14 अगस्त भारत विभाजन विभीषिका दिवस पर विशेष लेख (सांप्रदायिक राजनीति एवं भारत विभाजन)

भारत का विभाजन 1947 आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और त्रासद घटनाओं में से एक था। इस लेख में विभाजन के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संदर्भों, मुस्लिम लीग, द्विराष्ट्र सिद्धांत, पाकिस्तान की मांग, लाहौर प्रस्ताव, प्रत्यक्ष कार्रवाई और माउंटबेटन योजना जैसे प्रमुख घटनाक्रमों का विश्लेषण किया गया है। साथ ही विभाजन के दौरान हुई हिंसा और उसके दूरगामी प्रभावों पर भी चर्चा की गई है।

Oct 7, 2026 - 12:53
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14 अगस्त भारत विभाजन विभीषिका दिवस पर विशेष लेख  (सांप्रदायिक राजनीति एवं भारत विभाजन)
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भारत का विभाजन विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक कारकों का प्रतिफल था। वस्तुतः विभाजन मुख्यतः हिन्दू एवं मुस्लिम समुदायों के मध्य धार्मिक तनाव का परिणाम था जिसमें मुस्लिम अलगाववाद एवं सांप्रदायिकता प्रमुख थी। भारत में इस्लाम एवं मुसलमानों का प्रवेश भारतीय धर्म, संस्कृति के लिए काला अध्याय था। विश्व में वे जहाँ भी गये वहाँ के सांस्कृतिक परिवेश को बलपूर्वक बदल डाला। भारत में सर्वप्रथम पश्चिमोत्तर क्षेत्र से मुस्लिम आक्रांताओं ने हमला किया। प्रथम मुस्लिम आक्रमण अरबों ने किया जिसका नेतृत्व मुहम्मद बिन कासिम ने किया। उसके बाद तो भारत पर मुस्लिम आक्रमणों की एक श्रृंखला प्रारंभ हो गई जो महमूद गजनवी से लेकर के अहमद शाह अब्दाली तक अनवरत रूप में जारी रही।
ये मुस्लिम आक्रमण मात्र लूटमार अथवा विजय की आकांक्षा से प्रेरित होकर ही नहीं किए गए, बल्कि उनके पीछे एक और उद्देश्य भी था और वह था भारत में मूर्ति पूजा एवं बहुदेववाद पर प्रहार करना एवं भारत पर इस्लाम का प्रभुत्व स्थापित करना था। महमूद गजनवी के बारे में इतिहासकार अल-उत्बी लिखता है.. उसने मंदिरों में मूर्तियों को तोड़ा और इस्लाम की स्थापना की, मूर्तियों को तबाह किया तथा गर्वान्वित होकर घर लौटा और संकल्प लिया कि वह प्रत्येक वर्ष हिंदुस्तान के खिलाफ जेहाद करेगा।
लगभग सभी मुस्लिम आक्रांताओं एवं शासकों ने मंदिरों को तोड़ा और हिंदुओं के लिए इस्लाम अथवा मृत्यु का वरण करने के लिए कहा। वे सभी इस बात से एकमत थे और वह था हिंदुओं का विध्वंस। भारत में सांप्रदायिक समस्या १९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध एवं बीसवीं शताब्दी में भारतीय राष्ट्रवाद एवं ब्रिटिश साम्राज्य का महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु बन गई। इतिहासकार मेटकॉफ के अनुसार १८५७ का विद्रोह प्रारंभिक चरण में सैनिक विद्रोह था किंतु कालांतर में वह राजनीतिक संघर्ष बन गया। भारतीय जनता ने मुस्लिम नेतृत्व को स्वीकार करते हुए ११ मई १८५७ ई. को बहादुर शाह जफर को २१ तोपों की सलामी के बाद हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया। १८५७ ई. की क्रांति विफल होने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि ६ शताब्दियों के दीर्घ शासनकाल के पश्चात भारत में मुस्लिम सत्ता समाप्त हो गई। 


