विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का योगदान

भारतीय महलाओं की विज्ञान के क्षेत्र की यह अतिमहत्वपूर्ण यात्रा जितनी भी कठिनाइयों और चुनौतियों के साथ आरंभ हुई हो, परंतु उत्तम फलदायी सिध्द हो रही है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी 28% रही है। गन्तव्य अभी भी दूर है। कुछ फासला तय हो चुका है, बहुत कुछ सफर अभी बाकी है।

Apr 17, 2024 - 15:53
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विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का योगदान
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संसार के अन्य सभी क्षेत्रों की तरह, विज्ञान के क्षेत्र में भी, ऐतिहासिक रूप से, पुरूषों का वर्चस्व रहा है। रुढ़िवादी लैंगिक धारणाओं जैसे अनेक कारणों के चलते, अन्य क्षेत्रों की तुलना में, विज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश पाने में महिलाओं को अपेक्षाकृत, अधिक समय लगा है। फिर भी ऐसी कुछ असाधारण मेधा व प्रतिभा से परिपूर्ण महिलाएँ हुईं  हैं, जिन्होंने कठिनाई से ही सही विज्ञान क्षेत्र में अपनी सफलता का परचम लहराते हुए, विज्ञान क्षेत्र के द्वार महिलाओं के लिए सदा-सदा के लिए खोल दिए हैं।
ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण महिला वैज्ञानिक हैं :-

कमला सोहोनी : 18 जून, 1911 को इंदौर में जन्मीं, कमला सोहोनी ने जब 1933 में बंबई विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली, तब उनका एक ही सपना था, स्नातकोत्तर और आगे के शोध हेतु भारतीय विज्ञान संस्थान में प्रवेश। परंतु तत्कालीन भारतीय विज्ञान संस्थान के निदेशक सर सी.वी. रमन, एक महिला को शोधकार्य में प्रवेश देने हेतु बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। ऐसे में कमला जी ने अपने सपने को पूरा करने के लिए सर सी. वी. रमन के आफिस के बाहर सत्याग्रह शुरू कर दिया था। उनका हठ देखते हुए अंततः सर रमन उन्हें प्रवेश देने के लिए, दो शर्तों पर माने। एक तो यह कि उन्हें रेगुलर विद्यार्थी का दर्जा नहीं दिया जाएगा और दूसरा यह कि उन्हें एक वर्ष की अवधि के लिए, प्रोबेशन पर रखा जाएगा। बहरहाल, एक वर्ष की अवधि पूरी होते होते, श्रीमती कमला ने अपने परिश्रम और निष्ठा से यह प्रमाणित कर ही दिया कि वह प्रतिभा के मामले में किसी भी पुरुष शोधकर्ता से कम नहीं हैं और इस तरह से उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान से अपना स्नातकोत्तर वर्ष 1936 में और तत्पश्चात विश्वविख्यात कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से साइटोक्रोम 'सी' पर अपने शोधकार्य के लिए वर्ष 1939 में अपनी पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। और इस तरह वह पी.एच.डी. करने वाली पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक बन गईं। अपने रिसर्च कैरियर के दौरान उन्हें 'नीरा पेय' पर किए गए महत्वपूर्ण कार्य के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

श्रीमती कमला सोहोनी की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह उनकी अकेली की जीत नहीं, बल्कि उन सभी प्रतिभा सम्पन्न, विज्ञानप्रेमी महिलाओं की जीत थी, जो वर्षों से विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रवेश के लिए प्रतीक्षारत थीं।

जानकी अम्माल : 4 नवंबर, 1897 को तेल्लीचेरी, केरल में जन्मीं श्रीमती जानकी अम्माल भारतीय विज्ञान परंपरा की एक महत्वपूर्ण महिला वैज्ञानिक रहीं हैं। श्रीमती अम्माल को भारतीय विज्ञान में दिए गए महत्वपूर्ण योगदान के लिए, वर्ष 1935 में, भारतीय विज्ञान अकादमी का व वर्ष 1957 में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी का फेलो चुना गया। 1957 में ही उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2000 में भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने उनके नाम पर वर्गीकरण विज्ञान के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार संस्थापित किया।

असीमा चटर्जी : 23 सितम्बर,1917 को कोलकाता में जन्मीं श्रीमती असीमा चटर्जी एक महत्वपूर्ण रसायनशास्त्री हैं। जैव रसायन विज्ञान एवं 'फाइटोमेडिसिन' के क्षेत्र में किया गया उनका शोधकार्य उल्लेखनीय है। उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के औषधीय पौधों पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्हें 18 फरवरी,1982 से 8 मई,1990 तक राज्यसभा के सदस्य के रूप में भारत के राष्ट्रपति द्वारा नामित किया गया था।

