बूढ़ी गाँधी.. मातंगिनी हाजरा
गांव और नगर की सीमाएं अब मिटती जा रही है। अब तक हम समझते थे कि लोकनाट्यों के लिए गाँवो का विस्तृत क्षेत्र है, पर गाँवों की विद्युतीकरण की गति के साथ-साथ टी. वी., सिनेमा व साइबर दुनिया के प्रसार से भी इन लोक नाट्यों पर काफी घातक प्रभाव पड़ता जा रहा है। आज भारतीय संस्कृति में पाश्चात्य संस्कृति का अतिक्रमण इस हद तक बढ़ गया है कि हमारी अपनी सांस्कृतिक कला-निधि उपेक्षित होकर रह गई है।
आजादी महोत्सव यानि ७९ सालों का एक पुनरावलोकन विचारों पर, प्रगति पर,संकल्पों पर,सपनों पर जो साकार हुए और जो अभी आँखों में बसे हैं ।यह समय है आजादी की उर्जा और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों से सींची हुई फलती -फूलती आजादी के लिए उन्हें एक बार फिर से नमन करने का है। उत्साह, उल्लास, आनंद के बीच एक अविस्मरणीय दीप उन सेनानियों के लिए जिन की शहादत के कारण आज हमे यह दिन देखना नसीब हुआ है।
स्वतंत्रता संग्राम में अनगिनत सेनानियों, नागरिकों और महिलाओं ने अपना जीवन होम किया। आज से १७५ साल पहले का यदि सामाजिक ढांचा देखे तो महिलाओं की स्थिति इतनी सुदृढ़ नहीं थी कि वो पुरूषों के साथ कँधे से कँधा मिला कर आजादी की जंग में अपना योगदान दें। परंतु आजादी की जंग में अनेक महिलाओं के नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे गये और अनेक गुमनाम रहीं ।
भारत की गुलामी की बात करे तो सन् १७५७ (प्लासी की लड़ाई) के बाद से भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ता गया क्योंकि प्लासी की लड़ाई में बंगाल जैसा एक बड़ा क्षेत्र ब्रिटिश ने अपने कब्जे में ले लिया था। इसके बाद धीरे-धीरे वो भारत के अन्य हिस्सों पर भी अपनी पकड़ बना पाया और १९४७ तक भारत पर राज्य किया। तकरीबन १९० सालों तक हमारा देश गुलाम रहा।
आजादी की चिंगारी जो १८५७ में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से आरंभ हुई और एक ज्वालामुखी के रूप में अँग्रेजों को भस्म कर गई। समय के साथ महिला शक्ति माँ चंडी का रूप धर चुकी थी। लक्ष्मीबाई, दुर्गाबाई देशमुख, विजयलक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी, सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू,कस्तूरबा गाँधी, कमला नेहरू आदि जैसे नाम तो इतिहास के पन्नों पर और जनमानस के पटल पर अंकित है। परंतु ऐसे अनगिनत स्वतंत्रता की चिंगारियाँ हैं अभी धुंधली हैं। उनकी वीरता को खुला आसमान नहीं मिला है। उसमें कतिपय नाम हैं.. प्रभावती गुप्ता, रानी दिद्दा, रूद्रमा देवी, रानी चेनम्मा, प्रीतीलता वडेदा, बीना दास, कल्पना दता, मातंगिनी हाजरा आदि।
इसी परिपेक्ष्य में मांतगिनी हाजरा `बूढ़ी गाँधी', के जीवन के अनछुए पहलुओं पर नजर ड़ालें और आजादी की इस वीरांगना को नमन करें। मतांगिनी हाज़रा का जन्म,१९ अक्टूबर १८७० ई. में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के होगला गाँव में एक अत्यंत गरीब किसान परिवार में हुआ था। उन दिनों लड़कियों को अधिक पढ़ाया नहीं जाता था, इसीलिए मातंगिनी भी निरक्षर रही। उनके पिता ने १२ साल की उम्र में उसका विवाह साठ साल के एक धनी वृद्ध के साथ कर दिया। दुर्भाग्य यह कि छः साल तक निःसंतान रही और मात्र अठारह वर्ष की थी तब वो विधवा हो गई। पति की पहली पत्नी से उत्पन्न पुत्र उससे बहुत घृणा करता था। अतः उन्हें घर से निकाल दिया। तब मातंगिनी वहीं थोड़ी दूरी पर झोपड़ी बना कर रहने लगी। वो मजदूरी करके पेट पालती और पूरे गाँव के सुख-दुख में सदा हाथ बटाती और सभी उन्हें माँ समान मानते थे। दया, कर्मठता, सहयोग की यही भावना आगे चलकर देश की आजादी के लिए ज्वालामुखी बनी।