१९वीं शताब्दी के प्रथम दशक तक आते-आते शासन तंत्र में दो प्रतिक्रियाएं उभर कर सामने आईं। एक वर्ग वह था जो किसी भी मूल्य पर ब्रिटिश शासन से समझौते के पक्ष में नहीं था, जबकि दूसरा वर्ग ब्रिटिश राज की स्थिरता के संबंध में विश्वस्त था। प्रथम दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व वहाबी आंदोलन के प्रवर्तक सैयद अहमद बरेलवी ने किया, जबकि दूसरी विचारधारा के प्रवर्तक सैयद अहमद खां थे। वस्तुतः वहाबी आंदोलन इस्लामी धार्मिक पुनर्जागरण का प्रतिरोध था, जिसका प्रारंभ शाह वलीउल्लाह देहलवी (१७०३-१७६५ ई.) ने किया। उन्होंने इस्लाम को नवीन संदर्भों, नवीन व्याख्याओं व तर्कपूर्ण स्थापनाओं के साथ प्रस्तुत किया। १७५० ईस्वी में जब दिल्ली की गद्दी पर मराठों एवं जाटों का वर्चस्व बढ़ता गया और दिल्ली पर उनका कब्जा हो जाने का भय पैदा हो गया, तो वलीउल्लाह ने कई मुस्लिम शासकों एवं अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली को भारत आकर दिल्ली में सत्ता स्थापित करने एवं इस्लाम की रक्षा के लिए आमंत्रित किया।
अपने आमंत्रण पत्र में उन्होंने लिखा- भारत में मुस्लिम शासकों में कोई नहीं है जो काफिरों को परास्त करे, इसलिए सम्राट का यह कर्तव्य बनता है कि वह भारत पर आक्रमण करें और काफिरों की सत्ता समाप्त करें। इस्लाम की विजय संपूर्ण समुदाय की विजय है। १७६२ ईस्वी में शाह वलीउल्लाह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र शाह अजीज ने भारत को दारुल हर्ब (दुश्मन का घर) घोषित किया। उनके शिष्य सैयद अहमद बरेलवी ने इसे आगे बढ़ाते हुए जिहाद का स्वरूप देकर लंबा सशस्त्र संघर्ष चलाया जो वहाबी आंदोलन कहलाया। इसका एकमात्र उद्देश्य इस्लाम के शत्रुओं से लड़ना तथा मुसलमानों के खोए हुए राज्यों को वापस दिलाना था।
उनकी मृत्यु के पश्चात इसका केंद्र पटना बना। ब्रिटिश शासन के अंतर्गत भारतीय भूमि को दार-उल-हर्ब मानते हुए मुसलमानों का यह आह्वान किया गया कि वे जिहाद करें। इस आंदोलन के प्रभाव से पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में कई बार ब्रिटिश शासकों को सैन्य अभियान करने पड़े। कालांतर में यद्यपि यह आंदोलन असफल रहा, किंतु भविष्य में इसके दूरगामी प्रभाव हुए। इससे भारत में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। इसका उद्देश्य अरब में सातवीं शताब्दी में प्रचलित रीति-रिवाजों को मुसलमानों में कट्टरता से लागू करना था, जिससे कि वे भारतीय संस्कृति से दूर रहें। 


