पुरातन से आधुनिक तक कुम्भ में बढ़ती आस्था की धारा
स्वतंत्रता के बाद कुम्भ में जुड़ने वाले तीर्थयात्रियों की आनुमानिक संख्या एक करोड़ थी, बढ़ते बढ़ते इस बार के महाकुम्भ ने तो सारे रिकॉर्ड ( देश की आधी आबादी, लगभग 67 करोड़ जो कि आजादी के समय की भारत की कुल आबादी से लगभग दोगुनी है) ध्वस्त कर दिए। इस बार 73 देशों के प्रतिनिधियों ने महाकुम्भ मेले में भाग लिया।

महाकुंभ मेला विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समागम है।
अश्वमेघ सहस्त्राणि वाजपेय शतानि च।
लक्षप्रदक्षिणा भूमे कुंभ स्नानेन तत् फलम्।
भारत तीर्थों की भूमि है इसके प्रत्येक अंचल में पुण्य कथाएं हैं, जो मनुष्यता को पापबोध से उबारती हैं। उन्हीं में से एक है कुम्भ मेला। कुम्भ मेला पौराणिक कथा, समुद मंथन की घटना पर आधारित है इसे सभी सनातनी जानते हैं। यह हर बारह वर्ष में देश के प्रमुख चार नदी तट पर बसे शहरों पर — प्रयागराज , हरिद्वार, उज्जैन, नासिक में ज्योतिषीय गणनाओं, ग्रहों के संयोग के आधार पर तय किया जाता है। छः वर्ष में अर्ध कुम्भ मेला, हरिद्वार एवं प्रयागराज में, एवं महाकुम्भ 144 वर्ष बाद केवल प्रयागराज में आयोजित किया जाता है। ये कुम्भ मेले पूर्णतया ज्योतिषीय, धार्मिक, सांस्कृतिक, खगोलीय घटनाओं पर आधारित है। धर्मशास्त्र कहते हैं कि जब बृहस्पति भ्रमण करते हुए वृषभ राशि में आते हैं तथा सूर्य, मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो संगम तट प्रयागराज में यह मेला लगता है। और यह अक्सर माघ महीने में ही होता है, इसलिए इसे माघ मेला भी कहते हैं। जब इसी संयोग में अमावस्या आती है तो वह अमृत योग (मौनी अमावस्या) को प्रकट करती है। अमृत तत्व को प्राप्त करने की सभी के जीवन की बड़ी लालसा होती है, हो भी क्यों न सामान्य जन क्या देव दानवों के बीच भी तो समुद्र मंथन के समय इसी अमृत को लेकर छीना झपटी हुई थी जिससे अमृत की कुछ बूंदें चार स्थानों पर गिरीं, और इन कुम्भ आयोजनों का कारण बनीं। इस अमृत अभिलाषा के लिए असंख्य जन पीढ़ियों से गृहस्थ, श्रद्धालु, भक्त, संत, ऋषि मुनि अपनी परम्परा, श्रद्धा भक्ति से माघ मास में संगम स्नान, कल्प वास और विविध धार्मिक अनुष्ठान की प्रक्रिया करते आए हैं। पुरातन भारत से आधुनिक भारत तक प्रवाहित आस्था की धारा में सनातन कैसे अक्षुण्ण रहता है, महा कुम्भ का आयोजन इसका प्रमाण है। बात महाकुम्भ की हो रही है तो मानस में प्रयाग ही दिखता है। गंगा, जमुना, (गुप्त सरस्वती) संगम की दिव्य धाराओं के किनारे बसा नगर प्रयागराज "तीर्थों के राजा" के रूप में प्रतिष्ठित है। संगम को सिंहासन और अक्षयवट को छत्र के रूप में धारण किए हुए तीर्थराज प्रयाग की महिमा माघ महीने में अपूर्व हो जाती है।