मतांगिनी के जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन तब आया जब १९३० के आंदोलन में उनके गाँव के कुछ युवाओं ने इस में भाग लिया और तब उसने स्वतंत्रता की चर्चा पहली बार सुनी।इससे पहले उन्होंने कभी स्वतंत्रता शब्द भी नहीं सुना था। पति के देहांत के बाद ४४साल तक अकेले ही गांव मे मेहनत मजदूरी कर के जीवन जीने वाली मातंगिनी जब ६२ साल की हुई तब वे इस शब्द से परिचित हुँई। उस समय १९३२ में गाँधी जी के नेतृत्व में देश भर में स्वाधीनता का जयघोष हो रहा था। आंदोलन सब तरफ फैल चुका था। वंदेमातरम का जय घोष करते हुए जुलूस रोज निकलते थे । एक दिन ऐसा ही जुलूस मातंगिनी के घर के पास से निकला और बंगाली परंपरा के अनुसार उसने शंख ध्वनि से स्वागत किया।यह शंख ध्वनि उसके भीतर के अर्जुन को भी जगा गई और वह चल पड़ी उनके साथ। यह कदम नया मोड़ लाया उसके जीवन में। एक साधारण ग्रामीण से आजादी का सेनानी बनने की यात्रा शुरु हुई। उसने गाँधी जी के नमक सत्याग्रह में भी भाग लिया। १७ जनवरी १९३३ को `चौकीदारी करबंदी आंदोलन' को दबाने के लिए बंगाल के तत्कालीन गवर्नर एंडरसन तामलुक आये तो उनके विरोध में प्रदर्शन हुआ। वीर और साहसी मातंगिनी हजारा सबसे आगे काला झंडा लिए डटी थी। वह ब्रिटिश शासन के विरूद्ध नारे लगाते हुए दरबार तक पहुँच गयी। तब पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और छः माह का सश्रम का कारावास देकर मुर्शिदाबाद जेल में बंद कर दिया। जेल से बाहर आने पर उन्होंने चरखा खरीदा और खादी के वस्त्र पहनने लगी। निरक्षर आत्म सम्मानी मातंगिनी के जीवन का एक ही लक्ष्य था आजादी और अँग्रेजों को भारत भूमि से खदेड़ना।
तामलुक में १९३५ में भीषण बाढ़ के कारण हैजा और चेचक फैल गया। मातंगिनी ने जनसेवा में अपने को झोंक दिया। सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब १९४२ में `भारत छोड़ो आंदोलन' चरम पर था और मातंगिनी ने अपना दायित्व समझ कर साथ दिया। ८ सितंबर १९४२ को तामलुक में हुए एक प्रदर्शन में पुलिस की गोली से तीन स्वाधीनता सेनानी मारे गये। जिस के विरोध में २९ सितंबर को बड़ी रैली निकालने का निश्चय किया। इस में जुनूनी मातंिगनी ने गाँव-गाँव घूम कर रैली के लिए ५००० लोगों को तैयार किया। सब दोपहर को डाक़ बंगले पहुँचे। यह तय किया गया था कि सभी अँग्रेजों के कार्यालर और पुलिस थानों पर तिरंगा फहराया जाएगा। तभी पुलिस ने बर्बरता दिखाई,गोलियों की बरसात शुरु हुई। मातंगिनी एक चबूतरे पर खड़ी नारे लगवा रही थी। एक गोली उनके बायें हाथ पर लगी। उन्होंने तिरंगे गिरे इससे पहले ही दूसरे हाथ में ले लिया। तभी दूसरी गोली दूसरे हाथ में और तीसरी माथे पर लगी। उनकी देह वहीं लुढ़क गयी।
इस बलिदान से पूरे क्षेत्र में जोश का सैलाब सा आ गया। इस सैलाब ने दस दिनों के अंदर ही अँग्रेजों को खदेड़ दिया और स्वयं की सरकार स्थापित कर दी,जिसने इक्कीस महीने काम किया। २९ सितंबर १९४२ में ७१ साल की आयु में उनका देहांत हुआ। दिसंबर १९७४ में भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपने प्रवास के समय तामलुक में मातंगिनी हाजरा की मूर्ति का अनावरण कर उन्हें श्रृद्धांजलि दी। मातंगिनी हाजरा को लोग `बूढ़ी गाँधी' के नाम से भी जानते हैं। यह बलिदान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जी से कम नहीं है।
डॉ.नीना छिब्बर
जोधपुर
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