जमालुद्दीन अफगानी अखिल इस्लाम के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता थे। अफगानी भारत में कई बार आए और काफी समय तक रहे। भारत में उन्होंने हिंदू-मुसलमान खाई को चौड़ा किया। अखिल इस्लाम की बात करके उन्होंने यहाँ के मुसलमानों को विदेशी मुसलमानों एवं विदेशी भूमि से जोड़ा। उनके विदेशी सरोकारों को भारत के मुसलमानों का मुख्य सरोकार बनाया। इनका इस्लामी राष्ट्रवाद भारत-विरोधी था, भारतीयता का उसमें कोई हिस्सा नहीं था। देवबंद स्कूल ने भी अफगानी के विचारों से स्वर में स्वर मिलाया, उससे प्रभावित हुआ तथा वैश्विक इस्लाम से जुड़कर कट्टर इस्लामी रूप में परिवर्तित हो गया। इसका ब्रिटिश विरोध राष्ट्रीय न होकर सिर्फ धार्मिक था।
मुसलमानों के पुनर्जागरण की दूसरी धारा जो अंततः मुख्य धारा बनी एवं कालांतर में जिसने पाकिस्तान के समर्थन में मुस्लिम बौद्धिक जगत को आंदोलित किया, वह मुख्य रूप से सर सैयद अहमद खान एवं उनके द्वारा स्थापित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्रारंभ हुई। पाकिस्तान के जन्म के पीछे तथा हिंदू-मुसलमानों की खाई को गहराने के विषय में सैयद अहमद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने स्पष्ट व उग्र रूप से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विरोध किया एवं ब्रिटिश शासकों का समर्थन किया। मुसलमानों को किसी भी प्रकार से भारतीय अथवा राष्ट्रीय दृष्टि व गतिविधि से दूर करने का प्रयास किया। उन्हें किसी भी राष्ट्रीय संघर्ष आंदोलन तथा चेतना से अलग रखा तथा मुसलमानों के लिए अलग कौम का निरंतर प्रयोग किया। मुस्लिम विचारकों के लिए पाकिस्तान एक स्वप्न बन चुका था। पाकिस्तान यदि भारतीय मुसलमानों के लिए उपलब्धि है तो इसका श्रेय सैयद अहमद को ही दिया जा सकता है।
सैयद अहमद ने राजनीतिक कारणों से हिंदू-मुसलमानों को अलग-अलग रखा। ३० दिसंबर १८९३ ई. को सैयद अहमद के घर पर एक बैठक हुई जिसमें सरकार को मुस्लिम विचारधारा से अवगत कराने के लिए एक राजनीतिक संस्था बनाने का निर्णय लिया गया। यह संस्था मुस्लिम लीग की वास्तविक अग्रणी संस्था थी। सन १९०४ ईस्वी में सैयद अहमद की मृत्यु दिवस की बरसी पर मियां मुहम्मद दीन ने मुसलमानों के लिए एक केंद्रीय राजनीतिक संस्था बनाने का निर्णय लिया जिससे राजनीतिक कार्य किया जा सके। १९०५ ई. के बंगाल विभाजन ने मुसलमानों को अलग संगठन बनाने को प्रेरित किया। १९०६ ईस्वी में मुस्लिम लीग के जन्म के साथ ही कांग्रेस को चुनौती देने वाला एक अलग मुस्लिम संगठन बन गया जिसने अंततः पाकिस्तान के रूप में भारत के अंदर से एक अलग मुस्लिम राष्ट्र का निर्माण कर लिया।
