डॉ. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी बहुमुखी प्रतिभा धनी थे। उन्होंने निबन्ध, उपन्यास, समालोचना आदि अनेक विधाओं में रचना की, पर निबंधकार के रूप में द्विवेदीजी की विशिष्ट पहचान है। वस्तुत: द्विवेदीजी हिंदी के प्रथम मौलिक निबंधकार हैं। हिन्दी साहित्य को अपने पाण्डित्यपूर्ण चिंतन, विविधतापूर्ण लेखन से समृद्ध करने वाले साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने जीवन्त व्यक्तित्व तथा प्रगाढ़ पांडित्य के मणिकांचन संयोग द्वारा हिन्दी गद्य शैली को नए तेवर प्रदान किए हैं। जीवन की गतिविधियों, क्रिया-कलापों और अनुभवों को उन्होंने अपने निबंधों के अंतर्गत बहुत ही सरल रूप में अपनाया है, परिणामस्वरूप निबंध पाठक को उनके निबंधों में प्रतिभा, विद्वता एवं पाण्डित्य का अद्भुत समावेश दिखाई देता है, क्योंकि इनके निबंधों में कोरी मनोरंजकता और कलात्मकता नहीं है, अपितु सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का समावेश भी है। उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान ललित निबन्ध को स्वतन्त्र और गंभीर विधा के रूप में स्थापित करने में है। उन्होंने सूर, कबीर, तुलसी आदि पर जो विद्वत्तापूर्ण आलोचनाएं लिखी हैं, वे हिंदी में पहले नहीं लिखी गईं। उनका निबंध-साहित्य हिंदी की स्थाई निधि है।
उनके प्रसिद्ध निबंध संग्रह हैं- अशोक के फूल (१९४८), कल्पलता (१९५१), मध्यकालीन धर्मसाधना (१९५२), विचार और वितर्क (१९५७), विचार-प्रवाह (१९५९), कुटज (१९६४), आलोक पर्व (१९७२)।
डॉ. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध लेखन वर्गीकरण: वर्गीकरण की दृष्टि से द्विवेदी जी के निबंध दो भागों में विभाजित किए जा सकते हैं - विचारात्मक और आलोचनात्मक। विचारात्मक निबंधों को फिर दो भागों में बांट सकते हैं- दार्शनिक तत्वों की प्रधानता एवं सामाजिक जीवन संबंधी। आलोचनात्मक निबंध भी दो श्रेणियों में बांटें जा सकते हैं। प्रथम ऐसे निबंध, जिनमें साहित्य के विभिन्न अंगों का शास्त्रीय दृष्टि से विवेचन किया गया है और दूसरे वे निबंध, जिनमें साहित्यकारों की कृतियों पर आलोचनात्मक दृष्टि से विचार हुआ है। अध्ययन की दृष्टि से द्विवेदीजी के निबन्धों को समीक्षात्मक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, वैयक्तिक और गवेषणात्मक निबन्धों में विभक्त किया जा सकता है।
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों की विषय एवं विचारगत विशेषताएं : आचार्य द्विवेदी के निबन्ध व्यक्तित्वप्रधान, विषयव्यंजक और ललित गद्य के आदर्श रूप हैं। उनके निबंधों में उनका हँसता हुआ, व्यंग्य करता हुआ, शोध करता हुआ, चिंतन करता हुआ, शब्दों के माध्यम से संस्कृति की तह में पहुँचता हुआ, ज्ञान का अनमोल ख़ज़ाना खोलता हुआ, कभी गम्भीर, तो कभी बिलकुल उन्मुक्त और सहज चेहरा बराबर झाँकता रहता है।
१ भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर आधारित- द्विवेदीजी के सभी निबन्ध भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर आधारित हैं। उनके निबंध भारतीय संस्कृति के पर्याय हैं। इनमें मानव प्रेम, देश प्रेम, अध्यात्मिकता, उदारता, समर्पण-भावना, कर्तव्य-भावना, मानसिक संयम, असीम श्रद्धा और अगाध विश्वास आदि तत्व विद्यमान हैं
२. प्राचीनता एवं नवीनता का अद्वितीय सामञ्जस्य- आपके निबन्धों में प्राचीनता एवं नवीनता का अद्वितीय सामञ्जस्य देखने को मिलता है। भारतीय परम्परा का नए सामाजिक दर्शन के साथ समन्वय स्थापित करने का श्लाघनीय प्रयास किया है।
३. चिन्तन और मनन से परिपूर्ण- द्विवेदीजी के निबन्ध चिन्तन और मनन से परिपूर्ण होने के साथ-साथ सूक्ष्म निरीक्षण, तीक्ष्ण दृष्टि, गहन अनुभूति, मौलिक विचारधारा सम्पन्न तथा पाण्डित्यपूर्ण हैं।
४. प्रकृति प्रेम का का सूक्ष्म चित्रण- आपकी रचनाओं के अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि आपका प्रकृति निरीक्षण उच्चकोटि का होने के साथ ही प्रभावोत्पादक एवं भावोत्तेजक भी है। अपने निबंधों में प्रकृति के विभिन्न रूपों, विशाल वृक्षों, नाना वर्ण के पुष्पों से युक्त वनश्री का सूक्ष्म विवेचन आपके प्रकृति प्रेम का प्रतीक है।
६. राष्ट्रीय भावों की अजस्त्र धारा- द्विवेदीजी के निबन्धों में भारतीय संस्कृति का सजीव चित्रण हुआ है, परन्तु इनके साथ-साथ राष्ट्रीय भावों की अजस्त्र धारा भी प्रवाहित हो रही है।
७. विविध विषयों का संगम- आपके निबन्धों में विविध विषयों का संगम हुआ है। प्रमुख रूप से साहित्य, संस्कृति, ज्योतिष, योग, दर्शन, कला, धर्म, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, खगोल आदि विषय इनकी रचनाओं में समाहित हैं।
८. मानवीय आदशों को उच्च स्थान प्राप्त-द्विवेदी जी के सारे निबंध चिंतन के केंद्र में मनुष्य है । उनकी दृष्टि में मानव समाज को सुन्दर बनाने की साधना ही ‘साहित्य’ है, इसीलिए द्विवेदीजी के निबन्धों में मानवीय आदशों को उच्च स्थान प्राप्त हुआ है, जिनको जीवन यात्रा के सहज सम्बल के रूप में देखा जा सकता है। डॉ. शिवदानसिंह चौहान ने लिखा है कि 'द्विवेदीजी अतीत की धूमिलता को चीरते हुए, समसामयिकता के सन्दर्भ में मानवतावादी विचारधारा को पाठक की कल्पना में अभिषिक्त करते चलते हैं।'
९. अनुभूत तथ्यों का दिग्दर्शन- द्विवेदीजी ने भी अपने निबन्धों में देखे एवं भुक्त विचारों को प्रस्तुत किया है। उनके अनुभूत तथ्यों से युक्त विचार किसी देश या प्रान्त विशेष तक सीमित नहीं हैं, अपितु विश्व व्यापक मानव जीवन से प्रेरित हैं। एकतरफ इनके निबंधों में विचार, भावनात्मकता एवं अनुभूति की मंथर त्रिवेणी प्रवाहित होती रहती है, जो गहन संवेदना से परिपूर्ण है, तो दूसरी तरफ भावुकता एवं सह्रदयता का ज्वार-भाटा सा उठ पड़ता है।
