पर्यावरण और हिन्दू धर्म (विश्व पर्यावरण दिवस पर) : Environment and Hinduism (on World Environment Day)

This article reflects on India's ancient Sanatan values for environmental reverence in the context of World Environment Day, while addressing current challenges like deforestation, pollution, and ecological imbalance. हिन्दू धर्म में धरती को हमारी माता का स्थान दिया गया है इसलिए कोई भी ऐसा कार्य जिससे धरती माता को नुक्सान हो क्षति पहंचे, वह निषेध है, अस्वीकार्य है। हिंदू धर्म में वेदों, उपनिषदों, पुराणों, सूत्रों और अन्य पवित्र ग्रंथों में ईश्वर की पूजा के कई संदर्भ हैं। लाखों हिंदू अपनी नदियों, पहाड़ों, पेड़ों, जानवरों और पृथ्वी के प्रति श्रद्धा रखने के लिए प्रतिदिन संस्कृत मंत्रों का पाठ करते हैं।

Jul 7, 2025 - 15:06
Jul 10, 2025 - 17:57
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पर्यावरण और हिन्दू धर्म  (विश्व पर्यावरण दिवस पर) : Environment and Hinduism (on World Environment Day)
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 Environment and Hinduism (on World Environment Day) : पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए विश्व पर्यावरण दिवस हर साल ५ जून को मनाया जाता है और यह पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जागरूकता और कार्रवाई को प्रोत्साहित करता है। यह कई गैर-सरकारी संगठनों, व्यवसायों, सरकारी संस्थाओं द्वारा समर्थित है, और पर्यावरण का समर्थन करने वाला प्राथमिक संयुक्त राष्ट्र आउटरीच दिवस है। पहली बार १९७३ में आयोजित, यह समुद्री प्रदूषण, अधिक जनसंख्या, ग्लोबल वार्मिंग, सतत विकास और वन्यजीव अपराध जैसे पर्यावरणीय मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के लिए एक मंच रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस सार्वजनिक आउटरीच के लिए एक वैश्विक मंच है, जिसमें सालाना १४३ से अधिक देश भागीदारी करते हैं, जिसमें अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, ब्राजील, कनाडा, चिली, डेनमार्क, फिनलैंड, जर्मनी, भारत, इजरायल, इटली, जापान, मैक्सिको, नीदरलैंड, नॉर्वे, फिलीपींस, पोलैंड, दक्षिण का, स्पेन, स्विट्जरलैंड, थाईलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका की भागीदारी शामिल है। हर साल, कार्यक्रम ने व्यवसायों, गैर सरकारी संगठनों, समुदायों, राजनेताओं और सितारों के लिए पर्यावरणीय कारणों की वकालत करने के लिए एक थीम और मंच प्रदान किया गया है। 
विश्व पर्यावरण दिवस की स्थापना १९७२ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्टॉकहोम में मानव पर्यावरण पर आयोजित सम्मेलन (५-१६ जून १९७२) में की गई थी, जो मानवीय अंतःक्रियाओं और पर्यावरण के एकीकरण पर चर्चाओं का परिणाम था। एक साल बाद, १९७३ में, पहला विश्व पर्यावरण दिवस ‘केवल एक पृथ्वी' थीम के साथ आयोजित किया गया था। यह तो हुई विश्व व्यवस्था लेकिन हिन्दू धर्म में तो पर्यावरण के प्रति प्रेम हमारी जीवन शैली का हिस्सा है हमारे यहाँ कहा गया है-


‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।
‘पृथ्वी हमारी माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूं'
हिन्दू धर्म में धरती को हमारी माता का स्थान दिया गया है इसलिए कोई भी ऐसा कार्य जिससे धरती माता को नुक्सान हो क्षति पहंचे, वह निषेध है, अस्वीकार्य है। हिंदू धर्म में वेदों, उपनिषदों, पुराणों, सूत्रों और अन्य पवित्र ग्रंथों में ईश्वर की पूजा के कई संदर्भ हैं। लाखों हिंदू अपनी नदियों, पहाड़ों, पेड़ों, जानवरों और पृथ्वी के प्रति श्रद्धा रखने के लिए प्रतिदिन संस्कृत मंत्रों का पाठ करते हैं। हालाँकि चिपको (पेड़ों को गले लगाना) आंदोलन हिंदू पर्यावरण नेतृत्व का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला उदाहरण है, लेकिन पर्यावरण के लिए हिंदू संवेदनशीलता के सदियों पुराने उदाहरण हैं। 
हिंदू धर्म एक असाधारण रूप से विविध धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना है जिसमें कई स्थानीय और क्षेत्रीय अभिव्यक्तियाँ हैं। विश्वासों के इस ब्रह्मांड के भीतर, कई महत्वपूर्ण विषय उभर कर सामने आते हैं। हिंदू धर्म और जैन धर्म के विविध धर्मशास्त्र यह सुझाव देते हैं कि पृथ्वी को देवी का स्वरूप माना जाय और उसके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए। पांच तत्व (अंतरिक्ष, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) परस्पर जुड़े जीवन का मूल हैं। शरीर की उत्पत्ति इन्ही तत्वों से हुई है और इन्ही में शरीर अंत में मिल जाता है और प्रत्येक तत्व को पाँच इंद्रियों में से एक से जोड़ता है। मानव नाक पृथ्वी से जुड़ी है, जीभ पानी से, आँखें अग्नि से, त्वचा वायु से और कान अंतरिक्ष से जुड़े हैं। हमारी इंद्रियों और तत्वों के बीच यह बंधन प्राकृतिक दुनिया के साथ हमारे मानवीय संबंधों की नींव है। ‘ब्रह्म से आकाश उत्पन्न होता है, आकाश से वायु उत्पन्न होती है, वायु से अग्नि उत्पन्न होती है, अग्नि से जल उत्पन्न होता है, और जल से पृथ्वी उत्पन्न होती है।' धर्म, जिसका अक्सर अनुवाद ‘कर्तव्य' के रूप में किया जाता है, को पृथ्वी की देखभाल करने की हमारी जिम्मेदारी के रूप में पुनर्व्याख्या के रूप में देखा जा सकता है। प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार सीधे हमारे कर्म को प्रभावित करता है। 