यूं तो कुम्भ का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद और पुराणों में मिलता है लेकिन प्रामाणिक विस्तृत जानकारी किसी ग्रंथ में नहीं है। इसके बारे में प्राचीनतम वर्णन सम्राट हर्षवर्धन के समय का है। यहां आने वाले विदेशी यात्रियों ने भी इसके धार्मिक महत्व का वर्णन अपने यात्रा संस्मरणों में किया है। जिसका वर्णन चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी किताब ‘सी–यू–की’ में, यूनानी यात्री मेगस्थनीज ने अपनी किताब ‘इंडिका’ में, एवं एक अन्य चीनी यात्री फाहियान ने गंगा किनारे लगने वाले इस पवित्र पर्व का महत्वपूर्ण उल्लेख किया है। जहां एक ओर इस आयोजन को देख बाहरी यात्री अचंभित, प्रभावित थे वहीं दूसरी ओर विदेशी आक्रांताओं की आंख की किरकिरी भी बना। समरकंद से आए आक्रांता शुजाउद्दीन तैमूरलंग ने हरिद्वार में अर्धकुम्भ मेले में नरसंहार किया। अकबर ने भी अपने काल में कुम्भ पर लगान लगाया था लेकिन बाद में विरोध के कारण बंद करना पड़ा। मुगलों के पतन के बाद अंग्रेज भारत पर अपना वर्चस्व बनाए रखने की कोशिशों में जुटे हुए थे। सन 1857 की क्रांति के बाद वे इस तरह के लाखों की भीड़ वाले आयोजनों को लेकर डरे हुए भी थे और सतर्क भी थे कि कहीं फिर से कहीं कोई क्रांति न हो जाए। कुम्भ मेले का आजादी के आंदोलन से भी इसका गहरा नाता रहा है, अंग्रेजों को इस बात की भनक थी कि कुम्भ मेला स्वतंत्रता सेनानियों की मुलाकातों, उनकी योजनाओं को प्रारूप देने, खुफिया संदेश देने, लोगों को जागरूक करने का प्रभावी माध्यम था। हालांकि इसके लिखित दस्तावेज नहीं हैं, क्योंकि यह कार्य गुपचुप तरीके से प्रतीकात्मक चिन्हों को प्रयोग करते हुए ही किए जाते थे। इसलिए अंग्रेजों ने सुरक्षा के नाम पर कई प्रतिबंध लगाए, निगरानी शुरू की, टैक्स लगाया एवं धीरे धीरे इस आयोजन की पूरी कमान अपने हाथ में ले ली। ताकि कुम्भ मेले में कम से कम लोग ही जा सकें। सन 1942 तक आते आते अंग्रेज इतना डरे हुए थे कि प्रयाग आने जाने वाली सभी ट्रेन बस की टिकटों की बिक्री ही बंद करवा दी, खबरें फैलाई गई कि विश्व युद्ध के चलते जापान बम गिरा सकता है, इसके बावजूद लाखों धर्मप्रेमियों तीर्थयात्रियों को कुंभ में जाने से कोई रोक नहीं सका। स्वतंत्रता के बाद प्रयागराज में प्रथम अर्धकुंम्भ 1948 और 1954 में प्रथम पूर्ण कुम्भ मेला बहुत ही साधारण तरीके आयोजित हुआ, जिसे अब 2025 में नवीनतम टेक्निक के साथ अविस्मरणीय बना दिया।
यह बेहद अफसोस जनक है कि आस्था, आध्यात्म और संस्कृति के संगम, कुम्भ मेले की इतनी प्राचीन गौरवशाली परम्परा होते हुए भी इसका कहीं भी उचित संकलन नहीं है। कभी किसी पुस्तक में, फिल्म आदि में भी गौरवपूर्ण इतिहास नहीं दर्शाया गया। कुम्भ के अलग अलग जगहों पर आयोजन का उल्लेख अलग अलग टुकड़ों में ही मिलता है। इतिहास में 12 वीं शताब्दी से कुम्भ के भव्य आयोजन का उल्लेख मिलता है, हालांकि सीधे तौर पर कहीं जिक्र नहीं है।इंडोलॉजिस्ट एन. एन. बनर्जी ने अपनी किताब ‘हिंदुत्व’ में इस बात पर खेद व्यक्त किया है कि कुम्भ की परंपरा प्राचीन होने के बावजूद किसी ने भी कुम्भ के इतिहास को संजोया नहीं है।
