्वागत की भव्य तैयारियाँ की गयी थीं। ऐसे में मंत्री जी के चचेरे भाई, जिनके जिम्मे पूरा स्वागत कार्यक्रम था, बार-बार अपने मोबाइल को चेक कर रहे थे। कुछ देर पहले फोन करने पर पता चला था कि मंत्री जी अभी दो चौराहा दूर थे। इसी बेसब्री में उन्हे बायीं तरफ के चौराहे पर एक पुलिसवाला किसी बुलेटवाले से बात करते हुये दिखा जिसकी पिछली सीट पर एक महिला बैठी थी। नेताजी जानते थे कि पुलिसवाला उन्हे जाने नहीं देगा इसलिये वह निश्चिंत होकर दायीं तरफ देखने लगे। उधर की सड़क पूरी तरह से वीरान थी। तपते हुये कोलतार की कालिमा के बीच से गर्म हवा के उठने की वजह से मृग मरीचिका का आभास हो रहा था। एक पल के लिये सबकुछ भूलकर नेताजी सड़क के बीच में पानी के मिथ्या अस्तित्व को निहारने में मगन हो गये। लेकिन अगले ही पल बुलेट की धड़धड़ाहट ने उनको यथार्थ के धरातल पर ला पटका जब उन्होने देखा कि बुलेटवाला अपनी माँ को लेकर उसी सड़क से होते हुये तेजी से निकल गया है। नेताजी का गुस्सा साँतवे आसमान पर पहुँच गया। वह चीते की फुर्ती से पलटे और छलांग लगाते हुये कुछ ही कदमों में पुलिसवाले के पास पहुँच गये। पुलिसवाला जबतक अपनी सफाई में कुछ कहता, नेताजी ने उसके चमकते हुये गाल पर तीन-चार थप्पड़ लगा दिये।
शाम का वक्त था। शहर के पाश मुहल्ले की एक व्यस्त और भीड़-भाड़ वाली सड़क पर एक ई-रिक्शा रुका। सड़क के दोनों ओर बेतरतीब तरीके से साइकिलें, मोटरसाइकिलें और ठेले खड़े थे। रिक्शे को सड़क से उतरकर खड़े होने की जगह नहीं मिली। तिरछी स्थिति में उसका पिछला हिस्सा एक तिहाई सड़क पर ही रहा। रिक्शे से उतरकर बुर्कानशीन दो महिलायें सामनेवाली दुकान में चली गयीं। रिक्शा वहीं खड़ा रहा। आने-जाने वालें लोगों ने टोका भी, पर रिक्शावाला वहीं जमा रहा। कुछ समय ऐसे ही बीत गया। साइकिलवाले, मोटरसाइकिल वाले रिक्शे को बचाते हुये आ-जा रहे थे। ठीक इसी समय रिक्शे के पीछे की तरफ से एक मारुति बालेनो कार आती हुई दिखाई दी। रिक्शेवाले ने पहले तो उसे नहीं देखा, पर जब कार ने हार्न बजाया तो पहले उसने अपने मिरर में देखा और फिर पलटकर पीछे की ओर देखा। सफेद, नयी, चमचमाती हुई बालेनो कार, धीरे-धीरे उसी की तरफ बढ़ रही थी, और बार-बार हार्न भी बजाती जा रही थी। ड्राइवर ने लापरवाही से अपना सिर सामने की ओर घुमा लिया। ‘जो भी हो, काफी जगह है, निकल जायेगा...।’ यह सोचकर रिक्शेवाले ने परेशान होने की जहमत नहीं उठायी। कार रिक्शे से लगभग दस फीट की दूरी पर आकर खड़ी हो गयी। ड्राइवर ने एक बार फिर हार्न बजाया। इस बार रिक्शेवाले ने पलटकर देखा भी नहीं। ड्राइवर ने फिर हार्न बजाया। इस बार भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। ‘बजाने दो, देखते हैं कितना हार्न बजाता है।’ रिक्शेवाला यही सोच रहा था। हार्न बन्द हुआ, रिक्शेवाला हार्न के दुबारा बजने का इंतजार करने लगा। कुछ पल ऐसे ही बीत गये। हार्न नहीं बजा। ‘अरे, बजा न! क्यों नहीं बजा रहा है?’ रिक्शेवाला अपने मन में हँस रहा था। ‘बैटरी खत्म हो गयी क्या?’ ड्राइवर सोचता रहा, लेकिन हार्न नहीं बजा। रिक्शेवाले ने मजा बढ़ाने के लिये अपना सिर जैसे ही बाहर निकाला, उसके गाल पर एक जोरदार थप्पड़ बजा। रिक्शेवाला गिरते-गिरते बजा। उसका कान सुन्न हो गया था, इसलिये बजाने वाले ने कितनी गालियाँ दी, वह सुन नहीं सका। सिर उठाकर देखा तो, एक पुलिसवाले को सामने खड़ा पाया। यह वही पुलिसवाला था जिसे नेताजी ने दोपहर में थप्पड़ लगाया था।