हिंदू धर्म में प्रचीन समय से ही सभी तत्वों की पूजा का महत्व रहा है। हिंदू धर्म में प्रकृति को देवी-देवता और पितृदेव माना गया है। यही कारण है कि हिंदू धर्म के अनेकों तीज-त्योहार पर्यावरण और प्रकृति से जुड़े हैं। इन तीज त्योहारों को ऋतु, संक्रांति, नवसंवत्सर, छठ पूजा, बसंत पंचमी, आवंला नवमी, गंगा दशहरा, वट सावित्री, गोवर्धन पूजा आदि के रूप में मनाया जाता है। इतना ही नहीं हिंदू धर्म में यज्ञ का संबंध भी पर्यावरण से होता है। इन सब चीजों को हिन्दू धर्म में जीवन पद्धति के रूप में स्थापित किया गया है जिससे यह जीवन का अभिन्न अंग बन जाय और जीवन में आत्मसात हो जाये।
सनातन धर्म में ६ तरह की ऋतुओं का जिक्र मिलता है जो कि प्रकृति, पर्यावरण और परंपरा से जुड़ी है। इनमें बसंत, ग्रीष्म और वर्षा देवी ऋतु है। शरद, हेमंत और शिशिर पितरों की ऋतु हैं। वसंत ऋतु में नववर्ष है, ग्रीष्म ऋतु में देवशयनी एकादशी और गुरु पूर्णिमा है, वर्षा में सावन मास, शरद में शारदीय नवरात्रि, हेमंत में दीपावली और गोवर्धन पूजा, शिशिर में मकर संक्रांति और महाशिवरात्रि है। ये सारे तीज-त्योहार मौसम परिवर्तन की सूचना देते हैं।


चैत्र माह की शुरुआत होते ही सूर्य की गति में बदलाव होने लगता है और इस समय कई पर्व मनाए जाते हैं जो नवसंवत्सर यानी नववर्ष से जुड़े हैं, हालांकि अलग-अलग राज्यों में इसके नाम अलग-अलग होते हैं जैसे- महाराष्ट्र में गु़डी पड़वा, आंध्रप्रदेश में उगादि, सिंधु प्रांत में चेटी चंड, कश्मीर में नौरोज। इन्हें केवल नया साल का दिन नहीं बल्कि प्रकृति में नवजीवन का प्रतीक माना जाता है।
हर महीने सूर्य का राशि परिवर्तन होता है, जिसे संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इनमें कुछ संक्रांति ऐसी होती है जो सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन से जुड़ी है


छठ पूजा जिसे कि प्रकृति पर्व ही कहा जाता है। इसका कारण यह है कि यह पर्व सूर्य, जल और प्रकृति के अन्य तत्वों को समर्पित है। छठ पूजा सूर्य उपासना, जल की पूजा, प्रकृति की देवी छठी मईया की पूजा, संयमित दिनचर्या, पर्यावरण चेतना आदि से जुड़ा है। 
बसंत पंचमी पर खेतों में सरसों का चमकना, गेहूं की बलियों का पकना, फूलों में बहार आना, तितलियों का मंडराना और आमों के पेड़ों पर बौर आना पर्यावरण की खूबसूरती नहीं तो भला और क्या है?


