जो राह चुनी तूने उसी राह पर राही चलते जाना रे...
हो कितनी भी लम्बी रात, दिया बन जलते जाना रे...
ये गीत तो आपने जरुर ही सुना होगा लेकिन इस गाने का प्रयोग इस आलेख में क्यों कर रहा हूँ इस का सन्दर्भ समझाने का प्रयास मैं करता हूँ। दरअसल यह वक्तव्य सदा सत्य नहीं हैं जब आप नोबल पुरस्कार विजेता डॉ वेंकटरामन रामकृष्णन के बारे में जानेंगे तो आप भी यही कहेंगे। आइये जानते हैं भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ वेंकटरामन रामकृष्णन जी के बारे में। डॉ. वेंकटरमण रामकृष्णन एक विश्व प्रसिद्ध भारतीय-अमेरिकी-ब्रिटिश संरचनात्मक जीवविज्ञानी (Structural Biologist) हैं। उनके जीवन का सफर तमिलनाडु की गलियों से शुरू होकर विज्ञान के सर्वोच्च शिखर `नोबेल पुरस्कार' तक पहुँचने की एक प्रेरणादायक गाथा है।
वेंकटरामन रामकृष्णन का जन्म १९५२ में तमिलनाडु के चिदंबरम जिले में हुआ था। उनका जन्म एक शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था। उनके पिता सी.वी. रामकृष्णन और माता राजलक्ष्मी रामकृष्णन दोनों ही वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे, जिससे बचपन से ही उनके घर में सीखने और जिज्ञासा का वातावरण बना रहा। उनकी शिक्षा का सफर काफी दिलचस्प रहा है,क्योंकि उन्होंने अपनी शुरुआत भौतिकी से की थी। उन्होंने गुजरात के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय,वडोदरा से १९७१ में भौतिकी (Physics) में अपनी स्नातक की पढाई पूरी की। इसके बाद वे अमेरिका चले गए, जहाँ उन्होंने ओहियो विश्वविद्यालय से १९७६ में भौतिकी में ही पीएचडी की डिग्री प्राप्त की।
पीएचडी करने के बाद उन्होंने महसूस किया कि उनकी असली रुचि जीव विज्ञान (Biology) में है। इसलिए, उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो में दो साल तक जीव विज्ञान की पढ़ाई की और अपने करियर की दिशा बदल दी। उनके पास PhD की डिग्री थी,फिर भी वे क्लास में छोटे बच्चों के साथ बैठकर बेसिक बायोलॉजी सीखते थे। उनका मानना था कि यदि आप कुछ नया और महान करना चाहते हैं,तो आपको अपनी पुरानी उपलब्धियों को पीछे छोड़कर शून्य से शुरुआत करने का साहस रखना चाहिए। जीव विज्ञान पढ़ते समय उनकी रुचि इस बात में जगी कि कैसे के निर्देशों को पढ़कर कोशिकाएं प्रोटीन बनाती हैं। इसी जिज्ञासा ने उन्हें राइबोसोम की संरचना खोजने के सफर पर भेज दिया, जिसके लिए अंततः उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला।
उन्हें २००९ के रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इन्हें यह पुरस्कार कोशिका के अंदर प्रोटीन का निर्माण करने वाले राइबोसोम की कार्यप्रणाली व संरचना के उत्कृष्ट अध्ययन के लिए दिया गया है। इनकी इस उपलब्धि से कारगर प्रतिजैविकों को विकसित करने में मदद मिलेगी। इसराइली महिला वैज्ञानिक अदा योनोथ और अमरीका के थॉमस स्टीज़ को भी संयुक्त रूप से इस सम्मान के लिए चुना गया। राइबोसोम मानव शरीर की वह आणविक संरचना है जो जीवित कोशिकाओं में प्रोटीन का निर्माण करती है। प्रोटीन के बिना जीवन संभव नहीं है।
इन तीनों वैज्ञानिकों ने त्रि-आयामी चित्रों के ज़रिए दुनिया को समझाया कि किस तरह राइबोसोम अलग-अलग रसायनों के साथ प्रतिक्रिया करते हैं, इसके लिए उन्होंने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफ़ी का सहारा लिया जो राइबोसोम्ज़ की हज़ारों गुना बड़ी छवि सामने लाता है। उनके शोध से यह समझने में मदद मिली कि एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया के राइबोसोम से कैसे चिपकती हैं और उन्हें नष्ट करती हैं। इससे बेहतर दवाइयां बनाने का रास्ता साफ हुआ।
