हे सखा कृष्ण बनो
यह विचारप्रधान लेख स्त्री-पुरुष की मित्रता को सामाजिक दृष्टिकोण, विश्वास और मर्यादा के संदर्भ में प्रस्तुत करता है। लेख स्पष्ट करता है कि स्त्री और पुरुष के बीच मित्रता अपने आप में गलत नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब इस पवित्र संबंध में स्वार्थ, छल, वासना या शोषण प्रवेश कर जाता है। सच्ची मित्रता विश्वास, सम्मान, निस्वार्थता, संवेदनशीलता और आत्मसंयम पर आधारित होती है। श्रीकृष्ण और द्रौपदी की मित्रता को आदर्श उदाहरण मानते हुए लेख यह संदेश देता है कि मित्रता अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है और किसी भी रिश्ते की सबसे बड़ी पूँजी विश्वास व सम्मान होना चाहिए।
आज के परिदृश्य में स्त्री-पुरुष की मित्रता एक सामान्य सामाजिक वास्तविकता बन चुकी है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, कार्यालयों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर स्त्री और पुरुष सहजता से साथ कार्य करते हैं, विचार साझा करते हैं, हँसते-बोलते हैं। यदि उनसे उनके संबंध के बारे में पूछा जाए, तो प्रायः उत्तर मिलता है-
ठजस्ट ए फ्रेंड, नथिंग एल्स।ठ
इस धरा पर स्त्री अनेक रूपों में हमारे जीवन का हिस्सा बनती है-माता, बहन, पत्नी, दादी, बुआ, मौसी, बेटी और प्रेमिका। इन सभी संबंधों को समाज ने सहज स्वीकार किया है, किंतु जब स्त्री और पुरुष के बीच केवल ठमित्रताठ का संबंध होता है, तब अनेक बार उस पर प्रश्नचिह्न लग जाते हैं।
ऐसा क्यों?
क्योंकि कुछ लोगों ने मित्रता जैसे पवित्र संबंध का दुरुपयोग किया है। मित्रता का मुखौटा पहनकर स्वार्थ, छल, कपट और वासना को छिपाने का प्रयास किया जाता है। ऐसी घटनाएँ समाज के मन में संदेह पैदा करती हैं और एक निर्मल संबंध भी अविश्वास के घेरे में आ जाता है।
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वास्तविक मित्रता विश्वास, सम्मान, स्नेह, निस्वार्थता और मर्यादा की नींव पर खड़ी होती है। मित्र वह नहीं जो अवसर देखकर साथ बदल ले, बल्कि वह है जो कठिन समय में बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहे।
आज यह भी देखा जाता है कि कुछ लोग वैवाहिक या व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं से बचने के लिए मित्रता की सीमाएँ लाँघ बैठते हैं। कहीं भावनात्मक निर्भरता प्रेम का रूप ले लेती है, तो कहीं स्वार्थ या आकर्षण संबंधों को कलुषित कर देता है। कुछ मामलों में मित्रता के नाम पर छल, शोषण और अपराध तक सामने आते हैं। ऐसी घटनाएँ मित्रता नहीं, बल्कि विश्वास की हत्या हैं।
स्वार्थ की मित्रता भी कम घातक नहीं होती। कई बार लोग केवल अपना काम निकालने के लिए किसी को मित्र बनाते हैं। ठतुम तो मेरे दोस्त हो, तुम मना नहीं करोगेठ ऐसे वाक्यों के पीछे कई बार भावनात्मक शोषण छिपा होता है। यह मित्रता नहीं, बल्कि उपयोगितावाद है।
मित्र बनना और मित्रता निभाना सरल नहीं है। इसके लिए मन की पवित्रता, निष्कपटता, संवेदनशीलता और आत्मसंयम आवश्यक है। मित्रता अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; अपेक्षा नहीं, विश्वास है।
भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण और द्रौपदी की मित्रता इसका सर्वोच्च उदाहरण है। श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को सदैव अपनी सखी माना। उस संबंध में न कोई स्वार्थ था, न वासना, न कोई सामाजिक बंधन; वहाँ केवल आत्मीयता, सम्मान और धर्म की रक्षा का संकल्प था। जब द्रौपदी का सम्मान संकट में पड़ा, तब श्रीकृष्ण उसके सबसे बड़े सहायक बनकर सामने आए। उन्होंने मित्रता को केवल शब्दों से नहीं, अपने आचरण से परिभाषित किया।
आज आवश्यकता ऐसे ही मित्रों की है-जो किसी स्त्री को सम्मान की दृष्टि से देखें, उसकी गरिमा की रक्षा करें और उसके विश्वास को कभी टूटने न दें। उसी प्रकार स्त्री भी मित्रता को स्वार्थ का साधन नहीं, बल्कि आत्मीयता का पवित्र संबंध माने।
स्त्री-पुरुष का मित्र होना कभी गलत नहीं हो सकता। गलत तब होता है, जब मित्रता की मर्यादा भंग होती है। यदि संबंध परस्पर सम्मान, विश्वास और शुद्ध भावना पर आधारित हो, तो वह किसी भी अन्य पवित्र संबंध की तरह समाज के लिए प्रेरणादायी बन सकता है।
आइए, मित्रता को उसके वास्तविक अर्थ में जीना सीखें। स्वार्थ, छल, कपट और वासना से ऊपर उठकर ऐसा संबंध बनाएँ, जहाँ विश्वास सबसे बड़ी पूँजी हो और सम्मान सबसे बड़ा उपहार।
तभी यह संबंध गंगा की धारा की भाँति निर्मल, पवित्र और जीवनदायी बन सकेगा।
हे कन्हैया! फिर एक बार आ जाओ,
मित्रता की सच्ची मिसाल दिखा जाओ।
हर मन में विश्वास का दीप जला दो,
हर संबंध को मर्यादा का पथ बता दो।
सखा बनो वैसे, जैसे तुम द्रौपदी के थे-
निस्वार्थ, निर्भय, करुणामय और अटल।
ताकि इस युग की मित्रता भी
पवित्रता का पर्याय बन सके।
वंदना मिश्रा "वाणी
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