इसके साथ ही होली पर होलिका दहन करना, गंगा के अवतरण दिवस पर गंगा दशहरा मनाना, आवंला नवमी, वट सावित्री, तुलसी विवाह, शीतलाष्टमी, अश्वत्थोपनयन व्रत जैसे पर्व में पेड़-पौधे और नदियों की पूजा का महत्व बढ़ाते हैं। गोवर्धन पूजा का पर्व भी प्रकृति से जुड़ा पर्व है। हिंदू धर्म में पौराणिक समय से पूजा-पाठ के दौरान यज्ञ या हवन करने का भी बहुत महत्व है। 
यज्ञ का उद्देश्य भी पर्यावरण जलवायु में सुधार से है। हवन में सात तरह के पेड़ों (आम, बड़, पीपल, ढाक, जांटी, जामुन और शमी) की लकड़ियां होती हैं, जिससे हवन करने पर शुद्धता और सकारात्मकता बढ़ती है। साथ ही हवन में जिन सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है उससे रोग और शोक दूर होते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार, प्रकृति और पर्यावरण हमसे बाहर नहीं हैं, हमारे लिए पराया या शत्रुतापूर्ण नहीं हैं। वे हमारे अस्तित्व का अभिन्न अंग हैं और हमारे शरीर का हिस्सा हैं। पिछली शताब्दियों में, भारतीय समुदाय- अन्य पारंपरिक समुदायों की तरह-  ‘पर्यावरण’ को अपने जीवन की विभिन्न गतिविधियों से अलग नहीं समझते थे। बिश्नोई, भील और स्वाध्याय जैसे कई ग्रामीण हिंदू समुदायों ने स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र जैसे कि जंगलों और जल स्रोतों की रक्षा के लिए मजबूत सांप्रदायिक प्रथाओं को बनाए रखा है। ये समुदाय इन संरक्षण-उन्मुख प्रथाओं को पर्यावरण संबंधी कृत्यों के रूप में नहीं, बल्कि धर्म की अभिव्यक्ति के रूप में करते हैं।


कई हिंदू रीति-रिवाजों में माना जाता है कि मनुष्य को पृथ्वी से लाभ मिलता है और बदले में वे कृतज्ञता और सुरक्षा प्रदान करते हैं। कई हिंदू हर सुबह बिस्तर से उठने से पहले ज़मीन को छूते हैं और देवी से उनके शरीर को रौंदने के लिए माफ़ी मांगते हैं।
यह सब सत्य है लेकिन भारत में ही बढ़ती जनसंख्या और उससे उपजी समस्यायों ने प्रकृति के इस संतुलन को बहुत हद तक बिगाड़ दिया है। इसके पीछे अनेक कारक हो सकते हैं लेकिन पर्यावरण के गिरते स्तर को देखते हुए अब सचेत होने की आवश्यकता है। हमे जो कुछ भी सिखाया गया है हमारे पूर्वजों के द्वारा या हमारे धर्म ग्रन्थों में दी गयी शिक्षा अब उस तरह का प्रभाव नहीं डाल रही है। वर्ष २०२४ के वैश्विक प्रकृति संरक्षण सूचकांक (प्रकृति संरक्षण सूचकांक : र्‍ण्घ्) में भारत १७६ वें स्थान पर है। १८० देशों में से यह किरिबाती (१८०), तुर्की (१७९), इराक (१७८) और माइक्रोनेशिया (१७७) के साथ सबसे कम रैंक वाले पांच देशों में से एक है। सत्य यह है कि भारत में वनोन्मूलन के परिणामस्वरूप वर्ष २००१ और २०१९ के बीच २३,३०० वर्ग किलोमीटर वृक्ष क्षेत्र नष्ट हो गया। भारत के सार्वभौम संसाधनों को लगातार अधिक जनसंख्या के कारण खतरा बना हुआ है। 
इसका अर्थ यह है कि अब पर्यावरण के प्रति जागरूकता और अधिक बढ़ानी अत्यंत आवश्यक है। प्राकृतिक पर्यावरण और संसाधनों की रक्षा करना, प्रदूषण को रोकना और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प नही है। यह कार्य व्यक्ति, समुदाय और सरकार द्वारा मिलकर किया जा सकता है। 


इसका मुख्य उद्देश्य ही पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करना, पहले से हुई क्षति की भरपाई करना है तथा नुकसानदायक गतिविधियों को रोककर संतुलन बहाल करना है। इसमें जल, वायु, मृदा, वन और जैव विविधता की रक्षा शामिल है। इसका उद्देश्य है, पृथ्वी के संतुलन को बनाए रखना और मानव जीवन के लिए एक स्वस्थ वातावरण प्रदान करना। यह केवल प्रकृति की रक्षा नहीं है, बल्कि यह हमारे अपने अस्तित्व की सुरक्षा का भी मामला है। जब हम पर्यावरण को संरक्षित करते हैं, तो हम वास्तव में अपनी जीवन शैली को सुधारने और अपनी भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं।
पर्यावरण संरक्षण से हमारी स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है। स्वच्छ पर्यावरण में रहने से बीमारियों का खतरा कम होता है और हम अधिक स्वस्थ रहते हैं। प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों, जैसे अस्थमा, हृदय रोग और कैंसर का खतरा भी कम हो जाता है। पर्यावरण संरक्षण से हमें स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने का मौका मिलता है। एक स्वच्छ और हरा-भरा वातावरण हमारी मानसिक स्थिति को भी बेहतर बनाता है और हमें एक सकारात्मक दृष्टिकोण से जीवन जीने में मदद करता है। पर्यावरण संरक्षण हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें इसे गंभीरता से लेना चाहिए और इसके लिए सभी संभव उपाय करने चाहिए। पर्यावरण की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है और हमें इसे हर हाल में पूरा करना चाहिए।

रचना दीक्षित 
ग्रेटर नोएडा 

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