डॉ. ऋतु करिधाल : वर्ष 1975 को लखनऊ में जन्मीं डॉ. ऋतु करिधाल को बचपन से ही चांद सितारों और आसमानी संसार में गहरी रुचि थी। बड़े होकर, ऐरोस्पेस इंजीनियरिंग करने के बाद, एक वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन 'इसरो' ज्वाइन किया। उन्हें भारत की 'राॅकेट वुमन' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने 'इसरो' के बहुत से महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स के लिए 'आपरेशन डायरेक्टर' के रूप में काम किया है। चंद्रयान-3 जैसे महत्वपूर्ण व सफल प्रोजेक्ट की वह 'मिशन डायरेक्टर' रहीं हैं।

डॉ. टेसी थॉमस : अप्रैल 1963 को अलप्पुळा, केरल में  जन्मीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ( डी. आर. डी.ओ.) की एडवांस सिस्टम लेबोरेट्री में कार्यरत, मिसाइल वैज्ञानिक डॉ. टेसी थॉमस को देश 'अग्निपुत्री' के रूप में जानता है। अग्नि 2 से लेकर अग्नि 5 तक की सभी मिसाइल संस्करणों को विकसित करने में डॉ. टेसी थॉमस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 

किसी संस्करण में 'असिस्टेंट डायरेक्टर' तो किसी में 'असोसिएट डायरेक्टर', तो किसी संस्करण में 'एडिशनल डायरेक्टर' के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई है। अग्नि 5 के परीक्षण के लिए तो डॉ. टेसी थॉमस को 'मिशन डायरेक्टर' जैसी महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी, जिसमें डिजाइन, निर्माण और अचूक परीक्षण का पूरा कार्यभार उन्हें अपनी टीम के साथ पूरा करना था, जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया।

कल्पना चावला : 17 मार्च, 1962 को करनाल, हरियाणा में जन्मीं कल्पना चावला ने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ से वैमानिक अभियांत्रिकी में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद, उन्होंने टेक्सास विश्वविद्यालय से विज्ञान निष्णात और कोलोराडो विश्वविद्यालय से वैमानिक अभियांत्रिकी में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1988 के अंत में कल्पना चावला ने 'नासा' का प्रतिष्ठित 'एमीस रिसर्च सेंटर' ज्वाइन कर लिया थाथा, जहाँ उन्होंने वी/एसटी ओएल में सीएसटी पर अनुसंधान किया था।

19 नवंबर, 1997 को छह अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-87 के माध्यम से उन्होंने पहली बार अंतरिक्ष में उड़ान भरी। और इस तरह वह अंतरिक्ष में उड़ान भरने वाली पहली भारत में जन्मीं महिला बनीं।

16 जनवरी, 2003 को कोलंबिया एसटीएस-107 के माध्यम से उन्हें दूसरी बार अंतरिक्ष में उड़ान भरने का मौका मिला। इस दूसरी उड़ान में कल्पना चावला को बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं गईं थीं। परंतु कुछ तकनीकी परेशानियों के चलते, विमान पृथ्वी पर सुरक्षित लैंडिंग नहीं कर पाया। और 41 वर्ष की अल्पायु में ही अपने अन्य साथियों सहित कल्पना चावला को विज्ञान की सेवा करते करते ही भीषण त्रासदी का शिकार बनना पडा। और इस तरह भारतीय विज्ञान का चमकता हुआ सितारा कल्पना चावला, सितारों की दुनिया में ही विलीन हो गईं। और जाते जाते वह अपने उन शब्दों को सत्य प्रमाणित कर गईं की, "मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूँ"।

डॉ. गगनदीप कांग : 3 नवंबर, 1962 को शिमला, हिमाचल प्रदेश में जन्मीं डॉ. गगनदीप कांग,  जानी मानी माइक्रोबायोलोजिस्ट व वायरोलोजिस्ट हैं। भारत में रोटावायरस विज्ञान व वैक्सीन के विकास में उनका योगदान उल्लेखनीय है। उनके महत्वपूर्ण शोधकार्य के चलते ही उन्हें 'भारत की वैक्सीन गॉडमदर' कहा जाता है।

उपरोक्त एवं अन्य सभी महिला वैज्ञानिकों के परिश्रम एवं दृढ़ इच्छाशक्ति का ही परिणाम रहा है कि भारतीय महलाओं की विज्ञान के क्षेत्र की यह अतिमहत्वपूर्ण यात्रा  जितनी भी कठिनाइयों और चुनौतियों के साथ आरंभ हुई हो, परंतु उत्तम फलदायी सिध्द हो रही है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी 28% रही है।

गन्तव्य अभी भी दूर है। कुछ फासला तय हो चुका है, बहुत कुछ सफर अभी बाकी है। परंतु वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ये सहज ही कहा जाता है, कि भारतीय विज्ञान में महिलाओं के योगदान की यह आगे की यात्रा का भविष्य, निश्चित ही स्वर्णिम व सुखद प्रतीत होता है।

गार्गी शर्मा

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