रात हो चुकी थी। शहर के सबसे व्यस्त और रंगीन सरकारी शराब के दुकान पर नशे का खुमार पूरी तरह चढ़ चुका था। काउंटर पर पीने वालों की भीड़, गुड़ पर चिपटने वाले चींटों से ज्यादा हो गयी थी। ऐसा लग रहा था कि शराब मुफ्त में बाँटी जा रही है। अपनी उंगलियों में सौ, दो सौ और पाँच सौ के नोट को लहराते हुये पीने वाले, शराब बेचने वाले दो सेल्समैनों को अपनी-अपनी ओर आकर्षित करने में लगे हुये थे। सभी को जल्दी थी। ऐसा नहीं था कि शराब खत्म हो जायेगी या कोई बिना पिये रह जायेगा। शराबी इस बात को मौत की तरह अटल सत्य मानते हैं कि, मार्केट से आलू, गोभी, प्याज, टमाटर, सेब, संतरा, अनार, चीनी, नमक, आटा, दाल, चावल, गेहूँ...कुछ भी खत्म हो जाये, लेकिन मजाल है, शराब खत्म हो जाये। दुनिया इधर से उधर हो जायेगी। कोरोना जैसे भयानक दौर में भी, सबसे पहले शराब ही बिक्री के लिये उपलब्ध हुई थी। शराब कभी भी नहीं खत्म हो सकती है। बावजूद इसके, काउंटर पर लगे हुये लोहे के ग्रिल के बीच से उंगलियों में फँसाकर नोट को लहराने वालों को जल्दी क्यों थी। उन्हे जल्दी इसलिये थी, कि कमर-तोड़ दिहाड़ी करके टूट चुके शरीर को आराम मिल जाये। दुनिया शराब को लाख बुरा माने, लेकिन पीने वाले हर शराबी के लिये यह दवा होती है। ऐसे माहौल में दो सौ रुपये के नोट को थामे हुये एक हथेली में तीन पौवे और तुड़ी-मुड़ी हुई कुछ नोटों की चिंदी आकर चिपट गयी। ग्रिल में से हाथ ऐसे गायब हुआ जैसे गधे के िसर से सींग। भीड़ में से तीस-पैंतीस साल का एक दुबला-पतला आदमी, जिसके गाल जबड़े में घुँसे हुये थे, निकलता हुआ दिखाई दिया। हथेली में कितने पैसे हैं, उसे देखने की फुरसत नहीं थी। उसने उसे जेब में डाला और वहीं किनारे नाले के स्लैब के ऊपर बैठकर पौवे को तुरंत खोल लिया। जेब से नमक की पुड़िया निकालकर उसने खोला और चुटकी भर नमक उठाकर अपनी काली हो चुकी जीभ पर रख लिया। इसके बाद बोतल को उठाकर शराब को हलक में ऐसे उतारने लगा, जैसे अमृत हो। आधी खाली हो जाने के बाद बोतल जब होठों की जकड़न से छूटी तो शराबी की आँखें आनन्दातिरेक से बन्द हो चुकी थीं।आधे घण्टे बाद वह लहराते हुये उठा और सड़क की तरफ लड़खड़ाते हुये चल दिया। ठीक इसी समय एक रिक्शा सड़क से उतरा और शराबी को बचाते-बचाते किनारे जाकर रुक गया। शराबी ने घूमकर रिक्शे को देखा। वह कुछ कहना ही चाहता था कि रिक्शेवाला कूदकर निकला और शराबी के गाल पर जोरदार थप्पड़ लगा दिया। यह शामवाला रिक्शा ड्राइवर था।
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रात के नौ बज रहे थे। प्रधानमंत्री आवास में बने हुये एक छोटे से कमरे में एक महिला अपने दो छोटे बच्चों के साथ सोयी हुई थी। इसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई। महिला की नींद तुरंत खुल गयी। अभी वह बिस्तर से उठती की दरवाजे को पीटने की चार-पाँच आवाजें आ गयीं। वह हड़बड़ाकर अपने आँचल को ठीक करती हुई उठी और बिना दरवाजे के कमरे से बाहर निकलकर गैलरी से होते हुये मुख्य दरवाजे की तरफ भागी। लेकिन उसके कमरे से बाहर आने और दरवाजे तक पहुँचने के बीच में दरवाजा जोर-जोर से पीटा जाने लगा। ऐसे, कि एक पल को लगा, दरवाजा टूट जायेगा। ऐसा न हो, इसलिये महिला ने दरवाजे के पास पहुँचते ही बला की फुर्ती से कुँडी को हटाते हुये दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुला, महिला के गालों पर ताबड़तोड़ तीन-चार थप्पड़ पड़े। वह अपने गालों को सहलाते हुये किनारे खड़ी हो गयी। शराब के ठेके वाला शराबी अन्दर आया।
थोड़ी देर के बाद महिला बिस्तर पर लौट आयी। अपनी आँखों को आँचल से पोंछते हुये जैसे ही वह लेटने के लिये उद्यत हुई। बगल वाला बच्चा रोते हुये उठ बैठा।
सुरेन्द्र पटेल
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