आदिगुरु शंकराचार्य ने छठी शताब्दी ईसा पूर्व जब कुम्भ को लोकप्रिय बनाना शुरू किया, तब किस ने सोचा होगा, कि अनवरत चलने वाली एक ऐसी सनातन यात्रा प्रारंभ हो रही है, जो कालखंड में बांधी न जा सकेगी। इसके बाद सदियां बीतती गईं और कुंभ का वैभव बढ़ता ही गया। स्वतंत्रता के बाद कुम्भ में जुड़ने वाले तीर्थयात्रियों की आनुमानिक संख्या एक करोड़ थी, बढ़ते बढ़ते इस बार के महाकुम्भ ने तो सारे रिकॉर्ड ( देश की आधी आबादी, लगभग 67 करोड़ जो कि आजादी के समय की भारत की कुल आबादी से लगभग दोगुनी है) ध्वस्त कर दिए। इस बार 73 देशों के प्रतिनिधियों ने महाकुम्भ मेले में भाग लिया।
महाकुंभ के माध्यम से एक सीमित भूभाग में,अरबों रुपए की अर्थव्यवस्था, हजारों हजारों लोगों की आजीविका, असंख्य युवाओं के लिए कार्य कौशल के अवसर तथा विभिन्न जीवनोपयोगी उत्पाद, शिल्प, और कलाओं के लिए संभावना ने नए द्वार खोले हैं। सबकी अपनी अलग कहानी है। धर्म, अध्यात्म, संस्कार, लोकमंगल के अनेक प्रकार के आयाम देखने को मिलते हैं, धार्मिक सभाएं प्रवचन होते हैं। सभी का एक ही उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति और पापों से मुक्ति। साधु संतों के अखाड़े, नागा साधुओं की अनोखी परंपराएं, विभिन्न संस्कृतियां, आस्था की गूंज यह सब देखकर अद्भुत अनुभव होता है। रात्रि में जगमग रोशनी, तट पर गूंजती शंख ध्वनि, मंत्रमुग्ध कर देने वाली गंगा आरती, भक्तों की श्रद्धा, संतों की वाणी सब मिलकर इस आयोजन को और दिव्यता प्रदान करते हैं। लगता है बस यहीं रम जाओ। ना भविष्य की चिंता ना गुजरे का अफसोस, कितना भी नास्तिक क्यों ना हो ... उस परम शक्ति के प्रति जानने की जिज्ञासा बढ़ जाती है, सिर श्रद्धा से झुक जाता है।
महाकुम्भ भारतीय संस्कृति, धार्मिक समागम, आध्यात्मिकता से कहीं अधिक है। कुम्भ आर्थिक/ क्षेत्रीय विकास का भी अनूठा पर्व है। यहां संत, महात्मा, अखाड़े, नागा, अघोरी, विद्वान, विचारक, कलाकार, गृहस्थ, श्रद्धालु, आमजन न केवल आत्मशुद्धि के लिए एकत्र होते हैं ... अपितु शांति सहयोग का संदेश भी देते हैं। यही कारण है यूनेस्को ने इसे ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ के रूप में मान्यता दी है।
महाकुंभ समाप्त... वो शहर प्रयागराज! और सूनी हो चली सारी सड़कें, गलियां ... जहां करीब डेढ़ महीने से देश विदेश से श्रद्धालुओं का रेला उमड़ रहा था। हर घर, समाचार पत्र, टीवी चैनल्स की ... सुर्खियों में था। कभी व्यवस्था डगमगाती लगी तो तुरंत ही प्रशासन द्वारा संभाल लिया गया। लगता मानो किसी दैवीय शक्ति ने इस आयोजन को संभालने की जिम्मेदारी स्वयं ले रखी हो ... पैंतालीस दिनों तक चलने वाला महाकुंभ 13 जनवरी 2025 से शुरू हुआ 26 फरवरी 2025 को पूर्ण हो चुका है। लेकिन इसकी यादें हमेशा गर्वानुभूति कराएंगी, कि हम भी इस महाकुंभ के साक्षी बने जो कि अब 144 वर्ष बाद आयेगा।
मनु वाशिष्ठ कोटा जंक्शन राजस्थान
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