१०. कृत्रिमता व औपचारिकता का अभाव- आचार्य द्विवेदी जी ने निबंधों की रचना उन तथ्यों एवं विचारों के आधार पर की है, जिन्हें इन्होंने स्वयं अनुभव किया, इसीलिए उनकी रचनाओं में प्रायः कृत्रिमता व औपचारिकता का अभाव और सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टिगोचर होता है। यही कारण है कि आपके निबन्ध मनोरंजक होने के साथ ही, लोकहित की भावना से भी ओत-प्रोत हैं।
११. व्यंग्य-विनोद का पुट- द्विवेदीजी के निबन्धों में यत्र-तत्र व्यंग्य-विनोद के पुट भी देखने को मिलते हैं। इनके निबंधों की एक विशेषता उनके व्यंग्य का नुकीलापन है, जो इतना सूक्ष्म और सौम्य है कि चुभते हुए कष्ट भी नहीं देता। इनके व्यंग्य कटु और तीक्ष्ण न होते हुए भी मर्मस्पर्शी बन पड़े हैं। डॉक्टर के इंजेक्शन की भांति वे व्यंग्य, बारीक सुई की तरह हैं, जो मरीज को मीठी चुभन के साथ आरोग्य प्रदान करती है, अत: अपनी सहज आत्मीयता एवं विनोद-प्रियता के कारण वे पाठकों से सीधा संवाद शीघ्र ही स्थापित कर लेते हैं ।
भाषागत विशेषताएं: इनके विचार और चिंतन मौलिक है, इनका सृजन मौलिक है, इनकी भाषा-शैली और शिल्प भी मौलिक है।
१. संस्कृत-निष्ठता एवं भाषा की प्रौढता- द्विवेदीजी का संस्कृत भाषा का ज्ञान उच्च कोटि का है। उनकी भाषा का झुकाव तत्सम शब्दों के प्रयोग की ओर है। उनकी तत्सम शब्द प्रधान-भाषा से उनके निबंधों में पाण्डित्य की झलक मिलती है।
२. समन्वयवादी शब्दावली- उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ शब्द बहुल है, पर उसमें अन्य भाषाओं के शब्दों से कहीं भी परहेज नहीं बरता गया है। अंग्रेजी एवं देशज शब्दों के साथ तिब्बती, बांग्ला, प्राकृत, अपभ्रंश, अरबी, फारसी शब्दों का मिश्रित प्रयोग मिलता है।
३. उद्धरणों एवं काव्यसूक्तियों की बहुलता- द्विवेदीजी ने अपनी भाषा में जगह-जगह संस्कृत, हिन्दी आदि के उद्धरणों का भी बखूबी प्रयोग किया है। जैसे 'पत्ता खड़का बन्दा भड़का', 'लगालगी लोयन करें, नाहक मन बन्धि जाय'।
४. मुहावरें एवं लोकोक्तियों का प्रयोग- द्विवेदीजी ने लोकोक्तियों, मुहावरों का भी यथास्थान आवश्यकतानुसार प्रयोग किया है, जिससे उनकी भाषा में लाक्षणिकता का गुण भी समाविष्ट हो गया है।
५. प्रभावोत्पादन एवं संप्रेषणीयता की अपार क्षमता-जहाँ तक द्विवेदीजी की भाषा का प्रश्न है, वह भावों को सही ढंग से समझाने की क्षमता रखती है। उनकी भाषा में गाम्भीर्य एवं सरलता है, भाव-तारल्य है, कल्पना की उड़ान है, इसीलिए वह प्रभावी है।
६. रोचकता एवं रसपूर्णता -द्विवेदीजी की भाषा में स्वच्छन्दता और मौलिकता है। उसमें कहीं उनके स्वभाव का अल्हड़पन दिखाई देता है, तो कहीं प्रौढ़ता है, पाण्डित्य है, और सबसे ऊपर है- रोचकता।
शैली वैविध्यगत विशेषताएं:
निबंधों में प्रयुक्त विविधता से युक्त शैली उनके द्विवेदीजी की अपनी विशिष्ट विशेषता है । द्विवेदीजी की रचना पद्धति में कहीं वार्तामूलक पद्धति, तो कहीं व्याख्यामूलक पद्धति, कहीं चिन्तन-मनन मूलक पद्धति, तो कहीं व्यंग्यमूलक खण्डन-मण्डन पद्धति देखने को मिलती है-