खिलाफत आंदोलन के दौरान जब भारतीय मुसलमानों ने देखा कि तुर्की के खलीफा से ब्रिटेन एवं मित्र राष्ट्रों ने विश्वासघात किया है, तो वे अंग्रेजों के विरोध में आवाज उठाने लगे। महात्मा गांधी ने अपने असहयोग आंदोलन के साथ मुसलमानों के इस मुद्दे को जोड़ने का प्रयास किया जो तर्कसंगत नहीं था क्योंकि यह विदेशी मुद्दा था। इससे तुष्टिकरण को बढ़ावा मिला। इस मुद्दे को जोड़ने के बाद ही मुस्लिम राजनीति सांप्रदायिक राजनीति में परिवर्तित हो गई। कवि एवं दार्शनिक मोहम्मद इकबाल को पाकिस्तान का वैचारिक जनक माना जाता है। १९३० ईस्वी में इलाहाबाद में हुए मुस्लिम लीग के अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने भारत के अंदर एक मुसलमान भारत के निर्माण पर बल दिया। इस सांप्रदायिक दृष्टि को आगे बढ़ाने में कैंब्रिज स्नातक चौधरी रहमत अली का महत्वपूर्ण योगदान है। १९३० ईस्वी में उन्होंने चार पन्ने का एक पर्चा जारी किया जिसमें उल्लेख था कि पंजाब, उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत, कश्मीर, सिंध एवं बलूचिस्तान को मिलाकर एक अलग राज्य बने जिसका नाम पाकिस्तान हो। रहमत अली ने जुलाई १९३५ ईस्वी में स्वयं को पाकिस्तान राष्ट्रीय आंदोलन का संस्थापक घोषित किया। 


रहमत अली के स्वप्न को मूर्त रूप मोहम्मद अली जिन्ना ने दिया। ७ मार्च १९३४ ई. को जिन्ना इंग्लैंड से भारत लौटे तो मुस्लिम लीग ने उनका स्वागत किया और उनके नेतृत्व को स्वीकार किया। जिन्ना के समक्ष अब केवल एक ही लक्ष्य था-- मुसलमानों को संगठित करके एक ही दल (मुस्किल लीग) के अंतर्गत लाना। इनका मानना था कि मुसलमान यदि एक साथ में अपनी बात रखेंगे तो अधिक शक्तिशाली होंगे। वस्तुतः अलग राष्ट्र व दो राष्ट्रों के सिद्धांत का मुख्य विकास १९३७ ई. के चुनाव के बाद हुआ। २३ मार्च १९४० ई. को मुस्लिम लीग के अधिवेशन में ठलाहौर प्रस्तावठ पास हुआ जिसमें पाकिस्तान के निर्माण का लक्ष्य था। कैबिनेट मिशन के सदस्य जब जिन्ना से मिले और उनसे पाकिस्तान के औचित्य पर सवाल पूछा तो जिन्ना ने कहा- कई वर्षों की स्थिति के पश्चात हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि देश का बंटवारा हो जाना चाहिए।
१९४६ ई. के प्रांतीय चुनाव में मुस्लिम लीग को ४२५ सीटें मिलीं। इस जनादेश को मूर्त रूप देने व पाकिस्तान के समर्थन में मुसलमानों की एकजुटता को प्रकट करने के लिए ७ अप्रैल १९४६ ई. को दिल्ली में लीग का अधिवेशन हुआ जिसके मंच के बैनर पर लिखा था- ठआजादी का रास्ता पाकिस्तान से होकर जाता है।ठ १७ जुलाई १९४६ ई. को मुस्लिम लीग काउंसिल की बैठक हुई जिसमें ठसीधी कार्रवाईठ का प्रस्ताव पास हुआ जिसमें यह कहा गया था- मुसलमान कौम पाकिस्तान बनाने के लिए और अंग्रेजों की वर्तमान गुलामी व हिंदुओं की भविष्य में गुलामी से बचाने के लिए सीधी कार्रवाई करें। जिन्ना की यह सीधी कार्रवाई हिंदुओं के विरुद्ध थी न कि अंग्रेजों के। १६ अगस्त से २० अगस्त तक कोलकाता में मृत्यु का निर्वाध तांडव हुआ, सड़कों एवं गलियों में हिंदुओं की लाशें पड़ी थीं। मध्ययुगीन बर्बरता सैद्धांतिक आवरण में सर्वत्र फैली हुई थी।