वर्तमान में डॉ वेंकटरामन रामकृष्णन ब्रिटेन के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़े हैं एवं विश्वविद्यालय की एमआरसी लेबोरेट्रीज़ ऑफ़ म्यलूकुलर बायोलोजी (पेशीय जीवविज्ञान की एमआरसी प्रयोगशाला) के स्ट्रकचरल स्टडीज़ (संरचनात्मक अध्ययन) विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक हैं। उनका जीवन सिखाता है कि करियर बदलना या देर से शुरुआत करना कभी भी गलत नहीं होता, बशर्ते आपके पास सीखने का जुनून हो। वे अक्सर याद दिलाते हैं कि वे अपनी पहली मेडिकल प्रवेश परीक्षा में फेल हो गए थे। उनका संदेश है कि `असफलता केवल एक नया रास्ता खोजने का अवसर है।' उनके अनुसार, विज्ञान पुरस्कार जीतने के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति के रहस्यों को समझने की सच्ची खुशी के लिए किया जाना चाहिए। वे वैज्ञानिक प्रमाणों के कट्टर समर्थक हैं। वे अक्सर बिना किसी वैज्ञानिक आधार वाली बातों या अंधविश्वासों को विज्ञान के साथ जोड़ने का विरोध करते हैं। उनका मानना है कि आधुनिक भारत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण (एम्गहूग्fग्म् ऊास्ज्ी) अपनाना चाहिए।
नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकी रामकृष्णन ने राइबोसोम की संरचना की खोज में अपने योगदान के बारे में एक आकर्षक और हास्यपूर्ण संस्मरण ‘जीन मशीन’ लिखा है, और ऐसा करके वे एक ऐसी कहानी सुनाते हैं जो यह दर्शाती है कि विज्ञान वास्तव में कैसे काम करता है।
इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य राइबोसोम और इसके महत्व के बारे में बात करना है। यह एक छोटा अणु है जो डीएनए से भी पुराना है - कोशिका में लगभग हर अणु या तो राइबोसोम द्वारा बनाया गया है या उन एंजाइमों द्वारा बनाया गया है जो स्वयं राइबोसोम द्वारा बनाए गए थे। इसे सभी अणुओं की जननी या दादी समझें।
इसका संबंध जीवन की उत्पत्ति से है और जीव विज्ञान के महत्वपूर्ण मोड़ पर इसकी केंद्रीय भूमिका है। यह आश्चर्यजनक है कि यदि आप सड़क पर किसी व्यक्ति से कहें,`डीएनए',तो वे सभी सोचते हैं कि वे जानते हैं कि डीएनए क्या है, लेकिन यदि आप राइबोसोम का जिक्र करें तो उनमें से अधिकांश ने इसके बारे में कभी नहीं सुना होगा-यहां तक कि अधिकांश वैज्ञानिकों ने भी इसके बारे में कभी नहीं सुना है। इस पुस्तक में उन्होंने राइबोसोम जैसे जटिल विषय को इतनी सादगी से समझाया है कि एक आम इंसान भी इसे समझ सके।
विज्ञान क्या है? विज्ञान की प्रक्रिया कैसी होती है? खोजें कैसे सामने आती हैं? यह ऐसा नहीं है कि नल खोल दो और खोजें बहने लगें। यह बीज बोने जैसा है। आप बीज बोते हैं, उनकी देखभाल करते हैं। कुछ बीज फलते-फूलते हैं और बड़े-बड़े पेड़ बन जाते हैं। कुछ शायद न उगें। लेकिन अगर आप व्यापक रूप से बीज नहीं बोएंगे,तो आपको कुछ नहीं मिलेगा। इसलिए आपको विचलित नहीं होना है अपने उद्देश्य में लगे रहना है।
यह पुस्तक ईमानदारी और विनम्रता के साथ लिखी गई है जहाँ लेखक खुद पर हंसने से भी नहीं हिचकिचाते है। उदाहरण के लिए, अक्टूबर में हुई फोन कॉल की उनकी कहानी मनोरंजक थी, और उन्होंने अपनी पत्नी की उस अविश्वसनीय प्रतिक्रिया को भी साझा किया है जब उन्हें पहली बार पता चला कि उन्होंने नोबेल पुरस्कार जीता है: `मुझे लगा था कि ऐसा पुरस्कार जीतने के लिए वाकई बहुत बुद्धिमान होना पड़ता है!' वेंकटरामन रामकृष्णन को २०१० में भारत सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। किंग चार्ल्स तृतीय ने रामकृष्णन को २०१२ में आणविक जीव विज्ञान की सेवाओं के लिए नाइटहुड से सम्मानित किया गया था। (वे आम तौर पर `सर' की उपाधि का उपयोग नहीं करते हैं।) रामकृष्णन यूएस नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, लियोपोल्डिना और ईएमबीओ के सदस्य होने के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के विदेशी सदस्य भी हैं। २०१७ में उन्हें अमेरिकन एकेडमी ऑफ अचीवमेंट का गोल्डन प्लेट अवार्ड मिला। रामकृष्णन को २०१५ में पांच साल के लिए रॉयल सोसाइटी के अध्यक्ष के रूप में चुना गया।
डॉ वेंकटरामन रामकृष्णन के बारे में जानकर अब शुरू में उधृत गीत की पंक्तियों को देने का कारण समझ ही गए होंगे कि भौतिकी का विद्यार्थी बाद में जीव विज्ञान की पढाई करता है और रसायन का नोबल पुरस्कार प्राप्त करता है। जिस चीज में आपकी रूचि है वह काम करना चाहिए और उसी में उत्कृष्टता लानी चाहिए।
डॉ. रवीन्द्र दीक्षित