१. आगमन शैली- आपकी निबन्ध रचना में प्रायः आगमन शैली को अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ है, जिसमें प्रथमतः आप किसी विषय का विवेचन करते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं और अन्त में उसका निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं।
२. आलोचनात्मक शैली- व्यावहारिक आलोचनाओं में इस शैली का प्रयोग ज्यादा दिखाई देता है। द्विवेदी जी का आलोचक व्यक्तित्व इसमें मुखर रहा है। तत्सम प्रधान शब्दावली के रहते हुए भी भाषा में सरलता, सहजता और गम्भीरता दिखाई देती हैं।
३. गवेषणात्मक शैली- इस शैली में गम्भीर पाण्डित्य और विद्वत्ता का दर्शन होता है। सांस्कृतिक निबन्धों में प्रायः इसका प्रयोग किया गया है। इसकी भाषा संस्कृतगर्भित होती है ।
४. व्यास शैली- द्विवेदीजी ने व्यास शैली का खूब प्रयोग किया है। ज्ञानेन्द्र वर्मा ने ठीक ही लिखा है कि 'उनके विचारात्मक निबन्धों में हजारों-लाखों वर्षों के प्राचीरों को भेदकर सन्दर्भ प्रस्तुत करने और अन्य कथाओं के विन्यास के लिए व्यास शैली ही उपयुक्त है।'
५. सामसिक शैली- जहां वे व्यास शैली का प्रयोग बात को खूब स्पष्ट करने के उद्देश्य से करते हैं, वहीं कम शब्दों में बहुत कुछ कह देने के लिए सामासिक शैली का भी प्रयोग करते हैं।
६. आवेग शैली- आवेग शैली का प्रयोग उन्होंने वहाँ किया है, जहाँ उन्होंने संवेदना व्यक्त की है, जैसे- `हाय ! जो महापुरुष चला गया, साहित्य आदि की परख व उसने इस रहस्य को समझा था। हाय! हत भाग्य भारतवर्ष तू आज शोच्य है।'
७. हास्य-व्यंग्य शैली- आपके व्यंग्य में हास्य की निर्मल धारा प्रवाहित रहती हैं। शिष्टता और साहित्यिकता का गुण आपकी इस शैली का प्रधान विशेषण है।
८. लालित्यपूर्ण शैली- उनके ललित निबन्ध भावात्मक हैं। इनमें कल्पना की ऊँची-ऊँची उड़ानें हैं, भावनाओं का क्रीड़ा-विनोद है,संवेदनाओं की तीव्र बाढ़ है, अनुभूतियों की उद्दाम झंकार है, कवित्व की अद्भुत मधुरिमा है और वैयक्तिक जीवन की अमिट छाप है।
आचार्य द्विवेदी जी ने हिंदी निबंध साहित्य को व्यापक तथा समृद्ध बनाने का महान कार्य किया है। वास्तव में हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबन्ध-साहित्य बुद्धि, अनुभूति, कल्पना, विषय, भाषा एवं शैली की दृष्टि से बहुत ही समृद्ध है। विश्वंभर जी के शब्दों में' द्विवेदीजी किसी भी दशा में उन्नीस नहीं हैं-न प्रतिभा में, न अध्ययन में, न विद्वत्ता में, न विषय प्रतिपादन में और न हास्य-व्यंग्य में।' अंत में हम कह सकते हैं कि उन्होंने निबंध विधा को केवल सूचनात्मक या बौद्धिक न बना कर, जीवन के विविध रंगों और संवेदनाओं से जोड़ा, इस प्रकार उनका प्रौढ़ और संवेदनशील चिंतन उनके निबंधों में चित्रात्मकता के साथ अवतरित हो उठा है।
डॉ. मधु गुप्ता
बेंगलुरु, कर्नाटक