२२ मार्च १९४७ ई. को लॉर्ड माउंटबेटन भारत आए जिनका लक्ष्य भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना था। ३१ मार्च १९४७ ई. को गांधी-माउंटबेटन की पहली मुलाकात हुई, दूसरे दिन ९:०० बजे माउंटबेटन से दूसरी मुलाकात हुई जिसमें गांधीजी ने चौंकाने वाला प्रस्ताव माउंटबेटन को दिया। इसमें यह कहा गया कि जिन्ना एवं मुस्लिम लीग को केंद्र में सरकार बनने दी जाए, जिन्ना देश के प्रधानमंत्री बनें और जैसे चाहें देश चलाएं। किंतु गांधीजी के प्रस्ताव को न तो माउंटबेटन ने माना और न ही कांग्रेस ने, क्योंकि दोनों के अपने-अपने स्वार्थ थे। माउंटबेटन विभाजित भारत को भविष्य में अपना राजनीतिक केंद्र बनाना चाहते थे और नेहरू की अलग महत्वाकांक्षा थी। कांग्रेस कार्यसमिति ने गांधीजी के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। तत्पश्चात गांधीजी ने स्वयं को विभाजन प्रस्ताव से पूर्ण रूप से अलग कर लिया। 

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२० अप्रैल १९४७ ई. को नेहरू ने भाषण में कहा- मुस्लिम लीग पाकिस्तान ले सकती है लेकिन इस शर्त पर कि वह अपने साथ भारत का वह हिस्सा नहीं ले जाएगी जो पाकिस्तान में नहीं जाना चाहता। ४ जून १९४७ ई. की प्रेस कॉन्फ्रेंस में माउंटबेटन ने प्रथम बार यह संकेत दिया कि विभाजन की तारीख १५ अगस्त होगी। माउंटबेटन ने यह तारीख इसलिए चुनी क्योंकि इसी तारीख को दूसरे विश्वयुद्ध में उन्होंने जापानियों के विरुद्ध पूर्वी मोर्चे के कमांडर के रूप में निर्णायक विजय प्राप्त की थी।
इस प्रकार अंततः भारत का विभाजन हो गया और १४ अगस्त १९४७ ई. को पाकिस्तान के रूप में एक नवीन देश ने जन्म लिया। भारतीय इतिहास में एक अध्याय का अंत हुआ। पाकिस्तान एवं भारत दोनों अलग राष्ट्र बन गए। विभाजन एक त्रासदी थी जिसमें लाखों लोग मारे गए। गांधीजी भी इस त्रासदी को रोक नहीं पाए बल्कि तुष्टिकरण के दलदल में फंस गए। भारतीय इतिहास के एक अध्याय का अंत हुआ, पाकिस्तान एवं भारत दोनों अलग राष्ट्र बन गए। विभाजन की इस पूरी प्रक्रिया में एक तथ्य बिल्कुल स्पष्ट हो गया कि दोनों देशों के मध्य जन्म से ही पारस्परिक घृणा, असहयोग व दुराचार जन्म ले चुके थे जो वर्तमान एवं भविष्य में भी जारी रहेंगे।इस शहर के प्रमुख आकर्षणों में से एक है चिलान कैसल। यह कैसल मोन्त्रो और जिनेवा झील के पास स्थित एक आकर्षक किला है। ये इस क्षेत्र की रक्षा के लिए निर्मित किया गया था। ये किला स्विट्जरलैंड के रणनीतिक और सैन्य इतिहास की अनूठी झलक प्रदान करता है। इसमें मध्ययुगीन मीनार, पत्थर की दीवारें, ऐतिहासिक हॉल, प्राचीन भित्तिचित्र हैं। इसके अंदर सुरंग, कारावास कक्ष, शयन कक्ष, गुसलखाना और संरक्षित सैन्य प्रतिष्ठान हैं। साथ ही झील और आसपास के आल्प्स पर्वतमाला के मनोहर दृश्य हैं। यह कैसल स्विट्जरलैंड का सबसे खूबसूरत किला माना जाता है और घूमने के लिए बेहतरीन जगहों में से एक है।
फ्रेडी मर्करी की प्रतिमा मोन्त्रो के सबसे अधिक फोटो खींचे जाने वाले स्थलों में से एक है। १९९६ में फ्रेडरिक फ्रेडी मर्करी की ब्रोंज की ३ मीटर की एक प्रतिमा मार्केट स्क्वायर मेट्रो में लगाई गई, जो फ्रेडी मर्करी का आखिरी स्थान रहा। झील के किनारे मार्केट स्क्वायर पर स्थित यह प्रतिमा क्वीन बैंड के दिग्गज गायक को श्रद्धांजलि अर्पित करती है और जिनेवा झील का शानदार दृश्य प्रस्तुत करती है।
फ्रेडी मर्करी का जन्म ५ सितंबर १९४६ को हुआ था और इन्होंने १९७० में ब्रायन और रोजर टेलर के साथ बैंड क्वीन का गठन किया था। ठअगर आपको मन की शांति चाहिए, तो आपको मोन्त्रो आना चाहिए।ठ ये शब्द फ्रेडरिक मर्करी ने अपनी दोस्त मॉन्टसेराट के बाले से कहा था, जिनके साथ उन्होंने ८० के दशक के अंत में प्रसिद्ध गीत ठबार्सिलोनाठ रिकॉर्ड किया था। यह गीत, जो ओपेरा के प्रति मर्करी के प्रेम को दर्शाता है, १९९२ में कैटलन ओलंपिक खेलों का आधिकारिक राष्ट्रगान बन गया।
१९८७ से फ्रेडरिक मर्करी धीरे-धीरे क्षेत्र से इतना जुड़ गए कि अंततः उन्होंने अपना जीवन अपने मुख्य लंदन निवास गार्डन लॉज और मोन्त्रो के बीच बाँटने का फैसला किया। अपने नए निवास से झील और पहाड़ों को निहारते हुए उन्हें ठए विंटर्स टेलठ के बोल लिखने की प्रेरणा मिली। यह गीत मोन्त्रो शहर के प्रति एक श्रद्धांजलि है। यह गीत १९९५ में रिलीज हुए उनके मरणोपरांत एल्बम ठमेड इन हेवनठ में शामिल है। 

सूर्यास्त के समय यहाँ आना सबसे अच्छा लगता है। सूर्यास्त इस स्थान को सांस्कृतिक और दार्शनिक दोनों दृष्टि से बेहद आकर्षक बनाता है। क्वीन स्टूडियो एक्सपीरियंस मोन्त्रो के सबसे लोकप्रिय सांस्कृतिक आकर्षणों में से एक है। मोन्त्रो कैसीनो के अंदर स्थित यह इंटरएक्टिव संग्रहालय मशहूर बैंड क्वीन को समर्पित है, जिसमें शहर के लिए कई एल्बम रिकॉर्ड किए गए थे।
जैज़ महोत्सव दुनिया के सबसे प्रसिद्ध संगीत समारोह में से एक है। हर गर्मी में पर्यटकों के मोन्त्रो आने का एक प्रमुख कारण है। तो सप्ताह तक चलने वाला यह महोत्सव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कलाकारों और दुनिया भर के संगीत प्रेमियों को आकर्षित करता है। शहर भर के प्रतिष्ठित स्थान पर संगीत कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिससे एक जीवंत वातावरण बन जाता है।
इस साल का जैज़ महोत्सव ३ से १८ जुलाई २०२६ में मोन्त्रो अपने ६०वें संस्करण का आयोजन एक बिल्कुल नए सम्मेलन केंद्र में करेगा। २ साल के अंतराल के बाद दर्शक एक बार फिर अपने प्रतिष्ठित स्थलों स्ट्राविंस्की ऑडिटोरियम और जैज़ लैब में दिग्गज प्रतिभाओं को गाता हुआ सुन पाएँगे।
आपकी स्विट्जरलैंड यात्रा मोन्त्रो में आए बिना अधूरी ही रहेगी, क्योंकि प्रकृति का जो सौंदर्य यहाँ है, वह आपको दुनिया के किसी भी कोने में मिलना शायद असंभव है। तो सोच क्या रहे हैं, बनाइए स्विट्जरलैंड यात्रा का कार्यक्रम।

फ्रेडरिक मर्करी की प्रतिमा, जिनेवा झील और पर्वत श्रृंखला
झील के किनारे फूल-पौधे 

डॉ. जितेन्द्र प्रताप सिंह

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